Eidgah… by Munshi Premchand

Eidgah - A story of Eid day.

Eidgah – A story of Eid day.

ईदगाह

मुंशी प्रेमचन्द

रमजान के पूरे तीस रोजों के बाद ईद आयी है। कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभाव है। वृक्षों पर अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक है, आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है। आज का सूर्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है, यानी संसार को ईद की बधाई दे रहा है। गॉंव में कितनी हलचल है। ईदगाह जाने की तैयारियॉँ हो रही हैं। किसी के कुरते में बटन नहीं है, पड़ोस के घर में सुई-धागा लेने दौड़ा जा रहा है। किसी के जूते कड़े हो गए हैं, उनमें तेल डालने के लिए तेली के घर पर भागा जाता है। जल्दी-जल्दी बैलों को सानी-पानी दे दें। ईदगाह से लौटते-लौटते दोपहर हो जाएगी। तीन कोस का पेदल रास्ता, फिर सैकड़ों आदमियों से मिलना-भेंटना, दोपहर के पहले लोटना असम्भव है। लड़के सबसे ज्यादा प्रसन्न हैं। किसी ने एक रोजा रखा है, वह भी दोपहर तक, किसी ने वह भी नहीं, लेकिन ईदगाह जाने की खुशी उनके हिस्से की चीज है। रोजे बड़े-बूढ़ो के लिए होंगे। इनके लिए तो ईद है। रोज ईद का नाम रटते थे, आज वह आ गई। अब जल्दी पड़ी है कि लोग ईदगाह क्यों नहीं चलते। इन्हें गृहस्थी चिंताओं से क्या प्रयोजन! सेवैयों के लिए दूध ओर शक्कर घर में है या नहीं, इनकी बला से, ये तो सेवेयां खाऍंगे। वह क्या जानें कि अब्बाजान क्यों बदहवास चौधरी कायमअली के घर दौड़े जा रहे हैं। उन्हें क्या खबर कि चौधरी ऑंखें बदल लें, तो यह सारी ईद मुहर्रम हो जाए। उनकी अपनी जेबों में तो कुबेर काधन भरा हुआ है। बार-बार जेब से अपना खजाना निकालकर गिनते हैं और खुश होकर फिर रख लेते हैं। महमूद गिनता है, एक-दो, दस,-बारह, उसके पास बारह पैसे हैं। मोहनसिन के पास एक, दो, तीन, आठ, नौ, पंद्रह पैसे हैं। इन्हीं अनगिनती पैसों में अनगिनती चीजें लाऍंगें— खिलौने, मिठाइयां, बिगुल, गेंद और जाने क्या-क्या।
और सबसे ज्यादा प्रसन्न है हामिद। वह चार-पॉँच साल का गरीब सूरत, दुबला-पतला लड़का, जिसका बाप गत वर्ष हैजे की भेंट हो गया और मॉँ न जाने क्यों पीली होती-होती एक दिन मर गई। किसी को पता क्या बीमारी है। कहती तो कौन सुनने वाला था? दिल पर जो कुछ बीतती थी, वह दिल में ही सहती थी ओर जब न सहा गया,. तो संसार से विदा हो गई। अब हामिद अपनी बूढ़ी दादी अमीना की गोद में सोता है और उतना ही प्रसन्न है। उसके अब्बाजान रूपये कमाने गए हैं। बहुत-सी थैलियॉँ लेकर आऍंगे। अम्मीजान अल्लहा मियॉँ के घर से उसके लिए बड़ी अच्छी-अच्छी चीजें लाने गई हैं, इसलिए हामिद प्रसन्न है। आशा तो बड़ी चीज है, और फिर बच्चों की आशा! उनकी कल्पना तो राई का पर्वत बना लेती हे। हामिद के पॉंव में जूते नहीं हैं, सिर परएक पुरानी-धुरानी टोपी है, जिसका गोटा काला पड़ गया है, फिर भी वह प्रसन्न है। जब उसके अब्बाजान थैलियॉँ और अम्मीजान नियमतें लेकर आऍंगी, तो वह दिल से अरमान निकाल लेगा। तब देखेगा, मोहसिन, नूरे और सम्मी कहॉँ से उतने पैसे निकालेंगे।
अभागिन अमीना अपनी कोठरी में बैठी रो रही है। आज ईद का दिन, उसके घर में दाना नहीं! आज आबिद होता, तो क्या इसी तरह ईद आती ओर चली जाती! इस अन्धकार और निराशा में वह डूबी जा रही है। किसने बुलाया था इस निगोड़ी ईद को? इस घर में उसका काम नहीं, लेकिन हामिद! उसे किसी के मरने-जीने के क्या मतल? उसके अन्दर प्रकाश है, बाहर आशा। विपत्ति अपना सारा दलबल लेकर आये, हामिद की आनंद-भरी चितबन उसका विध्वसं कर देगी।
हामिद भीतर जाकर दादी से कहता है—तुम डरना नहीं अम्मॉँ, मै सबसे पहले आऊँगा। बिल्कुल न डरना।
अमीना का दिल कचोट रहा है। गॉँव के बच्चे अपने-अपने बाप के साथ जा रहे हैं। हामिद का बाप अमीना के सिवा और कौन है! उसे केसे अकेले मेले जाने दे? उस भीड़-भाड़ से बच्चा कहीं खो जाए तो क्या हो? नहीं, अमीना उसे यों न जाने देगी। नन्ही-सी जान! तीन कोस चलेगा कैसे? पैर में छाले पड़ जाऍंगे। जूते भी तो नहीं हैं। वह थोड़ी-थोड़ी दूर पर उसे गोद में ले लेती, लेकिन यहॉँ सेवैयॉँ कोन पकाएगा? पैसे होते तो लौटते-लोटते सब सामग्री जमा करके चटपट बना लेती। यहॉँ तो घंटों चीजें जमा करते लगेंगे। मॉँगे का ही तो भरोसा ठहरा। उस दिन फहीमन के कपड़े सिले थे। आठ आने पेसे मिले थे। उस उठन्नी को ईमान की तरह बचाती चली आती थी इसी ईद के लिए लेकिन कल ग्वालन सिर पर सवार हो गई तो क्या करती? हामिद के लिए कुछ नहीं हे, तो दो पैसे का दूध तो चाहिए ही। अब तो कुल दो आने पैसे बच रहे हैं। तीन पैसे हामिद की जेब में, पांच अमीना के बटुवें में। यही तो बिसात है और ईद का त्यौहार, अल्ला ही बेड़ा पर लगाए। धोबन और नाइन ओर मेहतरानी और चुड़िहारिन सभी तो आऍंगी। सभी को सेवेयॉँ चाहिए और थोड़ा किसी को ऑंखों नहीं लगता। किस-किस सें मुँह चुरायेगी? और मुँह क्यों चुराए? साल-भर का त्योंहार हैं। जिन्दगी खैरियत से रहें, उनकी तकदीर भी तो उसी के साथ है: बच्चे को खुदा सलामत रखे, यें दिन भी कट जाऍंगे।
गॉँव से मेला चला। ओर बच्चों के साथ हामिद भी जा रहा था। कभी सबके सब दौड़कर आगे निकल जाते। फिर किसी पेड़ के नींचे खड़े होकर साथ वालों का इंतजार करते। यह लोग क्यों इतना धीरे-धीरे चल रहे हैं? हामिद के पैरो में तो जैसे पर लग गए हैं। वह कभी थक सकता है? शहर का दामन आ गया। सड़क के दोनों ओर अमीरों के बगीचे हैं। पक्की चारदीवारी बनी हुई है। पेड़ो में आम और लीचियॉँ लगी हुई हैं। कभी-कभी कोई लड़का कंकड़ी उठाकर आम पर निशान लगाता हे। माली अंदर से गाली देता हुआ निंलता है। लड़के वहाँ से एक फलॉँग पर हैं। खूब हँस रहे हैं। माली को केसा उल्लू बनाया है।
बड़ी-बड़ी इमारतें आने लगीं। यह अदालत है, यह कालेज है, यह क्लब घर है। इतने बड़े कालेज में कितने लड़के पढ़ते होंगे? सब लड़के नहीं हैं जी! बड़े-बड़े आदमी हैं, सच! उनकी बड़ी-बड़ी मूँछे हैं। इतने बड़े हो गए, अभी तक पढ़ते जाते हैं। न जाने कब तक पढ़ेंगे ओर क्या करेंगे इतना पढ़कर! हामिद के मदरसे में दो-तीन बड़े-बड़े लड़के हें, बिल्कुल तीन कौड़ी के। रोज मार खाते हैं, काम से जी चुराने वाले। इस जगह भी उसी तरह के लोग होंगे ओर क्या। क्लब-घर में जादू होता है। सुना है, यहॉँ मुर्दो की खोपड़ियां दौड़ती हैं। और बड़े-बड़े तमाशे होते हें, पर किसी कोअंदर नहीं जाने देते। और वहॉँ शाम को साहब लोग खेलते हैं। बड़े-बड़े आदमी खेलते हें, मूँछो-दाढ़ी वाले। और मेमें भी खेलती हैं, सच! हमारी अम्मॉँ को यह दे दो, क्या नाम है, बैट, तो उसे पकड़ ही न सके। घुमाते ही लुढ़क जाऍं।
महमूद ने कहा—हमारी अम्मीजान का तो हाथ कॉँपने लगे, अल्ला कसम।
मोहसिन बोल—चलों, मनों आटा पीस डालती हैं। जरा-सा बैट पकड़ लेगी, तो हाथ कॉँपने लगेंगे! सौकड़ों घड़े पानी रोज निकालती हैं। पॉँच घड़े तो तेरी भैंस पी जाती है। किसी मेम को एक घड़ा पानी भरना पड़े, तो ऑंखों तक अँधेरी आ जाए।
महमूद—लेकिन दौड़तीं तो नहीं, उछल-कूद तो नहीं सकतीं।
मोहसिन—हॉँ, उछल-कूद तो नहीं सकतीं; लेकिन उस दिन मेरी गाय खुल गई थी और चौधरी के खेत में जा पड़ी थी, अम्मॉँ इतना तेज दौड़ी कि में उन्हें न पा सका, सच।
आगे चले। हलवाइयों की दुकानें शुरू हुई। आज खूब सजी हुई थीं। इतनी मिठाइयॉँ कौन खाता? देखो न, एक-एक दूकान पर मनों होंगी। सुना है, रात को जिन्नात आकर खरीद ले जाते हैं। अब्बा कहते थें कि आधी रात को एक आदमी हर दूकान पर जाता है और जितना माल बचा होता है, वह तुलवा लेता है और सचमुच के रूपये देता है, बिल्कुल ऐसे ही रूपये।
हामिद को यकीन न आया—ऐसे रूपये जिन्नात को कहॉँ से मिल जाऍंगी?
मोहसिन ने कहा—जिन्नात को रूपये की क्या कमी? जिस खजाने में चाहें चले जाऍं। लोहे के दरवाजे तक उन्हें नहीं रोक सकते जनाब, आप हैं किस फेर में! हीरे-जवाहरात तक उनके पास रहते हैं। जिससे खुश हो गए, उसे टोकरों जवाहरात दे दिए। अभी यहीं बैठे हें, पॉँच मिनट में कलकत्ता पहुँच जाऍं।
हामिद ने फिर पूछा—जिन्नात बहुत बड़े-बड़े होते हैं?
मोहसिन—एक-एक सिर आसमान के बराबर होता है जी! जमीन पर खड़ा हो जाए तो उसका सिर आसमान से जा लगे, मगर चाहे तो एक लोटे में घुस जाए।
हामिद—लोग उन्हें केसे खुश करते होंगे? कोई मुझे यह मंतर बता दे तो एक जिनन को खुश कर लूँ।
मोहसिन—अब यह तो न जानता, लेकिन चौधरी साहब के काबू में बहुत-से जिन्नात हैं। कोई चीज चोरी जाए चौधरी साहब उसका पता लगा देंगे ओर चोर का नाम बता देगें। जुमराती का बछवा उस दिन खो गया था। तीन दिन हैरान हुए, कहीं न मिला तब झख मारकर चौधरी के पास गए। चौधरी ने तुरन्त बता दिया, मवेशीखाने में है और वहीं मिला। जिन्नात आकर उन्हें सारे जहान की खबर दे जाते हैं।
अब उसकी समझ में आ गया कि चौधरी के पास क्यों इतना धन है और क्यों उनका इतना सम्मान है।
आगे चले। यह पुलिस लाइन है। यहीं सब कानिसटिबिल कवायद करते हैं। रैटन! फाय फो! रात को बेचारे घूम-घूमकर पहरा देते हैं, नहीं चोरियॉँ हो जाऍं। मोहसिन ने प्रतिवाद किया—यह कानिसटिबिल पहरा देते हें? तभी तुम बहुत जानते हों अजी हजरत, यह चोरी करते हैं। शहर के जितने चोर-डाकू हें, सब इनसे मुहल्ले में जाकर ‘जागते रहो! जाते रहो!’ पुकारते हें। तभी इन लोगों के पास इतने रूपये आते हें। मेरे मामू एक थाने में कानिसटिबिल हें। बरस रूपया महीना पाते हें, लेकिन पचास रूपये घर भेजते हें। अल्ला कसम! मैंने एक बार पूछा था कि मामू, आप इतने रूपये कहॉँ से पाते हैं? हँसकर कहने लगे—बेटा, अल्लाह देता है। फिर आप ही बोले—हम लोग चाहें तो एक दिन में लाखों मार लाऍं। हम तो इतना ही लेते हैं, जिसमें अपनी बदनामी न हो और नौकरी न चली जाए।
हामिद ने पूछा—यह लोग चोरी करवाते हैं, तो कोई इन्हें पकड़ता नहीं?
मोहसिन उसकी नादानी पर दया दिखाकर बोला..अरे, पागल! इन्हें कौन पकड़ेगा! पकड़ने वाले तो यह लोग खुद हैं, लेकिन अल्लाह, इन्हें सजा भी खूब देता है। हराम का माल हराम में जाता है। थोड़े ही दिन हुए, मामू के घर में आग लग गई। सारी लेई-पूँजी जल गई। एक बरतन तक न बचा। कई दिन पेड़ के नीचे सोए, अल्ला कसम, पेड़ के नीचे! फिरन जाने कहॉँ से एक सौ कर्ज लाए तो बरतन-भॉँड़े आए।
हामिद—एक सौ तो पचार से ज्यादा होते है?
‘कहॉँ पचास, कहॉँ एक सौ। पचास एक थैली-भर होता है। सौ तो दो थैलियों में भी न आऍं?
अब बस्ती घनी होने लगी। ईइगाह जाने वालो की टोलियॉँ नजर आने लगी। एक से एक भड़कीले वस्त्र पहने हुए। कोई इक्के-तॉँगे पर सवार, कोई मोटर पर, सभी इत्र में बसे, सभी के दिलों में उमंग। ग्रामीणों का यह छोटा-सा दल अपनी विपन्नता से बेखबर, सन्तोष ओर धैर्य में मगन चला जा रहा था। बच्चों के लिए नगर की सभी चीजें अनोखी थीं। जिस चीज की ओर ताकते, ताकते ही रह जाते और पीछे से आर्न की आवाज होने पर भी न चेतते। हामिद तो मोटर के नीचे जाते-जाते बचा।
सहसा ईदगाह नजर आई। ऊपर इमली के घने वृक्षों की छाया हे। नाचे पक्का फर्श है, जिस पर जाजम ढिछा हुआ है। और रोजेदारों की पंक्तियॉँ एक के पीछे एक न जाने कहॉँ वक चली गई हैं, पक्की जगत के नीचे तक, जहॉँ जाजम भी नहीं है। नए आने वाले आकर पीछे की कतार में खड़े हो जाते हैं। आगे जगह नहीं हे। यहॉँ कोई धन और पद नहीं देखता। इस्लाम की निगाह में सब बराबर हें। इन ग्रामीणों ने भी वजू किया ओर पिछली पंक्ति में खड़े हो गए। कितना सुन्दर संचालन है, कितनी सुन्दर व्यवस्था! लाखों सिर एक साथ सिजदे में झुक जाते हैं, फिर सबके सब एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ झुकते हें, और एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ झुकते हें, और एक साथ खड़े हो जाते हैं, कई बार यही क्रिया होती हे, जैसे बिजली की लाखों बत्तियाँ एक साथ प्रदीप्त हों और एक साथ बुझ जाऍं, और यही ग्रम चलता, रहे। कितना अपूर्व दृश्य था, जिसकी सामूहिक क्रियाऍं, विस्तार और अनंतता हृदय को श्रद्धा, गर्व और आत्मानंद से भर देती थीं, मानों भ्रातृत्व का एक सूत्र इन समस्त आत्माओं को एक लड़ी में पिरोए हुए हैं।

नमाज खत्म हो गई। लोग आपस में गले मिल रहे हैं। तब मिठाई और खिलौने की दूकान पर धावा होता है। ग्रामीणों का यह दल इस विषय में बालकों से कम उत्साही नहीं है। यह देखो, हिंडोला हें एक पैसा देकर चढ़ जाओ। कभी आसमान पर जाते हुए मालूम होगें, कभी जमीन पर गिरते हुए। यह चर्खी है, लकड़ी के हाथी, घोड़े, ऊँट, छड़ो में लटके हुए हैं। एक पेसा देकर बैठ जाओं और पच्चीस चक्करों का मजा लो। महमूद और मोहसिन ओर नूरे ओर सम्मी इन घोड़ों ओर ऊँटो पर बैठते हें। हामिद दूर खड़ा है। तीन ही पैसे तो उसके पास हैं। अपने कोष का एक तिहाई जरा-सा चक्कर खाने के लिए नहीं दे सकता।
सब चर्खियों से उतरते हैं। अब खिलौने लेंगे। अधर दूकानों की कतार लगी हुई है। तरह-तरह के खिलौने हैं—सिपाही और गुजरिया, राज ओर वकी, भिश्ती और धोबिन और साधु। वह! कत्ते सुन्दर खिलोने हैं। अब बोला ही चाहते हैं। महमूद सिपाही लेता हे, खाकी वर्दी और लाल पगड़ीवाला, कंधें पर बंदूक रखे हुए, मालूम होता हे, अभी कवायद किए चला आ रहा है। मोहसिन को भिश्ती पसंद आया। कमर झुकी हुई है, ऊपर मशक रखे हुए हैं मशक का मुँह एक हाथ से पकड़े हुए है। कितना प्रसन्न है! शायद कोई गीत गा रहा है। बस, मशक से पानी अड़ेला ही चाहता है। नूरे को वकील से प्रेम हे। कैसी विद्वत्ता हे उसके मुख पर! काला चोगा, नीचे सफेद अचकन, अचकन के सामने की जेब में घड़ी, सुनहरी जंजीर, एक हाथ में कानून का पौथा लिये हुए। मालूम होता है, अभी किसी अदालत से जिरह या बहस किए चले आ रहे है। यह सब दो-दो पैसे के खिलौने हैं। हामिद के पास कुल तीन पैसे हैं, इतने महँगे खिलौन वह केसे ले? खिलौना कहीं हाथ से छूट पड़े तो चूर-चूर हो जाए। जरा पानी पड़े तो सारा रंग घुल जाए। ऐसे खिलौने लेकर वह क्या करेगा, किस काम के!
मोहसिन कहता है—मेरा भिश्ती रोज पानी दे जाएगा सॉँझ-सबेरे
महमूद—और मेरा सिपाही घर का पहरा देगा कोई चोर आएगा, तो फौरन बंदूक से फैर कर देगा।
नूरे—ओर मेरा वकील खूब मुकदमा लड़ेगा।
सम्मी—ओर मेरी धोबिन रोज कपड़े धोएगी।
हामिद खिलौनों की निंदा करता है—मिट्टी ही के तो हैं, गिरे तो चकनाचूर हो जाऍं, लेकिन ललचाई हुई ऑंखों से खिलौनों को देख रहा है और चाहता है कि जरा देर के लिए उन्हें हाथ में ले सकता। उसके हाथ अनायास ही लपकते हें, लेकिन लड़के इतने त्यागी नहीं होते हें, विशेषकर जब अभी नया शौक है। हामिद ललचता रह जाता है।
खिलौने के बाद मिठाइयाँ आती हैं। किसी ने रेवड़ियॉँ ली हें, किसी ने गुलाबजामुन किसी ने सोहन हलवा। मजे से खा रहे हैं। हामिद बिरादरी से पृथक् है। अभागे के पास तीन पैसे हैं। क्यों नहीं कुछ लेकर खाता? ललचाई ऑंखों से सबक ओर देखता है।
मोहसिन कहता है—हामिद रेवड़ी ले जा, कितनी खुशबूदार है!
हामिद को सदेंह हुआ, ये केवल क्रूर विनोद हें मोहसिन इतना उदार नहीं है, लेकिन यह जानकर भी वह उसके पास जाता है। मोहसिन दोने से एक रेवड़ी निकालकर हामिद की ओर बढ़ाता है। हामिद हाथ फैलाता है। मोहसिन रेवड़ी अपने मुँह में रख लेता है। महमूद नूरे ओर सम्मी खूब तालियॉँ बजा-बजाकर हँसते हैं। हामिद खिसिया जाता है।
मोहसिन—अच्छा, अबकी जरूर देंगे हामिद, अल्लाह कसम, ले जा।
हामिद—रखे रहो। क्या मेरे पास पैसे नहीं है?
सम्मी—तीन ही पेसे तो हैं। तीन पैसे में क्या-क्या लोगें?
महमूद—हमसे गुलाबजामुन ले जाओ हामिद। मोहमिन बदमाश है।
हामिद—मिठाई कौन बड़ी नेमत है। किताब में इसकी कितनी बुराइयॉँ लिखी हैं।
मोहसिन—लेकिन दिन मे कह रहे होगे कि मिले तो खा लें। अपने पैसे क्यों नहीं निकालते?
महमूद—इस समझते हें, इसकी चालाकी। जब हमारे सारे पैसे खर्च हो जाऍंगे, तो हमें ललचा-ललचाकर खाएगा।
मिठाइयों के बाद कुछ दूकानें लोहे की चीजों की, कुछ गिलट और कुछ नकली गहनों की। लड़कों के लिए यहॉँ कोई आकर्षण न था। वे सब आगे बढ़ जाते हैं, हामिद लोहे की दुकान पररूक जात हे। कई चिमटे रखे हुए थे। उसे ख्याल आया, दादी के पास चिमटा नहीं है। तबे से रोटियॉँ उतारती हैं, तो हाथ जल जाता है। अगर वह चिमटा ले जाकर दादी को दे दे तो वह कितना प्रसन्न होगी! फिर उनकी ऊगलियॉँ कभी न जलेंगी। घर में एक काम की चीज हो जाएगी। खिलौने से क्या फायदा? व्यर्थ में पैसे खराब होते हैं। जरा देर ही तो खुशी होती है। फिर तो खिलौने को कोई ऑंख उठाकर नहीं देखता। यह तो घर पहुँचते-पहुँचते टूट-फूट बराबर हो जाऍंगे। चिमटा कितने काम की चीज है। रोटियॉँ तवे से उतार लो, चूल्हें में सेंक लो। कोई आग मॉँगने आये तो चटपट चूल्हे से आग निकालकर उसे दे दो। अम्मॉँ बेचारी को कहॉँ फुरसत हे कि बाजार आऍं और इतने पैसे ही कहॉँ मिलते हैं? रोज हाथ जला लेती हैं।
हामिद के साथी आगे बढ़ गए हैं। सबील पर सबके सब शर्बत पी रहे हैं। देखो, सब कतने लालची हैं। इतनी मिठाइयॉँ लीं, मुझे किसी ने एक भी न दी। उस पर कहते है, मेरे साथ खेलो। मेरा यह काम करों। अब अगर किसी ने कोई काम करने को कहा, तो पूछूँगा। खाऍं मिठाइयॉँ, आप मुँह सड़ेगा, फोड़े-फुन्सियॉं निकलेंगी, आप ही जबान चटोरी हो जाएगी। तब घर से पैसे चुराऍंगे और मार खाऍंगे। किताब में झूठी बातें थोड़े ही लिखी हें। मेरी जबान क्यों खराब होगी? अम्मॉँ चिमटा देखते ही दौड़कर मेरे हाथ से ले लेंगी और कहेंगी—मेरा बच्चा अम्मॉँ के लिए चिमटा लाया है। कितना अच्छा लड़का है। इन लोगों के खिलौने पर कौन इन्हें दुआऍं देगा? बड़ों का दुआऍं सीधे अल्लाह के दरबार में पहुँचती हैं, और तुरंत सुनी जाती हैं। में भी इनसे मिजाज क्यों सहूँ? मैं गरीब सही, किसी से कुछ मॉँगने तो नहीं जाते। आखिर अब्बाजान कभीं न कभी आऍंगे। अम्मा भी ऑंएगी ही। फिर इन लोगों से पूछूँगा, कितने खिलौने लोगे? एक-एक को टोकरियों खिलौने दूँ और दिखा हूँ कि दोस्तों के साथ इस तरह का सलूक किया जात है। यह नहीं कि एक पैसे की रेवड़ियॉँ लीं, तो चिढ़ा-चिढ़ाकर खाने लगे। सबके सब हँसेंगे कि हामिद ने चिमटा लिया है। हंसें! मेरी बला से! उसने दुकानदार से पूछा—यह चिमटा कितने का है?
दुकानदार ने उसकी ओर देखा और कोई आदमी साथ न देखकर कहा—तुम्हारे काम का नहीं है जी!
‘बिकाऊ है कि नहीं?’
‘बिकाऊ क्यों नहीं है? और यहॉँ क्यों लाद लाए हैं?’
तो बताते क्यों नहीं, कै पैसे का है?’
‘छ: पैसे लगेंगे।‘
हामिद का दिल बैठ गया।
‘ठीक-ठीक पॉँच पेसे लगेंगे, लेना हो लो, नहीं चलते बनो।‘
हामिद ने कलेजा मजबूत करके कहा तीन पैसे लोगे?
यह कहता हुआ व आगे बढ़ गया कि दुकानदार की घुड़कियॉँ न सुने। लेकिन दुकानदार ने घुड़कियॉँ नहीं दी। बुलाकर चिमटा दे दिया। हामिद ने उसे इस तरह कंधे पर रखा, मानों बंदूक है और शान से अकड़ता हुआ संगियों के पास आया। जरा सुनें, सबके सब क्या-क्या आलोचनाऍं करते हैं!
मोहसिन ने हँसकर कहा—यह चिमटा क्यों लाया पगले, इसे क्या करेगा?
हामिद ने चिमटे को जमीन पर पटकर कहा—जरा अपना भिश्ती जमीन पर गिरा दो। सारी पसलियॉँ चूर-चूर हो जाऍं बचा की।
महमूद बोला—तो यह चिमटा कोई खिलौना है?
हामिद—खिलौना क्यों नही है! अभी कन्धे पर रखा, बंदूक हो गई। हाथ में ले लिया, फकीरों का चिमटा हो गया। चाहूँ तो इससे मजीरे काकाम ले सकता हूँ। एक चिमटा जमा दूँ, तो तुम लोगों के सारे खिलौनों की जान निकल जाए। तुम्हारे खिलौने कितना ही जोर लगाऍं, मेरे चिमटे का बाल भी बॉंका नही कर सकतें मेरा बहादुर शेर है चिमटा।
सम्मी ने खँजरी ली थी। प्रभावित होकर बोला—मेरी खँजरी से बदलोगे? दो आने की है।
हामिद ने खँजरी की ओर उपेक्षा से देखा-मेरा चिमटा चाहे तो तुम्हारी खॅजरी का पेट फाड़ डाले। बस, एक चमड़े की झिल्ली लगा दी, ढब-ढब बोलने लगी। जरा-सा पानी लग जाए तो खत्म हो जाए। मेरा बहादुर चिमटा आग में, पानी में, ऑंधी में, तूफान में बराबर डटा खड़ा रहेगा।
चिमटे ने सभी को मोहित कर लिया, अब पैसे किसके पास धरे हैं? फिर मेले से दूर निकल आए हें, नौ कब के बज गए, धूप तेज हो रही है। घर पहुंचने की जल्दी हो रही हे। बाप से जिद भी करें, तो चिमटा नहीं मिल सकता। हामिद है बड़ा चालाक। इसीलिए बदमाश ने अपने पैसे बचा रखे थे।
अब बालकों के दो दल हो गए हैं। मोहसिन, महमद, सम्मी और नूरे एक तरफ हैं, हामिद अकेला दूसरी तरफ। शास्त्रर्थ हो रहा है। सम्मी तो विधर्मी हा गया! दूसरे पक्ष से जा मिला, लेकिन मोहनि, महमूद और नूरे भी हामिद से एक-एक, दो-दो साल बड़े होने पर भी हामिद के आघातों से आतंकित हो उठे हैं। उसके पास न्याय का बल है और नीति की शक्ति। एक ओर मिट्टी है, दूसरी ओर लोहा, जो इस वक्त अपने को फौलाद कह रहा है। वह अजेय है, घातक है। अगर कोई शेर आ जाए मियॉँ भिश्ती के छक्के छूट जाऍं, जो मियॉँ सिपाही मिट्टी की बंदूक छोड़कर भागे, वकील साहब की नानी मर जाए, चोगे में मुंह छिपाकर जमीन पर लेट जाऍं। मगर यह चिमटा, यह बहादुर, यह रूस्तमे-हिंद लपककर शेर की गरदन पर सवार हो जाएगा और उसकी ऑंखे निकाल लेगा।
मोहसिन ने एड़ी—चोटी का जारे लगाकर कहा—अच्छा, पानी तो नहीं भर सकता?
हामिद ने चिमटे को सीधा खड़ा करके कहा—भिश्ती को एक डांट बताएगा, तो दौड़ा हुआ पानी लाकर उसके द्वार पर छिड़कने लगेगा।
मोहसिन परास्त हो गया, पर महमूद ने कुमुक पहुँचाई—अगर बचा पकड़ जाऍं तो अदालम में बॅधे-बँधे फिरेंगे। तब तो वकील साहब के पैरों पड़ेगे।
हामिद इस प्रबल तर्क का जवाब न दे सका। उसने पूछा—हमें पकड़ने कौने आएगा?
नूरे ने अकड़कर कहा—यह सिपाही बंदूकवाला।
हामिद ने मुँह चिढ़ाकर कहा—यह बेचारे हम बहादुर रूस्तमे—हिंद को पकड़ेगें! अच्छा लाओ, अभी जरा कुश्ती हो जाए। इसकी सूरत देखकर दूर से भागेंगे। पकड़ेगें क्या बेचारे!
मोहसिन को एक नई चोट सूझ गई—तुम्हारे चिमटे का मुँह रोज आग में जलेगा।
उसने समझा था कि हामिद लाजवाब हो जाएगा, लेकिन यह बात न हुई। हामिद ने तुरंत जवाब दिया—आग में बहादुर ही कूदते हैं जनाब, तुम्हारे यह वकील, सिपाही और भिश्ती लैडियों की तरह घर में घुस जाऍंगे। आग में वह काम है, जो यह रूस्तमे-हिन्द ही कर सकता है।
महमूद ने एक जोर लगाया—वकील साहब कुरसी—मेज पर बैठेगे, तुम्हारा चिमटा तो बाबरचीखाने में जमीन पर पड़ा रहने के सिवा और क्या कर सकता है?
इस तर्क ने सम्मी औरनूरे को भी सजी कर दिया! कितने ठिकाने की बात कही हे पट्ठे ने! चिमटा बावरचीखाने में पड़ा रहने के सिवा और क्या कर सकता है?
हामिद को कोई फड़कता हुआ जवाब न सूझा, तो उसने धॉँधली शुरू की—मेरा चिमटा बावरचीखाने में नही रहेगा। वकील साहब कुर्सी पर बैठेगें, तो जाकर उन्हे जमीन पर पटक देगा और उनका कानून उनके पेट में डाल देगा।
बात कुछ बनी नही। खाल गाली-गलौज थी, लेकिन कानून को पेट में डालनेवाली बात छा गई। ऐसी छा गई कि तीनों सूरमा मुँह ताकते रह गए मानो कोई धेलचा कानकौआ किसी गंडेवाले कनकौए को काट गया हो। कानून मुँह से बाहर निकलने वाली चीज हे। उसको पेट के अन्दर डाल दिया जाना बेतुकी-सी बात होने पर भी कुछ नयापन रखती हे। हामिद ने मैदान मार लिया। उसका चिमटा रूस्तमे-हिन्द हे। अब इसमें मोहसिन, महमूद नूरे, सम्मी किसी को भी आपत्ति नहीं हो सकती।
विजेता को हारनेवालों से जो सत्कार मिलना स्वाभविक है, वह हामिद को भी मिल। औरों ने तीन-तीन, चार-चार आने पैसे खर्च किए, पर कोई काम की चीज न ले सके। हामिद ने तीन पैसे में रंग जमा लिया। सच ही तो है, खिलौनों का क्या भरोसा? टूट-फूट जाऍंगी। हामिद का चिमटा तो बना रहेगा बरसों?
संधि की शर्ते तय होने लगीं। मोहसिन ने कहा—जरा अपना चिमटा दो, हम भी देखें। तुम हमार भिश्ती लेकर देखो।
महमूद और नूरे ने भी अपने-अपने खिलौने पेश किए।
हामिद को इन शर्तो को मानने में कोई आपत्ति न थी। चिमटा बारी-बारी से सबके हाथ में गया, और उनके खिलौने बारी-बारी से हामिद के हाथ में आए। कितने खूबसूरत खिलौने हैं।
हामिद ने हारने वालों के ऑंसू पोंछे—मैं तुम्हे चिढ़ा रहा था, सच! यह चिमटा भला, इन खिलौनों की क्या बराबर करेगा, मालूम होता है, अब बोले, अब बोले।
लेकिन मोहसनि की पार्टी को इस दिलासे से संतोष नहीं होता। चिमटे का सिल्का खूब बैठ गया है। चिपका हुआ टिकट अब पानी से नहीं छूट रहा है।
मोहसिन—लेकिन इन खिलौनों के लिए कोई हमें दुआ तो न देगा?
महमूद—दुआ को लिय फिरते हो। उल्टे मार न पड़े। अम्मां जरूर कहेंगी कि मेले में यही मिट्टी के खिलौने मिले?
हामिद को स्वीकार करना पड़ा कि खिलौनों को देखकर किसी की मां इतनी खुश न होगी, जितनी दादी चिमटे को देखकर होंगी। तीन पैसों ही में तो उसे सब-कुछ करना था ओर उन पैसों के इस उपयों पर पछतावे की बिल्कुल जरूरत न थी। फिर अब तो चिमटा रूस्तमें—हिन्द हे ओर सभी खिलौनों का बादशाह।
रास्ते में महमूद को भूख लगी। उसके बाप ने केले खाने को दियें। महमून ने केवल हामिद को साझी बनाया। उसके अन्य मित्र मुंह ताकते रह गए। यह उस चिमटे का प्रसाद थां।

