Hunooz Khawab Mein…. By Rasheed Amjad

हुनूज़ ख़ाब में….

लेखक: रशीद अमजद 

[उर्दू से हिंदी तर्जुमा: शीराज़ हसन, इदारत: गीताली तारे]

आग अब चारों तरफ थी, तपिश में इज़ाफ़ा[i] हो रहा था, लेकिन आग नज़र नहीं आती थी, लोग हैरान हो हो कर चारों तरफ देखते थे लेकिन कुछ दिखाई न देता|

मुर्शद ने कहानी सुनी कि “जब दुश्मन ने शहर पर हमला किया तो वो मीलों दूर से आता दिखाई दिया| शहरवालों ने फसीलों[ii] पर तीरंदाज़ खड़े  कर दिए, सिपाही और नेज़े[iii] तान कर सफों में आ गये. दुश्मन ने फसीलों पर पत्थर बरसाए और एक हिस्सा तोडने में कामयाब हो गया. दूबदू लड़ाई हुई, मरने वाले मर गये और बचने वाले बच गए, जो हुआ आँखों रूबरू हुआ”

उस ने ठंडी आह भरी….  “अब दुश्मन नज़र ही नहीं आता, धमाका होता है तो मालूम होता है की साथ खड़े ने खुद्कुश बेल्ट[iv] बांध रखी थी| न मरने वाले को मालूम कि वो क्यों दूसरों को मार रहा है न मरने वाले को पता की उन का क़सूर क्या है?”

अब शहर का यही हाल था कि सुबह घर से निकले तो मालूम नहीं कौन कौन  वापिस आयेगा और किस किस की सिर्फ़ खबर मालूम होगी. कफ़न-फरोश[v] अलग परेशान कि कफ़न की ज़रुरत ही नहीं और गोर्कन अलग परेशान कि कब्र  की भी ज़रुरत नहीं| हर तरफ एक मंदी ही मंदी थी, इंसानी जानों की भी और चीज़ों की भी, एक ज़माना था कि चीजें मौजूद थीं और जेबें ख़ाली, अब जेबें भरी हुई हैं कि  चीजें गायब|

वो हंसा, उसे अपनी हंसी अजीब-सी लगी कि इस सूरत-ए-हाल में भी वो हंस रहा है| लेकिन फ़ौरन ही एहसास हुआ कि उस की आँखों में आँसू भी हैं. मुर्शद ने तरहम उस की तरफ देखा और बोला …. “जब चीजें बेढंगी होती हैं तो सब उलट-पलट हो जाता है|”

उस ने सवालिया नज़रों से मुर्शद की तरफ देखा. मुर्शद चंद लम्हे[vi] चुप रहा, फ़िर कहने लगा…. “यह एक लम्बा अमल है एक दिन में सब कुछ नहीं हो जाता, बस जो बोओगे वो तो काटना ही पड़ेगा|”

उस ने जेहन पर जोर दिया, “यह ग़लती कहाँ से होती है, अभी, बहुत पहले, बहुत  पहले से भी बहुत पहले कब.”

तारीख के क़ब्रिस्तान में मुर्दा कब्रों पर उन की दास्तान रक़म थी, कहाँ से आग़ाज़[vii] हुआ, कमाल का नुक्ता कहाँ था और ढल्वान का सफ़र कब शुरू हुआ.

तेज़ी से लडखडाते  हुए उस ने एक पत्थर से टेक लगाने की कोशिश की, लेकिन पत्थर भी उस के साथ ही लडखडाने लगा! ऊपर दूर, माज़ी की चमक, अब हाल मुसलसल[viii] फिसलते चले जाना और नीचे मुस्तकबिल[ix] एक अंधी गहरी खाई.

“क्या मुक़द्दर[x] है?” उस ने सोचा, समझ न आया कि हँसे या रोए!

मुर्शद ने कहा…. ” हँसने रोने वाले का किस्सा भी अजीब है”

“क्या”

“एक शख्स को किसी क़सूर की सज़ा मिली कि या सौ प्याज़ खाए या सौ जूते| उस शख्स ने प्याज़ खाने को तरजीह[xi] दी| दो-चार प्याज़ के बाद वह रोने लगा और ख्वाहिश की के उसे जूते मारे जाएँ| तीन-चार जूते खाने क बाद उसे हंसी आ गई की प्याज़ ही बेहतर था सो उस ने सौ जूते भी खाए और सौ प्याज़ भी|”

उस ने सोचा …. “यही मेरा हाल है|”

कुछ देर ख़ामोशी रही, फ़िर उस ने पूछा… “यह मामला क्या है?”

मुर्शद बोला… “पहले दिन से ही ग़लती हुई है. इब्तदा[xii] इंसान से होती है, इंसान से ज़ुबान, ज़ुबान से अदब[xiii], अदब से तनक़ीद[xiv] और तनक़ीद से तरक्की जनम लेती है, तुम ने इंसान बनने की कोशिश ही नहीं की , अगले मरहले[xv]  कैसे तय होते?”

“तो मैं इंसान भी नहीं” उस ने सोचा|

टीवी की खबर ने उसे अपनी तरफ मुत्वाजः[xvi] कर लिया …. बिग बेंग की असलियत मालूम करने के लिए जो तन्नल[xvii] बनाई गई थी| उस में कुछ ख़राबी पैदा हो गई है जिसे दूर करने की कोशिश की जा रही है|

उस ने चैनल बदल दिया … दूसरे चैनल पर सवाल-जवाब की महफ़िल थी, एक साहब ने सवाल किया … “मग़रिब[xviii] में  हम जब स्टोर से सामान लेने जाते हैं तो सेल्समेन से बकाया रक़म लेते हैं. यह सेल्समेन ग़ैर मज़हब[xix] का है, शराब पीता  है, इन्हीं हाथों शराब उठाता है. क्या इस क हाथों से बकाया लेना जायज़ है?”

वो झुंझला गया … इतना झुंझलाया की सर नोचने और चीखने लगा| घर के सारे लोग भागे दौड़ते आते … “क्या हुआ… क्या हुआ?”

लेकिन वो कुछ कहे बग़ैर चीखता और अपने बाल नोचता रहा|


[i] इज़ाफ़ा = बढ़ोतरी

[ii] फसीलों = separator/divider/ walls

[iii] नेज़े = भाले

[iv] खुद्कुश बेल्ट = suicide belt

[v] कफ़न-फरोश = कफ़न बनाने वाले / Coffin seller

[vi] लम्हे = क्षण

[vii] आगाज़ = शुरुआत

[viii] मुसलसल = लगातार

[ix] मुस्तकबिल = भविष्य

[x] मुक़द्दर = किस्मत

[xi]  तरजीह देना = वरीयता देना/ Giving importance / Recommended

[xii] इब्तदा = शुरुआत

[xiii] अदब = साहित्य / Literature

[xiv] तनकीद = आलोचना

[xv] मरहले = पड़ाव

[xvi] मुत्वाजः = आकर्षित

[xvii] तन्नल = सुरंग

[xviii] मगरिब = पश्चिम

[xix] गैर मज़हब का = दूसरे धर्म का

Below is the original story by Rashid Amjad, in Urdu:

…ہنوز خواب میں

رشید امجد

آگ اب چاروں طرف تھی، تپش میں اضافہ ہو رہا تھا، لیکن آگ نظر نہیں آتی تھی، لوگ حیران ہو ہو کر چاروں طرف دیکھتے تھے لیکن کچھ دکھائی نہ دیتا۔ 

مُرشد نے کہانی سنائی کہ ”جب دشمن نے شہر پر حملہ کیا تو وہ میلوں دُور سے آتا دکھائی دیا۔ شہروالوں نے فصیلوں پر تیرانداز کھڑے کر دیے، سپاہی تلواریں اور نیزے تان کر صفوں میں آگئے۔ دُشمن نے فصیل پر پتھر پرسائے اور ایک حصّہ توڑنے میں کامیاب ہوگیا۔ دُو بدو لڑائی ہوئی، مرنے والے مر گئے اور بچنے والے بچ گئے، جو ہوا آنکھوں کے رُوبرو ہوا“