ग्यारह बजे गॉँव में हलचल मच गई। मेलेवाले आ गए। मोहसिन की छोटी बहन दौड़कर भिश्ती उसके हाथ से छीन लिया और मारे खुशी के जा उछली, तो मियॉं भिश्ती नीचे आ रहे और सुरलोक सिधारे। इस पर भाई-बहन में मार-पीट हुई। दानों खुब रोए। उसकी अम्मॉँ यह शोर सुनकर बिगड़ी और दोनों को ऊपर से दो-दो चॉँटे और लगाए।
मियॉँ नूरे के वकील का अंत उनके प्रतिष्ठानुकूल इससे ज्यादा गौरवमय हुआ। वकील जमीन पर या ताक पर हो नहीं बैठ सकता। उसकी मर्यादा का विचार तो करना ही होगा। दीवार में खूँटियाँ गाड़ी गई। उन पर लकड़ी का एक पटरा रखा गया। पटरे पर कागज का कालीन बिदाया गया। वकील साहब राजा भोज की भाँति सिंहासन पर विराजे। नूरे ने उन्हें पंखा झलना शुरू किया। आदालतों में खर की टट्टियॉँ और बिजली के पंखे रहते हें। क्या यहॉँ मामूली पंखा भी न हो! कानून की गर्मी दिमाग पर चढ़ जाएगी कि नहीं? बॉँस कापंखा आया ओर नूरे हवा करने लगें मालूम नहीं, पंखे की हवा से या पंखे की चोट से वकील साहब स्वर्गलोक से मृत्युलोक में आ रहे और उनका माटी का चोला माटी में मिल गया! फिर बड़े जोर-शोर से मातम हुआ और वकील साहब की अस्थि घूरे पर डाल दी गई।
अब रहा महमूद का सिपाही। उसे चटपट गॉँव का पहरा देने का चार्ज मिल गया, लेकिन पुलिस का सिपाही कोई साधारण व्यक्ति तो नहीं, जो अपने पैरों चलें वह पालकी पर चलेगा। एक टोकरी आई, उसमें कुछ लाल रंग के फटे-पुराने चिथड़े बिछाए गए जिसमें सिपाही साहब आराम से लेटे। नूरे ने यह टोकरी उठाई और अपने द्वार का चक्कर लगाने लगे। उनके दोनों छोटे भाई सिपाही की तरह ‘छोनेवाले, जागते लहो’ पुकारते चलते हें। मगर रात तो अँधेरी होनी चाहिए, नूरे को ठोकर लग जाती है। टोकरी उसके हाथ से छूटकर गिर पड़ती है और मियॉँ सिपाही अपनी बन्दूक लिये जमीन पर आ जाते हैं और उनकी एक टॉँग में विकार आ जाता है।
महमूद को आज ज्ञात हुआ कि वह अच्छा डाक्टर है। उसको ऐसा मरहम मिला गया है जिससे वह टूटी टॉँग को आनन-फानन जोड़ सकता हे। केवल गूलर का दूध चाहिए। गूलर का दूध आता है। टाँग जावब दे देती है। शल्य-क्रिया असफल हुई, तब उसकी दूसरी टाँग भी तोड़ दी जाती है। अब कम-से-कम एक जगह आराम से बैठ तो सकता है। एक टॉँग से तो न चल सकता था, न बैठ सकता था। अब वह सिपाही संन्यासी हो गया है। अपनी जगह पर बैठा-बैठा पहरा देता है। कभी-कभी देवता भी बन जाता है। उसके सिर का झालरदार साफा खुरच दिया गया है। अब उसका जितना रूपांतर चाहों, कर सकते हो। कभी-कभी तो उससे बाट का काम भी लिया जाता है।
अब मियॉँ हामिद का हाल सुनिए। अमीना उसकी आवाज सुनते ही दौड़ी और उसे गोद में उठाकर प्यार करने लगी। सहसा उसके हाथ में चिमटा देखकर वह चौंकी।
‘यह चिमटा कहॉं था?’
‘मैंने मोल लिया है।‘
‘कै पैसे में?
‘तीन पैसे दिये।‘
अमीना ने छाती पीट ली। यह कैसा बेसमझ लड़का है कि दोपहर हुआ, कुछ खाया न पिया। लाया क्या, चिमटा! ‘सारे मेले में तुझे और कोई चीज न मिली, जो यह लोहे का चिमटा उठा लाया?’
हामिद ने अपराधी-भाव से कहा—तुम्हारी उँगलियॉँ तवे से जल जाती थीं, इसलिए मैने इसे लिया।
बुढ़िया का क्रोध तुरन्त स्नेह में बदल गया, और स्नेह भी वह नहीं, जो प्रगल्भ होता हे और अपनी सारी कसक शब्दों में बिखेर देता है। यह मूक स्नेह था, खूब ठोस, रस और स्वाद से भरा हुआ। बच्चे में कितना व्याग, कितना सदभाव और कितना विवेक है! दूसरों को खिलौने लेते और मिठाई खाते देखकर इसका मन कितना ललचाया होगा? इतना जब्त इससे हुआ कैसे? वहॉँ भी इसे अपनी बुढ़िया दादी की याद बनी रही। अमीना का मन गदगद हो गया।
और अब एक बड़ी विचित्र बात हुई। हामिद कें इस चिमटे से भी विचित्र। बच्चे हामिद ने बूढ़े हामिद का पार्ट खेला था। बुढ़िया अमीना बालिका अमीना बन गई। वह रोने लगी। दामन फैलाकर हामिद को दुआऍं देती जाती थी और आँसूं की बड़ी-बड़ी बूंदे गिराती जाती थी। हामिद इसका रहस्य क्या समझता!

***

عید گاہ

منشی پریم چند

رمضان کے پورے تیس روزوں کے بعد آج عید آئی ہے۔ کتنی سہانی اور رنگین صبح ہے۔ بچہ کی طرح پر تبسم، درختوں پر کچھ عجیب ہر یاول ہے۔ کھیتوں میں عجیب رونق ہے۔ آسمان پر کچھ عجیب فضا ہے۔ آج کا آفتاب دیکھو کتنا پیارا ہے گویا دنیا کو عید کی خوشی پر مبارک باد دے رہا ہو۔ گائوں میں کتنی چہل پہل ہے۔ عید گاہ جانے کی دھوم ہے۔ کسی کے کرتے میں بٹن نہیں ہیں، سوئی دھاگہ لینے جارہا ہے۔ کسی کے جوتے سخت ہوگئے ہیں اسے تیل اور پانی سے نرم کر رہا ہے۔ جلدی جلدی بیلوں کوپانی دے دیں۔ عید گاہ سے لوٹتے لوٹتے دوپہر ہوجائے گی۔ بچے سب سے زیادہ خوش ہیں، کسی نے ایک روزہ رکھا، وہ بھی دوپہر تک، کسی نے وہ بھی نہیں، لیکن عید گاہ جانے کی خوشی ان کا حصّہ ہے۔ روزے بڑے بوڑھوں کے لیے ہوںگے بچوں کے لیے تو عید ہے۔ انھیں گھر کی فکروں سے کیا واسطہ؟ سیوئیوں کے لیے گھر میں دودھ اور شکر میوے ہیں یا نہیں، انہیں کیا فکر۔ ان کی اپنی جیبوں میں تو قارون کا خزانہ رکھا ہوا ہے۔ بار بار جیب سے اپنا خزانہ نکال کر گنتے ہیں۔ ان ہی دو چار پیسوں میں دنیا کی ساری نعمتیں لائیں گے۔ کھلونے اور مٹھائیاں اور بگل اور خدا جانے کیا کیا۔

اور سب سے زیادہ خوش ہے ’’حامد۔‘‘ وہ سات آٹھ سال کا غریب صورت بچہ ہے۔ جس کا باپ پچھلے سال ہیضہ کی نذر ہوگیا اور ماں نہ جانے کیوں زرد ہوتی ہوتی ایک دن مر گئی۔ کسی کو پتا نہ چلا کہ کیا بیماری ہے۔ اب حامد اپنی بوڑھی دادی امینہ کی گود میں سوتا ہے اور اتنا ہی خوش ہے۔ اس کی دادی اسے کہتی ہے کہ اس کے ابا جان بڑی دور روپے کمانے گئے ہیں۔ بہت سی تھیلیاں لے کر آئیں گے، امی جان اللّٰہ میاں کے گھر مٹھائی لینے گئی ہیں۔ اس لیے حامد خوش ہے۔ امید تو بڑی چیز ہے۔ حامد کے پائوں میں جوتے نہیں ہیں۔ سر پر ایک پرانی ٹوپی ہے جس کا گوٹا سیاہ ہوگیا ہے۔ پھر بھی وہ خوش ہے۔ جب اس کے ابّا جان تھیلیاں اور امّاں جان نعمتیں لے کر آئیں گے۔ تب وہ دل کے ارمان نکالے گا۔

’’تم ڈرنا نہیں امّاں! میں گائوں والوں کا ساتھ نہیں چھوڑوں گا، بالکل نہ ڈرنا۔‘‘ لیکن امینہ کا دل نہیں مانتا۔

گائوں کے بچے اپنے اپنے باپ کے ساتھ جا رہے ہیں۔ حامد کیا اکیلا ہی جائے گا؟ اس بھیڑ بھاڑ میں کہیں کھو جائے تو کیا ہوگا؟ نہیں امینہ اسے تنہا نہ جانے دے گی۔ ننھی سی جان تین کوس چلے گا۔ پائوں میں چھالے نہ پڑ جائیں گے۔

مگر وہ چلی جائے تو یہاں سیوئیاں کون پکائے گا؟ بھوکا پیاسا دوپہر کو لوٹے گا، کیا اس وقت سیوئیاں پکانے بیٹھے گی؟ رونا تو یہ ہے کہ امینہ کے پاس پیسے نہیں ہیں۔ اس دن فہیمن کے کپڑے سیے تھے، آٹھ آنے پیسے ملے تھے۔ اس اَٹھنی کو ایمان کی طرح بچاتی چلی آتی تھی… اس عید کے لیے۔ لیکن کل گھر میں آٹا نہ تھا اور گوالن کے پیسے چڑھ گئے تھے۔ دینے پڑے۔ حامد کے لیے دو پیسے کا روز دودھ تو لینا ہی پڑتا ہے۔ اب کل آٹھ پیسے بچ رہے ہیں۔ تین پیسے حامد کی جیب میں اور پانچ امینہ کے بٹوے میں، یہی بساط ہے۔ اللہ ہی بیڑا پار کرے۔

گائوں سے لوگ چلے اور حامد بھی بچوں کے ساتھ تھا۔ کبھی سب کے سب دوڑ کر نکل جاتے۔ پھر کسی درخت کے نیچے کھڑے ہو کر ساتھ والوں کا انتظار کرتے۔

شہر کا سرا شروع ہو گیا۔ سڑک کے دونوں طرف امیروں کے باغ ہیں۔ بڑی بڑی عمارتیں آنے لگیں۔ یہ عدالت ہے۔ یہ مدرسہ ہے۔ یہ کلب گھر ہے۔پھر آگے چلو۔ حلوائیوں کی دْکانیں شروع ہو گئیں۔ آج خوب سجی ہوئی تھیں۔ اتنی مٹھائیاں کون کھاتا ہے؟ دیکھو نا! ایک ایک دْکان پر منوں ہوں گی۔ آگے چلیے! یہ پولیس لائن ہے۔ یہاں پولیس والے قواعد کرتے ہیں۔ رائٹ لپ، پھام پھو۔ رات کو بے چارے گھوم گھوم کر پہرا دیتے ہیں، نہیں تو چوریاں ہو جائیں۔

اب بستی گھنی ہونے لگی۔ عید گاہ جانے والوں کے مجمع نظر آنے لگے۔ ایک سے ایک زرق برق پوشاک پہنے ہوئے۔ کوئی تانگے پر سوار کوئی موٹر پر چلتے تھے تو کپڑوں سے عطر کی خوشبو اْڑتی تھی۔ دہقانوں کی یہ مختصر سی ٹولی اپنی بے سرو سامانی سے بے حس اپنی خستہ حالی میں مگر صابر و شاکر چلی جاتی تھی۔ جس چیز کی طرف تاکتے، تاکتے رہ جاتے اور پیچھے سے بار بار ہارن کی آواز ہونے پر بھی خبر نہ ہوتی تھی۔ محسن تو موٹر کے نیچے جاتے جاتے بچا۔

وہ عید گاہ نظر آئی۔ جماعت شروع ہو رہی ہے۔ املی کے گھنے درختوں کا سایہ ہے نیچے کھلا ہوا پختہ فرش ہے۔ جس پر جاجم بچھا ہوا ہے۔ اور نمازیوں کی قطاریں ایک کے پیچھے دوسرے خدا جانے کہاں تک چلی گئی ہیں۔ پختہ فرش کے نیچے جاجم بھی نہیں۔ کئی قطاریں کھڑی ہیں۔ جو آتے جاتے ہیں پیچھے کھڑے ہوتے جاتے ہیں۔آگے اب جگہ نہیں رہی۔ یہاں کوئی رْتبہ اور عہدہ نہیں دیکھتا۔ اسلام کی نگاہ میں سب برابر ہیں۔ دہقانوں نے بھی وضو کیا اور جماعت میں شامل ہو گئے۔ کتنی باقاعدہ منظم جماعت ہے، لاکھوں آدمی ایک ساتھ جھکتے ہیں ، ایک ساتھ دو زانو بیٹھ جاتے ہیں۔ اور یہ عمل بار بار ہوتا ہے ایسا معلوم ہو رہا ہے گویا بجلی کی لاکھوں بتیاں ایک ساتھ روشن ہو جائیں اور ایک ساتھ بجھ جائیں۔ کتنا پر احترام رعب انگیز نظارہ ہے۔ جس کی ہم آہنگی اور وسعت اور تعداد دلوں پر ایک وجدانی کیفیت پیدا کر دیتی ہے۔ گویا اخوت کا رشتہ ان تمام روحوں کو منسلک کیے ہوئے ہے۔

نماز ختم ہو گئی ہے لوگ باہم گلے مل رہے ہیں۔ کچھ لوگ محتاجوں اور سائلوں کو خیرات کر رہے ہیں۔ جو آج یہاں ہزاروں جمع ہو گئے ہیں۔ ہمارے دہقانوں نے مٹھائی اور کھلونوں کی دْکانوں پر یورش کی۔ بوڑھے بھی ان دلچسپیوں میں بچوں سے کم نہیں ہیں۔

یہ دیکھو ہنڈولا ہے ایک پیسہ دے کر آسمان پر جاتے معلوم ہوں گے۔ کبھی زمین پر گرتے ہیں یہ چرخی ہے لکڑی کے گھوڑے، اْونٹ، ہاتھی منجوں سے لٹکے ہوئے ہیں۔ ایک پیسہ دے کر بیٹھ جاو اور پچیس چکروں کا مزہ لو۔ محمود اور محسن دونوں ہنڈولے پر بیٹھے ہیں۔ آذر اور سمیع گھوڑوں پر۔
ان کے بزرگ اتنے ہی طفلانہ اشتیاق سے چرخی پر بیٹھے ہیں۔ حامد دور کھڑا ہے تین ہی پیسے تو اس کے پاس ہیں۔ ذرا سا چکر کھانے کے لیے وہ اپنے خزانہ کا ثلث نہیں صرف کر سکتا۔ محسن کا باپ بار بار اسے چرخی پر بلاتا ہے لیکن وہ راضی نہیں ہوتا۔ بوڑھے کہتے ہیں اس لڑکے میں ابھی سے اپنا پرایا آ گیا ہے۔حامد سوچتا ہے: ’’کیوں کسی کا احسان لوں؟‘‘ عسرت نے اسے ضرورت سے زیادہ ذکی الحس بنا دیا ہے۔

سب لو گ چرخی سے اْترتے ہیں۔ کھلونوں کی خرید شروع ہوتی ہے۔ سپاہی اور گجریا اور راجہ رانی اور وکیل اور دھوبی اور بہشتی بے امتیاز ران سے ران ملائے بیٹھے ہیں۔ دھوبی راجہ رانی کی بغل میں ہے اور بہشتی وکیل صاحب کی بغل میں۔ واہ کتنے خوبصورت… بولا ہی چاہتے ہیں۔ محمود سپاہی پر لٹو ہو جاتا ہے خاکی وردی اور پگڑی لال، کندھے پر بندوق ، معلوم ہوتا ہے ابھی قواعد کے لیے چلا آ رہا ہے۔ محسن کو بہشتی پسندآیا۔ کمر جھکی ہوئی ہے اس پر مشک کا دھانہ ایک ہاتھ سے پکڑے ہوئے ہے۔ دوسرے ہاتھ میں رسی ہے،کتنا بشاش چہرہ ہے، شاید کوئی گیت گا رہا ہے۔ مشک سے پانی ٹپکتا ہوا معلوم ہوتا ہے۔ نوری کو وکیل سے مناسبت ہے۔ کتنی عالمانہ صورت ہے، سیاہ چغہ نیچے سفید اچکن، اچکن کے سینہ کی جیب میں سنہری زنجیر، ایک ہاتھ میں قانون کی کتاب لیے ہوئے ہے۔ معلوم ہوتا ہے، ابھی کسی عدالت سے جرح یا بحث کر کے چلے آ رہے ہیں۔ یہ سب دو دو پیسے کے کھلونے ہیں۔ حامد کے پاس کل تین پیسے ہیں۔ اگر دو کا ایک کھلونا لے لے تو پھر اور کیا لے گا؟ نہیں …کھلونے فضول ہیں۔ کہیں ہاتھ سے گر پڑے تو چور چور ہو جائے۔ ذرا سا پانی پڑ جائے تو سارا رنگ دْھل جائے۔ ان کھلونوں کو لے کروہ کیا کرے گا، کس مصرف کے ہیں؟
محسن کہتا ہے: ’’میرا بہشتی روز پانی دے جائے گا صبح شام۔‘‘
نوری بولا: ’’اور میرا وکیل روز مقدمے لڑے گا اور روز روپے لائے گا۔‘‘
حامد کھلونوں کی مذمت کرتا ہے۔ مٹی کے ہی تو ہیں، گریں تو چکنا چور ہو جائیں، لیکن ہر چیز کو للچائی ہوئی نظروں سے دیکھ رہا ہے اور چاہتا ہے کہ ذرا دیر کے لیے انہیں ہاتھ میں لے سکتا۔
کھلونوں کے بعد مٹھائیوں کا نمبر آیا، کسی نے ریوڑیاں لی ہیں، کسی نے گلاب جامن، کسی نے سوہن حلوہ۔ مزے سے کھا رہے ہیں۔ حامد ان کی برادری سے خارج ہے۔ کمبخت کی جیب میں تین پیسے تو ہیں، کیوں نہیں کچھ لے کر کھاتا۔ حریص نگاہوں سے سب کی طرف دیکھتا ہے۔
محسن نے کہا: ’’حامد! یہ ریوڑی لے جا کتنی خوشبودار ہیں۔‘‘
حامد سمجھ گیا یہ محض شرارت سے کہہ رہا ہے۔ محسن اتنا فیاض طبع نہ تھا۔ پھر بھی وہ اس کے پاس گیا۔ محسن نے تھیلی سے دو تین ریوڑیاں نکالیں۔ حامد کی طرف بڑھائیں۔ حامد نے ہاتھ پھیلایا۔ محسن نے ہاتھ کھینچ لیا اور ریوڑیاں اپنے منھ میں رکھ لیں۔ محمود اور نوری اور سمیع خوب تالیاں بجا بجا کر ہنسنے لگے۔ حامد کھسیانہ ہو گیا۔ محسن نے کہا:
’’اچھا اب ضرور دیں گے۔ یہ لے جاو ?۔ اللہ قسم۔‘‘
حامد نے کہا: ’’رکھیے رکھیے…کیا میرے پاس پیسے نہیں ہیں؟‘‘
سمیع بولا، ’’تین ہی پیسے تو ہیں، کیا کیا لوگے؟‘‘
محمود بولا: ’’تم اس سے مت بولو۔ حامد! میرے پاس آو?۔ یہ گلاب جامن لے لو۔‘‘
حامد: ’’مٹھائی کون سی بڑی نعمت ہے۔ کتاب میں اس کی برائیاں لکھی ہیں۔‘‘
محسن: ’’لیکن جی میں کہہ رہے ہو گے کہ کچھ مل جائے تو کھا لیں۔ اپنے پیسے کیوں نہیں نکالتے؟‘‘
محمود: ’’اس کی ہوشیاری میں سمجھتا ہوں۔ جب ہمارے سارے پیسے خرچ ہو جائیں گے، تب یہ مٹھائی لے گا اور ہمیں چڑا چڑا کر کھائے گا۔‘‘

حلوائیوں کی دْکانوں کے آگے کچھ دْکانیں لوہے کی چیزوں کی تھیں کچھ گلٹ اور ملمع کے زیورات کی۔ لڑکوں کے لیے یہاں دلچسپی کا کوئی سامان نہ تھا۔ حامد لوہے کی دْکان پر ایک لمحہ کے لیے رک گیا۔ دست پناہ رکھے ہوئے تھے۔ وہ دست پناہ خرید لے گا۔ ماں کے پاس دست پناہ نہیں ہے۔ توے سے روٹیاں اتارتی ہیں تو ہاتھ جل جاتا ہے۔ اگر وہ دست پناہ لے جا کر اماں کو دے دے، تو وہ کتنی خوش ہوںگی۔ پھر ان کی انگلیاں کبھی نہیںجلیں گی، گھر میں ایک کام کی چیز ہو جائے گی۔ کھلونوں سے کیا فائدہ۔ مفت میں پیسے خراب ہوتے ہیں۔ ذرا دیر ہی تو خوشی ہوتی ہے پھر تو انھیں کوئی آنکھ اْٹھا کر کبھی نہیں دیکھتا۔ یا تو گھر پہنچتے پہنچتے ٹوٹ پھوٹ کر برباد ہو جائیں گے یا چھوٹے بچے جو عید گاہ نہیں جا سکتے ہیں ضد کر کے لے لیں گے اور توڑ ڈالیں گے۔ دست پناہ کتنے فائدہ کی چیز ہے۔ روٹیاں توے سے اْتار لو،چولھے سے آگ نکال کر دے دو۔ اماں کو فرصت کہاں ہے کہ بازار آئیں اور اتنے پیسے کہاں ملتے ہیں۔ روز ہاتھ جلا لیتی ہیں۔

اس کے ساتھی آگے بڑھ گئے ہیں۔ سبیل پر سب کے سب پانی پی رہے ہیں۔ کتنے لالچی ہیں۔ سب نے اتنی مٹھائیاں لیں کسی نے مجھے ایک بھی نہ دی۔ اس پر کہتے ہیں میرے ساتھ کھیلو۔ میری تختی دھو لائوں۔ اب اگر میاں محسن نے کوئی کام کرنے کو کہا تو خبر لوں گا، کھائیں مٹھائی… آپ ہی منہ سڑے گا، پھوڑے پھنسیاں نکلیں گی۔ آپ ہی زبان چٹوری ہو جائے گی، تب پیسے چرائیں گے اور مار کھائیں گے۔ میری زبان کیوں خراب ہوگی۔

اس نے پھر سوچا : ’’اماں دست پناہ دیکھتے ہی دوڑ کر میرے ہاتھ سے لے لیں گی اور کہیں گی۔ میرا بیٹااپنی اماں کے لیے دست پناہ لایا ہے، ہزاروں دْعائیں دیں گی۔ پھر اسے پڑوسیوں کو دکھائیں گی۔ سارے گائوں میں واہ واہ مچ جائے گی۔ ان لوگوں کے کھلونوں پر کون انھیں دْعائیں دے گا؟ بزرگوں کی دْعائیں سیدھی خدا کی درگاہ میں پہنچتی ہیں اور فوراً قبول ہوتی ہیں۔ میرے پاس بہت سے پیسے نہیں ہیں۔ جب ہی تو محسن اور محمود یوں مزاج دکھاتے ہیں۔ میں بھی ان کو مزاج دکھائوں گا۔ وہ کھلونے کھیلیں، مٹھائیاں کھائیں، میں غریب سہی۔ کسی سے کچھ مانگنے تو نہیں جاتا۔ آخر ابا کبھی نہ کبھی تو آئیں گے ہی، پھر ان لوگوں سے پوچھوں گا کتنے کھلونے لو گے؟ ایک ایک کو ایک ٹوکری دوں اور دکھا دوں کہ دوستوں کیساتھ اس طرح سلوک کیا جاتا ہے۔ جتنے غریب لڑکے ہیں سب کو اچھے اچھے کرتے دلوا دوں گا، اور کتابیں دے دوں گا، یہ نہیں کہ ایک پیسہ کی ریوڑیاں لیں تو چڑا چڑا کر کھانے لگے۔ ‘‘

حامد نے ڈرتے ڈرتے دکان دار سے پوچھا: ’’یہ دست پناہ بیچو گے؟‘‘
دوکان دار نے اس کی طرف دیکھا اور ساتھ کوئی آدمی نہ دیکھ کر کہا: ’’ تمھارے کام کا نہیں ہے۔ ‘‘
‘‘بکائو ہے یا نہیں؟‘‘
’’بکائو ہے جی اور یہاں کیوں لاد کر لائے ہیں۔‘‘
’’تو بتلاتے کیوں نہیں؟ کے پیسے کا دو گے؟‘‘
’’چھ پیسے لگیں گے۔‘‘
حامد کا دل بیٹھ گیا۔ کلیجہ مضبوط کر کے بولا: ’’تین پیسے لو گے؟‘‘ اور آگے بڑھا کہ دکان دار کی گھرکیاں نہ سنے، مگر دکان دار نے گھرکیاں نہ دیں۔ دست پناہ اس کی طرف بڑھادیا اور پیسے لے لیے۔
حامد نے دست پناہ کندھے پر رکھ لیا، گویا بندوق ہے اور شان سے اکڑتا ہوا اپنے رفیقوں کے پاس آیا۔
محسن نے ہنستے ہوئے کہا: ’’یہ دست پناہ لایا ہے۔ احمق اس کا کیا کرو گے؟‘‘
حامد نے دست پناہ کو زمین پر پٹک کر کہا: ’’ذرا اپنا بہشتی زمین پر گرا دو، ساری پسلیاں چور چور ہو جائیں گی بچو کی۔‘‘
محمود: ’’تو یہ دست پناہ کوئی کھلونا ہے؟‘‘
حامد: ’’کھلونا کیوں نہیں ہے؟ ابھی کندھے پر رکھا، بندوق ہو گیا‘‘ ہاتھ میں لے لیا فقیر کا چمٹا ہو گیا، چاہوں تو اس سے تمہاری ناک پکڑ لوں۔ ایک چمٹا دوں تو تم لوگوں کے سارے کھلونوں کی جان نکل جائے۔ تمہارے کھلونے کتنا ہی زور لگائیں، اس کا بال بیکا نہیں کر سکتے۔ میرا بہادر شیر ہے یہ دست پناہ۔‘‘
سمیع متاثر ہو کر بدلا: ’’میری خنجری سے بدلو گے؟ دو آنے کی ہے۔‘‘
حامد نے خنجری کی طرف حقارت سے دیکھ کر کہا: ’’میرا دست پناہ چاہے تو تمہاری خنجری کا پیٹ پھاڑ ڈالے۔ بس ایک چمڑے کی جھلی لگا دی، ڈھب ڈھب بولنے لگی۔ ذرا سا پانی لگے تو ختم ہو جائے۔ میرا بہادر دست پناہ تو آگ میں پانی میں آندھی میں طوفان میں برابر ڈٹا رہیگا۔‘‘
میلہ بہت دور پیچھے چھوٹ چکا تھا۔ دس بج رہے تھے۔ گھر پہنچنے کی جلدی تھی۔ اب دست پناہ نہیں مل سکتا تھا۔ اب کسی کے پاس پیسے بھی تو نہیں رہے، حامد ہے بڑا ہوشیار۔ اب دو فریق ہو گئے، محمود، محسن اور نوری ایک طرف، حامد یکہ و تنہادوسری طرف۔ سمیع غیر جانب دار ہے جس کی فتح دیکھے گا اس کی طرف ہو جائیگا۔ محمود، محسن اور نورے کے پاس تعداد کی طاقت ہے، حامد کے پاس حق اور اخلاق کی۔ ایک طرف مٹی ربڑ اور لکڑکی کی چیزیں دوسری جانب اکیلا لوہا جو اس وقت اپنے آپ کو فولاد کہہ رہا ہے۔
محسن نے ایڑی چوٹی کا زور لگا کر کہا: ’’اچھا تمھارا دست پناہ پانی تو نہیں بھر سکتا۔‘‘
حامد نے دست پناہ کو سیدھا کر کے کہا: ’’یہ بہشتی کو ایک ڈانٹ پلائے گا تو دوڑا ہوا پانی لا کر اس کے دروازے پر چھڑکنے لگے گا۔ جناب اس سے چاہے گھڑے مٹکے اور کونڈے بھر لو۔‘‘
محسن کا ناطقہ بند ہو گیا۔ نوری نے کمک پہنچائی: ’’بچہ گرفتار ہو جائیں تو عدالت میں بندھے بندھے پھریں گے۔ تب تو ہمارے وکیل صاحب ہی پیروی کریں گے۔ بولیے جناب؟‘‘
اس وار سے بچائو اتنا آسان نہ تھا، دفعتاً حامد نے ذرا مہلت پا جانے کے ارادے سے پوچھا: ’’اسے پکڑنے کون آئے گا؟‘‘
محمود نے کہا: ’’یہ سپاہی بندوق والا۔‘‘
حامد نے منھ چڑا کر کہا: ’’یہ بے چارے اس رستم ہند کو پکڑ لیں گے؟ اچھا لائو ابھی ذرا مقابلہ ہو جائے۔اس کی صورت دیکھتے ہی بچہ کی ماں مر جائے گی، پکڑیں گے کیا بے چارے!‘‘
محسن نے تازہ دم ہو کر وار کیا: ’’تمھارے دست پناہ کا منھ روز آگ میں جلا کرے گا۔‘‘
حامد کے پاس جواب تیار تھا: ’’آگ میں بہادر کودتے ہیں جناب۔ تمھارے یہ وکیل اور سپاہی اور بہشتی ڈرپوک ہیں۔ سب گھر میں گھس جائیں گے۔ آگ میں کودنا وہ کام ہے جو رْستم ہی کر سکتا ہے۔‘‘
نوری نے انتہائی جدت سے کام لیا: ’’تمھارا دست پناہ باورچی خانہ میں زمین پر پڑا رہے گا۔ میرا وکیل شان سے میز کرسی لگاکر بیٹھے گا۔‘‘ اس جملہ نے مْردوں میں بھی جان ڈال دی۔
حامد نے دھاندلی کی: ’’میرا دست پناہ باورچی خانہ میں رہے گا، وکیل صاحب کرسی پر بیٹھیں گے تو جا کر انھیں زمین پر پٹک دے گا اور سارا قانون ان کے پیٹ میں ڈال دے گا۔‘‘
اس جواب میں بالکل جان نہ تھی، بالکل بے تکی سی بات تھی۔ لیکن قانون پیٹ میں ڈالنے والی بات چھا گئی۔ تینوں سورما منھ تکتے رہ گئے۔ حامد نے میدان جیت لیا۔ دست پناہ رستم ہند ہے۔ اس میں کسی کو چوں چرا کی گنجائش نہیں۔
محسن نے کہا: ’’ذرا اپنا چمٹا دو۔ ہم بھی تودیکھیں۔ تم چاہو تو ہمارا وکیل دیکھ لوحامد!‘‘
’’ ہمیں اس میں کوئی اعتراض نہیں ہے۔‘‘ وہ فیاض طبع فاتح ہے۔ دست پناہ باری باری سے محمود، محسن، نور اور سمیع سب کے ہاتھوں میں گیا اور ان کے کھلونے باری باری حامد کے ہاتھ میں آئے۔ کتنے خوبصورت کھلونے ہیں، معلوم ہوتا ہے بولا ہی چاہتے ہیں۔مگر ان کھلونوں کے لیے انھیں دْعا کو ن دے گا؟ کون کون ان کھلونوں کو دیکھ کر اتنا خوش ہوگا جتنا اماں جان دست پناہ کو دیکھ کر ہوں گی۔ اسے اپنے طرزِ عمل پر بالکل پچھتاوا نہیں ہے۔ پھراب تو دست پناہ تو ہے اور سب کا بادشاہ۔ راستے میں محمود نے ایک پیسے کی ککڑیاں لیں۔اس میں حامد کو بھی خراج ملا حالاں کہ وہ انکار کرتا رہا۔ محسن اورسمیع نے ایک ایک پیسے کے فالسے لیے، حامدکو خراج ملا۔ یہ سب رستم ہند کی برکت تھی۔

گیارہ بجے سارے گائوں میں چہل پہل ہو گئی۔ میلے والے آ گئے۔ محسن کی چھوٹی بہن نے دوڑ کر بہشتی اس کے ہاتھ سے چھین لیا اور مارے خوشی جو اچھلی تو میاں بہشتی نیچے آ رہے۔ اس پر بھائی بہن میں مار پیٹ ہوئی۔ دونوں خوب روئے۔ ان کی اماں جان یہ کہرام سن کر اور بگڑیں۔ دونوں کو اوپر سے دو دو چانٹے رسید کیے۔

میاں نوری کے وکیل صاحب کا حشر اس سے بھی بدتر ہوا۔ وکیل زمین پر یاطاق پرتو نہیں بیٹھ سکتا۔ اس کی پوزیشن کا لحاظ تو کرنا ہی ہوگا۔ دیوار میں دو کھونٹیاں گاڑی گئیں۔ ان پر چیڑ کا ایک پرانا پٹرا رکھا گیا۔ پٹرے پر سرخ رنگ کا ایک چیتھڑا بچھا دیا گیا جو منزلہ قالین کا تھا۔ وکیل صاحب عالم بالاپہ جلوہ افروز ہوئے۔ یہیں سے قانونی بحث کریں گے۔ نوری ایک پنکھا لے کر جھلنے لگا۔ معلوم نہیں پنکھے کی ہوا سے یا پنکھے کی چوٹ سے وکیل صاحب عالم بالا سے دْنیائے فانی میںآ رہے۔ اور ان کی مجسمہ خاکی کے پرزے ہوئے۔ پھر بڑے زور کا ماتم ہوا اور وکیل صاحب کی میت کوڑے پر پھینک دی گئی۔

اب رہے میاں محمود کے سپاہی۔ وہ محترم اور ذی رْعب ہستی ہے اپنے پیروںچلنے کی ذلت اسے گوارا نہیں۔ محمود نے اپنی بکری کا بچہ پکڑا اور اس پر سپاہی کو سوار کیا۔ محمود کی بہن ایک ہاتھ سے سپاہی کو پکڑے ہوئے تھی اور محمود بکری کے بچہ کا کان پکڑ کر اسے دروازے پر چلا رہاتھا۔ اور اس کے دونوں بھائی سپاہی کی طرف سے ’’سونے والے جاگتے رہو‘‘ پکارتے چلتے تھے۔ معلوم نہیں کیا ہوا، میاں سپاہی اپنے گھوڑے کی پیٹھ سے گر پڑے اور اپنی بندوق لیے زمین پر آ رہے۔ ایک ٹانگ مضروب ہو گئی۔

اب میاں حامد کا قصہ سنیے۔ امینہ اس کی آواز سنتے ہی دوڑی اور اسے گود میں اْٹھا کر پیار کرنے لگی۔ دفعتاً اس کے ہاتھ میں چمٹا دیکھ کر چونک پڑی۔
’’یہ دست پناہ کہاں تھا بیٹا؟‘‘
’’میں نے مول لیا ہے، تین پیسے میں۔‘‘
امینہ نے چھاتی پیٹ لی۔ ’’یہ کیسا بے سمجھ لڑکا ہے کہ دوپہر ہو گئی۔ نہ کچھ کھایا نہ پیا۔ لایا کیا یہ دست پناہ۔ سارے میلے میں تجھے اور کوئی چیز نہ ملی۔‘‘
حامد نے خطاوارنہ انداز سے کہا: ’’تمھاری انگلیاں توے سے جل جاتی تھیں کہ نہیں؟‘‘
امینہ کا غصہ فوراً شفقت میں تبدیل ہو گیا۔ اور شفقت بھی وہ جو بیان نہیں کی جا سکتی۔ اور اپنی ساری تاثیر لفظوں میں منتشر کر دیتی ہے۔ یہ بے زبان شفقت تھی۔ درد التجا میں ڈوبی ہوئی۔ اْف کتنی نفس کشی ہے۔ کتنی جاں سوزی ہے۔ غریب نے اپنے طفلانہ اشتیاق کو روکنے کے لیے کتنا ضبط کیا۔جب دوسرے لڑکے کھلونے لے رہے ہوں گے، مٹھائیاں کھا رہے ہوں گے، اس کادل کتنا لہراتا ہوگا۔ اتنا ضبط اس سے ہوا کیوں کر۔ اپنی بوڑھی دادی کی یاد اسے وہاں بھی رہی۔ میرا لال میری کتنی فکر رکھتا ہے۔ اس کے دل میں ایک ایسا جذبہ پیدا ہوا کہ اس کے ہاتھ میں دنیا کی بادشاہت آ جائے اور وہ اسے حامد کے اوپر نثار کر دے۔

اور تب بڑی دلچسپ بات ہوئی۔ بوڑھی امینہ، ننھی سی امینہ بن گئی۔ وہ رونے لگی۔ دامن پھیلا کر حامد کو دعائیں دیتی جاتی تھی اور آنکھوں سے آنسو کی بڑی بڑی بوندیں گراتی جاتی تھی۔ حامد اس کا راز کیا سمجھتا اور نہ شاید ہمارے بعض ناظرین ہی سمجھ سکیں گے۔

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Parmeshar Singh… by Ahmad Nadeem Qasmi

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Permasher Singh, a story of the parition. Photo Courtesy: trekearth.com/bobomietie

परमेशर सिंह

अहमद नदीम कास्मी

 उर्दू से हिन्दी: शीराज़ हसन 

अख़्तर अपनी माँ से यूं अचानक बिछड़ गया जैसे भागते हुए किसी जेब से रुपया गिर पड़े. अभी था और अभी गायब. ठनडया पड़ी मगर बस इस हद तक कि लुटे-पिटे क़ाफ़िले के आख़िरी सिरे पर एक हंगामा साबुन के झाग की तरह उठा और बैठ गया. “कहीं आ ही रहा होगा.”  किसी ने कहा “हजारों का तो क़ाफ़िला है” और अख़्तर की माँ इस तसल्ली की लाठी थामे पाकिस्तान ओर रेंगती चली आई थी. “आ रहा होगा “वह सोचती. “कोई तितली पकड़ने निकल गया होगा और फिर माँ को न पाकर रोया होगा और फिर. फिर अब कहीं आ ही रहा होगा. समझदार है पाँच साल से कुछ ऊपर हो चला है. आ जाएगा वहां पाकिस्तान में ज़रा ठिकाने से बैठूँगी तो ढूंढ लूंगी.”

लेकिन अख़्तर तो सीमा से कोई पन्द्रह मील उधर यूँ ही बस किसी वजह के बिना इतने बड़े क़ाफ़िले से कट गया था. अपनी मां के विचार के अनुसार उसने तितली का पीछा किया या किसी खेत में गन्ने तोड़ने गया और तोड़ता रह गया. बहरहाल, जब रोताल चिल्लाता एक तरफ़ भागा जा रहा था तो सिखों ने उसे घेर लिया और अख़्तर ने तैश में आकर कहा “मैं नारा-ए-तकबीर मारूंगा”और यह कहकर वह सहम गया था.

 

सभी सिख बेइख्तियार हंस पड़े थे, सिवाए एक सिख के जिसका नाम परमेशर सिंह था. ढीली-ढाली पगड़ी में से उसके उलझे हुए केश  झांक रहे थे और जूडा तो बिल्कुल नंगा था. वह बोला “हंसो नहीं यारों, इस बच्चे को तो वाहे गुरू बनाया है जिसने तुम्हें और तुम्हारे बच्चों को पैदा किया है.”

एक नोजवान सिख जिस अब तक अपनी कृपाण निकाल ली थी , बोला “ज़रा ठहर परमेशर. कृपाण अपना धर्म पूरा कर ले, तो हम धर्म की बात करेंगे.”

“मारो नहीं यारो” परमेशर सिंह की आवाज़ में पुकार थी. इसे मारो नहीं है और वे बुरी तरह कांप रहा था.

अख़्तर के पास आकर वह घुटनों के बल बैठ गया और बोला.

“नाम क्या है तुम्हारा?”

“अख्तर” . . . अबकी अख़्तर की आवाज़ भराई हुई नहीं थी.

“अख़्तर बेटे” परमेशर सिंह ने बड़े प्यार से कहा.

“ज़रा मेरी उंगलियों में झांको तो”

अख़्तर ज़रा सा झुक गया. परमेशर सिंह ने दोनों हाथों में ज़रा सी झरी बनाई और तुरंत बंद कर ली “अहा” अख़्तर ने ताली बजाकर अपने हाथों को परमेशर सिंह के हाथों की तरह बंद कर लिया और आँसुओं में मुस्करा कर बोला. “तितली”

“लोगे?” परमेशर सिंह ने पूछा.

“हाँ” अख़्तर ने अपने हाथों को मला.

“लो” परमेशर सिंह ने अपने हाथों को खोला. अख़्तर ने तितली को पकड़ने की कोशिश की मगर वह रास्ता पाते ही उड़ गई और अख़्तर की उंगलियों की पोरों पर अपने परों के रंगों के ज़र्रे छोड़ गयी. अख़्तर उदास हो गया और परमेशर सिंह दूसरे सिखों की तरफ़ देखकर बोला “सभी बच्चे एक से क्यों होते हैं यारों! करतार की तितली भी उड़ जाती थी यूँ ही मुँह लटका लेता था…”

 

“परमेशर सिंह तू आधा पागल हो गया है.” नोजवान सिख ने ना-गवारी से कहा और फिर सारी टोली वापिस जाने लगी.

परमेशर सिंह ने अख़्तर को किनारे पर बिठा लिया और जब उसी तरफ़ चलने लगा जिधर दूसरे सिख गए थे तो अख़्तर फड़क फड़क कर रोने लगा” हम अम्मा पास जाएँगे. अम्मा पास जाएँगे”. परमेशर सिंह ने हाथ उठाकर उसे थपकने की कोशिश की मगर अख़्तर ने उसका हाथ झटक दिया फिर जब परमेशर सिंह ने यह कहा कि “हाँ हाँ बेटे,तुम्हें तुम्हारी अम्मा पास लिए चलता हूँ”. तो अख़्तर चुप हो गया. कभी-कभी सिसक लेता था और परमेशर सिंह की थपकियों को बड़ी ना-गवारी से बर्दाश्त करता जा रहा था.

 

परमेशर सिंह उसे अपने घर ले आया. पहले यह किसी मुसलमान का घर था. लुटा-पिटा परमेशर सिंह जब ज़िला लाहौर से ज़िला अमृतसर में आया था तो गाँव वालों ने उसे यह मकान अलाट कर दिया था वह अपनी पत्नी और बेटी के साथ जब चारदीवारी में दाख़िल हुआ था, ठिठक कर रह गया था. “यह इतना जरा सा तो है और उसे भी तो उसी वाहे गुरूजी बनाया है जिस ने . . . ”

“पूछ लेते हैं इसी से… ” एक और सिख बोला तो उस ने डरे हुए अख़्तर के पास जाकर कहा . . . “बोलो तुम्हें किसने पैदा किया है? ख़ुदा ने या वाहेगुरुजी ने?”

अख़्तर ने सारी ख़ुशकी को निगलने की कोशिश की जो ज़ुबान की नोक से लेकर नाभि तक फैल चुकी थी, आंखें झपक कर उसने अपने आंसुओं को गिरा देना चाहा कि रेत की तरह उसके पपोटों में खटक रहे थे . उसने परमेशर सिंह की तरफ़ यूं देखा जैसे माँ को देख रहा है. मुंह में गए हुए एक आंसू को थूक डाला और बोला.

“पता नहीं.”

“लो और सुनो” किसी ने कहा और अख़्तर को गाली देकर हंसने लगा.

अख़्तर ने अभी अपनी बात पूरी नहीं की थी, बोला . . . “अम्मा तो कहती है भूसे की कोठरी में पड़ा मिला था.”

 

सभी सिख हंसने लगे मगर परमेशर सिंह बच्चों की तरह बिलबिला कर कुछ यूं रोया कि दूसरे सिख भौंचक्का से रह गए और परमेशर सिंह रोनी आवाज़ में जैसे बैन करने लगा . . . “सभी बच्चे एक से होते हैं, यारों. मेरा करतारा भी तो यही कहता था वह भी तो उसकी माँ को भूसे की कोठरी में पड़ा मिला था . ”

 

कृपाण म्यान में चली गई. सिखों ने परमेशर सिंह से अलग थोड़ी देर खुसर-फुसर की. फिर एक सिख आगे बढ़ा. बिलखते हुए अख़्तर को हाथ से पकड़े वह चुपचाप रोते हुए परमेशर सिंह के पास आया और बोला . . . “ले परमेशरे… संभाल इसे केश बढ़ा कर इसे अपना करतार बना ले . . . ले पकड़ “.

 

परमेशर ने अख़्तर को यूँ झपट कर उठा लिया कि उसकी पगड़ी खुल गई और केश की लटें लटकने लगीं. उसने अख़्तर को पागलों की तरह चूमा. उसे अपने सीने से भींचा और फिर उसकी आंखों में आंखें डाल कर और मुस्कुरा मुस्कुरा कर कुछ ऐसी बातें सोचने लगा जिन्होंने उसके चेहरे को चमका दिया फिर उसने पलट कर दूसरे सिखों की तरफ देखा. अचानक वह अख़्तर को नीचे उतार कर सिखों की तरफ़ लपका, लेकिन उनके पास से गुज़र कर दूर भागा चला गया. झाड़ियों के एक झुंड में बंदरों की तरह कूदता और छिपता रहा और उसके केश इस लपक-झपट में उसका साथ देते रहे. दूसरे सिख हैरान खड़े देखते रहे, वे एक हाथ दूसरे हाथ में रखे भागता हुआ वापस आया. उसकी भीगी हुई दाढ़ी में फंसे हुए होठों पर मुस्कान थी और लाल आँखों में चमक थी. आंखें पथरा-सी गई थीं और वह बड़ा उद्विग्न होकर फुसफुसाते हुए बोला था . “यहाँ कोई चीज़ कुरान पढ़ रही है”

 

ग्रंथी जी और गाँव के दूसरे लोग हँस पड़े थे. परमेशर सिंह की बीवी ने उन्हें पहले से बता दिया था कि करतार सिंह के बिछड़ते ही उन्हें कुछ हो गया है. “जाने क्या हो गया है उसे” उसने कहा. वाहेगुरुजी झूठ न बुलवाएं तो वहां दिन में दस बार तो करतार सिंह को गधों की तरह पीट डालता था. और जब करतार सिंह बछड़ा है तो मैं तो खैर रो-धो ली पर इसका रोने से भी जी हल्का नहीं हुआ. वहाँ मजाल है जो बेटी अमर कौर को मैं ज़रा भी गुस्से से देख लेती, बिफर जाता था, कहता था, बेटी को बुरा मत कहो. बेटी बड़ी विनम्र होती है. यह तो एक यात्री है बेचारी. हमारे घरौंदे में सुस्ताने बैठ गई है. समय आएगा तो चली जाएगी और अब अमर कौर से ज़रा-सा भी कोई दोष हो तो आपे में नहीं रहता. यहां तक बक देता है कि “बेटियाँ बीवियाँ अपहरण होती सुनी थीं यारो. यह नहीं सुना था कि पाँच साल के बेटे भी उठ जाते हैं.”

 

वह एक महीने से इस घर में रहते थे मगर हर रात उसका नियम था कि पहले सोते में बहुत ज्यादा करवटें बदलता फिर बड़बड़ाने लगता और फिर उठ बैठता. बड़ी डरी हुई फुसफुसाहट में पत्नी से कहता “सुनती हो! यहाँ कोई चीज़ कुरान पढ़ रही है” . . . पत्नी उसे सिर्फ “ओंह” से टाल सो जाती थी, मगर अमर कौर को उसकी इस फुसफुसाहट के बाद रात भर नींद न आई. उसे अंधेरे में बहुत-सी परछाइयां हर तरफ़ बैठी कुरान पढ़ती नज़र आईं और फिर जब जरा-सी पौ फटती तो वह कानों में उँगलियाँ दे लेती थी. वहाँ ज़िला लाहौर में उनका घर मस्जिद के पड़ोस ही में था और जब सुबह अज़ान होती थी तो कैसा मज़ा आता था. ऐसा लगता था कि जैसे पूरब से फूटता हुआ उजाला गाने लगा है. फिर जब उसकी पड़ौसन प्रीतम कौर को कुछ नौजवानों ने खराब करके चीथड़े की तरह घूरे पर फेंक दिया था तो जाने क्या हुआ कि मुअज़्ज़न की अज़ान में भी उसे प्रीतम कौर की चीख़ सुनाई दे रही थी, अज़ान का खयाल तक उसे भयभीत कर देता था और वह यह भी भूल जाती थी कि अब उनके पड़ोस में मस्जिद नहीं है. यूँ ही कानों में उँगलियाँ देते हुए वह सो जाती और रात भर जागते रहने की वजह से दिन चढ़े तक सोई रहती थी और परमेशर सिंह इस बात पर बिगड़ जाता . . . ” ठीक है सोए नहीं तो और क्या करे. निकम्मी तो होती हैं यह छोकरियां. पुरुष तो अब तक जाने कितने काम कर चुका होता यारों.”

परमेशर सिंह आंगन में दाख़िल हुआ तो आज सदा से विपरीत उसके होठों पर मुस्कान थी. इसके खुले केश कंघे समेत उसकी पीठ और कंधे पर बिखरे हुए थे और उसका एक हाथ अख़्तर की कमर थपके जा रहा था. उसकी पत्नी एक तरफ़ बैठी छाज में गेहूं फटक रही थी. उसके हाथ जहाँ थे वहीं रुक गए और टुकुर-टुकुर परमेशर सिंह को देखने लगी. फिर वह छाज पर से कूदती हुई आयी और बोली.

“यह कौन है?”

 

परमेशर सिंह यथापूर्वक मुस्कुराते हुए बोला. . . “डरो नहीं बेवक़ूफ़, इसकी आदतें बिल्कुल करतारे की सी हैं यह भी अपनी माँ को भूसे की कोठरी में पड़ा मिला था. यह भी तितलियों का आशिक है, इसका नाम अख्तर है.”

 

“अख़्तर”, पत्नी के तेवर बदल गए.

 

“तुम इसे अख़्तर सिंह कह लेना” परमेशर सिंह ने समझाया. . . “और फिर केशों का क्या है, दिनों में बढ़ जाते हैं. कड़ा और कच्छा पहना दो, कंघा केशों के बढ़ते ही लग जाएगा.”

 

“पर ये है किसका?” पत्नी ने स्पष्टीकरण चाही.

 

“किसका है!” परमेशर सिंह ने अख़्तर को कन्धे पर से उतार कर उसे ज़मीन पर खड़ा कर दिया और उसके सिर पर हाथ फेरने लगा. वाहे गुरुजी का है, हमारा अपना है और फिर यारों यह औरत इतना भी नहीं देख सकती कि अख़्तर के माथे पर जो ज़रा-सा तिल है यह करतारे ही का तिल है. करतारे का भी तो एक तिल था और यहीं था. ज़रा बड़ा था पर हम उसे यहीं तिल पर तो चूमते थे. और अख़्तर के कानों की लवीं गुलाब की तरह गुलाबी हैं तो यारों. यह औरत यह तक नहीं सोचती कि करतारे के कान की लवीं भी तो ऐसी ही थीं. फ़र्क़ सिर्फ इतना है कि वह ज़रा मोटी थीं, यह जरा पतली और . . . ”

 

अख़्तर अब तक मारे आश्चर्य के धैर्य किए बैठा था. बिलबिला उठा . . . “हम नहीं रहेंगे, हम अम्मा पास जाएँगे… अम्मा पास”

 

परमेशर सिंह ने अख़्तर का हाथ पकड़कर उसे बीवी की तरफ़ बढ़ाया . . . “अरी लो. यह अम्मा के पास जाना चाहता है”

 

“तो जाए.” पत्नी की आँखों में और चेहरे पर वही दुष्टता आ गयी थी जिसे परमेशर सिंह अपनी आँखों और चेहरे से नोच कर बाहर खेतों में झटक आया था… “डाका मारने गया था सूरमा. और उठा लाया यह हाथ-भर लौंडा. अरे कोई लड़की ही उठा लाता. तो हज़ार में न सही, दो सौ में बिक जाती. इस उजड़े घर का खाट खटोला बन जाता और फिर … पगले तुझे तो कुछ हो गया है, देखते नहीं यह लड़का मुसल्ला है? जहाँ से उठा लाये हो वहीं वापिस डाल आओ. ख़बरदार जो इसने मेरे चौके में पाँव रखा. ”

परमेशर सिंह ने विनती की. . . “करतारे और अख़्तर को एक ही वाहे गुरुजी ने पैदा किया है, समझीं”

“नहीं” अब के पत्नी चीख़ उठी … “मैं नहीं समझी और न कुछ समझना चाहती हूँ, मैं रात ही रात झटका कर डालूंगी इसका, काटकर फेंक दूँगी. उठा लाया है वहाँ से ले जा इसे फेंक दे बाहर.”

“तुम्हें न फेंक दूँ बाहर?”… अब के परमेशर सिंह बिगड़ गया.

“तुम्हारा न कर डालूँ झटका?” वह पत्नी की तरफ़ बढ़ा और बीवी अपने सीने को दो हथड़ों से पीटती, चीख़ती, चिल्लाती भागी. पड़ोस से अमर कौर दौड़ी आई. इसके पीछे गली की दूसरी औरतें भी आ गयीं. मर्द भी जमा हो गए और परमेशर सिंह की बीवी पिटने से बच गई. फिर सबने उसे समझाया कि नेक काम है, एक मुस्लिम को सिख करना कोई मामूली काम तो नहीं. पुराना ज़माना होता तो अब तक परमेशर सिंह गुरु मशहूर हो चुका होता. पत्नी की ढाढस बंधी पर अमर कौर एक कोने में बैठी घुटनों में सिर दिये रोती रही. अचानक परमेशर सिंह की गरज ने सारी भीड़ को हिला दिया… “अख़्तर किधर गया है वह चला गया यारो … अख़्तर … अख़्तर … !” वह चीख़ता हुआ मकान के कोनों खुद्रों में झाँकता हुआ बाहर भाग गया. बच्चे मारे दिलचस्पी के उसके पीछे थे. महिलाएं छतों पर चढ़ गई थीं और परमेशर सिंह गलियों से बाहर खेतों में निकल गया था… ” अरे, में तो उसे अम्मा पास ले चलता यारों. अरे, वह गया कहां? अख़्तर … हे अख़्तर… !”

“मैं तुम्हारे पास नहीं आऊँगा.” पगडंडी के एक मोड़ पर ज्ञान सिंह के गन्ने के खेत की आड़ में रोते हुए अख़्तर ने परमेशर सिंह को डाँट दिया “तुम तो सिख हो.”

“हाँ भैया मैं तो सिख हूं.” परमेशर सिंह ने जैसे मजबूर होकर स्वीकार अपराध कर लिया.

“तो फिर हम नहीं आएंगे.” अख़्तर ने पुराने आँसुओं को पोंछ कर नए आँसुओं के लिए रास्ता साफ़ किया.

“नहीं आओगे?” परमेशर सिंह का लहजा अचानक बदल गया .

“नहीं”

“नहीं आओगे ? ”

“नहीं…नहीं नहीं”

 

“कैसे नहीं आओगे?” परमेशर सिंह ने अख़्तर को कान से पकड़ा और फिर निचले होंठ को दांतों में दबा कर उसके मुंह पर चटाख से एक थप्पड़ मार दिया. “चलो” वह कड़का.

अख़्तर यूँ सहम गया जैसे एकदम उसका सारा खून नुचड़ कर रह गया है. फिर एका-एकी वह ज़मीन पर गिर पैर पटकने, धूल उड़ाने और बिलख-बिलख कर रोने लगा. “नहीं चलता बस नहीं चलता! तुम सिख हो मैं सिखों के पास नहीं जाऊँगा. में अम्मा पास जाऊँगा, मैं तुम्हें मार दूंगा”

 

और अब जैसे परमेशर सिंह के सहने की बारी थी. उसका भी सारा ख़ून जैसे निचुड कर रह गया था. उसने अपने हाथ को दाँतों में जकड़ लिया. उसके नथने फड़कने लगे और फिर इस ज़ोर से रोया कि खेत की दूसरी तरफ़ मेड पर आते हुए कुछ पड़ोसी और उनके बच्चे भी सहम कर रह गए और ठिठक गए. परमेशर सिंह घुटनों के बल अख़्तर के सामने बैठ गया. बच्चों की तरह यूँ सिसक सिसक कर रोने लगा कि उसका निचला होंठ भी बच्चों की तरह लटक आया और फिर बच्चों की सी रोती आवाज़ में बोला.

 

“मुझे माफ़ कर दे अख़्तर, मुझे तुम्हारे ख़ुदा की कसम मैं तुम्हारा दोस्त हूँ, तुम अकेले यहाँ से जाओगे तो तुम्हें कोई मार देगा. फिर तुम्हारी माँ पाकिस्तान से आकर मुझे मारेगी. मैं ख़ुद जाकर तुम्हें पाकिस्तान छोड़ आऊँगा. सुना? फिर वहाँ अगर तुम्हें एक लड़का मिल जाए ना. करतार नाम  का तो तुम उसे इधर गाँव में छोड़ जाना. अच्छा?”

 

“अच्छा!” अख़्तर ने उलटे हाथों से आँसू पोंछते हुए परमेशर सिंह से सौदा कर लिया .

परमेशर सिंह ने अख़्तर को कन्धे पर बिठा लिया और चला मगर एक ही कदम उठाकर रुक गया. सामने बहुत-से बच्चे और पड़ोसी खड़े उसकी तमाम हरकतें देख रहे थे. अधेड़ उम्र का एक पड़ोसी बोला … “रोते क्यों हो परमेशरे कुल एक महीने की तो बात है, एक महीने में केश बढ़ आएंगे तो बिल्कुल करतारा लगेगा.”

 

कुछ कहे बिना वह तेज़ तेज़ कदम उठाने लगा. फिर एक जगह रुककर उसने पलट कर अपने पीछे आने वाले पड़ोसियों की ओर देखा. . . “तुम कितने ज़ालिम लोग हो यारो. अख़्तर को करतारा बनाते हो और उधर अगर करतारे को अख़्तर बना ले तो? उसे ज़ालिम ही कहोगे ना.” फिर उसकी आवाज़ में गरज आ गई… ” यह लड़का मुसलमान ही रहेगा . दरबार साहब की सौं. में कल अमृतसर जाकर इसके अंग्रेजी बाल बनवा लाऊँगा. तुम ने मुझे समझ क्या रखा है , खालसा हूँ, सीने में शेर का दिल है, मुर्गी का नहीं”

 

परमेशर सिंह अपने घर में दाहिल होकर अभी अपनी पत्नी और बेटी को अख़्तर की जुलना के सिलसिले में आदेश ही दे रहा था कि गांव का ग्रंथी सरदार सनतो सिंह अंदर आया और बोला, “परमेशर सिंह.”

“जी”, परमेशर सिंह ने पलट कर देखा. ग्रंथी जी के पीछे उसके सब पड़ोसी भी थे.

 

“देखो” ग्रंथी जी ने बड़े दबदबे से कहा… “कल से यह लड़का खालसे की सी पगड़ी बांधेगा, कड़ा पहनेगा, धर्मशाला आएगा और इसे प्रसाद खिलाया जाएगा. उसके केश को कैंची नहीं छूएगी. छू गई तो कल ही से यह घर ख़ाली कर दो. समझे?”

“जी” परमेशर सिंह ने धीरे से कहा.

“हाँ.” ग्रंथीजी ने आख़री चोट लगाई.

“ऐसा ही होगा ग्रंथीजी.” परमेशर सिंह की पत्नी बोली… “पहले ही उसे रात को घर के कोने-कोने से कोई चीज़ कुरान पढ़ती सुनाई देती है. लगता है पहले जन्म में मुसल्ला रह चुका है. अमर कौर बेटी ने जब से यह सुना है कि हमारे घर में मुसल्ला छोकरा आया तो बैठी रो रही है, कहती है घर पर कोई आफ़त आएगी. परमेशरे ने आपका कहा न माना तो मैं भी धर्मशाला में चली आऊँगी और अमर कौर भी. फिर यह छोकरे को चाटे मुआ निकम्मा, वाहे गुरुजी का भी लिहाज़ नहीं करता”

 

“वाहे गुरुजी का अनुसार कौन नहीं करता गधी” परमेशर सिंह ने ग्रंथीजी की बात का गुस्सा बीवी पर निकाला. फिर वह मुह में ही गालियाँ देता रहा. कुछ देर के बाद वह उठकर ग्रंथीजी के पास गया. “अच्छा जी अच्छा” उसने कहा. ग्रंथीजी पड़ोसियों के साथ फ़ौरन विदा हो गए.

 

कुछ ही दिनों में अख़्तर को दूसरे सिख लड़कों से पहचानना मुश्किल हो गया. वही कानों की लवों तक कस कर बंधी हुई पगड़ी, वही हाथ का कड़ा और वही कच्छा. केवल जब वह घर में आकर पगड़ी उतारता था तो उसके गैर सिख होने का रहस्य खुलता था. लेकिन बाल धड़ा-धड़ बढ़ रहे थे. परमेशर सिंह की बीवी इन बालों को छूकर बहुत खुश होती… “ज़रा इधर तो आ अमर कौर, यह देख केश बन रहे हैं. फिर एक दिन जोड़ा बनेगा. कंघा लगेगा और उसका नाम रखा जाएगा करतार सिंह”

 

“नहीं माँ.” अमर कौर वहीं से जवाब देती… “जैसे वाहे गुरुजी एक हैं और ग्रन्थ साहब एक हैं और चाँद एक है. इसी तरह करतार भी एक है. मेरा नन्हा-मुन्ना भाई!” वह फूट-फूट कर रो देती और मचल कर कहती… “मैं इस खिलौने से नहीं बहलूंगी माँ, मैं जानती हूँ माँ यह मुसल्ला है और जो करतार होता है वह मुसल्ला नहीं होता.”