اُس نے ٹھنڈی آہ بھری…. ”اب دُشمن نظر ہی نہیں آتا، دھماکہ ہوتا ہے تو معلوم ہوا ہے کہ ساتھ کھڑے نے خودکش بیلٹ باندھ رکھی تھی۔ نہ مارنے والے کو معلوم کہ وہ کیوں دوسروں کو مار رہا ہے نہ مرنے والے کو پتہ ہے کہ اُن کا قصور کیا ہے؟“

اب شہر کا یہی حال تھا کہ صبح گھر سے نکلے تو معلوم نہیں کون کون واپس آئے گا اور کس کس کی صرف خبر معلوم ہوگی۔ کفن فروش الگ پریشان کہ کفن کی کی ضرورت ہی نہیں اور گورکن الگ پریشان کہ قبر کی بھی ضرورت نہیں۔ہر طرف مندی ہی مندی تھی، انسانی جانوں کی بھی اور چیزوں کی بھی، ایک زمانہ تھا کہ چیزیں موجود تھیں اور جیبیں خالی، اب جیبیں بھری ہوئی ہیں کہ چیزیں غائب۔ 

وہ ہنسا، اُسے اپنی ہنسی عجیب سی لگی کہ اِس صورتِ حال میں بھی وہ ہنس رہا ہے لیکن فوراً ہی احساس ہوا کہ اُس کی آنکھوں میں آنسو بھی ہیں۔ مُرشد نے ترحم سے اُس کی طرف دیکھا اور بولا …. ”جب چیزیں بے ڈھنگی ہوتی ہیں تو سب کچھ الٹ پلٹ ہوجاتا ہے۔“

اُس نے سوالیہ نظروں سے مُرشد کی طرف دیکھا۔ مُرشد چند لمحے چُپ رہا۔ پھر کہنے لگا…. ”یہ ایک لمبا عمل ہے ایک دِن میں سب کچھ نہیں ہو جاتا، بس جو بوﺅ گے وہ تو کاٹنا ہی پڑے گا“

اُس نے سوالیہ ذہن پر زور دیا، ”یہ غلطی کہاں سے ہوتی ہے، ابھی، بہت پہلے، بہت پہلے سے بھی بہت پہلے کب“

تاریخ کے قبرستان میں مردہ قوموں کے کتبوں پر اُن کی داستان رقم تھی، کہاں سے آغاز ہوا، کمال کا نقطہ کہاں تھا اور ڈھلوان کا سفر کب شروع ہوا۔ 

تیزی سے لڑکھتے ہوئے اُس نے ایک پتھر سے ٹیک لگانے کی کوشش کی، لیکن پتھر بھی اُس کے ساتھ ہی لڑکھنے لگا۔ اُوپر دُور، ماضی کی چمک، اب حال مسلسل پھسلتے چلے جانا اور نیچے مستقبل ایک اندھی گہری کھائی۔

”کیا مقدرہے؟“ اُس نے سوچا، سمجھ نہ آیا کہ ہنسے یا روئے۔
”مُرشد نے کہا….”ہنسنے رونے واکے کا قصّہ بھی عجیب ہے“
”کیا“
”ایک شخص کو کسی قصور کی سزا ملی کہ یا سو پیاز کھائے یا سو جوتے۔ اُس شخص نے پیاز کھانے کی توجیح دی۔ دو چار پیاز کھانے کے بعد وہ رونے لگا اور خواہش کی کہ اُسے جوتے مارے جائیں۔ تین چار جوتے کھانے کے بعد اُسے ہنسی آگئی کہ پیاز ہی بہتر تھا سو اسی رونے ہنسنے میں اُس نے سو جوتے بھی کھائے اور سو پیاز بھی“

اُس نے سوچا….”یہی میرا حال ہے“

کچھ دیر خاموشی رہی، پھر اُس نے پوچھا….”یہ معاملہ کیا ہے؟“

مُرشد بولا…. ”پہلے دِن ہی سے غلطی ہوئی ہے۔ ابتدا انسان سے ہوتی ہے، انسان سے زبان، زبان سے ادب، ادب سے تنقید، تنقید سے ترقی جنم لیتی ہے، تم نے انسان بننے کی کوشش ہی نہیں کی، اگلے مرحلے کیسے طے ہوتے؟“