 

“मैं कब कहती हूँ यह सचमुच का करतार है. मेरा चाँद-सा लाडला बच्चा!”… परमेशर सिंह की बीवी भी रो देती. दोनों अख़्तर को अकेला छोड़कर किसी कोने में बैठ जातीं. ख़ूब ख़ूब रोतीं, एक दूसरे को तसल्लियाँ  देती और फिर ज़ार-ज़ार रोने लगतीं वह अपने करतार के लिए, अख़्तर कुछ दिन अपनी माँ के लिए रोया, अब किसी और बात पर रोता जब परमेशर सिंह शरणार्थियों की सहायता पंचायत से कुछ अनाज या कपड़ा ले आता तो अख़्तर भाग कर जाता और उसकी टांगों से लिपट जाता और रो रोकर कहता. . . “मेरे सिर पर पगड़ी बांध दो परमों … मेरे केश  बढ़ा दो. मुझे कंघा खरीद दो..”

 

परमेशर सिंह उसे सीने से लगा लेता और भराई हुई आवाज़ में कहता . . . “यह सब होगा बच्चे. सब कुछ हो जाएगा पर एक बात कभी नहीं होगी. वह बात कभी नहीं होगी. वह नहीं होगा मुझसे समझे? यह केश-वेश सब बढ़ आएँगे”

अख़्तर अपनी माँ को बहुत कम याद करता था. जब तक परमेशर सिंह घर में रहता वह उससे चिमटा रहता और जब वह कहीं बाहर जाता तो अख़्तर उसकी पत्नी और अमर कौर की ओर यूँ देखता रहता जैसे उनसे एक एक प्यार की भीख मांग रहा है. परमेशर सिंह की पत्नी उसे नहलाती, उसके कपड़े धोती और फिर उसके बालों में कंघी करते हुए रोने लगती और रोती रह जाती. लेकिन अमर कौर ने जब ​​देखा, नाक उछाल दी. शुरू शुरू में तो उसने अख़्तर को धमोका भी जड़ दिया था लेकिन जब अख़्तर ने परमेशर सिंह से इसकी शिकायत की तो परमेशर सिंह बिफर गया और अमर कौर को बड़ी नंगी-नंगी गालियां देता उसकी ओर बढ़ा कि अगर उसकी पत्नी रास्ते में पैर न पड़ जाती तो वह बेटी को उठाकर दीवार पर से गली में पटक देता . . . ” उल्लू की पट्ठी.” उस दिन उसने कड़क कर कहा था.

“सुना तो यही था कि लड़कियाँ उठ रही हैं पर यहाँ यह मुश्टंडी हमारे साथ लगी चली आई और उठ गया तो पांच साल का लड़का जिसे अभी अच्छी तरह नाक पोंछना भी नहीं आता. अजीब अंधेर है यारों.” इस घटना के बाद अमर कौर ने अख़्तर पर हाथ तो ख़ैर कभी न उठाया मगर उसकी नफ़रत दुगनी हो गई.

एक दिन अख़्तर को तेज़ बुख़ार आ गया. परमेशर सिंह वैद के पास चला गया और उसके जाने के कुछ देर बाद उसकी पत्नी पड़ोसन से पिसी हुई सौंफ माँगने चली गई. अख़्तर को प्यास लगी.

 

“पानी”, उसने कहा, कुछ देर बाद लाल लाल सूजी-सूजी आँखें खोलें इधर-उधर देखा और पानी का शब्द एक कराह बनकर उसके हलक से निकला. कुछ देर के बाद वह लिहाफ़ एक तरफ़ झटककर उठ बैठा. अमर कौर सामने दरवाज़े पर बैठी खजूर के पत्तों से चंगैर बना रही थी… “पानी दे!” अख़्तर ने उसे डाँटा. अमर कौर ने भंवें सिकोडकर उसे घूर कर देखा और अपने काम में जुट गई. अब के अख़्तर चिल्लाया… “पानी देती है कि नहीं … पानी दे वर्ना मारूंगा” . . . अमर कौर ने अब इसकी ओर देखा ही नहीं. बोली… “मार तो सही. तो करतार नहीं कि मैं तेरी मार सह लूंगी. मैं तो तेरी बोटी-बोटी कर डालूं” अख़्तर बिलख-बिलख रो दिया. और आज उसने अवधि के बाद अपनी माँ को याद किया. फिर जब परमेशर सिंह दवा ले आया और उसकी पत्नी भी पिसी हुई सौंफ लेकर आ गयी, तब तक अख़्तर ने रोते-रोते बुरी हालत बना ली थी और वह सिसक-सिसक कर कह रहा था. “हम तो अब अम्मा पास चलेंगे. यह अमर कौर सुअर की बच्ची तो पानी भी नहीं पिलाती. हम तो अम्मा पास जाएँगे” परमेशर सिंह ने अमर कौर की ओर गुस्से से देखा. वह रो रही थी और अपनी मां से कह रही थी . . . ” क्यों पानी पिलाऊँ? करतार भी तो कहीं इसी तरह पानी माँग रहा होगा किसी से. किसी को उस पर तरस न आये तो हमें क्यों तरस आये इस पर … हाँ?”

 

परमेशर सिंह अख़्तर की ओर बढ़ा और अपनी बीवी की तरफ़ इशारा करते हुए बोला.

“यह भी तो तुम्हारी माँ है बेटे.”

“नहीं” अख़्तर बड़े गुस्से से बोला. “यह तो सिख है. मेरी अम्मा तो पाँच वक्त की नमाज़ पढ़ती है और बिस्मिल्लाह कहकर पानी पिलाती है.”

परमेशर सिंह की बीवी जल्दी से एक प्याला भरकर लाई तो अख़्तर ने प्याले को दीवार पर दे मारा और चिल्लाया. “तुम्हारे हाथ से नहीं पीएंगे”

“यह भी तो मुझ सुअर की बच्ची का पिता है” अमर कौर ने जलकर कहा.

“तो हुआ करे” अख़्तर बोला. . . “तुम्हें इस से क्या”

परमेशर सिंह के चेहरे पर सुखद भाव अजीब धूप छाँव-सी पैदा कर गए. वह अख़्तर की माँग पर मुस्कुराया  भी और रो भी दिया. फिर उसने अख़्तर को पानी पिलाया. उसके माथे को चूमा. उसकी पीठ पर हाथ फेरा, उसे बिस्तर पर लिटा कर उसके सिर को हौले हौले सहलाता रहा और कहीं शाम को जाकर जब उसने पहलू बदला,  उस वक़्त अख़्तर का बुखार उतर चुका था और वह बड़े मज़े से सो रहा था.

 

आज बहुत समय के बाद रात को परमेशर सिंह भड़क उठा और निहायत धीरे-से बोला.

“अरी सुनती हो? सुन रही हो यहाँ कोई चीज़ कुरान पढ़ रही है.”

पत्नी ने पहले तो उसे परमेशर सिंह की पुरानी आदत कहकर टालना चाहा मगर फिर एकदम बड़बड़ाकर उठी और अमर कौर की खाट की तरफ़ हाथ बढ़ाकर उसे हौले हौले हिला कर धीरे से बोली. . . “बेटी”

“क्या है माँ?” अमर कौर चौंक उठी.

और उसने फुसफुसाहट की: “सुनो तो. सचमुच कोई चीज़ कुरान पढ़ रही है.”

यह एक क्षण का सन्नाटा बड़ा भयानक था. अमर कौर की चीख़ उससे भी अधिक भयानक थी और फिर अख़्तर की चीख़ सब से ज्यादा डरावनी थी.

“क्या हुआ बेटा” परमेशर सिंह तड़पकर उठा और अख़्तर की खाट पर जाकर उसे छाती से भींच लिया. “डर गए बेटा?”

“हाँ” अख़्तर लिहाफ से सिर निकाल कर बोला. “कोई चीज़ चीख़ी थी.”

“अमर कौर चीख़ी थी” परमेशर सिंह ने कहा. . . “हम सब यूँ समझे जैसे कोई चीज़ यहां कुरान पढ़ रही है”

“मैं पढ़ रहा था” अख़्तर बोला.

अब के भी अमर कौर के मुँह से हल्की चीख़ निकल गई.

पत्नी ने जल्दी से चिराग जला दिया और अमर कौर की खाट पर बैठकर वह दोनों अख़्तर को यूँ देखने लगीं जैसे वह अभी धुआं बनकर दरवाज़े की झुरियों से बाहर उड़ जाएगा और बाहर से एक डरावनी आवाज़ आएगी. “जिन हूँ मैं! कल रात फिर आकर कुरान पढूंगा.”

“क्या पढ़ रहे थे भला?” परमेशर सिंह ने पूछा.

“पढ़ूँ?” अख़्तर ने पूछा.

“हाँ हाँ” परमेशर सिंह ने बड़े शौक से कहा.

और अख़्तर “क़ुल हु वल्लाह उहद” पढ़ने लगा. “कुफुवन् अहद” पर पहुँचकर उसने अपने गिरेबान में छू की और फिर परमेशर सिंह की तरफ़ मुस्कुराते हुए बोला. . . “तुम्हारे सीने में भी छू कर दूँ?”

“हाँ हाँ” परमेशर सिंह ने गिरेबान का बटन खोल दिया और अख़्तर ने छू कर दी. अब के अमर कौर ने बड़ी मुश्किल से चीख़ पर काबू पाया.

परमेशर सिंह बोला. . . “क्या नींद नहीं आती थी?”

 

“हाँ” अख़्तर बोला… “अम्मा याद आ गई. अम्मा कहती है नींद न आए तो तीन बार “क़ुल हू वल्लाह” पढ़ो, नींद आ जाएगी, अभी आ रही थी, पर अमर कौर ने डरा दिया.”

“फिर से पढ़कर सो जाओ” परमेशर सिंह ने कहा. . . “रोज़ पढ़ा करो. ऊँचे-ऊँचे पढ़ा करो इसे भूलना नहीं वर्ना तुम्हारी अम्मा तुम्हें मारेगी. लो, अब सो जाओ.” उसने अख़्तर को लिटा कर उसे लिहाफ से ओढ़ा दिया. फिर दिया बुझाने के लिए बढ़ा तो अमर कौर पुकारी. . . “नहीं, नहीं बाबा. बुझाओ नहीं. डर लगता है.”

“जलता रहे, क्या है?” पत्नी बोली.

और परमेशर सिंह दिया बुझाकर हँस दिया… “पगालियाँ” वह बोला… “गधियाँ!”

रात के अंधेरे में अख़्तर आहिस्ता-आहिस्ता “क़ुल हू वल्लाह” पढ़ता रहा. फिर कुछ देर बाद ज़रा-ज़रा से खर्राटे लेने लगा. परमेशर सिंह भी सो गया और उसकी पत्नी भी. मगर अमर कौर रात-भर कच्ची नींद में “पडौस” की मस्जिद की अज़ान सुनती रही और डरती रही.

अब अख़्तर के अच्छे ख़ासे केश  बढ़ आए थे. छोटे से जूडी में कंघा भी अटक जाता था. गांव वालों की तरह परमेशर सिंह की पत्नी भी उसे करतार कहने लगी थी और इससे काफी प्यार से पेश आती थी मगर अमर कौर अख़्तर को यूँ देखती थी जैसे वह कोई बहरुपिया है और अभी वह पगड़ी और केश उतार कर फेंक देगा और “क़ुल हू वल्लाह” पढ़ता हुआ गायब हो जाएगा.

एक दिन परमेशर सिंह बड़ी तेज़ी से घर आया और हाँफते हुए अपनी पत्नी से पूछा.

 

“वह कहाँ है?”

“कौन? अमर कौर?”

“नहीं.”

“करतारा?”

“नहीं …” फिर कुछ सोचकर बोला. . . “हाँ, हाँ, वही करतारा”

“बाहर खेलने गया है. गली में होगा.”

परमेशर सिंह वापिस लपका. गली में जाकर भागने लगा. बाहर खेतों में जाकर उसकी रफ़्तार और तेज़ हो गई. फिर उसे दूर ज्ञान सिंह की गन्ने की फ़सल के पास कुछ बच्चे कबड्डी खेलते नज़र आए. खेत की ओट से उसने देखा कि अख़्तर ने एक लड़के को घुटनों तले दबा रखा है. लड़के के होठों से ख़ून फूट रहा है लेकिन कबड्डी कबड्डी की रट जारी है. फिर उस लड़के ने जैसे हार मान ली. और जब अख़्तर की पकड़ से छूटा तो बोला. . . “क्यों बे करतारु! तू ने मेरे मुंह पर घटना क्यों मारा?”

“अच्छा किया जो मारा” अख़्तर अकड़ कर बोला और बिखरे हुए जूड़े की लटें सँभालकर उनमें कंघी फंसाने लगा.

“तुम्हारे रसूल ने तुम्हें यही समझाया है?” लड़के ने तंज़ से पूछा.

अख़्तर एक क्षण के लिए चकरा गया. फिर सोचकर बोला. . . “और क्या तुम्हारे गुरु ने तुम्हें यही समझाया है?”

“मुसल्ला” लड़के ने उसे गाली दी.

“सखड़ा” अख़्तर ने उसे गाली दी.

सब लड़के अख़्तर पर टूट पड़े मगर परमेशर सिंह की एक ही कड़क से मैदान साफ़ ​​था. उसने अख़्तर की पगड़ी बाँधी और उसे एक तरफ ले जाकर बोला. . . “सुनो बेटे, मेरे पास रहोगे कि अम्मा के पास जाओगे …?”

 

अख़्तर कोई फ़ैसला न कर सका. कुछ देर तक परमेशर सिंह की आँखों में आँखें डाले खड़ा रहा फिर मुस्कुराने लगा और बोला. . . “अम्मा पास जाऊँगा.”

“और मेरे पास नहीं रहोगे?”

परमेशर सिंह का रंग यूँ सुर्ख़ हो गया जैसे वह रो देगा.

“तुम्हारे पास भी रहूँगा?” अख़्तर ने समस्या का हल पेश कर दिया. परमेशर सिंह ने उसे उठाकर सीने से लगा लिया और वह आँसू जो मायूसी ने ऑंखों में जमा किए थे, खुशी के आंसू बनकर टपक पड़े. वह बोला… “देखो बेटे! अख़्तर बेटे आज यहां सेना आ रही है यह सैनिक तुम्हें मुझसे छीनने आ रहे हैं, समझे तुम कहीं छुप जाओ. फिर जब वे चले जाएँगे ना, तो मैं तुम्हें ले आऊँगा.”

परमेशर सिंह को उस वक्त दूर गुबार का एक फैलता हुआ बगूला दिखाई दिया. मैंड पर चढ़कर उसने लम्बे होते हुए बगूले को गौर से देखा और अचानक तड़प कर बोला. . . “सैनिकों की लारी आ गई …” वह मैंड से कूद पड़ा और गन्ने के खेत का पूरा चक्कर काट गया.

“ज्ञाने, ओ ज्ञान सिंह!” वह चिल्लाया. ज्ञान सिंह फसल के अंदर से निकल आया. उसके एक हाथ में दरांती और दूसरे हाथ में थोड़ी-सी घास थी… परमेशर सिंह उसे अलग ले गया, उसे कोई बात समझाई फिर दोनों अख़्तर के पास आए. ज्ञान सिंह ने फसल में से एक गन्ना तोड़कर दरांती से उसके पत्ते काटे और उसे अख़्तर के हवाले करके बोला… “आओ भाई करतार! तुम मेरे पास बैठकर गन्ना चूसो जब तक सैनिक चले जाएं. अच्छा-खासा बना-बनाया खालसा हथियाने आये हैं. हूंह”… परमेशर सिंह ने अख़्तर से जाने की अनुमति मांगी… “जाऊँ …?”

 

और अख़्तर ने दाँतों में गन्ने का लम्बा सा छिल्का जकड़े हुए मुस्कुराने की कोशिश की. अनुमति पाकर परमेशर सिंह गाँव के तरफ़ भाग गया. बगूला गांव की तरफ़ बढ़ा आ रहा था.

घर जाकर उसने बीवी और बेटी को समझाया. फिर भागम-भाग ग्रंथीजी के पास गया. उनसे बात करके इधर उधर दूसरे लोगों को समझाता फिरा. जब सैनिकों की लारी धर्मशाला से उधर खेतों में रुक गई तो सभी सैन्य और पुलिस वाले ग्रंथीजी के पास आए. उनके साथ इलाक़े का नम्बरदार भी आया था. मुसलमान लड़कियों के बारे में पूछताछ होती रही. ग्रंथीजी ने ग्रन्थ साहब की कसम खाकर कह दिया कि गाँव में कोई मुसलमान लड़की नहीं. “लड़के की बात दूसरी है” किसी ने परमेशर सिंह के कान में कानाफूसी की और आसपास के सिख परमेशर सिंह समेत मुस्कराने लगे. फिर एक सैन्य अधिकारी ने गांव वालों के सामने एक भाषण दिया. उसने मामता पर बड़ा ज़ोर दिया कि इन माताओं के दिलों में इन दिनों टीस बन कर रह गई थी जिनकी बेटियों छिन गई थीं और उन भाइयों और पतियों के प्यार की बड़ी दर्दनाक तस्वीर खींची जिनकी बहनें और पत्नियाँ उनसे हथिया ली गई थीं … “और धर्म क्या है, दोस्तो?” उसने कहा… “दुनिया का हर धर्म इंसान को इंसान बनना सिखाता है और तुम धर्म के नाम लेकर मनुष्य को मनुष्य से लड़ा देते हैं. उनकी आबरू पर नाचते हो और कहते हो हम सिख हैं, हम मुसलमान हैं … हम  वाहे गुरुजी के चेले हैं, हम रसूल के गुलाम हैं”

तक़रीर के बाद भीड़ छूटने लगी. सैनिकों के अधिकारी ने ग्रंथीजी को धन्यवाद कहा. उनसे हाथ मिलाया और लारी चली गई.

पहले ग्रंथीजी ने परमेशर सिंह को बधाई दी. फिर दूसरे लोगों ने परमेशर सिंह को घेर लिया और उसे बधाई देने लगे लेकिन परमेशर सिंह लारी आने से पहले होश बाख़्ता हो रहा था तो लारी जाने के बाद लुट-पुटा सा लग रहा था. फिर वह गाँव से निकलकर ज्ञान सिंह के खेत में आया. अख़्तर को कंधे पर बैठाकर घर में ले आया. खाना खिलाने के बाद उसे खाट पर लिटा कर कुछ यूं थपका कि उसे नींद आ गई. परमेशर सिंह देर तक खाट पर बैठा रहा. कभी दाढ़ी खुजाते और इधर उधर देखकर फिर सोच में बैठ जाता. पड़ोस की छत पर खेलता हुआ एक बच्चा अचानक अपनी एड़ी पकड़ कर बैठ गया और जोर से रोने लगा. “हाए, इतना बड़ा कांटा उतर गया पूरे का पूरा.” वह चिल्लाया और फिर उसकी माँ नंगे सिर ऊपर भागी. उसे गोद में बिठा लिया फिर नीचे बेटी को पुकार कर सुई मंगवाई. कांटा निकालने के बाद इसे बहुत चूमा और फिर नीचे झुककर पुकारा… “अरे, मेरा दुपट्टा तो ऊपर फेंक. कैसी बेहयाई से ऊपर भागी चली आयी.”

परमेशर सिंह ने कुछ देर बाद चौंककर पत्नी से पूछा.

“सुनो, क्या तुम्हें करतारा अब भी याद आता है.”

“लो और सुनो” पत्नी बोली और फिर एकदम छाजों रो दी… “करतारा तो मेरे कलेजे का नासूर बन गया है परमेशरे!”

करतारे का नाम सुनकर उधर से अमर कौर उठकर आई और रोती हुई मां के घुटने के पास बैठकर रोने लगी.

परमेशर सिंह यूं बिदक कर जल्दी से उठ बैठा जैसे उसने शीशे के बर्तनों से भरा तश्त अचानक ज़मीन पर दे मारा हो.

 

शाम के खाने के बाद वह अख़्तर को उंगली से पकड़े बाहर दालान में आया और बोला. “आज तो दिन भर खूब सोए हो बेटा. चलो आज ज़रा घूमने चलते हैं. चांदनी रात है.”

अख़्तर तुरंत मान गया. परमेशर सिंह ने उसे कंबल में लपेटा और कन्धे पर बिठा लिया. खेतों में आकर वह बोला. “यह चाँद जो पूरब से निकल रहा है न बेटे, जब यह हमारे सिर पर पहुँचेगा तो सुबह हो जाएगी.”

अख़्तर चाँद की ओर देखने लगा.

“यह चाँद जो यहाँ चमक रहा है ना. यह वहाँ भी चमक रहा होगा. तुम्हारी अम्मा के देश में.”

अब के अख़्तर ने झुककर परमेशर सिंह की ओर देखने की कोशिश की.

“यह चाँद हमारे सिर पर आएगा तो वहाँ तुम्हारी अम्मा के सिर पर भी होगा.”

अब के अख़्तर बोला “हम चाँद देख रहे हैं तो क्या अम्मा भी चाँद देख रही होगी?”

“हाँ” परमेशर सिंह की आवाज़ में गूंज थी … “चलोगे अम्मा के पास? ”

“हाँ” अख़्तर बोला… “पर तुम जाते नहीं, तुम बहुत बुरे हो, तुम सिख हो.”

परमेशर सिंह बोला. . . “नहीं बेटे, आज तो तुम्हें ज़रूर ले जाऊँगा. तुम्हारी अम्मा की चिट्ठी आई है. वह कहती है अख़्तर बेटे के लिए दुखी हूँ.”

“मैं भी तो दुखी हूँ.” अख़्तर को जैसे कोई भूली हुई बात याद आ गई.

“मैं तुम्हें तुम्हारी अम्मा के पास लिए जा रहा हूँ.”

“सच …?” अख़्तर परमेशर सिंह के कंधे पर कूदने लगा और ज़ोर ज़ोर से बोलने लगा. . . “हम अम्मा पास जा रहे हैं. परमों हमें अम्मा पास ले जाएगा. हम वहाँ परमों को चिट्ठी लिखेंगे.”

परमेशर सिंह चुपचाप रोए जा रहा था. आँसू पोंछकर और गला साफ़ करके उसने अख़्तर से पूछा.

“गाना सुनोगे?”

“हाँ”

“पहले तुम कुरान सुनाओ.”

“अच्छा” और अख़्तर “क़ुल हु वल्लाह” अहद पढ़ने लगा, “कुफुवन् अहद” पर पहुँचकर उसने अपने सीने पर छू करदी, और बोला. . . “लाओ तुम्हारे सीने पर भी छू कर दूं.”

रुक कर परमेशर सिंह ने गिरेबान का एक बटन खोला और ऊपर देखा. अख़्तर ने लटक कर उसके सीने पर छू कर दी और बोला. . . “अब तुम सुनाओ.”

 

परमेशर सिंह ने अख़्तर को दूसरे कन्धे पर बिठा लिया. उसे बच्चों का कोई गीत याद नहीं था. इसलिए उसने तरह-तरह के गीत गाने शुरू किये और गाते हुए तेज़-तेज़ चलने लगा. अख़्तर चुपचाप सुनता रहा.

“बन्तो दा सर बन वरगा जे बन्तो दा मुंह चन् वरगा जे बन्तो दा लक चित्रा जे लोको बन्तो दा लक चित्रा…”

“बन्तो कौन है?” अख़्तर ने परमेशर सिंह को टोका.

परमेशर सिंह हँसा फिर विराम के बाद बोला… “मेरी पत्नी है ना? अमर कौर की मां? उसका नाम बन्तो है. अमर कौर का नाम भी बन्तो है. तुम्हारी अम्मा का नाम भी बन्तो ही होगा.”

“क्यों?” अख़्तर खफ़ा हो गया… “वह कोई सिख है?”

परमेशर सिंह चुप हो गया.

चाँद बहुत ऊँचा हो गया था. रात ख़ामोश थी, कभी-कभी गन्ने के खेतों के आस पास गीदड़ रोते और फिर सन्नाटा छा जाता. अख़्तर पहले तो गीदड़ों की आवाज़ से बहुत डरा मगर परमेशर सिंह के समझाने से बहल गया और एक बार खामोशी के लंबे अंतराल के बाद उसने परमेशर सिंह से पूछा. . . “अब क्यों नहीं रोते गीदड़?” परमेशर सिंह हँस दिया. फिर उसे एक कहानी याद आ गई. यह गुरु गोविन्द सिंह की कहानी थी. लेकिन उसने बड़े सलीके से सिखों के नामों को मुसलमानों के नामों में बदल दिया और अख़्तर “फिर? फिर?” की रट लगाता रहा और कहानी अभी जारी थी जब अख़्तर एकदम बोला. “अरे, चाँद तो सिर पर आ गया!”

परमेशर सिंह ने भी रुक कर ऊपर देखा. वह पास के टीले पर चढ़कर दूर से देखने लगा और बोला. . . “तुम्हारी अम्मा का देश जाने किधर चला गया.”

वह कुछ देर टीले पर खड़ा रहा. जब अचानक कहीं दूर से अज़ान की आवाज़ आने लगी और अख़्तर मारे खुशी के यूँ कूदा कि परमेशर सिंह उसे बड़ी मुश्किल से संभाल सका. उसे कंधे से उतारकर वह ज़मीन पर बैठ गया और खड़े हुए अख़्तर के कन्धों पर हाथ रखकर बोला… “जाओ बेटा, तुम्हें तुम्हारी अम्मा ने पुकारा है. बस तुम इस आवाज़ की सीध में…”

“श्श” अख़्तर ने अपने होठों पर उंगली रख दी और फुसफुसाहट की.

“अज़ान के वक्त नहीं बोलते.”

“पर मैं तो सिख हूं बेटे!” परमेशर सिंह बोला.

“श्श” अब के अख़्तर ने बिगड़ कर उसे घूरा.

और परमेशर सिंह ने उसे गोद में बिठा लिया. उसके माथे पर एक बहुत लम्बा प्यार दिया और अज़ान समाप्त होने के बाद आस्तीन से आँखें रगड़ कर भराई हुई आवाज़ में बोला.

“मैं यहाँ से आगे नहीं आऊँगा. बस तुम …”

“क्यों …? क्यों नहीं आओगे …?” अख़्तर ने पूछा.

“तुम्हारी अम्मा ने चिट्ठी में यही लिखा है कि अख़्तर अकेला आए.”

परमेशर सिंह ने अख़्तर को फुसलाया … “बस तुम सीधे चले जाओ. सामने एक गाँव आएगा. वहाँ जाकर अपना नाम बताना करतारा नहीं, अख़्तर. फिर अपनी मां का नाम बताना. अपने गाँव का नाम बताना और देखो, मुझे एक चिट्ठी ज़रूर लिखना.”

“लिखूंगा” अख़्तर ने वादा किया.

“और हाँ, तुम्हें करतारा नाम का कोई लड़का मिले न, तो उसे इधर भेज देना.”

“अच्छा” परमेशर सिंह ने एक बार फिर अख़्तर का माथा चूमा और जैसे कुछ निगल कर बोला.

“जाओ!”

अख़्तर कुछ कदम चला मगर पलट आया. . . “तुम भी आ जाओ, ना.”

“नहीं भाई!” परमेशर सिंह ने उसे समझाया. . . “तुम्हारी अम्मा ने चिट्ठी में यह नहीं लिखा.”

“मुझे डर लगता है.” अख़्तर बोला.

“कुरान क्यों नहीं पढ़ते?” परमेशर सिंह ने सुझाव दिया.

“अच्छा” बात समझ में आ गई और वह “क़ुल हु वल्लाह” का पाठ करता हुआ जाने लगा.

नरम-नरम पौ क्षितिज के दायरे पर अँधेरे से लड़ रही थी और नन्हा-सा अख़्तर दूर धुंधली पगडंडी पर एक लंबे तडंगे सिख जवान की तरह तेज़-तेज़ जा रहा था. परमेशर सिंह उस पर नज़रें गाड़े टीले पर बैठा रहा और जब अख़्तर बिंदु वातावरण का एक हिस्सा बन गया तो वहाँ से उतर आया.

अख़्तर अभी गाँव के क़रीब नहीं पहुँचा था कि दो सिपाही लपक कर आये और उसे रोककर बोले. “कौन हो तुम?”

“अख़्तर”

वह यूँ बोला जैसे सारी दुनिया उसका नाम जानती है.

“अख़्तर!” दोनों सिपाही कभी अख़्तर के चेहरे को देखते और कभी उसकी सिखों की सी पगड़ी को. फिर एक ने आगे बढ़कर उसकी पगड़ी झटके से उतार ली तो अख़्तर के केश खुलकर इधर उधर बिखर गए.

अख़्तर ने भिन्ना कर पगड़ी छीन ली और फिर एक हाथ सेसिर को टटोलते हुए वह ज़मीन पर लेट गया और ज़ोर-ज़ोर से रोते हुए बोला… “मेरा कंघा लाओ. आप ने मेरा कंघा ले लिया है. दो वरना मैं तुम्हें मारूंगा.”

एकदम दोनों सिपाही धप ज़मीन पर गिरे और राइफल को कंधे से लगाकर जैसे निशाना बाँधने लगे.

“हाल्ट!” एक पुकारा, जैसे जवाब का इंतजार करने लगा. फिर बढ़ते हुए उजाले में उन्होंने एक दूसरे की ओर देखा और एक ने फायर कर दिया. अख़्तर फायर की आवाज से दहल कर रह गया और सिपाहियों को एक तरफ भागता देखकर वह भी रोता-चिल्लाता हुआ उनके पीछे भागा.

सिपाही जब एक जगह जाकर रुके तो परमेशर सिंह अपनी रान पर कस कर पट्टी बाँध चुका था मगर खून उसकी पगड़ी की सैकड़ों परतों में से भी फूट आया. और वह कह रहा था… “मुझे क्यों मारा तुमने? मैं तो अख़्तर के केश काटना भूल गया, मैं अख़्तर को उसका धर्म वापस देने आया था यारों.”

और अख़्तर भागा आ रहा था और इस केश हवा में उड़ रहे थे.

 ***

پرمیشر سنگھ
از احمد ندیم قاسمی

اختر اپنی ماں سے یوں اچانک بچھڑ گیا جیسے بھاگتے ہوئے کسی جیب سے روپیہ گر پڑے۔ ابھی تھا اور ابھی غائب۔ ڈھنڈیا پڑی مگر بس اس حد تک کہ لٹے پٹے قافلے کے آخری سرے پر ایک ہنگامہ صابن کی جھاگ کی طرح اٹھا اور بیٹھ گیا۔ “کہیں آ ہی رہا ہو گا۔ ” کسی نے کہہ دیا “ہزاروں کا تو قافلہ ہے” اور اختر کی ماں اس تسلی کی لاٹھی تھامے پاکستان کی طرف رینگتی چلی آئی تھی۔ “آہی رہا ہو گا” وہ سوچتی “کوئی تتلی پکڑنے نکل گیا ہو گا اور پھر ماں کو نہ پا کر رویا ہو گا اور پھر۔ پھر اب کہیں آ ہی رہا ہو گا۔ سمجھ دار ہے پانچ سال سے تو کچھ اوپر ہو چلا ہے۔ آ جائے گا وہاں پاکستان میں ذرا ٹھکانے سے بیٹھوں گی تو ڈھونڈ لوں گی۔ “

لیکن اختر تو سرحد سے کوئی پندرہ میل دور اُدھر یونہی بس کسی وجہ کے بغیر اتنے بڑے قافلے سے کٹ گیا تھا۔ اپنی ماں کے خیال کے مطابق اس نے تتلی کا تعاقب کیا یا کسی کھیت میں سے گنّے توڑنے گیا اور توڑتا رہ گیا۔ بہر حال وہ جب روتا چلاتا ایک طرف بھاگا جا رہا تھا تو سکھوں نے اسے گھیر لیا تھا اور اختر نے طیش میں آ کر کہا تھا “میں نعرۂ تکبیر ماروں گا” اور یہ کہہ کر سہم گیا تھا۔

سب سکھ بے اختیار ہنس پڑے تھے، سوائے ایک سکھ کے، جس کا نام پرمیشر سنگھ تھا۔ ڈھیلی ڈھالی پگڑی میں سے اس کے الجھے ہوئے کیس جھانک رہے تھے اور جوڑا تو بالکل ننگا تھا۔ وہ بولا “ہنسو نہیں یارو، اس بچے کو بھی تو اس واہ گورو نے پیدا کیا ہے جس نے تمھیں اور تمھارے بچوں کو پیدا کیا ہے۔ “

ایک نوجوان سکھ جس نے اب تک اپنی کرپان نکال لی تھی، بولا “ذرا ٹھہر پرمیشر” کرپان اپنا دھرم پورا کر لے، پھر ہم اپنی دھرم کی بات کریں گے۔ “

“مارو نہیں یارو” پرمیشر سنگھ کی آواز میں پکار تھی۔ اسے مارو نہیں اور وہ بری طرح ہانپ رہا تھا۔

اختر کے پاس آ کر وہ گھٹنوں کے بل بیٹھ گیا اور بولا۔

“نام کیا ہے تمھارا؟”

“اختر”۔ ۔ ۔ اب کی اختر کی آواز بھرائی ہوئی نہیں تھی۔

“اختر بیٹے” پرمیشر سنگھ نے بڑے پیار سے کہا۔

“ذرا میری انگلیوں میں جھانکو تو”

اختر ذرا سا جھک گیا۔ پرمیشر سنگھ نے دونوں ہاتھوں میں ذرا سی جھری پیدا کی اور فوراً بند کر لی “آہا” اختر نے تالی بجا کر اپنے ہاتھوں کو پرمیشر سنگھ کے ہاتھوں کی طرح بند کر لیا اور آنسوؤں میں مسکرا کر بولا۔ “تتلی”

“لو گے؟” پرمیشر سنگھ نے پوچھا۔

“ہاں” اختر نے اپنے ہاتھوں کو ملا۔

“لو” پرمیشر سنگھ نے اپنے ہاتھوں کو کھولا۔ اختر نے تتلی کو پکڑنے کی کوشش کی مگر وہ راستہ پاتے ہی اڑ گئی اور اختر کی انگلیوں کی پوروں پر اپنے پروں کے رنگوں کے ذرّے چھوڑ گئی۔ اختر اداس ہو گیا اور پرمیشر سنگھ دوسرے سکھوں کی طرف دیکھ کر بولا “سب بچے ایک سے کیوں ہوتے ہیں یارو! کرتارے کی تتلی بھی اڑ جاتی تھی یوں ہی منھ لٹکا لیتا تھا۔ ۔ ۔ “

“پرمیشر سنگھ تو آدھا پاگل ہو گیا ہے۔ ” نوجوان سکھ نے ناگواری سے کہا اور پھر سارا گروہ واپس جانے لگا۔

پرمیشر سنگھ نے اختر کو کنارے پر بٹھا لیا اور جب اسی طرف چلنے لگا جدھر دوسرے سکھ گئے تھے تو اختر پھڑک پھڑک کر رونے لگا “ہم اماں پاس جائیں گے۔ اماں پاس جائیں گے” پرمیشر سنگھ نے ہاتھ اٹھا کر اسے تھپکنے کی کوشش کی مگر اختر نے اس کا ہاتھ جھٹک دیا پھر جب پرمیشر سنگھ نے اس سے یہ کہا کہ “ہاں ہاں بیٹے” تمھیں تمھاری اماں پاس لیے چلتا ہوں۔ تو اختر چپ ہو گیا۔ صرف کبھی کبھی سسک لیتا تھا اور پرمیشر سنگھ کی تھپکیوں کو بڑی ناگواری سے برداشت کرتا جا رہا تھا۔

پرمیشر سنگھ اسے اپنے گھر میں لے آیا۔ پہلے یہ کسی مسلمان کا گھر تھا۔ لٹا پٹا پرمیشر سنگھ جب ضلع لاہور سے ضلع امرت سر میں آیا تھا تو گاؤں والوں نے اسے یہ مکان الاٹ کر دیا تھا وہ اپنی بیوی اور بیٹی سمیت جب اس چار دیواری میں داخل ہوا تھا، ٹھٹھک کر رہ گیا تھا۔ اس کی اتنا ذرا سا تو ہے اور اسے بھی تو اسی واہگوروجی نے پیدا کیا ہے جس نے۔ ۔ ۔ “

“پوچھ لیتے ہیں اسی سے۔ ۔ ۔ ” ایک اور سکھ بولا پھر اس نے سہمے ہوئے اختر کے پاس جا کر کہا۔ ۔ ۔ “بولو تمھیں کس نے پیدا کیا ہے؟ خدا نے کہ واہگوروجی نے؟”

اختر نے ساری خشکی کو نگلنے کی کوشش کی جو اس کی زبان کی نوک سے لے کر اس کی ناف تک پھیل چکی تھی، آنکھیں جھپک کر اس نے ان آنسوؤں کو گرا دینا چاہا جو ریت کی طرح اس کے پپوٹوں میں کھٹک رہے تھے۔ اس نے پرمیشر سنگھ کی طرف یوں دیکھا جیسے ماں کو دیکھ رہا ہے۔ منھ میں گئے ہوئے ایک آنسو کو تھوک ڈالا اور بولا۔

“پتہ نہیں۔ “

“لو اور سنو” کسی نے کہا اور اختر کو گالی دے کر ہنسنے لگا۔

اختر نے ابھی اپنی بات پوری نہیں کی تھی، بولا۔ ۔ ۔ “اماں تو کہتی ہے میں بھوسے کی کوٹھری میں پڑا ملا تھا۔ “

سب سکھ ہنسنے لگے مگر پرمیشر سنگھ بچوں کی طرح بلبلا کر کچھ یوں رویا کہ دوسرے سکھ بھونچکا سے رہ گئے اور پرمیشر سنگھ رونی آواز میں جیسے بین کرنے لگا۔ ۔ ۔ “سب بچے ایک سے ہوتے ہیں یارو۔ میرا کرتار ابھی تو یہی کہتا تھا وہ بھی تو اس کی ماں کو بھوسے کی کوٹھری میں پڑا ملا تھا۔ “

کرپان میان میں چلی گئی۔ سکھوں نے پرمیشر سنگھ سے الگ تھوڑی دیر کھُسر پھُسر کی۔ پھر ایک سکھ آگے بڑھا۔ بلکتے ہوئے اختر کو بازو سے پکڑے وہ چپ چاپ روتے ہوئے پرمیشر سنگھ کے پاس آیا اور بولا۔ ۔ ۔ “لے پرمیشرے” سنبھال اسے، کیس بڑھوا کر اسے اپنا کرتارا بنا لے۔ ۔ ۔ لے پکڑ”۔

پرمیشر نے اختر کو یوں جھپٹ کر اٹھا لیا کہ اس کی پگڑی کھل گئی اور کیسوں کی لٹیں لٹکنے لگیں۔ اس نے اختر کو پاگلوں کی طرح چوما۔ اسے اپنے سینے سے بھینچا اور پھر اس کی آنکھوں میں آنکھیں ڈال کر اور مسکرا مسکرا کر کچھ ایسی باتیں سوچنے لگا جنھوں نے اس کے چہرے کو چمکا دیا پھر اس نے پلٹ کر دوسرے سکھوں کی طرف دیکھا۔ اچانک وہ اختر کو نیچے اتار کر سکھوں کی طرف لپکا، مگر ان کے پاس سے گزر کر دور تک بھاگا چلا گیا۔ جھاڑیوں کے ایک جھنڈ میں بندروں کی طرح کودتا اور چھپتا رہا اور اس کے کیس اس کی لپک جھپٹ کا ساتھ دیتے رہے۔ دوسرے سکھ حیران کھڑے دیکھتے رہے، پھر وہ ایک ہاتھ کو دوسرے ہاتھ میں رکھے بھاگتا ہوا واپس آیا۔ اس کی بھیگی ہوئی داڑھی میں پھنسے ہوئے ہونٹوں پر مسکراہٹ تھی اور سرخ آنکھوں میں چمک تھی۔ آنکھیں پتھرا سی گئی تھیں اور وہ بڑی پر اسرار سرگوشی میں بولا تھا۔ “یہاں کوئی چیز قرآن پڑھ رہی ہے۔ “

گرنتھی جی اور گاؤں کے دوسرے لوگ ہنس پڑے تھے۔ پرمیشر سنگھ کی بیوی نے انھیں پہلے سے بتا دیا تھا کہ کرتار سنگھ کے بچھڑتے ہی انھیں کچھ ہو گیا ہے۔ “جانے کیا ہو گیا ہے اسے” اس نے کہا تھا۔ واہگوروجی جھوٹ نہ بلوائیں تو وہاں دن میں کوئی دس بار تو یہ کرتار سنگھ کو گدھوں کی طرح پیٹ ڈالتا تھا۔ اور جب سے کرتار سنگھ بچھڑا ہے تو میں تو خیر رو دھو لی پر اس کا رونے سے بھی جی ہلکا نہیں ہوا۔ وہاں مجال ہے جو بیٹی امر کور کو میں ذرا بھی غصے سے دیکھ لیتی، بپھر جاتا تھا، کہتا تھا، بیٹی کو برا مت کہو۔ بیٹی بڑی مسکین ہوتی ہے۔ یہ تو ایک مسافر ہے بے چاری۔ ہمارے گھروندے میں سستانے بیٹھ گئی ہے۔ وقت آئے گا تو چلی جائے گی اور اب امر کور سے ذرا سا بھی کوئی قصور ہو جائے تو آپے ہی میں نہیں رہتا۔ یہاں تک بک دیتا ہے کہ بیٹیاں بیویاں اغوا ہوتے سنی تھیں یارو۔ یہ نہیں سنا تھا کہ پانچ برس کے بیٹے بھی اٹھ جاتے ہیں۔ “

وہ ایک مہینے سے اس گھر میں مقیم تھا مگر ہر رات اس کا معمول تھا کہ پہلے سوتے میں بے تحاشا کروٹیں بدلتا پھر بڑبڑانے لگتا اور پھر اٹھ بیٹھتا۔ بڑی ڈری ہوئی سرگوشی میں بیوی سے کہتا۔ “سنتی ہو؟ یہاں کوئی چیز قرآن پڑھ رہی ہے۔ “۔ ۔ ۔ بیوی اسے محض “اونہہ” سے ٹال کر سو جاتی تھی مگر امر کور کو اس سرگوشی کے بعد رات بھر نیند نہ آئی۔ اسے اندھیرے میں بہت سی پرچھائیاں ہر طرف بیٹھی قرآن پڑھتی نظر آئیں اور پھر جب ذرا سی پو پھٹتی تو وہ کانوں میں انگلیاں دے لیتی تھی۔ وہاں ضلع لاہور میں ان کا گھر مسجد کے پڑوس ہی میں تھا اور جب صبح اذان ہوتی تھی تو کیسا مزا آتا تھا۔ ایسا لگتا تھا کہ جیسے پورب سے پھوٹتا ہوا اجالا گانے لگا ہے۔ پھر جب اس کی پڑوسن پریتم کور کو چند نوجوانوں نے خراب کر کے چیتھڑے کی طرح گھورے پر پھینک دیا تھا تو جانے کیا ہوا کہ مؤذن کی اذان میں بھی اسے پریتم کور کی چیخ سنائی دے رہی تھی، اذان کا تصور تک اسے خوف زدہ کر دیتا تھا اور وہ یہ بھی بھول جاتی تھی کہ اب ان کے پڑوس میں مسجد نہیں ہے۔ یوں ہی کانوں میں انگلیاں دیتے ہوئے وہ سو جاتی اور رات بھر جاگتے رہنے کی وجہ سے دن چڑھے تک سوئی رہتی تھی اور پرمیشر سنگھ اس بات پر بگڑ جاتا۔ ۔ ۔ “ٹھیک ہے سوئے نہیں تو اور کیا کرے۔ نکمی تو ہوتی ہیں یہ چھوکریاں۔ لڑکا ہو تو اب تک جانے کتنے کام کر چکا ہوتا یارو۔ “

پرمیشر سنگھ آنگن میں داخل ہوا تو آج خلاف معمول اس کے ہونٹوں پر مسکراہٹ تھی۔ اس کے کھلے کیس کنگھے سمیت اس کی پیٹھ اور ایک کندھے پر بکھرے ہوئے تھے اور اس کا ایک ہاتھ اختر کی کمر تھپکے جا رہا تھا۔ اس کی بیوی ایک طرف بیٹھی چھاج میں گندم پھٹک رہی تھی۔ اس کے ہاتھ جہاں تھے وہیں رک گئے اور وہ ٹکر ٹکر پرمیشر سنگھ کو دیکھنے لگی۔ پھر وہ چھاج پر سے کودتی ہوئی آئی اور بولی۔

“یہ کون ہے؟”

پرمیشر سنگھ بدستور مسکراتے ہوئے بولا۔ ۔ ۔ “ڈرو نہیں بیوقوف اس کی عادتیں بالکل کرتارے کی سی ہیں یہ بھی اپنی ماں کو بھوسے کی کوٹھری میں پڑا ملا تھا۔ یہ بھی تتلیوں کا عاشق ہے اس کا نام اختر ہے۔ “

“اختر” بیوی کے تیور بدل گئے۔

“تم اسے اختر سنگھ کہہ لینا” پرمیشر سنگھ نے وضاحت کی۔ ۔ ۔ “اور پھر کیسوں کا کیا ہے، دنوں میں بڑھ جاتے ہیں۔ کڑا اور کچھیرا پہنا دو، کنگھا کیسوں کے بڑھتی لگ جائے گا۔ “

“پر یہ ہے کس کا؟” بیوی نے مزید وضاحت چاہی۔

“کس کا ہے!” پرمیشر سنگھ نے اختر کو کندھے پر سے اتار کر اسے زمین پر کھڑا کر دیا اور اس کے سر پر ہاتھ پھیرنے لگا۔ واہگورو جی کا ہے ہمارا اپنا ہے اور پھر یارو یہ عورت اتنا بھی دیکھ نہیں سکتی کہ اختر کے ماتھے پر جو یہ ذرا سا تل ہے یہ کرتارے ہی کا تل ہے۔ کرتارے کے بھی تو ایک تل تھا اور یہیں تھا۔ ذرا بڑا تھا پر ہم اسے یہیں تل پر تو چومتے تھے۔ اور یہ اختر کے کانوں کی لویں گلاب کے پھول کی طرح گلابی ہیں تو یارو۔ یہ عورت یہ تک نہیں سوچتی کہ کرتارے کے کانوں کی لویں بھی تو ایسی ہی تھیں۔ فرق صرف اتنا ہے کہ وہ ذرا موٹی تھیں یہ ذرا پتلی ہیں اور۔ ۔ ۔ “

اختر اب تک مارے حیرت کے ضبط کیے بیٹھا تھا۔ بلبلا اٹھا۔ ۔ ۔ “ہم نہیں رہیں گے، ہم اماں پاس جائیں گے، اماں پاس۔ “

پرمیشر سنگھ نے اختر کا ہاتھ پکڑ کر اسے بیوی کی طرف بڑھایا۔ ۔ ۔ “اری لو۔ یہ اماں کے پاس جانا چاہتا ہے۔ “

“تو جائے۔ ” بیوی کی آنکھوں میں اور چہرے پر وہی آسیب آگیا تھا جسے پرمیشر سنگھ اپنی آنکھوں اور چہرے میں سے نوچ کر باہر کھیتوں میں جھٹک آیا تھا۔ ۔ ۔ “ڈاکہ مارنے گیا تھا سورما۔ اور اٹھا لایا یہ ہاتھ بھر کا لونڈا۔ ارے کوئی لڑکی ہی اٹھا لاتا۔ تو ہزار میں نہ سہی، ایک دو سو میں بک جاتی۔ اس اجڑے گھر کا کھاٹ کھٹولہ بن جاتا اور پھر۔ ۔ ۔ پگلے تجھے تو کچھ ہو گیا ہے، دیکھتے نہیں یہ لڑکا مُسلّا ہے؟ جہاں سے اٹھا لائے ہو وہیں واپس ڈال آؤ۔ خبردار جو اس نے میرے چوکے میں پاؤں رکھا۔ “

پرمیشر سنگھ نے التجا کی۔ ۔ ۔ “کرتارے اور اختر کو ایک ہی واہگورو جی نے پیدا کیا ہے، سمجھیں۔ “

“نہیں ” اب کے بیوی چیخ اٹھی۔ ۔ ۔ “میں نہیں سمجھی اور نہ کچھ سمجھنا چاہتی ہوں، میں رات ہی رات میں جھٹکا کر ڈالوں گی اس کا، کاٹ کے پھینک دوں گی۔ اٹھا لایا ہے وہاں سے، لے جا اسے پھینک دے باہر۔ “

“تمھیں نہ پھینک دوں باہر؟”۔ ۔ ۔ اب کے پرمیشر سنگھ بگڑ گیا۔

“تمھارا نہ کر ڈالوں جھٹکا؟ وہ بیوی کی طرف بڑھا اور بیوی اپنے سینے کو دو ہتڑوں سے پیٹتی، چیختی، چلاتی بھاگی۔ پڑوس سے امر کور دوڑی آئی۔ اس کے پیچھے گلی کی دوسری عورتیں بھی آ گئیں۔ مرد بھی جمع ہو گئے اور پرمیشر سنگھ کی بیوی پٹنے سے بچ گئی۔ پھر سب نے اسے سمجھایا کہ نیک کام ہے، ایک مسلمان کا سکھ بنانا کوئی معمولی کام تو نہیں۔ پرانا زمانہ ہوتا تو اب تک پرمیشر سنگھ گرو مشہور ہو چکا ہوتا۔ بیوی کی ڈھارس بندھی مگر امر کور ایک کونے میں بیٹھی گھٹنوں میں سر دیے روتی رہی۔ اچانک پرمیشر سنگھ کی گرج نے سارے ہجوم کو ہلا دیا۔ ۔ ۔ “اختر کدھر گیا ہے۔ ” وہ چڑھ گیا یارو۔ ۔ ۔ ؟اختر۔ ۔ ۔ اختر۔ ۔ ۔ !” وہ چیختا ہوا مکان کے کونوں کھدّوں میں جھانکتا ہوا باہر بھاگ گیا۔ بچے مارے دلچسپی کے اس کے تعاقب میں تھے۔ عورتیں چھتوں پر چڑھ گئی تھیں اور پرمیشر سنگھ گلیوں میں سے باہر کھیتوں میں نکل گیا تھا۔ ۔ ۔ “ارے میں تو اسے اماں پاس لے چلتا یارو۔ ارے وہ گیا کہاں؟ اختر۔ ۔ ۔ ! اے اختر۔ ۔ ۔ !”

“میں تمھارے پاس نہیں آؤں گا۔ ” پگڈنڈی کے ایک موڑ پر گیان سنگھ کے گنے کے کھیت کی آڑ میں روتے ہوئے اختر نے پرمیشر سنگھ کو ڈانٹ دیا۔ “تم تو سکھ ہو۔ “

“ہاں بھیا میں تو سکھ ہوں۔ ” پرمیشر سنگھ نے جیسے مجبور ہو کر اعتراف جرم کر لیا۔

“تو پھر ہم نہیں آئیں گے۔ ” اختر نے پرانے آنسوؤں کو پونچھ کر نئے آنسوؤں کے لیے راستہ صاف کیا۔

“نہیں آؤ گے؟” پرمیشر سنگھ کا لہجہ اچانک بدل گیا۔

“نہیں۔ “

“نہیں آؤ گے؟”

“نہیں۔ نہیں نہیں۔ “

“کیسے نہیں آؤ گے؟” پرمیشر سنگھ نے اختر کو کان سے پکڑا اور پھر نچلے ہونٹ کو دانتوں میں دبا کر اس کے منہ میں چٹاخ سے ایک تھپڑ مار دیا۔ “چلو” وہ کڑکا۔

اختر یوں سہم گیا جیسے ایک دم اس کا سارا خون نچڑ کر رہ گیا ہے۔ پھر ایکا ایکی وہ زمین پر گر کر پاؤں پٹخنے، خاک اڑانے اور بلک بلک کر رونے لگا۔ “نہیں چلتا، بس نہیں چلتا تم سکھ ہو، میں سکھوں کے پاس نہیں جاؤں گا۔ میں اپنی اماں پاس جاؤں گا، میں تمھیں مار دوں گا۔ “


اور اب جیسے پرمیشر سنگھ کے سہنے کی باری تھی۔ اس کا بھی سارا خون جیسے نچڑ کر رہ گیا تھا۔ اس نے اپنے ہاتھ کو دانتوں میں جکڑ لیا۔ اس کے نتھنے پھڑکنے لگے اور پھر اس زور سے رویا کہ کھیت کی پرلی مینڈ پر آتے ہوئے چند پڑوسی اور ان کے بچے بھی سہم کر رہ گئے اور ٹھٹک گئے۔ پرمیشر سنگھ گھٹنوں کے بل اختر کے سامنے بیٹھ گیا۔ بچوں کی طرح یوں سسک سسک کر رونے لگا کہ اس کا نچلا ہونٹ بھی بچوں کی طرح لٹک آیا اور پھر بچوں کی سی روتی آواز میں بولا۔

“مجھے معاف کر دے اختر، مجھے تمھارے خدا کی قسم میں تمھارا دوست ہوں، تم اکیلے یہاں سے جاؤ گے تو تمھیں کوئی مار دے گا۔ پھر تمھاری ماں پاکستان سے آ کر مجھے مارے گی۔ میں خود جا کر تمھیں پاکستان چھوڑ آؤں گا۔ سنا؟ پھر وہاں اگر تمھیں ایک لڑکا مل جائے نا۔ کرتارا نام کا تو تم اسے ادھر گاؤں میں چھوڑ جانا۔ اچھا؟”

“اچھا!” اختر نے الٹے ہاتھوں سے آنسو پونچھتے ہوئے پرمیشر سنگھ سے سودا کر لیا۔

پرمیشر سنگھ نے اختر کو کندھے پر بٹھا لیا اور چلا مگر ایک ہی قدم اٹھا کر رک گیا۔ سامنے بہت سے بچے اور پڑوسی کھڑے اس کی تمام حرکات دیکھ رہے تھے۔ ادھیڑ عمر کا ایک پڑوسی بولا۔ ۔ ۔ “روتے کیوں ہو پرمیشرے، کل ایک مہینے کی تو بات ہے، ایک مہینے میں اس کے کیس بڑھ آئیں گے تو بالکل کرتار ا لگے گا۔ “

کچھ کہے بغیر وہ تیز تیز قدم اٹھانے لگا۔ پھر ایک جگہ رک کر اس نے پلٹ کر اپنے پیچھے آنے والے پڑوسیوں کی طرف دیکھا۔ ۔ ۔ “تم کتنے ظالم لوگ ہو یارو۔ اختر کو کرتارا بناتے ہو اور ادھر اگر کوئی کرتارے کو اختر بنا لے تو؟ اسے ظالم ہی کہو گے نا۔ ” پھر اس کی آواز میں گرج آ گئی۔ ۔ ۔ “یہ لڑکا مسلمان ہی رہے گا۔ دربار صاحب کی سوں۔ میں کل ہی امرت سر جا کر اس کے انگریزی بال بنوا لاؤں گا۔ تم نے مجھے سمجھ کیا رکھا ہے، خالصہ ہوں، سینے میں شیر کا دل ہے، مرغی کا نہیں۔ “

پرمیشر سنگھ اپنے گھر میں داخل ہو کر ابھی اپنی بیوی اور بیٹی ہی کو اختر کی مدارات کے سلسلے میں احکام ہی دے رہا تھا کہ گاؤں کا گرنتھی سردار سنتو سنگھ اندر آیا اور بولا۔

“پرمیشر سنگھ۔ “

“جی” پرمیشر سنگھ نے پلٹ کر دیکھا۔ گرنتھی جی کے پیچھے اس کے سب پڑوسی بھی تھے۔

“دیکھو” گرنتھی جی نے بڑے دبدبے سے کہا۔ ۔ ۔ “کل سے یہ لڑکا خالصے کی سی پگڑی باندھے گا، کڑا پہنے گا، دھرم شالہ آئے گا اور اسے پرشاد کھلایا جائے گا۔ اس کے کیسوں کو قینچی نہیں چھوئے گی۔ چھو گئی تو کل ہی سے یہ گھر خالی کر دو سمجھے؟”

“جی” پرمیشر سنگھ نے آہستہ سے کہا۔

“ہاں۔ ” گرنتھی جی نے آخری ضرب لگائی۔

“ایسا ہی ہو گا گر نتھی جی۔ ” پرمیشر سنگھ کی بیوی بولی۔ ۔ ۔ “پہلے ہی اسے راتوں کو گھر کے کونے کونے سے کوئی چیز قرآن پڑھتی سنائی دیتی ہے۔ لگتا ہے پہلے جنم میں مُسلّا رہ چکا ہے۔ امر کور بیٹی نے تو جب سے یہ سنا ہے کہ ہمارے گھر میں مُسلّا چھوکرا آیا ہے تو بیٹھی رو رہی ہے، کہتی ہے گھر پر کوئی اور آفت آئے گی۔ پرمیشرے نے آپ کا کہا نہ مانا تو میں بھی دھرم شالہ میں چلی آؤں گی اور امر کور بھی۔ پھر یہ اس چھوکرے کو چاٹے مُوا نکما، واہگورو جی کا بھی لحاظ نہیں کرتا۔ “

“واہگوروجی کا لحاظ کون نہیں کرتا گدھی” پرمیشر سنگھ نے گرنتھی جی کی بات کا غصہ بیوی پر نکالا۔ پھر وہ زیر لب گالیاں دیتا رہا۔ کچھ دیر کے بعد وہ اٹھ کر گرنتھی جی کے پاس آگیا۔ “اچھا جی اچھا۔ ” اس نے کہا۔ گرنتھی جی پڑوسیوں کے ساتھ فوراً رخصت ہو گئے۔

چند ہی دنوں میں اختر کو دوسرے سکھ لڑکوں سے پہچاننا دشوار ہو گیا۔ وہی کانوں کی لوؤں تک کس کر بندھی ہوئی پگڑی، وہی ہاتھ کا کڑا اور وہی کچھیرا۔ صرف جب وہ گھر میں آ کر پگڑی اتارتا تھا تو اس کے غیر سکھ ہونے کا راز کھلتا تھا۔ لیکن اس کے بال دھڑا دھڑ بڑھ رہے تھے۔ پرمیشر سنگھ کی بیوی ان بالوں کو چھوکر بہت خوش ہوتی۔ ۔ ۔ “ذرا ادھر تو آ امر کورے، یہ دیکھ کیس بن رہے ہیں۔ پھر ایک دن جوڑا بنے گا۔ کنگھا لگے گا اور اس کا نام رکھا جائے گا کرتار سنگھ۔ “

“نہیں ماں۔ ” امر کور وہیں سے جواب دیتی۔ ۔ ۔ “جیسے واہگورو جی ایک ہیں، اور گرنتھ صاحب ایک ہیں اور چاند ایک ہے۔ اسی طرح کرتارا بھی ایک ہے۔ میرا ننھا منا بھائی!” وہ پھوٹ پھوٹ کر رو دیتی اور مچل کر کہتی۔ ۔ ۔ “میں اس کھلونے سے نہیں بہلوں گی ماں، میں جانتی ہوں ماں یہ مسلا ہے اور جو کرتارا ہوتا ہے وہ مسلا نہیں ہوتا۔ “

“میں کب کہتی ہوں یہ سچ مچ کا کرتارا ہے۔ میرا چاند سا لاڈلا بچہ!”۔ ۔ ۔ پرمیشر سنگھ کی بیوی بھی رو دیتی۔ دونوں اختر کو اکیلا چھوڑ کر کسی گوشے میں بیٹھ جاتیں۔ خوب خوب روتیں، ایک دوسرے کو تسلیاں دیتیں اور پھر زارزار رونے لگتیں وہ اپنے کرتارے کے لیے روتیں، اختر چند روز اپنی ماں کے لیے رویا، اب کسی اور بات پر روتا، جب پرمیشر سنگھ شرنارتھیوں کی امدادی پنچایت سے کچھ غلّہ یا کپڑا لے کر آتا تو اختر بھاگ کر جاتا اور اس کی ٹانگوں سے لپٹ جاتا اور رو رو کر کہتا۔ ۔ ۔ “میرے سر پر پگڑی باندھ دو پرموں۔ ۔ ۔ میرے کیس بڑھا دو۔ مجھے کنگھا خرید دو۔ “

پرمیشر سنگھ اسے سینے سے لگا لیتا اور بھرائی ہوئی آواز میں کہتا۔ ۔ ۔ “یہ سب ہو جائے گا بچے۔ سب کچھ ہو جائے گا پر ایک بات کبھی نہ ہو گی۔ وہ بات کبھی نہ ہو گی۔ وہ نہیں ہو گا مجھ سے سمجھے؟ یہ کیس ویس سب بڑھ آئیں گے۔ “

اختر اپنی ماں کو بہت کم یاد کرتا تھا۔ جب تک پرمیشر سنگھ گھر میں رہتا وہ اس سے چمٹا رہتا اور جب وہ کہیں باہر جاتا تو اختر اس کی بیوی اور امر کور کی طرف یوں دیکھتا رہتا جیسے ان سے ایک ایک پیار کی بھیک مانگ رہا ہے۔ پرمیشر سنگھ کی بیوی اسے نہلاتی، اس کے کپڑے دھوتی، اور پھر اس کے بالوں میں کنگھی کرتے ہوئے رونے لگتی اور روتی رہ جاتی۔ البتہ امر کور نے جب بھی دیکھا، ناک اچھال دی۔ شروع شروع میں تو اس نے اختر کو دھموکا بھی جڑ دیا تھا مگر جب اختر نے پرمیشر سنگھ سے اس کی شکایت کی تو پرمیشر سنگھ بپھر گیا اور امر کور کو بڑی ننگی ننگی گالیاں دیتا اس کی طرف بڑھا کہ اگر اس کی بیوی راستے میں اس کے پاؤں نہ پڑ جاتی تو وہ بیٹی کو اٹھا کر دیوار پر سے گلی میں پٹخ دیتا۔ ۔ ۔ “الو کی پٹھی۔ ” اس روز اس نے کڑک کر کہا تھا۔


“سنا تو یہی تھا کہ لڑکیاں اٹھ رہی ہیں پر یہاں یہ مشٹنڈی ہمارے ساتھ لگی چلی آئی اور اٹھ گیا تو پانچ سال کا لڑکا جسے ابھی اچھی طرح ناک پونچھنا نہیں آتا۔ عجیب اندھیر ہے یارو۔ ” اس واقعے کے بعد امر کور نے اختر پر ہاتھ تو خیر کبھی نہ اٹھایا مگر اس کی نفرت دو چند ہو گئی۔

ایک روز اختر کو تیز بخار آگیا۔ پرمیشر سنگھ وید کے پاس چلا گیا اور اس کے جانے کے کچھ دیر بعد اس کی بیوی پڑوسن سے پسی ہوئی سونف مانگنے چلی گئی۔ اختر کو پیاس لگی۔

“پانی” اس نے کہا، کچھ دیر بعد لال لال سوجی سوجی آنکھیں کھولیں۔ ادھر ادھر دیکھا اور پانی کا لفظ ایک کراہ بن کر اس کے حلق سے نکلا۔ کچھ دیر کے بعد وہ لحاف کو ایک طرف جھٹک کر اٹھ بیٹھا۔ امر کور سامنے دہلیز پر بیٹھی کھجور کے پتوں سے چنگیر بنا رہی تھی۔ ۔ ۔ “پانی دے!” اختر نے اسے ڈانٹا۔ امر کور نے بھنویں سکیڑ کر اسے گھور کر دیکھا اور اپنے کام میں جٹ گئی۔ اب کے اختر چلایا۔ ۔ ۔ “پانی دیتی ہے کہ نہیں۔ ۔ ۔ پانی دے ورنہ ماروں گا”۔ ۔ ۔ امر کور نے اب کے اس کی طرف دیکھا ہی نہیں۔ بولی۔ ۔ ۔ “مار تو سہی۔ تو کرتارا نہیں کہ میں تیری مار سہہ لوں گی۔ میں تو تیری بوٹی بوٹی کر ڈالوں گی۔ ” اختر بلک بلک کر رو دیا۔ اور آج اس نے مدّت کے بعد اپنی اماں کو یاد کیا۔ پھر جب پرمیشر سنگھ دوا لے آیا اور اس کی بیوی بھی پسی ہوئی سونف لے کر آ گئی تو اختر نے روتے روتے بری حالت بنا لی تھی اور وہ سسک سسک کر کہہ رہا تھا۔ “ہم تو اب اماں پاس چلیں گے۔ یہ امر کور سور کی بچی تو پانی بھی نہیں پلاتی۔ ہم تو اماں پاس جائیں گے۔ ” پرمیشر سنگھ نے امر کور کی طرف غصے سے دیکھا۔ وہ رو رہی تھی اور اپنی ماں سے کہہ رہی تھی۔ ۔ ۔ “کیوں پانی پلاؤں؟ کرتارا بھی تو کہیں اسی طرح پانی مانگ رہا ہو گا کسی سے۔ کسی کو اس پر ترس نہ آئے تو ہمیں کیوں ترس آئے اس پر۔ ۔ ۔ ہاں “۔

پرمیشر سنگھ اختر کی طرف بڑھا اور اپنی بیوی کی طرف اشارہ کرتے ہوئے بولا۔

“یہ بھی تو تمھاری ماں ہے بیٹے۔ “

“نہیں ” اختر بڑے غصے سے بولا۔ “یہ تو سکھ ہے۔ میری اماں تو پانچ وقت نماز پڑھتی ہے اور بسم اللہ کہہ کر پانی پلاتی ہے۔ “

پرمیشر سنگھ کی بیوی جلدی سے ایک پیالہ بھر کر لائی تو اختر نے پیالے کو دیوار پر دے مارا اور چلایا۔ “تمھارے ہاتھ سے نہیں پئیں گے۔ “

“یہ بھی تو مجھی سور کی بچی کا باپ ہے۔ ” امر کور نے جل کر کہا۔

“تو ہوا کرے” اختر بولا۔ ۔ ۔ “تمھیں اس سے کیا۔ “

پرمیشر سنگھ کے چہرے پر عجیب کیفیتیں دھوپ چھاؤں سی پیدا کر گئیں۔ وہ اختر کے مطالبے پر مسکرایا بھی اور رو بھی دیا۔ پھر اس نے اختر کو پانی پلایا۔ اس کے ماتھے کو چوما۔ اس کی پیٹھ پر ہاتھ پھیرا، اسے بستر پر لٹا کر اس کے سر کو ہولے ہولے کھجاتا رہا اور کہیں شام کو جا کر اس نے پہلو بدلا۔ اس وقت اختر کا بخار اتر چکا تھا اور وہ بڑے مزے سے سو رہا تھا۔

آج بہت عرصے کے بعد رات کو پرمیشر سنگھ بھڑک اٹھا اور نہایت آہستہ سے بولا۔

“اری سنتی ہو؟۔ ۔ ۔ سن رہی ہو؟ یہاں کوئی چیز قرآن پڑھ رہی ہے۔ “

بیوی نے پہلے تو اسے پرمیشر سنگھ کی پرانی عادت کہہ کر ٹالنا چاہا مگر پھر ایک دم ہڑبڑا کر اٹھی اور امر کور کی کھاٹ کی طرف ہاتھ بڑھا کر اسے ہولے ہولے ہلا کر آہستہ سے بولی۔ ۔ ۔ “بیٹی!”