”تو مَیں انسان بھی نہیں“ اُس نے سوچا۔

ٹی وی کی خبر نے اُسے اپنی طرف متوجہ کر لیا …. بِگ بینگ کی اصلیّت معلوم کرنے کے لئے جو ٹنل بنائی گئی تھی۔ اس میں کچھ خرابی پیدا ہوگئی ہے جسے دُور کرنے کی کوشش کی جارہی ہے۔ 

اُس نے چینل بدل دیا…. دوسرے چینل پرسوال جواب کی محفل تھی، ایک صاحب نے سوال کیا ”مَیں مغرب میں رہتا ہوں ہم جب سٹور سے سامان لینے جاتے ہیں تو سیلزمین سے بقیہ رقم لیتے ہیں۔ یہ سیلزمین غیرمذہب کا ہے، شراب پیتا ہے انہی ہاتھوں سے شراب اُٹھاتا ہے۔ کیا اس کے ہاتھوں سے بقیہ لینا جائز ہے۔“
وہ جھنجھلا گیا…. اتنا جھنجھلایا کہ سر نوچنے اور چیخنے لگا۔ گھر کے سارے لوگ بھاگے دوڑے آتے….”کیا ہوا…. کیا ہوا“

لیکن وہ کچھ کہے بغیر چیختا اور اپنے بال نوچتا رہا۔

٭٭٭

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20 Responses to Hunooz Khawab Mein…. By Rasheed Amjad

  1. Good story. I am glad, you have given Urdu version as well. I cant read Hindi.

  2. Indscribe says:

    Great job. Congrats Mr Hasan and Ms Tare. Its a wonderful job. Hope you will continue posting such stories in both scripts.

  3. Himanshu Sharma says:

    Nice One

  4. Onir says:

    wish there was an English version too :(

  5. A great initiative . But I found that some translations are wrong.
    तरजीह देना = चुनाव करना
    मगरिब = पूर्व
    both wrong.
    Correct translations :-
    तरजीह देना = वरीयता देना
    मगरिब = पश्चिम

  6. Very nice & thought provoking indeed….And the initiative to post in both languages is praiseworthy.

  7. PRAVIN KARKHANIS says:

    Excellent idea ..Many persons like me who do not know Urdu script can read the matter in Devnagari script and enjoy the beauty and grandeur of Urdu language .Giving meaning of some difficult Urdu words in Hindi is also a good idea. I think , if I keep reading this blog regularly for one year , my vocabulary of Urdu will automatically increase. Thanks.

  8. Fatima Aftab says:

    Rashid Amjad buhat haqqeqi kahani aur buhat kubsurat andaaz mein .kash humari qoum such mein tareekh say sabuq seekh kur aaj kay halaat badal paaye

  9. Seema Pervez says:

    “jaiboan mai haram ki kamaai daal kar halaal gosht ki talash mai phirnaiy walloan ke dil mai aise hi was vass-vasaiy (doubts) sur uthha taiy hain… we really dont know what will be the end of this intellectual, emotional and economic confusions

  10. Ibrar Hussain says:

    Rashid Amjad …. really a thoughtful story.

  11. ULFAT ABBAS BALOCH says:

    Very Nice Story , If this story just in Hindi Version i can’t read this. Thanks to translate in Urdu.

  12. ASHRAF HAI says:

    nice one, ab tou aasman say gray or khajoor main atkay houway zamana hou ghaya,
    Baqool Dilawer Figar,
    HALLAT-E-HAZRAA KO KAYEE SAAL HOGAYE

  13. Preeti Kaul says:

    Poignant. I could sense a vivid emotion of each and every sentence written in this story. Thanks for posting it in Hindi. I could understand it well and of course you made it even more understandable by translating some typical Urdu words, Thank you!

  14. cosmosint says:

    Bachpan ka pur sukoon daur ab kitna qeemti aur ek khuab lagta hai….. Ab to bechainiyon ke siwa aur kuchh nahi … liked ur effort

  15. safeer says:

    Too Good to read.

  16. Yasser Nomann says:

    Thought provoking!. Thank you Rashid Amjad sahib. Yasser Nomann

  17. Muhammad Amin says:

    Think about life and death.

  18. Zee says:

    How do I follow this blog?

  19. really commendable effort. more power to your translating fingers!

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