“کیا ہے ماں؟” امر کور چونک اٹھی۔

اور اس نے سرگوشی کی۔ “سنو تو۔ سچ مچ کوئی چیز قرآن پڑھ رہی ہے۔ “

یہ ایک ثانیے کا سناٹا بڑا خوف ناک تھا۔ امر کور کی چیخ اس سے بھی زیادہ خوف ناک تھی اور پھر اختر کی چیخ خوف ناک تر تھی۔

“کیا ہوا بیٹا” پرمیشر سنگھ تڑپ کر اٹھا اور اختر ی کھاٹ پر جا کر اسے چھاتی سے بھینچ لیا۔ “ڈر گئے بیٹا۔ “

“ہاں ” اختر لحاف میں سے سر نکال کر بولا۔ “کوئی چیز چیخی تھی۔ “

“امر کور چیخی تھی” پرمیشر سنگھ نے کہا۔ ۔ ۔ “ہم سب یوں سمجھے جیسے کوئی چیز یہاں قرآن پڑھ رہی ہے۔ “

“میں پڑھ رہا تھا” اختر بولا۔

اب کے بھی امر کور کے منہ سے ہلکی چیخ نکل گئی۔

بیوی نے جلدی سے چراغ جلا دیا اور امر کور کی کھاٹ پر بیٹھ کر وہ دونوں اختر کو یوں دیکھنے لگیں جیسے وہ ابھی دھواں بن کر دروازے کی جھریوں میں سے باہر اڑ جائے گا اور باہر سے ایک ڈراؤنی آواز آئے گی۔ “میں جن ہوں میں کل رات پھر آ کر قرآن پڑھوں گا۔ “

“کیا پڑھ رہے تھے بھلا؟” پرمیشر سنگھ نے پوچھا۔

“پڑھوں؟” اختر نے پوچھا۔

“ہاں ہاں” پرمیشر سنگھ نے بڑے شوق سے کہا۔

اور اختر قُل ہو اللہ اَحَد پڑھنے لگا۔ کُفواً اَحَد پر پہنچ کر اس نے اپنے گریبان میں چھوکی اور پھر پرمیشر سنگھ کی طرف مسکراتے ہوئے بولا۔ ۔ ۔ “تمھارے سینے میں بھی چھو کر دوں؟”

“ہاں ہاں” پرمیشر سنگھ نے گریبان کا بٹن کھول دیا اور اختر نے چھو کر دی۔ اب کے امر کور نے بڑی مشکل سے چیخ پر قابو پایا۔

پرمیشر سنگھ بولا۔ ۔ ۔ “کیا نیند نہیں آتی تھی؟”

“ہاں” اختر بولا۔ ۔ ۔ “امّاں یاد آ گئی۔ اماں کہتی ہے، نیند نہ آئے تو تین بار قُل ہو اللّٰہ پڑھو نیند آ جائے گی، اب آ رہی تھی، پر امر کور نے ڈرا دیا۔ “

“پھر سے پڑھ کر سو جاؤ” پرمیشر سنگھ نے کہا۔ ۔ ۔ “روز پڑھا کرو۔ اونچے اونچے پڑھا کرو اسے بھولنا نہیں ورنہ تمھاری اماں تمھیں مارے گی۔ لو اب سو جاؤ۔ ” اس نے اختر کو لٹا کر اسے لحاف اوڑھا دیا۔ پھر چراغ بجھانے کے لیے بڑھا تو امر کور پکاری۔ ۔ ۔ “نہیں، نہیں بابا۔ بجھاؤ نہیں۔ ڈر لگتا ہے۔ “

“جلتا رہے، کیا ہے؟” بیوی بولی۔

اور پرمیشر سنگھ دیا بجھا کر ہنس دیا۔ ۔ ۔ “پگلیاں” وہ بولا۔ ۔ ۔ “گدھیاں۔ “

رات کے اندھیرے میں اختر آہستہ آہستہ قل ھو اللّٰہ پڑھتا رہا۔ پھر کچھ دیر بعد ذرا ذرا سے خراٹے لینے لگا۔ پرمیشر سنگھ بھی سو گیا اور اس کی بیوی بھی۔ مگر امر کور رات بھر کچی نیند میں “پڑوس” کی مسجد کی اذان سنتی رہی اور ڈرتی رہی۔

اب اختر کے اچھے خاصے کیس بڑھ آئے تھے۔ ننھے سے جوڑے میں کنگھا بھی اٹک جاتا تھا۔ گاؤں والوں کی طرح پرمیشر سنگھ کی بیوی بھی اسے کرتارا کہنے لگی تھی اور اس سے خاصی شفقت سے پیش آتی تھی مگر امر کور اختر کو یوں دیکھتی تھی جیسے وہ کوئی بہروپیا ہے اور ابھی وہ پگڑی اور کیس اتار کر پھینک دے گا اور قُل ہو اللّٰہ پڑھتا ہوا غائب ہو جائے گا۔

ایک دن پرمیشر سنگھ بڑی تیزی سے گھر آیا اور ہانپتے ہوئے اپنی بیوی سے پوچھا۔

“وہ کہاں ہے؟”

“کون؟ امر کور؟”

“نہیں۔ “

“کرتارا؟”

“نہیں۔ ۔ ۔ ” پھر کچھ سوچ کر بولا۔ ۔ ۔ “ہاں ہاں وہی کرتارا۔ “

“باہر کھیلنے گیا ہے۔ گلی میں ہو گا۔ “

پرمیشر سنگھ واپس لپکا۔ گلی میں جا کر بھاگنے لگا۔ باہر کھیتوں میں جا کر اس کی رفتار اور تیز ہو گئی۔ پھر اسے دور گیان سنگھ کے گنوں کی فصل کے پاس چند بچے کبڈی کھیلتے نظر آئے۔ کھیت کی اوٹ سے اس نے دیکھا کہ اختر نے ایک لڑکے کو گھٹنوں تلے دبا رکھا ہے۔ لڑکے کے ہونٹوں سے خون پھٹ رہا ہے مگر کبڈی کبڈی کی رٹ جاری ہے۔ پھر اس لڑکے نے جیسے ہار مان لی۔ اور جب اختر کی گرفت سے چھوٹا تو بولا۔ ۔ ۔ “کیوں بے کرتارو! تو نے میرے منھ پر گھٹنا کیوں مارا ہے؟”

“اچھا کیا جو مارا” اختر اکڑ کر بولا اور بکھرے ہوئے جوڑے کی لٹیں سنبھال کر ان میں کنگھا پھنسانے لگا۔

“تمھارے رسول نے تمھیں یہی سمجھایا ہے؟” لڑکے نے طنز سے پوچھا۔

اختر ایک لمحے کے لیے چکرا گیا۔ پھر سوچ کر بولا۔ ۔ ۔ “اور کیا تمھارے گُرو نے تمھیں یہی سمجھایا ہے؟”

“مُسلّا” لڑکے نے اسے گالی دی۔

“سکھڑا” اختر نے اسے گالی دی۔

سب لڑکے اختر پر ٹوٹ پڑے مگر پرمیشر سنگھ کی ایک ہی کڑک سے میدان صاف تھا۔ اس نے اختر کی پگڑی باندھی اور اسے ایک طرف لے جا کر بولا۔ ۔ ۔ “سنو بیٹے! میرے پاس رہو گے کہ اماں کے پاس جاؤ گے۔ ۔ ۔ ؟”

اختر کوئی فیصلہ نہ کر سکا۔ کچھ دیر تک پرمیشر سنگھ کی آنکھوں میں آنکھیں ڈالے کھڑا رہا پھر مسکرانے لگا اور بولا۔ ۔ ۔ “اماں پاس جاؤں گا۔ “

“اور میرے پاس نہیں رہو گے؟”

پرمیشر سنگھ کا رنگ یوں سُرخ ہو گیا جیسے وہ رو دے گا۔

“تمھارے پاس بھی رہوں گا؟” اختر نے معمے کا حل پیش کر دیا۔ پرمیشر سنگھ نے اسے اٹھا کر سینے سے لگا لیا اور وہ آنسو جو مایوسی نے آنکھوں میں جمع کیے تھے، خوشی کے آنسو بن کر ٹپک پڑے۔ وہ بولا۔ ۔ ۔ “دیکھو بیٹے!۔ ۔ ۔ اختر بیٹے آج یہاں فوج آ رہی ہے یہ فوجی تمھیں مجھ سے چھیننے آ رہے ہیں، سمجھے؟ تم کہیں چھپ جاؤ۔ پھر جب وہ چلے جائیں گے نا، تو میں تمھیں لے آؤں گا۔ “

پرمیشر سنگھ کو اس وقت دور غبار کا ایک پھیلتا ہوا بگولہ دکھائی دیا۔ مینڈ پر چڑھ کر اس نے لمبے ہوتے ہوئے بگولے کو غور سے دیکھا اور اچانک تڑپ کر بولا۔ ۔ ۔ “فوجیوں کی لاری آ گئی۔ ۔ ۔ ” وہ مینڈ پر سے کود پڑا اور گنے کے کھیت کا پورا چکر کاٹ گیا۔

“گیا نے، او گیان سنگھ!” وہ چلایا۔ گیان سنگھ فصل کے اندر سے نکل آیا۔ اس کے ایک ہاتھ میں درانتی اور دوسرے ہاتھ میں تھوڑی سی گھاس تھی۔ ۔ ۔ پرمیشر سنگھ اسے الگ لے گیا، اسے کوئی بات سمجھائی پھر دونوں اختر کے پاس آئے۔ گیان سنگھ نے فصل میں سے ایک گنا توڑ کر درانتی سے اس کے پتے کاٹے اور اسے اختر کے حوالے کر کے بولا۔ ۔ ۔ “آؤ بھائی کرتارے تم میرے پاس بیٹھ کر گنا چوسو جب تک یہ فوجی چلے جائیں۔ اچھا خاصا بنا بنایا خالصہ ہتھیانے آئے ہیں۔ ہونہہ!”۔ ۔ ۔ پرمیشر سنگھ نے اختر سے جانے کی اجازت مانگی۔ ۔ ۔ “جاؤں۔ ۔ ۔ ؟”

اور اختر نے دانتوں میں گنے کا لمبا سا چھلکا جکڑے ہوئے مسکرانے کی کوشش کی۔ اجازت پا کر پرمیشر سنگھ گاؤں کی طرف بھاگ گیا۔ بگولا گاؤں کی طرف بڑھا آ رہا تھا۔

گھر جا کر اس نے بیوی اور بیٹی کو سمجھایا۔ پھر بھاگم بھاگ گرنتھی جی کے پاس گیا۔ ان سے بات کر کے ادھر ادھر دوسرے لوگوں کو سمجھاتا پھیرا۔ اور جب فوجیوں کی لاری دھرم شالہ سے ادھر کھیت میں رک گئی تو سب فوجی اور پولیس والے گرنتھی جی کے پاس آئے۔ ان کے ساتھ علاقے کا نمبردار بھی تھا۔ مسلمان لڑکیوں کے بارے میں پوچھ گچھ ہوتی رہی۔ گرنتھی جی نے گرنتھ صاحب کی قسم کھا کر کہہ دیا کہ اس گاؤں میں کوئی مسلمان لڑکی نہیں “لڑکے کی بات دوسری ہے۔ ” کسی نے پرمیشر سنگھ کے کان میں سرگوشی کی اور آس پاس کے سکھ پرمیشر سنگھ سمیت زیر لب مسکرانے لگے۔ پھر ایک فوجی افسر نے گاؤں والوں کے سامنے ایک تقریر کی۔ اس نے مامتا پر بڑا زور دیا جو ان ماؤں کے دلوں میں ان دنوں ٹیس بن کر رہ گئی تھی جن کی بیٹیاں چھن گئی تھیں اور ان بھائیوں اور شوہروں کی پیار کی بڑی دردناک تصویر کھینچی جن کی بہنیں اور بیویاں ان سے ہتھیا لی گئی تھیں۔ ۔ ۔ “اور مذہب کیا ہے دوستو۔ ” اس نے کہا تھا۔ ۔ ۔ “دنیا کا ہر مذہب انسان کو انسان بننا سکھاتا ہے اور تم مذہب کے نام لے کر انسان کو انسان سے لڑا دیتے ہو۔ ان کی آبرو پر ناچتے ہو اور کہتے ہو ہم سکھ ہیں، ہم مسلمان ہیں۔ ۔ ۔ ہم واہگورو جی کے چیلے ہیں، ہم رسول کے غلام ہیں۔ “

تقریر کے بعد مجمع چھٹنے لگا۔ فوجیوں کے افسر نے گرنتھی جی کا شکریہ ادا کیا۔ ان سے ہاتھ ملایا اور لاری چلی گئی۔

سب سے پہلے گرنتھی جی نے پرمیشر سنگھ کو مبارک باد دی۔ پھر دوسرے لوگوں نے پرمیشر سنگھ کو گھیر لیا اور اسے مبارک باد دینے لگے لیکن پرمیشر سنگھ لاری آنے سے پہلے حواس باختہ ہو رہا تھا تو اب لاری جانے کے بعد لُٹا لُٹا سا لگ رہا تھا۔ پھر وہ گاؤں سے نکل کر گیان سنگھ کے کھیت میں آیا۔ اختر کو کندھے پر بٹھا کر گھر میں لے آیا۔ کھانا کھلانے کے بعد اسے کھاٹ پر لٹا کر کچھ یوں تھپکا کہ اسے نیند آ گئی۔ پرمیشر سنگھ دیر تک کھاٹ پر بیٹھا رہا۔ کبھی داڑھی کھجاتا اور ادھر ادھر دیکھ کر پھر سوچ میں بیٹھ جاتا۔ پڑوس کی چھت پر کھیلتا ہوا ایک بچہ اچانک اپنی ایڑی پکڑ کر بیٹھ گیا اور زار زار رونے لگا۔ “ہائے اتنا بڑا کانٹا اتر گیا پورے کا پورا۔ ” وہ چلایا اور پھر اس کی ماں ننگے سر اوپر بھاگی۔ اسے گود میں بٹھا لیا پھر نیچے بیٹی کو پکار کر سوئی منگوائی۔ کانٹا نکالنے کے بعد اسے بے تحاشا چوما اور پھر نیچے جھک کر پکاری۔ ۔ ۔ “ارے میرا دوپٹہ تو اوپر پھینک دینا۔ کیسی بے حیائی سے اوپر بھاگی چلی آئی۔ “

پرمیشر سنگھ نے کچھ دیر بعد چونک کر بیوی سے پوچھا۔

“سنو کیا تمھیں کرتارا اب بھی یاد آتا ہے۔ “

“لو اور سنو” بیوی بولی اور پھر ایک دم چھاجوں رو دی۔ ۔ ۔ “کرتارا تو میرے کلیجے کا ناسور بن گیا ہے پرمیشرے!”

کرتارے کا نام سن کر ادھر سے امر کور اٹھ کر آئی اور روتی ہوئی ماں کے گھٹنے کے پاس بیٹھ کر رونے لگی۔

پرمیشر سنگھ یوں بدک کر جلدی سے اٹھ بیٹھا جیسے اس نے شیشے کے برتنوں سے بھرا ہوا طشت اچانک زمین پر دے مارا ہو۔

شام کے کھانے کے بعد وہ اختر کو انگلی سے پکڑے باہر دالان میں آیا اور بولا۔ “آج تو دن بھر خوب سوئے ہو بیٹا۔ چلو آج ذرا گھومنے چلتے ہیں۔ چاندنی رات ہے۔ “

اختر فوراً مان گیا۔ پرمیشر سنگھ نے اسے کمبل میں لپیٹا اور کندھے پر بٹھا لیا۔ کھیتوں میں آ کر وہ بولا۔ “یہ چاند جو پورب سے نکل رہا ہے نا بیٹے، جب یہ ہمارے سر پر پہنچے گا تو صبح ہو جائے گی۔ “

اختر چاند کی طرف دیکھنے لگا۔

“یہ چاند جو یہاں چمک رہا ہے نا۔ یہ وہاں بھی چمک رہا ہو گا۔ تمھاری اماں کے دیس میں۔ “

اب کے اختر نے جھک کر پرمیشر سنگھ کی طرف دیکھنے کی کوشش کی۔

“یہ چاند ہمارے سر پر آئے گا تو وہاں تمھاری اماں کے سر پر بھی ہو گا۔ “

اب کے اختر بولا “ہم چاند دیکھ رہے ہیں تو کیا اماں بھی چاند کو دیکھ رہی ہو گی؟”

“ہاں پرمیشر سنگھ کی آواز میں گونج تھی۔ ۔ ۔ “چلو گے اماں کے پاس؟”

“ہاں ” اختر بولا۔ ۔ ۔ “پر تم جاتے نہیں، تم بہت برے ہو، تم سکھ ہو۔ “

پرمیشر سنگھ بولا۔ ۔ ۔ “نہیں بیٹے، آج تو تمھیں ضرور ہی لے جاؤں گا۔ تمھاری اماں کی چٹھی آئی ہے۔ وہ کہتی ہے میں اختر بیٹے کے لیے اداس ہوں۔ “

“میں بھی تو اداس ہوں۔ ” اختر کو جیسے کوئی بھولی ہوئی بات یاد آ گئی۔

“میں تمھیں تمھاری اماں ہی کے پاس لیے جا رہا ہوں۔ “

“سچ۔ ۔ ۔ ؟” اختر پرمیشر سنگھ کے کندھے پر کودنے لگا اور زور زور سے بولنے لگا۔ ۔ ۔ “ہم اماں پاس جا رہے ہیں۔ پر موں ہمیں اماں پاس لے جائے گا۔ ہم وہاں سے پرموں کو چٹھی لکھیں گے۔ “

پرمیشر سنگھ چپ چاپ روئے جا رہا تھا۔ آنسو پونچھ کر اور گلا صاف کر کے اس نے اختر سے پوچھا۔

“گانا سنو گے؟”

“ہاں “

“پہلے تم قرآن سناؤ۔ “

“اچھا” اور اختر قُل ہو اللّٰہ پڑھنے لگا، کفواً اَحَد پر پہنچ کر اس نے اپنے سینے پر چھو، کی اور بولا۔ ۔ ۔ “لاؤ تمھارے سینے پر بھی چھو، کر دوں۔ “

رک کر پرمیشر سنگھ نے گریبان کا ایک بٹن کھولا اور اوپر دیکھا۔ اختر نے لٹک کر اس کے سینے پر چھو کر دی اور بولا۔ ۔ ۔ “اب تم سناؤ۔ “

پرمیشر سنگھ نے اختر کو دوسرے کندھے پر بٹھا لیا۔ اسے بچوں کا کوئی گیت یاد نہیں تھا۔ اس لیے اس نے قسم قسم کے گیت گانا شروع کیے اور گاتے ہوئے تیز تیز چلنے لگا۔ اختر چپ چاپ سنتا رہا۔

بنتو داس سر بن ورگا جے بنتو دا منہ ورگا جے بنتو دالک چترا جے لوکو بنتو دا لک چترا

“بنتو کون ہے؟” اختر نے پرمیشر سنگھ کو ٹوکا۔

پرمیشر سنگھ ہنسا پھر ذرا وقفے کے بعد بولا۔ ۔ ۔ “میری بیوی ہے نا۔ امر کور کی ماں۔ اس کا نام بنتو ہے۔ امر کور کا نام بھی بنتو ہے۔ تمھاری اماں کا نام بھی بنتو ہی ہو گا۔ “

“کیوں؟” اختر خفا ہو گیا۔ ۔ ۔ “وہ کوئی سکھ ہے؟”

پرمیشر سنگھ خاموش ہو گیا۔

چاند بہت بلند ہو گیا تھا۔ رات خاموش تھی، کبھی کبھی گنے کے کھیتوں کے آس پاس گیدڑ روتے اور پھر سناٹا چھا جاتا۔ اختر پہلے تو گیدڑوں کی آواز سے بہت ڈرا، مگر پرمیشر سنگھ کے سمجھانے سے بہل گیا اور ایک بار خاموشی کے طویل وقفے کے بعد اس نے پرمیشر سنگھ سے پوچھا۔ ۔ ۔ “اب کیوں نہیں روتے گیدڑ؟” پرمیشر سنگھ ہنس دیا۔ پھر اسے ایک کہانی یاد آ گئی۔ یہ گُرو گوبند سنگھ کی کہانی تھی۔ لیکن اس نے بڑے سلیقے سے سکھوں کے ناموں کو مسلمانوں کے ناموں میں بدل دیا اور اختر “پھر؟پھر؟” کی رٹ لگاتا رہا اور کہانی ابھی جاری تھی، جب اختر ایک دم بولا۔ “ارے چاند تو سر پر آگیا!”

پرمیشر سنگھ نے بھی رک کر اوپر دیکھا۔ پھر وہ قریب کے ٹیلے پر چڑھ کر دور دیکھنے لگا اور بولا۔ ۔ ۔ “تمھاری اماں کا دیس جانے کدھر چلا گیا۔ “

وہ کچھ دیر ٹیلے پر کھڑا رہا۔ جب اچانک کہیں دور سے اذان کی آواز آنے لگی اور اختر مارے خوشی کے یوں کودا کہ پرمیشر سنگھ اسے بڑی مشکل سے سنبھال سکا۔ اسے کندھے پر سے اتار کر وہ زمین پر بیٹھ گیا اور کھڑے ہوئے اختر کے کندھوں پر ہاتھ رکھ کر بولا۔ ۔ ۔ جاؤ بیٹے، تمھیں تمھاری اماں نے پکارا ہے۔ بس تم اس آواز کی سیدھ میں۔ ۔ ۔ “

“شش!” اختر نے اپنے ہونٹوں پر انگلی رکھ دی اور سرگوشی میں بولا۔

“اذان کے وقت نہیں بولتے۔ “

“پر میں تو سکھ ہوں بیٹے!” پرمیشر سنگھ بولا۔

“شش” اب کے اختر نے بگڑ کر اسے گھورا۔

اور پرمیشر سنگھ نے اسے گود میں بٹھا لیا۔ اس کے ماتھے پر ایک بہت طویل پیار دیا اور اذان ختم ہونے کے بعد آستینوں سے آنکھیں رگڑ کر بھرائی ہوئی آواز میں بولا۔

“میں یہاں سے آگے نہیں آؤں گا۔ بس تم۔ ۔ ۔ “

“کیوں۔ ۔ ۔ ؟ کیوں نہیں آؤ گے۔ ۔ ۔ ؟ اختر نے پوچھا۔

“تمھاری اماں نے چٹھی میں یہی لکھا ہے کہ اختر اکیلا آئے۔ “

پرمیشر سنگھ نے اختر کو پھسلایا۔ ۔ ۔ “بس تم سیدھے چلے جاؤ۔ سامنے ایک گاؤں آئے گا۔ وہاں جا کر اپنا نام بتانا کرتارا نہیں اختر، پھر اپنی ماں کا نام بتانا۔ اپنے گاؤں کا نام بتانا اور دیکھو، مجھے ایک چٹھی ضرور لکھنا۔ “

“لکھوں گا” اختر نے وعدہ کیا۔

“اور ہاں تمھیں کرتارا نام کا کوئی لڑکا ملے نا، تو اسے ادھر بھیج دینا۔ “

“اچھا” پرمیشر سنگھ نے ایک بار پھر اختر کا ماتھا چوما اور جیسے کچھ نگل کر بولا۔

“جاؤ!”

اختر چند قدم چلا مگر پلٹ آیا۔ ۔ ۔ “تم بھی آ جاؤ نا۔ “

“نہیں بھئی!” پرمیشر سنگھ نے اسے سمجھایا۔ ۔ ۔ “تمھاری اماں نے چٹھی میں یہ نہیں لکھا۔ “

“مجھے ڈر لگتا ہے۔ ” اختر بولا۔

“قرآن کیوں نہیں پڑھتے؟” پرمیشر سنگھ نے مشورہ دیا۔

“اچھا” بات سمجھ میں آ گئی اور وہ قُل ہو اللّٰہ کا ورد کرتا ہوا جانے لگا۔

نرم نرم پو افق کے دائرے پر اندھیرے سے لڑ رہی تھی اور ننھا سا اختر دور دھندلی پگڈنڈی پر ایک لمبے تڑنگے سکھ جوان کی طرح تیز تیز جا رہا تھا۔ پرمیشر سنگھ اس پر نظریں گاڑے ٹیلے پر بیٹھا رہا اور جب اختر کا نقطہ فضا کا ایک حصہ بن گیا تو وہاں سے اتر آیا۔

اختر ابھی گاؤں کے قریب نہیں پہنچا تھا کہ دو سپاہی لپک کر آئے اور اسے روک کر بولے۔ “کون ہو تم؟”

“اختر۔ “

وہ یوں بولا جیسے ساری دنیا اس کا نام جانتی ہے۔

“اختر!” دونوں سپاہی کبھی اختر کے چہرے کو دیکھتے اور کبھی اس کی سکھوں کی سی پگڑی کو۔ پھر ایک نے آگے بڑھ کر اس کی پگڑی جھٹکے سے اتار لی تو اختر کے کیس کھل کر ادھر ادھر بکھر گئے۔

اختر نے بھنا کر پگڑی چھین لی اور پھر ایک ہاتھ سے سر کو ٹٹولتے ہوئے وہ زمین پر لیٹ گیا اور زور زور سے روتے ہوئے بولا۔ ۔ ۔ “میرا کنگھا لاؤ۔ تم نے میرا کنگھا لے لیا ہے۔ دے دو ورنہ میں تمھیں ماروں گا۔ “

ایک دم دونوں سپاہی دھپ سے زمین پر گرے اور رائفل کو کندھوں سے لگا کر جیسے نشانہ باندھنے لگے۔

“ہالٹ۔ “

ایک پکارا جیسے جواب کا انتظار کرنے لگا۔ پھر بڑھتے ہوئے اجالے میں انھوں نے ایک دوسرے کی طرف دیکھا اور ایک نے فائر کر دیا۔ اختر فائر کی آواز سے دہل کر رہ گیا اور سپاہیوں کو ایک طرف بھاگتا دیکھ کر وہ بھی روتا چلاتا ہوا ان کے پیچھے بھاگا۔

سپاہی جب ایک جگہ جا کر رُکے تو پرمیشر سنگھ اپنی ران پر کس کر پٹی باندھ چکا تھا مگر خون اس کی پگڑی کی سیکڑوں پرتوں میں سے بھی پھوٹ آیا۔ اور وہ کہہ رہا تھا۔ ۔ ۔ “مجھے کیوں مارا تم نے، میں تو اختر کے کیس کاٹنا بھول گیا تھا؟ میں اختر کو اس کا دھرم واپس دینے آیا تھا یارو۔ “

اور اختر بھاگا آ رہا تھا اور اس کے کیس ہوا میں اڑ رہے تھے۔

***

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Aurat… by Nirmala Putul

Painting: Lord Frederic Leighton

Painting: Lord Frederic Leighton

عورت: رسوئی اور بستر سے پرے

نرملا اپتل
ہندی سے اردو ترجمہ: علمانہ فصیح

کیا تم جانتے ہو
آدمی سے الگ ایک عورت کی تنہائی
گھر، پریم اور کنبے سے الگ
ایک عورت کو
اس کی اپنی زمین کے بارے میں
بتا سکتے ہو تم؟

بتا سکتے ہو
صدیوں سے اپنا گھر تلاشتی
ایک بے چین عورت کو اس کے گھر کا پتہ؟

کیا تم جانتے ہو
اپنے تصور میں کس طرح ایک ہی وقت
اپنے وجود کو قائم رکھتی ہے اور اپنی دنیا بساتی ہے ایک عورت۔

خوابوں میں بھاگتی ایک عورت کا پیچھا کرتے
کبھی دیکھا ہے تم نے اسے
رشتوں کی جنگ میں اپنے آپ سے لڑتے؟
جسم کے جغرافیے سے پرے
ایک عورت کے من کی گرہ کھول کر

کبھی پڑھی ہے تم نے اس کے اندر کھولتی تاریخ

پڑھا ہے کبھی اس کی خاموشی کی دہلیز پر بیٹھے
الفاظ کے انتظار میں اس کے چہرے کو؟

اسکے اندر اپنی نسل کا بیج بوتے
کیا کبھی تم نے محسوس کیا ہے
اسکی پھیلتی جڑوں کو اپنے اندر؟

کیا تم جانتے ہو
ایک عورت کے کامل رشتوں کے قوائد
بتا سکتے ہو تم
ایک عورت کو اس کی ہی نظر سے دیکھتے ہوئے
اس کے عورت ہونے کی تشریح؟

اگر نہیں
تو پھرر
کیا جانتے ہو تم
باورچی خانے اور بستر کی ریاضی سے پرے
ایک عورت کے بارے میں… ؟

 ***

स्त्री : रसोई और बिस्तर से परे
– निर्मला पुतुल

क्या तुम जानते हो
पुरुष से भिन्न एक स्त्री का एकांत?
घर प्रेम और जाति से अलग
एक स्त्री को

उसकी अपनी जमीन के बारे में

बता सकते हो तुम?

बता सकते हो

सदियों से अपना घर तलाशती

एक बेचैन स्त्री को उसके घर का पता?

क्या तुम जानते हो
अपनी कल्पना में किस तरह एक ही समय में

स्वयं को स्थापित और निर्वासित करती है एक स्त्री?

सपनों में भागती एक स्त्री का पीछा करते
कभी देखा है तुमने उसे
रिश्तों के कुरुक्षेत्र में अपने-आपसे लड़ते?
तन के भूगोल से परे
एक स्त्री के मन की गांठ खोलकर

कभी पढ़ा है तुमने उसके भीतर का खौलता इतिहास?

पढ़ा है कभी उसकी चुप्पी की दहलीज पर बैठ

शब्दों की प्रतीक्षा में उसके चेहरे को?

उसके अंदर वंशबीज बोते

क्या तुमने कभी महसूसा है
उसकी फैलती जड़ों को अपने भीतर?
क्या तुम जानते हो

एक स्त्री के समस्त रिश्ते का व्याकरण?

बता सकते हो तुम

एक स्त्री को स्त्री-दृष्टि से देखते

उसके स्त्रीत्व की परिभाषा?
अगर नहीं!

तो फिर

क्या जानते हो तुम

रसोई और बिस्तर के गणित से परे

एक स्त्री के बारे में….?

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Toba Tek Singh… by Saadat Hasan Manto

India's BSF soldiers patrol fenced border with Pakistan near Jammu

टोबा  टेक सिंह

सआदत हसन मंटो

बंटवारे के दो-तीन साल बाद पाकिस्तान और हिंदुस्तान की हुकूमतों को ख़याल आया कि सामान्य क़ैदियों की तरह पागलों का भी तबादला होना चाहिए, यानी जो मुसलमान पागल हिंदुस्तान के पागलख़ानों में हैं, उन्हें पाकिस्तान पहुँचा दिया जाए और जो हिंदू और सिख पाकिस्तान के पागलख़ानो में हैं, उन्हें हिंदुस्तान के हवाले कर दिया जाए।

मालूम नहीं, यह बात माक़ूल थी या गै़र माकूल़, बहरहाल दानिशमंदों के फ़ैसले के मुताबिक़ इधर-उधर ऊँची सतह की कान्फ़ेंस हुई और बिल आख़िर पागलों के तबादले के लिए एक दिन मुक़र्रर हो गया।

अच्छी तरह छानबीन की गई – वे मुसलमान पागल जिनके संबंधी हिंदुस्तान ही में थे, वहीं रहने दिए गए, बाक़ी जो बचे, उनको सरहद पर रवाना कर दिया गया। पाकिस्तान से चूँकि क़रीब-क़रीब तमाम हिंदू-सिख जा चुके थे, इसलिए किसी को रखने-रखाने का सवाल ही पैदा नहीं हुआ, जितने हिंदू-सिख पागल थे, सबके-सब पुलिस की हिफ़ाज़त में बॉर्डर पर पहुँचा दिए गए।

उधर का मालूम नहीं लेकिन इधर लाहौर के पागलख़ाने में जब इस तबादले की ख़बर पहुँची तो बड़ी दिलचस्प गपशप होने लगी।

एक मुसलमान पागल जो बारह बरस से, हर रोज़, बाक़ायदगी के साथ ‘ज़मींदार’ पढ़ता था, उससे जब उसके एक दोस्त ने पूछा, “मौलवी साब, यह पाकिस्तान क्या होता है?” तो उसने बड़े गौरो-फ़िक्र के बाद जवाब दिया, “हिंदुस्तान में एक ऐसी जगह है जहाँ उस्तरे बनते हैं!” यह जवाब सुनकर उसका दोस्त संतुष्ट हो गया।

इसी तरह एक सिख पागल ने एक दूसरे सिख पागल से पूछा, “सरदार जी, हमें हिंदुस्तान क्यों भेजा जा रहा है, हमें तो वहाँ की बोली नहीं आती।” दूसरा मुस्कराया, “मुझे तो हिंदुस्तोड़ों की बोली आती है, हिंदुस्तानी बड़े शैतानी आकड़ आकड़ फिरते हैं।”

एक दिन, नहाते-नहाते, एक मुसलमान पागल ने ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ का नारा इस ज़ोर से बुलंद किया कि फ़र्श पर फिसलकर गिरा और बेहोश हो गया।

बाज़ पागल ऐसे भी थे जो पागल नहीं थे, उनमें बहुतायत ऐसे क़ातिलों की थी जिनके रिश्तेदारों ने अफ़सरों को कुछ दे दिलाकर पागलख़ाने भिजवा दिया था कि वह फाँसी के फंदे से बच जाएँ, यह पागल कुछ-कुछ समझते थे कि हिंदुस्तान क्यों तक़्सीम हुआ है और यह पाकिस्तान क्या है, लेकिन सही वाक़िआत से वह भी बेख़बर थे, अख़बारों से उन्हें कुछ पता नहीं चलता था और पहरेदार सिपाही अनपढ़ और जाहिल थे, जिनकी गुफ़्तगू से भी वह कोई नतीजा बरामद नहीं कर सकते थे। उनको सिर्फ़ इतना मालूम था कि एक आदमी मुहम्मद अली जिन्नाह है जिसको क़ायदे-आज़म कहते हैं, उसने मुसलमानी के लिए एक अलहदा मुल्क बनाया है जिसका नाम पाकिस्तान है, यह कहाँ हैं, इसकी भौगोलिक स्थिति क्या है, इसके मुताल्लिक़ वह कुछ नहीं जानते थे – यही वजह है कि वह सब पागल जिनका दिमाग पूरी तरह बिगड़ा हुआ नहीं हुआ था, इस मखमसे में गिरफ़्तार थे कि वह पाकिस्तान में हैं या हिंदुस्तान में, अगर हिंदुस्तान में हैं तो पाकिस्तान कहाँ हैं, अगर वह पाकिस्तान में हैं तो यह कैसे हो सकता है कि वह कुछ अर्से पहले यहीं रहते हुए हिंदुस्तान में थे।

एक पागल तो हिंदुस्तान और पाकिस्तान, पाकिस्तान, पाकिस्तान और हिंदुस्तान के चक्कर में कुछ ऐसा गिरफ़्तार हुआ कि और ज़्यादा पागल हो गया। झाडू देते-देते वह एक दिन दरख्त़ पर चढ़ गया और टहने पर बैठकर दो घंटे मुसलसल तक़रीर करता रहा, जो पाकिस्तान और हिंदुस्तान के नाज़ुक मसले पर थी, सिपाहियों ने जब उसे नीचे उतरने को कहा तो वह और ऊपर चढ़ गया। जब उसे डराया-धमकाया गया तो उसने कहा, “मैं हिंदुस्तान में रहना चाहता हूँ न पाकिस्तान में, मैं इस दरख़्त पर रहूँगा।” बड़ी देर के बाद जब उसका दौरा सर्द पड़ा तो वह नीचे उतरा और अपने हिंदू-सिख दोस्तों से गले मिल-मिलकर रोने लगा – इस ख़याल से उसका दिल भर आया था कि वह उसे छोड़कर हिंदुस्तान चले जाएँगे।

एक एम.एस-सी. पास रेडियो इंजीनियर में जो मुसलमान था और दूसरे पागलों से बिलकुल अलग-थलग बाग की एक खास पगडंडी पर सारा दिन ख़ामोश टहलता रहता था, यह तब्दीली ज़ाहिर हुई कि उसने अपने तमाम कपड़े उतारकर दफादार के हवाले कर दिए और नंग-धड़ंग सारे बाग में चलना-फिरना शुरू कर दिया।

चियौट के एक मोटे मुसलमान ने, जो मुस्लिम लीग का सरगर्म कारकुन रह चुका था और दिन में पंद्रह-सोलह मर्तबा नहाया करता था, एकदम यह आदत तर्क कर दी – उसका नाम मुहम्मद अली था, चुनांचे उसने एक दिन अपने जंगले में एलान कर दिया कि वह क़ायदे-आज़म मुहम्मद अली जिन्नाह है, उसकी देखा-देखी एक सिख पागल मास्टर तारा सिंह बन गया – इससे पहले कि खून-ख़राबा हो जाए, दोनों को ख़तरनाक पागल क़रार देकर अलहदा-अलहदा बंद कर दिया गया।

लाहौर का एक नौजवान हिंदू वकील मुहब्बत में नाकाम होकर पागल हो गया था, जब उसने सुना कि अमृतसर हिंदुस्तान में चला गया है तो उसे बहुत दुख हुआ। अमृतसर की एक हिंदू लड़की से उसे मुहब्बत थी जिसने उसे ठुकरा दिया था मगर दीवानगी की हालत में भी वह उस लड़की को नहीं भूला था – वह उन तमाम हिंदू और मुसलमान लीडरों को गालियाँ देने लगा जिन्होंने मिल-मिलाकर हिंदुस्तान के दो टुकडे कर दिए हैं, और उसकी महबूबा हिंदुस्तानी बन गई है और वह पाकिस्तानी। जब तबादले की बात शुरू हुई तो उस वकील को कई पागलों ने समझाया कि वह दिल बुरा न करे, उसे हिंदुस्तान भेज दिया जाएगा, उसी हिंदुस्तान में जहाँ उसकी महबूबा रहती है – मगर वह लाहौर छोड़ना नहीं चाहता था, उसका ख़याल था कि अमृतसर में उसकी प्रैक्टिस नहीं चलेगी।

युरोपियन वार्ड में दो एंग्लो इंडियन पागल थे। उनको जब मालूम हुआ कि हिंदुस्तान को आज़ाद करके अंग्रेज़ चले गए हैं तो उनको बहुत सदमा हुआ, वह छुप-छुपकर घंटों आपस में इस अहम मसले पर गुफ़्तगू करते रहते कि पागलख़ाने में अब उनकी हैसियत किस किस्म की होगी, योरोपियन वार्ड रहेगा या उड़ा दिया जाएगा, ब्रेक-फास्ट मिला करेगा या नहीं, क्या उन्हें डबल रोटी के बजाय ब्लडी इंडियन चपाटी तो ज़बरदस्ती नहीं खानी पड़ेगी?

एक सिख था, जिसे पागलख़ाने में दाखिल हुए पंद्रह बरस हो चुके थे। हर वक्त उसकी जुबान से यह अजीबो-गरीब अल्फ़ाज़ सुनने में आते थे, “औपड़ दि गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानां दि मूँग दि दाल ऑफ दी लालटेन!” वह दिन को सोता था न रात को। पहरेदारों का यह कहना था कि पंद्रह बरस के तबील अर्से में वह एक लहज़े के लिए भी नहीं सोया था, वह लेटता भी नहीं था, अलबत्ता कभी-कभी किसी दीवार के साथ टेक लगा लेता था – हर वक्त खड़ा रहने से उसके पाँव सूज गए थे और पिंडलियाँ भी फूल गई थीं, मगर जिस्मानी तकलीफ़ के बावजूद वह लेटकर आराम नहीं करता था।

हिंदुस्तान, पाकिस्तान और पागलों के तबादले के मुताल्लिक़ जब कभी पागलख़ानों में गुफ़्तगू होती थी तो वह गौर से सुनता था, कोई उससे पूछता कि उसका क्या ख़याल है तो वह बड़ी संजीदगी से जवाब देता, “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानां दि मुँग दि दाल आफ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट!” लेकिन बाद में ‘आफ दि पाकिस्तान गवर्नमेंट’ की जगह ‘आफ दि टोबा टेक सिंह गवर्नमेंट’ ने ले ली, और उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू कर दिया कि टोबा टेक सिंह कहाँ हैं, जहाँ का वह रहनेवाला है। किसी को भी मालूम नहीं था कि टोबा टेक सिंह पाकिस्तान में हैं या हिंदुस्तान में, जो बताने की कोशिश करते थे वह खुद इस उलझाव में गिरफ़्तार हो जाते थे कि सियालकोट पहले हिंदुस्तान में होता था, पर अब सुना है कि पाकिस्तान में हैं, क्या पता है कि लाहौर जो आज पकिस्तान में हैं, कल हिंदुस्तान में चला जाए या सारा हिंदुस्तान ही पाकिस्तान बन जाए और यह भी कौन सीने पर हाथ रखकर कह सकता है कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान, दोनों किसी दिन सिरे से गायब ही हो जाएँ!

इस सिख पागल के केश छिदरे होकर बहुत मुख्त़सर रह गए थे, चूँकि बहुत कम नहाता था, इसलिए दाढ़ी और सिर के बाल आपस में जम गए थे जिसके बायस उसकी शक्ल बड़ी भयानक हो गई थी, मगर आदमी हिंसक नहीं था – पंद्रह बरसों में उसने कभी किसी से झगड़ा-फ़साद नहीं किया था। पागलख़ाने के जो पुराने मुलाज़िम थे, वह उसके मुताल्लिक़ इतना जानते थे कि टोबा टेक सिंह में उसकी कई ज़मीनें थी, अच्छा खाता-पीता ज़मींदार था कि अचानक दिमाग उलट गया, उसके रिश्तेदार उसे लोहे की मोटी-मोटी ज़ंजीरों में बाँधकर लाए और पागलख़ाने में दाखिल करा गए।

महीने में एक बार मुलाक़ात के लिए यह लोग आते थे और उसकी खैर-ख़ैरियत दरयाफ़्त करके चले जाते थे, एक मुश्त तक यह सिलसिला जारी रहा, पर जब पाकिस्तान, हिंदुस्तान की गड़बड़ शुरू हुई तो उनका आना-जाना बंद हो गया।

उसका नाम बिशन सिंह था मगर सब उसे टोबा टेक सिंह कहते थे। उसको यह बिलकुल मालूम नहीं था कि दिन कौन-सा है या कितने साल बीत चुके हैं, लेकिन हर महीने जब उसके निकट संबंधी उससे मिलने के लिए आने के क़रीब होते तो उसे अपने आप पता चल जाता, चुनांचे वह दफादार से कहता कि उसकी मुलाकात आ रही है, उस दिन वह अच्छी तरह नहाता, बदन पर ख़ूब साबुन घिसता और बालों में तेल डालकर कंघा करता, अपने वह कपड़े जो वह कभी इस्तेमाल नहीं करता था, निकलवाकर पहनता और यों सज-बनकर मिलनेवालों के पास जाता। वह उससे कुछ पूछते तो वह ख़ामोश रहता या कभी-कभार ‘औपड़ दि गड़ गड़ अनैक्स दि बेध्यानां दि मुँग दि दाल आफ दी लालटेन’ कह देता।

उसकी एक लड़की थी जो हर महीने एक उँगली बढ़ती-बढ़ती पंद्रह बरसों में जवान हो गई थी। बिशन सिंह उसको पहचानता ही नहीं था – वह बच्ची थी जब भी अपने आप को देखकर रोती थी, जवान हुई तब भी उसकी आँखों से आँसू बहते थे।

पाकिस्तान और हिंदुस्तान का किस्सा शुरू हुआ तो उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू किया कि टोबा टेक सिंह कहाँ हैं, जब उसे इत्मीनानबख्श़ जवाब न मिला तो उसकी कुरेद दिन-ब-दिन बढ़ती गई। अब मुलाक़ात भी नहीं होती थी, पहले तो उसे अपने आप पता चल जाता था कि मिलनेवाले आ रहे हैं, पर अब जैसे उसके दिल की आवाज़ भी बंद हो गई थी जो उसे उनकी आमद की ख़बर दे दिया करती थी – उसकी बड़ी ख़्वाहिश थी कि वह लोग आएं जो उससे हमदर्दी का इज़हार करते थे और उसके लिए फल, मिठाइयाँ और कपड़े लाते थे। वह आएँ तो वह उनसे पूछे कि टोबा टेक सिंह कहाँ हैं, वह उसे यकीनन बता देंगे कि टोबा टेक सिंह पाकिस्तान में हैं या हिंदुस्तान में – उसका ख़याल था कि वह टोबा टेक सिंह ही से आते हैं जहाँ उसकी ज़मीनें हैं।

पागलख़ाने में एक पागल ऐसा भी था जो खुद़ को ख़ुदा कहता था। उससे जब एक रोज़ बिशन सिंह ने पूछा कि टोबा टेक सिंह पाकिस्तान में हैं या हिंदुस्तान में तो उसने हस्बे-आदत कहकहा लगाया और कहा, “वह पाकिस्तान में हैं न हिंदुस्तान में, इसलिए कि हमने अभी तक हुक्म ही नहीं दिया!”

बिशन सिंह ने उस ख़ुदा से कई मर्तबा बड़ी मिन्नत-समाजत से कहा कि वह हुक़्म दे दें ताकि झंझट ख़त्म हो, मगर ख़ुदा बहुत मसरूफ़ था, इसलिए कि उसे और बे-शुमार हुक़्म देने थे।

एक दिन तंग आकर बिशन सिंह खुद़ा पर बरस पड़ा, “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानां दि मुँग दि दाल आफ वाहे गुरु जी दा खालस एंड वाहे गुरु जी दि फ़तह!” इसका शायद मतलब था कि तुम मुसलमानों के ख़ुदा हो, सिखों के खुद़ा होते तो ज़रूर मेरी सुनते।

तबादले से कुछ दिन पहले टोबा टेक सिंह का एक मुसलमान जो बिशन सिंह का दोस्त था, मुलाक़ात के लिए आया, मुसलमान दोस्त पहले कभी नहीं आया था। जब बिशन सिंह ने उसे देखा तो एक तरफ़ हट गया, फिर वापस जाने लगा मगर सिपाहियों ने उसे रोका, “यह तुमसे मिलने आया है, तुम्हारा दोस्त फज़लदीन है!”
बिशन सिंह ने फज़लदीन को एक नज़र देखा और कुछ बड़बड़ाने लगा।
फज़लदीन ने आगे बढ़कर उसके कंधे पर हाथ रखा, “मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि तुमसे मिलूँ लेकिन फ़ुरसत ही न मिली, तुम्हारे सब आदमी ख़ैरियत से हिंदुस्तान चले गए थे, मुझसे जितनी मदद हो सकी, मैंने की तुम्हारी बेटी रूपकौर…” वह कहते-कहते रुक गया।
बिशन सिंह कुछ याद करने लगा, “बेटी रूपकौर…”
फज़लदीन ने रुक-रुककर कहा, “हाँ, वह, वह भी ठीक-ठाक है, उनके साथ ही चली गई थी!”
बिशन सिंह खामोश रहा।
फज़लदीन ने फिर कहना शुरू किया, “उन्होंने मुझे कहा था कि तुम्हारी ख़ैर-ख़ैरियत पूछता रहूँ, अब मैंने सुना है कि तुम हिंदुस्तान जा रहे हो, भाई बलबीर सिंह और भाई वधावा सिंह से मेरा सलाम कहना और बहन अमृतकौर से भी, भाई बलबीर से कहना कि फज़लदीन राजीखुशी है, दो भूरी भैंसे जो वह छोड़ गए थे, उनमें से एक ने कट्टा दिया है, दूसरी के कट्टी हुई थी, पर वह छ: दिन की होके मर गई और मेरे लायक जो खिदमत हो, कहना, मैं हर वक्त तैयार हूँ, और यह तुम्हारे लिए थोड़े-से मरोंडे लाया हूँ!”

बिशन सिंह ने मरोंडों की पोटली लेकर पास खड़े सिपाही के हवाले कर दी और फज़लदीन से पूछा, “टोबा टेक सिंह कहाँ है?”
फज़लदीन ने कदरे हैरत से कहा, “कहाँ है? वहीं है, जहाँ था!”
बिशन सिंह ने फिर पूछा, “पाकिस्तान में है या हिंदुस्तान में?”
“हिंदुस्तान में, नहीं, नहीं पाकिस्तान में!” फज़लदीन बौखला-सा गया।

बिशन सिंह बड़बड़ाता हुआ चला गया, “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानां दि मुँग दि दाल आफ दी पाकिस्तान एंड हिंदुस्तान आफ दी दुर फिटे मुँह!”

तबादले की तैयारियाँ मुकम्मल हो चुकी थीं, इधर से उधर और उधर से इधर आनेवाले पागलों की फ़ेहरिस्तें पहुँच चुकी थीं और तबादले का दिन भी मुक़र्रर हो चुका था।

सख्त़ सर्दियाँ थीं जब लाहौर के पागलख़ाने से हिंदू-सिख पागलों से भरी हुई लारियाँ पुलिस के रक्षक दस्ते के साथ रवाना हुई, संबंधित अफ़सर भी हमराह थे – वागह(एक गाँव) के बॉर्डर पर तरफीन (दोनों तरफ़) के सुपरिटेंडेंट एक-दूसरे से मिले और प्रारंभिक कार्रवाई ख़त्म होने के बाद तबादला शुरू हो गया, जो रात-भर जारी रहा।

पागलों को लारियों से निकालना और उनको दूसरे अफ़सरों के हवाले करना बड़ा कठिन काम था, बाज़ तो बाहर निकलते ही नहीं थे, जो निकलने पर रज़ामंद होते थे, उनको सँभालना मुश्किल हो जाता था, क्योंकि वह इधर-उधर भाग उठते थे, जो नंगे थे, उनको कपड़े पहनाए जाते तो वह उन्हें फाड़कर अपने तन से जुदा कर देते – कोई गालियाँ बक रहा है, कोई गा रहा है क़ुछ आपस में झगड़ रहे हैं क़ुछ रो रहे हैं, बिलख रहे हैं – कान पड़ी आवाज़ सुनाई नहीं देती थी – पागल औरतों का शोर-शराबा अलग था, और सर्दी इतनी कड़ाके की थी कि दाँत से दाँत बज रहे थे।

पागलों की अक्सरीयत इस तबादले के हक़ में नहीं थी, इसलिए कि उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि उन्हें अपनी जगह से उखाड़कर कहाँ फेंका जा रहा है, वह चंद जो कुछ सोच-समझ सकते थे, ‘पाकिस्तान : जिंदाबाद’ और ‘पाकिस्तान : मुर्दाबाद’ के नारे लगा रहे थे, दो-तीन मर्तबा फ़साद होते-होते बचा, क्योंकि बाज मुसलमानों और सिखों को यह नारे सुनकर तैश आ गया था।

जब बिशन सिंह की बारी आई और वागह के उस पार का मुताल्लिक़ अफ़सर उसका नाम रजिस्टर में दर्ज करने लगा तो उसने पूछा : “टोबा टेक सिंह कहाँ है, पाकिस्तान में या हिंदुस्तान में?”
यह सुनकर बिशन सिंह उछलकर एक तरफ़ हटा और दौड़कर अपने बचे हुए साथियों के पास पहुँच गया।

पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ़ ले जाने लगे, मगर उसने चलने से इनकार कर दिया, “टोबा टेक सिंह यहाँ है!” और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा, “औपड़ दि गड़ गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानां दि मुँग दि दाल आफ दी टोबा टेक सिंह एंड पाकिस्तान!”

उसे बहुत समझाया गया कि देखो, अब टोबा टेक सिंह हिंदुस्तान में चला गया है, अगर नहीं गया है तो उसे फौरन वहाँ भेज दिया जाएगा, मगर वह न माना! जब उसको ज़बर्दस्ती दूसरी तरफ़ ले जाने की कोशिश की गई तो वह दरमियान में एक जगह इस अंदाज़ में अपनी सूजी हुई टांगों पर खड़ा हो गया जैसे अब उसे कोई ताकत नहीं हिला सकेगी, आदमी चूँकि सीधा था, इसलिए उससे ज़्यादा ज़बर्दस्ती न की गई, उसको वहीं खड़ा रहने दिया गया, और तबादले का बाक़ी काम होता रहा।

सूरज निकलने से पहले शांत पड़े बिशन सिंह के हलक के एक गगन भेदी चीख़ निकली।

इधर-उधर से कई दौड़े आए और उन्होने देखा कि वह आदमी जो पंद्रह बरस तक दिन-रात अपनी टाँगों पर खड़ा रहा था, औंधे मुँह लेटा है – उधर खरदार तारों के पीछे हिंदुस्तान था, इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान, दरमियान में ज़मीन के उस टुकड़े पर जिसका कोई नाम नहीं था, टोबा टेक सिंह पड़ा था।

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ٹوبہ ٹیک سنگھ

از سعادت حسن منٹو

بٹوارے کے دو تین سال بعد پاکستان اور ہندوستان کی حکومتوں کو خیال آیا کہ اخلاقی قیدیوں کی طرح پاگلوں کا تبادلہ بھی ہونا چاہئے یعنی جو مسلمان پاگل ، ہندوستان کے پاگل خانوں میں ہیں انہیں پاکستان پہنچا دیا جائے اور جو ہندو اور سکھ پاکستان کے پاگل خانوں میں ہیں انہیں ہندوستان کے حوالے کر دیا جائے ۔

معلوم نہیں یہ بات معقول تھی یا غیر معقول ، بہر حال دانش مندوں کے فیصلے کے مطابق اِدھر اُدھر اونچی سطح کی کانفرنسیں ہوئیں، اور بالاخر ایک دن پاگلوں کے تبادلے کے لئے مقرر ہو گیا ۔اچھی طرح چھان بین کی گئی ۔وہ مسلمان پاگل جن کے لواحقین ہندوستان ہی میں تھے ۔وہیں رہنے دیئے گئے تھے ۔جو باقی تھے ان کو سرحد پر روانہ کر دیا گیا ۔یہاں پاکستان میں چونکہ قریب قریب تمام ہندو سکھ جا چکے تھے ۔اس لئے کسی کو رکھنے رکھانے کا سوال ہی نہ پیدا ہوا۔ جتنے ہندو سکھ پاگل تھے ۔سب کے سب پولیس کی حفاظت میں بارڈر پر پہنچا دیئے گئی۔

اُدھر کا معلوم نہیں ۔لیکن اِدھر لاہور کے پاگل خانے میں جب اس تبادلے کی خبر پہنچی تو بڑی دلچسپ چہ مگوئیاں ہونے لگیں ۔ایک مسلمان پاگل جو بارہ برس سے ہر روز باقاعدگی کے ساتھ ” زمیندار “ پڑھتا تھا اس سے جب اس کے ایک دوست نے پوچھا ۔”مولبی ساب ، یہ پاکستان کیا ہوتا ہے “۔تو اس نے بڑے غور و فکر کے بعد جواب دیا ۔ ”ہندوستان میں ایک ایسی جگہ ہے جہاں استرے بنتے ہیں ۔“

یہ جواب سن کر اس کا دوست مطمئن ہو گیا ۔

اسی طرح ایک سکھ پاگل نے ایک دوسرے سکھ پاگل سے پوچھا۔ ”سردار جی ہمیں ہندوستان کیوں بھیجا جا رہا ہے…. ہمیں تو وہاں کی بولی نہیں آتی۔“

دوسرا مسکرایا ۔” مجھے تو ہندوستوڑوں کی بولی آتی ہے…. ہندوستانی بڑے شیطانی آکڑ آکڑ پھرتے ہیں ۔“
ایک دن نہاتے نہاتے ایک مسلمان پاگل نے ” پاکستان زندہ باد“ کا نعرہ اس زور سے بلند کیا کہ فرش پر پھسل کر گرا اور بیہوش ہو گیا ۔

بعض پاگل ایسے بھی تھے جو پاگل نہیں تھے ۔ان میں اکثریت ایسے قاتلوں کی تھی جن کے رشتہ داروں نے افسروں کو دے دلا کر پاگل خانے بھجوا دیا تھا کہ پھانسی کے پھندے سے بچ جائیں ۔یہ کچھ کچھ سمجھتے تھے کہ ہندوستان کیوں تقسیم ہوا ہے اور یہ پاکستان کیا ہے ۔لیکن صحیح واقعات سے یہ بھی بے خبر تھے ۔اخباروں سے کچھ پتا نہیں چلتا تھا اور پہرہ دار سپاہی ان پڑھ اور جاہل تھے ۔ان کی گفتگو سے بھی وہ کوئی نتیجہ برآمد نہیں کر سکتے تھے ۔ان کو صرف اتنا معلوم تھا کہ ایک آدمی محمّد علی جناح ہے جس کو قائدِ اعظم کہتے ہیں ۔اس نے مسلمانوں کے لئے ایک علیٰحدہ ملک بنایا ہے جس کا نام پاکستان ہے…. یہ کہاں ہے۔ ، اس کا محل وقوع کیا ہے۔ اس کے متعلق وہ کچھ نہیں جانتے تھے ۔یہی وجہ ہے کہ پاگل خانے میں وہ سب پاگل جن کا دماغ پوری طرح ماؤف نہیں ہوا تھا اس مخمصے میں گرفتار تھے کہ وہ پاکستان میں ہیں یا ہندوستان میں۔ اگر ہندوستان میں ہیں تو پاکستان کہاں ہے ۔اگر وہ پاکستان میں ہیں تو یہ کیسے ہو سکتا ہے کہ وہ کچھ عرصہ پہلے یہیں رہتے ہوئے بھی ہندوستان میں تھے ۔

ایک پاگل تو پاکستان اور ہندوستان ، اور ہندوستان اور پاکستان کے چکّر میں کچھ ایسا گرفتار ہوا کہ اور زیادہ پاگل ہو گیا ۔جھاڑو دیتے دیتے ایک دن درخت پر چڑھ گیا اور ٹہنے پر بیٹھ کر دو گھنٹے مسلسل تقریر کرتا رہا جو پاکستان اور ہندوستان کے نازک مسئلے پر تھی ۔سپاہیوں نے اسے نیچے اترنے کو کہا تو وہ اور اوپر چڑھ گیا ۔ڈرایا دھمکایا گیا تو اس نے کہا ” میں ہندوستان میں رہنا چاہتا ہوں نہ پاکستان میں۔ میں اس درخت ہی پر رہوں گا۔“

بڑی مشکلوں کے بعد جب اس کا دورہ سرد پڑا تو وہ نیچے اترا اور اپنے ہندو سکھ دوستوں سے گلے مل مل کر رونے لگا ۔اس خیال سے اس کا دل بھر آیا تھا کہ وہ اسے چھوڑ کر ہندوستان چلے جائیں گے۔

ایک ایم۔ ایس۔ سی پاس ریڈیو انجینئر جو مسلمان تھا اور دوسرے پاگلوں سے بالکل الگ تھلگ باغ کی ایک خاص روش پر سارا دن خاموش ٹہلتا رہتا تھا یہ تبدیلی نمودار ہوئی کہ اس نے تمام کپڑے اتار کر دفعدار کے حوالے کر دیئے اور ننگ دھڑنگ سارے باغ میں چلنا پھرنا شروع کر دیا۔

چنیوٹ کے ایک موٹے مسلمان پاگل نے جو مسلم لیگ کا سر گرم کارکن رہ چکا تھا اور دن میں پندرہ سولہ مرتبہ نہایا کرتا تھا یک لخت یہ عادت ترک کر دی ۔اس کا نام محمّد علی تھا۔ چنانچہ اس نے ایک دن اپنے جنگلے میں اعلان کر دیا کہ وہ قائدِ اعظم محمّد علی جنّاح ہے ۔اس کی دیکھا دیکھی ایک سکھ پاگل ماسٹر تارا سنگھ بن گیا ۔قریب تھا کہ اس جنگلے میں خون خرابہ ہو جائے مگر دونوں کو خطرناک پاگل قرار دے کر علیحدہ علیحدہ بند کر دیا گیا۔

لاہور کا ایک نوجوان ہندو وکیل تھا جو محبّت میں نا کام ہو کر پاگل ہو گیا تھا ۔جب اس نے سنا کہ امرتسر ہندوستان میں چلا گیا ہے تو اسے بہت دکھ ہوا ۔اسی شہر کی ایک ہندو لڑکی سے اسے محبّت ہو گئی تھی ۔گو اس نے اس وکیل کو ٹھکرا دیا تھا مگر دیوانگی کی حالت میں بھی وہ اس کو نہیں بھولا تھا ۔چنانچہ ان تمام ہندو اور مسلم لیڈروں کو گالیاں دیتا تھا جنہوں نے مل ملا کر ہندوستان کے دو ٹکڑے کر دیئے اس کی محبوبہ ہندوستانی بن گئی اور وہ پاکستانی ۔

جب تبادلے کی بات شروع ہوئی تو وکیل کو کئی پاگلوں نے سمجھایا کہ وہ دل برا نہ کرے ۔ اس کو ہندوستان بھیج دیا جائے گا ۔اس ہندوستان میں جہاں اس کی محبوبہ رہتی ہے مگر وہ لاہور چھوڑنا نہیں چاہتا تھا ۔اس لئے کہ اس کا خیال تھا کہ امرتسر میں اس کی پریکٹس نہیں چلے گی ۔

یورپین وارڈ میں دو اینگلو انڈین پاگل تھے ۔ان کو جب معلوم ہوا کہ ہندوستان کو آزاد کر کے انگریز چلے گئے ہیں تو ان کو بہت صدمہ ہوا ۔وہ چھپ چھپ کر گھنٹوں آپس میں اس اہم مسئلے پر گفتگو کرتے رہتے کہ پاگل خانے میں ان کی حیثیت کس قسم کی ہوگی ۔یورپین وارڈ رہے گا یا اڑا دیا جائے گا ۔بریک فاسٹ ملا کرے گا یا نہیں۔کیا انہیں ڈبل روٹی کے بجائے بلڈی انڈین چپاٹی تو زہر مار نہیں کرنا پڑے گی ۔

ایک سکھ تھا جس کو پاگل خانے میں داخل ہوئے پندرہ برس ہو چکے تھے ۔ہر وقت اس کی زبان سے یہ عجیب و غریب الفاظ سننے میں آتے تھے ۔”اوپڑ دی گڑ گڑ دی اینکس دی بے دھیانا دی منگ دی دال آف دی لالٹین۔“دن کو سوتا تھا نہ رات کو ۔پہرہ داروں کا یہ کہنا تھا کہ پندرہ برس کے طویل عرصے میں وہ ایک لحظے کے لئے بھی نہیں سویا ۔لیٹتا بھی نہیں تھا ۔البتہ کبھی کبھی کسی دیوار کے ساتھ ٹیک لگا لیتا تھا ۔
ہر وقت کھڑے رہنے سے اس کے پاو ¿ں سوج گئے تھے ۔پنڈلیاں بھی پھول گئی تھیں ۔مگر اس جسمانی تکلیف کے با وجود لیٹ کر آرام نہیں کرتا تھا ۔ہندوستان ، پاکستان اور پاگلوں کے تبادلے کے متعلق جب کبھی پاگل خانے میں گفتگو ہوتی تھی تو وہ غور سے سنتا تھا ۔کوئی اس سے پوچھتا کہ اس کا کیا خیال ہے تو وہ بڑی سنجیدگی سے جواب دیتا۔ ”اوپڑ دی گڑ گڑ دی اینکس دی بے دھیانا دی مونگ دی دال آف دی پاکستان گورنمنٹ ۔“

لیکن بعد میں ” آف دی پاکستان گورنمنٹ “ کی جگہ ”آف دی ٹوبہ ٹیک سنگھ گورنمنٹ“ نے لے لی اور اس نے دوسرے پاگلوں سے پوچھنا شروع کیا کہ ٹوبہ ٹیک سنگھ کہاں ہے جہاں کا وہ رہنے والا ہے ۔لیکن کسی کو بھی معلوم نہیں تھا کہ وہ پاکستان میں ہے یا ہندوستان میں۔جو بتانے کی کوشش کرتے تھے وہ خود اس الجھاؤ میں گرفتار ہو جاتے تھے کہ سیالکوٹ پہلے ہندوستان میں ہوتا تھا پر اب سنا ہے کہ پاکستان میں ہے ۔کیا پتا ہے کہ لاہور جو اب پاکستان میں ہے کل ہندوستان میں چلا جائے ۔یا سارا ہندوستان ہی پاکستان بن جائے۔ اور یہ بھی کون سینے پر ہاتھ رکھ کر کہہ سکتا تھا کہ ہندوستان اور پاکستان دونوں کسی دن سرے سے غائب ہی ہو جائیں ۔

اس سکھ پاگل کے کیس چھدرے ہو کے بہت مختصر رہ گئے تھے ۔چونکہ بہت کم نہاتا تھا اس لئے ڈاڑھی اور سر کے بال آپس میں جم گئے تھے ۔جن کے باعث اس کی شکل بڑی بھیانک ہو گئی تھی ۔مگر آدمی بے ضرر تھا ۔پندرہ برسوں میں اس نے کبھی کسی سے جھگڑا فساد نہیں کیا تھا ۔پاگل خانے کے جو پرانے ملازم تھے وہ اس کے متعلّق اتنا جانتے تھے کہ ٹوبہ ٹیک سنگھ میں اس کی کئی زمینیں تھیں ۔اچّھا کھاتا پیتا زمین دار تھا کہ اچانک دماغ الٹ گیا ۔اس کے رشتہ دار لوہے کی موٹی موٹی زنجیروں میں اسے باندھ کر لائے اور پاگل خانے میں داخل کرا گئے ۔

مہینے میں ایک بار ملاقات کے لئے یہ لوگ آتے تھے اور اس کی خیر خیریت دریافت کر کے چلے جاتے تھے ۔ایک مدّت تک یہ سلسلہ جاری رہا ۔پر جب پاکستان، ہندوستان کی گڑبڑ شروع ہوئی تو ان کا آنا بند ہو گیا ۔
اس کا نام بشن سنگھ تھا مگر سب اسے ٹوبہ ٹیک سنگھ کہتے تھے ۔اس کو قطعاً معلوم نہیں تھا کہ دن کون سا ہے ، مہینہ کون سا ہے ، یا کتنے سال بیت چکے ہیں ۔لیکن ہر مہینے جب اس کے عزیز و اقارب اس سے ملنے کے لئے آتے تھے تو اسے اپنے آپ پتا چل جاتا تھا ۔چنانچہ وہ دفعدار سے کہتا کہ اس کی ملاقات آ رہی ہے ۔اس دن وہ اچّھی طرح نہاتا ، بدن پر خوب صابن گھستا اور سر میں تیل لگا کر کنگھا کرتا ، اپنے کپڑے جو وہ کبھی استعمال نہیں کرتا تھا نکلوا کے پہنتا اور یوں سج بن کر ملنے والوں کے پاس جاتا ۔وہ اس سے کچھ پوچھتے تو وہ خاموش رہتا یا کبھی کبھار ” اوپڑ دی گڑ گڑ دی اینکس دی بے دھیانا دی مونگ دی دال آف دی لالٹین“ کہ دیتا ۔

اس کی ایک لڑکی تھی جو ہر مہینے ایک انگلی بڑھتی بڑھتی پندرہ برسوں میں جوان ہو گئی تھی ۔بشن سنگھ اس کو پہچانتا ہی نہیں تھا ۔وہ بچّی تھی جب بھی اپنے باپ کو دیکھ کر روتی تھی ، جوان ہوئی تب بھی اس کی آنکھوں سے آنسو بہتے تھے ۔

پاکستان اور ہندوستان کا قصّہ شروع ہوا تو اس نے دوسرے پاگلوں سے پوچھنا شروع کیا کہ ٹوبہ ٹیک سنگھ کہاں ہے ۔جب اطمینان بخش جواب نہ ملا تو اس کی کرید دن بدن بڑھتی گئی ۔اب ملاقات بھی نہیں آتی تھی ۔پہلے تو اسے اپنے آپ پتہ چل جاتا تھا کہ ملنے والے آ رہے ہیں ، پر اب جیسے اس کے دل کی آواز بھی بند ہو گئی تھی جو اسے ان کی آمد کی خبر دے دیا کرتی تھی ۔

اس کی بڑی خواہش تھی کہ وہ لوگ آئیں جو اس سے ہم دردی کا اظہار کرتے تھے اور اس کے لئے پھل، مٹھائیاں اور کپڑے لاتے تھے ۔وہ اگر ان سے پوچھتا کہ ٹوبہ ٹیک سنگھ کہاں ہے تو وہ یقیناً اسے بتا دیتے کہ پاکستان میں ہے یا ہندوستان میں ۔کیونکہ اس کا خیال تھا کہ وہ ٹوبہ ٹیک سنگھ ہی سے آتے ہیں جہاں اس کی زمینیں ہیں ۔

پاگل خانے میں ایک پاگل ایسا بھی تھا جو خود کو خدا کہتا تھا ۔اس سے جب ایک روز بشن سنگھ نے پوچھا کہ ٹوبہ ٹیک سنگھ پاکستان میں ہے یا ہندوستان میں، تو اس نے حسبِ عادت قہقہہ لگایا اور کہا۔ ”وہ پاکستان میں ہے نہ ہندوستان میں۔ اس لئے کہ ہم نے ابھی تک حکم نہیں دیا۔“

بشن سنگھ نے اس خدا سے کئی مرتبہ بڑی منّت سماجت سے کہا کہ وہ حکم دے دے تاکہ جھنجھٹ ختم ہو مگر وہ بہت مصروف تھا اس لئے کہ اسے اور بے شمار حکم دینے تھے ۔ایک دن تنگ آ کر وہ اس پر برس پڑا ۔”اوپڑ دی گڑ گڑ دی اینکس دی بے دھیانا دی منگ دی دال آف واہے گورو جی دا خالصہ اینڈ واہے گورو جی کی فتح جو بولے سو نہال ، ست سری اکال۔“

اس کا شاید یہ مطلب تھا کہ تم مسلمانوں کے خدا ہو سکھوں کے خدا ہوتے تو ضرور میری سنتے ۔

تبادلے سے کچھ دن پہلے ٹوبہ ٹیک سنگھ کا ایک مسلمان جو اس کا دوست تھا ملاقات کے لئے آیا۔ پہلے وہ کبھی نہیں آیا تھا۔جب بشن سنگھ نے اسے دیکھا تو ایک طرف ہٹ گیا اور واپس جانے لگا ۔مگر سپاہیوں نے اسے روکا ۔ ”یہ تم سے ملنے آیا ہے تمہارا دوست فضل دین ہے۔“

بشن سنگھ نے فضل دین کو ایک نظر دیکھا اور کچھ بڑبڑانے لگا ۔فضل دین نے آگے بڑھ کر اس کے کندھے پر ہاتھ رکھا ۔”میں بہت دنوں سے سوچ رہا تھا کہ تم سے ملوں لیکن فرصت ہی نہ ملی تمہارے سب آدمی خیریت سے ہندوستان چلے گئے تھے مجھ سے جتنی مدد ہو سکی ، میں نے کی ۔تمہاری بیٹی روپ کور . . . . “

وہ کچھ کہتے کہتے رک گیا ۔بشن سنگھ کچھ یاد کرنے لگا ۔ ”بیٹی روپ کور۔“

فضل دین نے رک رک کر کہا ۔”ہاں…. وہ…. وہ بھی ٹھیک ٹھاک ہے— ان کے ساتھ ہی چلی گئی تھی۔“

بشن سنگھ خاموش رہا ۔فضل دین نے کہنا شروع کیا ۔”انہوں نے مجھ سے کہا تھا کہ تمہاری خیر خیریت پوچھتا رہوں۔ اب میں نے سنا ہے کہ تم ہندوستان جا رہے ہو۔ بھائی بلیر سنگھ اور بھائی ودھاوا سنگھ سے میرا سلام کہنا….اور بہن امرت کور سے بھی…. بھائی بلیرسے کہنا ۔فضل دین راضی خوشی ہے…. وہ بھوری بھینسیں جو وہ چھوڑ گئے تھے ۔ان میں سے ایک نے کٹّا دیا ہے۔ دوسری کے کٹّی ہوئی تھی پر وہ چھ دن کی ہو کے مر گئی…. اورمیرے….میرے لائق جو خدمت ہو، کہنا ، میں ہر وقت تیار ہوں…. اور یہ تمہارے لئے تھوڑے سے مرونڈے لایا ہوں ۔“

بشن سنگھ نے مرونڈوں کی پوٹلی لے کر پاس کھڑے سپاہی کے حوالے کر دی اور فضل دین سے پوچھا ۔ ”ٹوبہ ٹیک سنگھ کہاں ہے؟“

فضل دین نے قدرے حیرت سے کہا ۔”کہاں ہے؟ وہیں ہے جہاں تھا۔“

بشن سنگھ نے پھر پوچھا ۔”پاکستان میں یا ہندوستان میں؟“

”ہندوستان میں…. نہیں نہیں پاکستان میں ۔ ”فضل دین بوکھلا سا گیا ۔

بشن سنگھ بڑبڑاتا ہوا چلا گیا ۔”اوپڑ دی گڑ گڑ دی اینکس دی بے دھیانا دی منگ دی دال آف دی پاکستان اینڈ ہندوستان آف دی دور فٹے منہ !“

تبادلے کے تیاریاں مکمّل ہو چکی تھیں۔ اِدھر سے اُدھر اور اُدھر سے اِدھر آنے والے پاگلوں کی فہرستیں پہنچ گئی تھیں اور تبادلے کا دن بھی مقرر ہو چکا تھا ۔

سخت سردیاں تھیں جب لاہور کے پاگل خانے سے ہندو سکھ پاگلوں سے بھری ہوئی لاریاں پولیس کے محافظ دستے کے ساتھ روانہ ہوئیں ۔متعلقہ افسر بھی ہمراہ تھے ۔واہگہ کے بارڈر پر طرفین کے سپرنٹندنٹ ایک دوسرے سے ملے اور ابتدائی کارروائی ختم ہونے کے بعد تبادلہ شروع ہو گیا جو رات بھر جاری رہا ۔

پاگلوں کو لاریوں سے نکالنا اور دوسرے افسروں کے حوالے کرنا بڑا کٹھن کام تھا۔ بعض تو باہر نکلتے ہی نہیں تھے ۔جو نکلنے پر رضا مند ہوتے تھے ۔ان کو سنبھالنا مشکل ہو جاتا تھا۔ کیونکہ اِدھر اُدھر بھاگ اٹھتے تھے ، جو ننگے تھے ان کو کپڑے پہنائے جاتے تو وہ پھاڑ کر اپنے تن سے جدا کر دیتے۔کوئی گالیاں بک رہا ہے ۔کوئی گا رہا ہے ۔آپس میں لڑ جھگڑ رہے ہیں ۔رو رہے ہیں ، بلک رہے ہیں ۔کان پڑی آواز سنائی نہیں دیتی تھی۔ پاگل عورتوں کا شور و غوغا الگ تھا اور سردی اتنی کڑاکے کی تھی کہ دانت سے دانت بج رہے تھے ۔

پاگلوں کی اکثریت اس تبادلے کے حق میں نہیں تھی۔ اس لئے کہ ان کی سمجھ میں نہیں آتا تھا کہ انہیں اپنی جگہ سے اکھاڑ کر کہاں پھینکا جا رہا ہے ۔وہ چند جو کچھ سوچ سمجھ سکتے تھے ”پاکستان زندہ باد“ اور ” پاکستان مردہ باد“ کے نعرے لگا رہے تھے ۔دو تین مرتبہ فساد ہوتے ہوتے بچا ، کیونکہ بعض مسلمانوں اور سکھوں کو یہ نعرے سن کر طیش آ گیا تھا ۔

جب بشن سنگھ کی باری آئی اور واہگہ کے اس پار متعلقہ افسر اس کا نام رجسٹر میں درج کرنے لگا تو اس نے پوچھا ۔”ٹوبہ ٹیک سنگھ کہاں ہے؟ پاکستان میں یا ہندوستان میں ؟ “

متعلقہ افسر ہنسا ۔”پاکستان میں۔“

یہ سن کر بشن سنگھ اچھل کر ایک طرف ہٹا اور دوڑ کر اپنے باقی ماندہ ساتھیوں کے پاس پہنچ گیا۔ پاکستانی
سپاہیوں نے اسے پکڑ لیا اور دوسری طرف لے جانے لگے ، مگر اس نے چلنے سے انکار کر دیا۔ ”ٹوبہ ٹیک سنگھ یہاں ہے“ اور زور زور سے چلّانے لگا ۔”اوپڑ دی گڑ گڑ دی اینکس دی بے دھیانا دی منگ دی دال آف ٹوبہ ٹیک سنگھ اینڈ پاکستان۔“

اسے بہت سمجھایا گیا کہ دیکھو اب ٹوبہ ٹیک سنگھ ہندوستان میں چلا گیا ہے۔اگر نہیں گیا تو اسے فوراً وہاں بھیج دیا جائے گا ۔مگر وہ نہ مانا ۔جب اس کو زبردستی دوسری طرف لے جانے کی کوشش کی گئی تو وہ درمیان میں ایک جگہ اس انداز میں اپنی سوجی ہوئی ٹانگوں پر کھڑا ہوگیا جیسے اب اسے کوئی طاقت وہاں سے نہیں ہلا سکے گی۔

آدمی چونکہ بے ضرر تھا اس لئے اس سے مزید زبردستی نہ کی گئی، اس کو وہیں کھڑا رہنے دیا گیا اور تبادلے کا باقی کام ہوتا رہا ۔

سورج نکلنے سے پہلے ساکت و صامت بشن سنگھ کے حلق سے ایک فلک شگاف چیخ نکلی۔ اِدھر اُدھر سے کئی افسر دوڑے آئے اور دیکھا کہ وہ آدمی جو پندرہ برس تک دن رات اپنی ٹانگوں پر کھڑا رہا ، اوندھے منہ لیٹا ہے ۔ادھر خاردار تاروں کے پیچھے ہندوستان تھا ادھر ویسے ہی تاروں کے پیچھے پاکستان۔درمیان میں زمین کے اس ٹکڑے پر جس کا کوئی نام نہیں تھا ۔ٹوبہ ٹیک سنگھ پڑا تھا ۔

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DhuaaN… By Gulzar

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دھواں

گلزار
ہندی سے اردو ترجمہ: شیراز حسن

بات سلگی تو بہت آہستہ سے تھی، لیکن دیکھتے ہی دیکھتے پورے قصبے میں ‘دھواں’ بھر گیا۔ چودھری کی موت صبح چار بجے ہوئی تھی۔ سات بجے تک چودھرائن نے رو دھو کر ہوش سنبھالے اور سب سے پہلے ملا خیرالدین کو بلایا اور نوکر کو سخت تاکید کی کہ کوئی ذکر نہ کرے۔ نوکر جب ملّا کو آنگن میں چھوڑ کر چلا گیا تو چودھرائن ملّا کو اوپر خواب گاہ میں لے گئی، جہاں چودھری کی لاش بستر سے اتار کر زمین پر بچھا دی گئی تھی۔ دو سفید چادروں کے درمیان لیٹا ایک زردی مائل سفید چہرہ، سفید بھونویں، داڑھی اور لمبے لمبے سفید بال۔ چودھری کا چہرہ بڑا نورانی لگ رہا تھا۔

ملاّ نے دیکھتے ہی ‘اِنا لِلہِ وِنا ِلیہِ راجِعون’ پڑھا، کچھ رسمی سے جملے کہے۔ ابھی ٹھیک سے بیٹھا بھی نہ تھا کہ چودھرائن الماری سے ثبوت نکال لائی، ملاّ کو دکھایا اور پڑھایا بھی۔ چودھری کی آخری خواہش تھی کہ انہیں دفن کے بجائے چتا پر رکھ کے جلایا جائے اور ان کی راکھ کو گائوں کی ندی میں بہا دیا جائے، جو ان کی زمین سینچتی ہے۔

ملاّ پڑھ کے خاموش رہا۔ چودھری نے دین مذہب کے لئے بڑے کام کئے تھے گائوں میں۔ ہندو، مسلمان کو ایک سا عطیہ دیتے تھے۔ گائوں میں کچی مسجد پکی کرا دی تھی۔ اور تو اور ہندوں کے شمشان کی عمارت بھی پکی کروائی تھی۔ اب کئی سالوں سے بیمار پڑے تھے، لیکن اس بیماری کے دوران بھی ہر رمضان میں غریب غرباء کی افگری (افطاری) کا انتظام مسجد میں انہی کی طرف سے ہوا کرتا تھا۔ علاقے کے مسلمان بڑے مداح تھے ان کے، بڑا عقیدہ تھا ان پر اور اب وصیت پڑھ کے بڑی حیرت ہوئی ملّا کو کہیں جھمیلا نہ کھڑا ہوجائے۔ آج کل ویسے ہی ملک کی فضا خراب ہو رہی تھی، ہندو کچھ زیادہ ہی ہندو ہو گئے تھے، مسلمان  کچھ زیادہ مسلمان۔

چودھرائن نے کہا، ‘میں کوئی پاٹھ پوجا نہیں کرنا چاہتی۔ بس اتنا چاہتی ہوں کہ شمشان میں انہیں جلانے کا انتظام کر دیجئے۔ میں رام چندر پنڈت کو بھی بتا سکتی تھی، لیکن اس لئے نہیں بلایا کہ بات کہیں بگڑ نہ جائے۔ ‘

بات بتانے ہی سے بگڑ گئی جب ملّا خیرالدین نے مصلحتاً پنڈت رام چندر کو بلا کر سمجھایا کہ
‘تم چودھری کو اپنے شمشان میں جلانے کی اجازت نہ دینا ورنہ ہو سکتا ہے، علاقے کے مسلمان واویلا کھڑا کر دیں۔آخر چودھری عام آدمی تو تھا نہیں، بہت سے لوگ بہت طرح سے ان سے جڑے ہوئے ہیں۔’
پنڈت رام چندر نے بھی یقین دلایا کہ وہ کسی طرح کی شر انگیزی اپنے علاقے میں نہیں چاہتے۔ اس سے پہلے بات پھیلے، وہ بھی اپنی طرف کے مخصوص لوگوں کو سمجھا دیں گے۔

بات جو سلگ گئی تھی دھیرے دھیرے آگ پکڑنے لگی۔ سوال چودھری اور چودھرائن کا نہیں ہے، سوال عقیدوں کا ہے۔ ساری قوم ہے، ساری کمیونٹی اور مذہب کا ہے۔ چودھرائن کی ہمت کیسے ہوئی کہ وہ اپنے شوہر کو دفن کرنے کی بجائے جلانے پر تیار ہو گئی۔ وہ کیا اسلام کے آئین نہیں جانتی؟ ‘

کچھ لوگوں نے چودھرائن سے ملنے کی بھی ضد کی۔ چودھراین نے بڑے تحمل سے کہا،
‘بھائیوں! ایسی ان کی آخری خواہش تھی۔ مٹی ہی تو ہے، اب جلا دو یا دفن کر دو، جلانے سے ان کی روح کو تسین ملے تو آپ کو اعتراض ہو سکتا ہے؟ ‘
ایک صاحب کچھ زیادہ طیش میں آ گئے۔
بولے، ‘انہیں جلا کر کیا آپ کو تسکین ہوگی؟’
‘جی ہاں۔’ چودھرائن کا جواب بہت مختصر تھا۔
‘ان کی آخری خواہش پوری کرنے سے ہی مجھے تسکین ہوگی۔’

دن چڑھتے چڑھتے چودھرائن کی بے چینی بڑھنے لگی۔ جس بات کو وہ صلح صفائی سے نمٹنا چاہتی تھی وہ طول پکڑنے لگی۔ چودھری صاحب کی اس خواہش کے پیچھے کوئی پیچیدہ پلاٹ، کہانی یا راز کی بات نہیں تھی۔ نہ ہی کوئی ایسا فلسفہ تھا جو کسی دین مذہب یا عقیدے سے جڑتا ہو۔ ایک سیدھی سادھی انسانی خواہش تھی کہ مرنے کے بعد میرا کوئی نام و نشان نہ رہے۔
‘جب ہوں تو ہوں، جب نہیں ہوں تو کہیں نہیں ہوں۔’

برسوں پہلے یہ بات بیوی سے ہوئی تھی، پر جیتے جی کہاں کوئی ایسی تفصیل میں جھانک کر دیکھتا ہے۔ اور یہ بات اس خواہش کو پورا کرنا چودھرائن کی محبت اور اعتماد کا ثبوت تھا۔ یہ کیا کہ آدمی آنکھ سے اوجھل ہوا اور آپ تمام عہد و پیمان بھول گئے۔

چودھرائن نے ایک بار بیرو کو بھیج کر رام چندر پنڈت کو بلانے کی کوشش بھی کی تھی لیکن پنڈت ملا ہی نہیں۔ اس کے چوکیدار نے کہا –
‘دیکھو بھئی، ہم جلانے سے پہلے منتر پڑھے چودھری کو تلک ضرور لگائیں گے۔’
“ارے بھئی جو مر چکا اس کا مذہب اب کیسے بدلے گا؟ ‘
‘تم زیادہ بحث تو کرو نہیں۔ یہ نہیں ہو سکتا کہ گیتا کے شلوک پڑھے بغیر ہم کسی کو آگ کا منہ دکھا دیں۔ ایسا نہ کریں تو روح ہم سب کو ستائے گی، تمہیں بھی، ہمیں بھی۔ چودھری صاحب کے ہم پر بہت احسان ہیں۔ ہم ان کی روح کے ساتھ ایسا نہیں کر سکتے۔’
بیرو واپس گیا۔
بیرو جب پنڈت کے گھر سے نکل رہا تھا تو پنّا نے دیکھ لیا۔ پنّا نے جا کر مسجد میں خبر کر دی۔

آگ جو گُھٹ گُھٹ کر ٹھنڈی ہونے لگی تھی، پھر سے بھڑک اٹھی۔ چار پانچ معتبر مسلمانوں نے تو اپنا قطعی فیصلہ بھی سنا دیا۔ ان پر چودھری کے بہت احسان تھے وہ ان کی روح کو بھٹکنے نہیں دیں گے۔ مسجد کے پچھواڑے والے قبرستان میں، قبر کھودنے کا حکم بھی دے دیا۔

شام ہوتے ہوتے کچھ لوگ پھر حویلی پر آ دھمکے۔ انہوں نے فیصلہ کر لیا تھا کہ چودھرائن کو ڈرا دھمکا کر، چودھری کا ثبوت اس سے حاصل کر لیا جائے اور جلا دیا جائے پھر عہد نامہ ہی نہیں رہے گا تو بڑھیا کیا کر لے گی۔

چودھران نے شاید یہ بات سونگھ لی تھی۔ عہد نامہ تو اس نے کہیں چھپا دیا تھا اور جب لوگوں نے ڈرانے دھمکانے کی کوشش کی تو اس نے کہہ دیا،
‘ملا خیرالدین سے پوچھ لو، اس نے وصیت دیکھی ہے اور پوری پڑھی ہے۔’
‘اور اگر وہ انکار کر دے تو؟’
‘قرآن شریف پر ہاتھ رکھ کے انکار کر دے تو دکھا دیں گے، ورنہ۔۔ ‘
‘ورنہ کیا؟’
‘ورنہ کچہری میں دیکھنا’

بات کچہری تک جا سکتی ہے، یہ بھی واضح ہو گیا۔ ہو سکتا ہے چودھرائن شہر سے اپنے وکیل کو اور پولیس کو بلا لے۔ پولیس کو بلا کر ان کی حاضری میں اپنے ارادے پر عمل کر لے۔ اور کیا پتہ وہ اب تک انہیں بلا بھی چکیں ہوں۔ ورنہ شوہر کی لاش برف کی سلوں پر رکھ کر کوئی کیسے اتنی خود اعتمادی سے بات کر سکتا ہے۔

رات کے وقت خبریں افواہوں کی رفتار سے اڑتی ہیں۔ گلزار
کسی نے کہا، ‘ایک گھوڑا سوار ابھی ابھی شہر کی طرف جاتے ہوئے دیکھا گیا ہے۔ گھڑسوار نے سر اور منہ صافے سے ڈھانپ رکھا تھا، اور وہ چودھری کی حویلی سے ہی آ رہا تھا۔ ‘
ایک نے تو اسے چودھری کے اصطبل سے نکلتے ہوئے بھی دیکھا تھا۔
خادو کا کہنا تھا کہ اس نے حویلی کے پچھلے احاطے میں صرف لکڑیاں کاٹنے کی آواز ہی نہیں سنی، بلکہ درخت گرتے ہوئے بھی دیکھا ہے۔
چودھرائن یقیناً پچھلے احاطے میں، چتا لگوانے کا انتظام کر رہی ہیں۔کلّو کا خون کھول اٹھا۔
‘بزدلو، آج رات ایک مسلمان کو چتا پر جلایا جائے گا اور تم سب یہاں بیٹھے آگ کی لپٹیں دیکھو گے۔’
کلّو اپنے اڈے سے باہر نکلا۔ خون خرابہ اس کا پیشہ ہے تو کیا ہوا؟ ایمان بھی تو کوئی چیز ہے۔
‘ایمان سے عزیز تو ماں بھی نہیں ہوتی یارو۔’

چار پانچ ساتھیوں کو لے کر کلّو پچھلی دیوار سے حویلی پر چڑھ گیا۔ بڑھیا اکیلی بیٹھی تھی، لاش کے پاس۔ چونکنے سے پہلے ہی کلّو کی کلہاڑی سر سے گزر گئی۔
چودھری کی لاش کو اٹھوایا اور مسجد کے پچھواڑے لے گئے، جہاں اس کی قبر تیار تھی۔ جاتے جاتے رمجے نے پوچھا،
‘صبح چودھرائن کی لاش ملے گی تو کیا ہوگا؟’
‘بڑھیا مر گئی کیا؟’
‘سر تو پھٹ گیا تھا، صبح تک کیا بچے گی؟’
کلّو رکا اور دیکھا چودھرائن کی خوابگاہ کی طرف۔ پنّا کلّو کے ‘جگرے’ کی بات سمجھ گیا۔
“تو چل استاد، تیرا جگرا کیا سوچ رہا ہے میں جانتا ہوں. سب انتظام ہو جائے گا۔’

کلّو نکل گیا، قبرستان کی طرف۔
رات جب چودھری کی خواب گاہ سے آسمان چھوتی لپٹیں نکل رہی تھی تو سارا شہر دھوئیں سے بھرا ہوا تھا۔
زندہ جلا دیے گئے تھے،
اور مردے دفن ہو چکے تھے۔

***

धुआँ 

गुलजार

बात सुलगी तो बहुत धीरे से थी, लेकिन देखते ही देखते पूरे कस्बे में ‘धुआँ’ भर गया। चौधरी की मौत सुबह चार बजे हुई थी। सात बजे तक चौधराइन ने रो-धो कर होश सम्भाले और सबसे पहले मुल्ला खैरूद्दीन को बुलाया और नौकर को सख़्त ताकीद की कि कोई ज़िक्र न करे। नौकर जब मुल्ला को आँगन में छोड़ कर चला गया तो चौधराइन मुल्ला को ऊपर ख़्वाबगाह में ले गई, जहाँ चौधरी की लाश बिस्तर से उतार कर ज़मीन पर बिछा दी गई थी। दो सफेद चादरों के बीच लेटा एक ज़रदी माइल सफ़ेद चेहरा, सफेद भौंवें, दाढ़ी और लम्बे सफेद बाल। चौधरी का चेहरा बड़ा नूरानी लग रहा था।

मुल्ला ने देखते ही ‘एन्नल्लाहे व इना अलेहे राजेउन’ पढ़ा, कुछ रसमी से जुमले कहे। अभी ठीक से बैठा भी ना था कि चौधराइन अलमारी से वसीयतनामा निकाल लाई, मुल्ला को दिखाया और पढ़ाया भी। चौधरी की आख़िरी खुवाहिश थी कि उन्हें दफ़न के बजाय चिता पर रख के जलाया जाए और उनकी राख को गाँव की नदी में बहा दिया जाए, जो उनकी ज़मीन सींचती है।

मुल्ला पढ़ के चुप रहा। चौधरी ने दीन मज़हब के लिए बड़े काम किए थे गाँव में। हिन्दु-मुसलमान को एकसा दान देते थे। गाँव में कच्ची मस्जिद पक्की करवा दी थी। और तो और हिन्दुओं के शमशान की इमारत भी पक्की करवाई थी। अब कई वर्षों से बीमार पड़े थे, लेकिन इस बीमारी के दौरान भी हर रमज़ान में गरीब गुरबा की अफ़गरी (अफ़तारी) का इन्तज़ाम मस्जिद में उन्हीं की तरफ़ से हुआ करता था। इलाके के मुसलमान बड़े भक्त थे उनके, बड़ा अकीदा था उन पर और अब वसीयत पढ़ के बड़ी हैरत हुई मुल्ला को कहीं झमेला ना खड़ा हो जाए। आज कल वैसे ही मुल्क की फिज़ा खराब हो रही थी, हिन्दू कुछ ज़्यादा ही हिन्दू हो गए थे, मुसलमान कुछ ज़्यादा मुसलमान!!

चौधराइन ने कहा, ‘मैं कोई पाठ पूजा नहीं करवाना चाहती। बस इतना चाहती हूँ कि शमशान में उन्हें जलाने का इन्तज़ाम कर दीजिए। मैं रामचन्द्र पंडित को भी बता सकती थी,लेकिन इस लिए नहीं बुलाया कि बात कहीं बिगड़ न जाए।’

बात बताने ही से बिगड़ गई जब मुल्ला खैरूद्दीन ने मसलेहतन पंडित रामचंन्द्र को बुला कर समझाया कि —
‘तुम चौधरी को अपने शमशान में जलाने की इज़ाज़त ना देना वरना हो सकता है, इलाके के मुसलमान बावेला खड़ा कर दें। आखिर चौधरी आम आदमी तो था नहीं, बहुत से लोग बहुत तरह से उन से जुड़े हुए हैं।’
पंडित रामचंद्र ने भी यकीन दिलाया कि वह किसी तरह की शर अंगेज़ी अपने इलाके में नहीं चाहते। इस से पहले बात फैले, वह भी अपनी तरफ़ के मखसूस लोगों को समझा देंगे।

बात जो सुलग गई थी धीरे-धीरे आग पकड़ने लगी। सवाल चौधरी और चौधराइन का नहीं हैं, सवाल अकीदों का है। सारी कौम, सारी कम्युनिटि और मज़हब का है। चौधराइन की हिम्मत कैसे हुई कि वह अपने शौहर को दफ़न करने की बजाय जलाने पर तैयार हो गई। वह क्या इसलाम के आईन नहीं जानती?’

कुछ लोगों ने चौधराइन से मिलने की भी ज़िद की। चौधराइन ने बड़े धीरज से कहा,
‘भाइयों! ऐसी उनकी आख़री ख्व़ाहिश थी। मिट्टी ही तो है, अब जला दो या दफन कर दो, जलाने से उनकी रूह को तसकीन मिले तो आपको एतराज़ हो सकता है?’
एक साहब कुछ ज़्यादा तैश में आ गए।
बोले, ‘उन्हें जलाकर क्या आप को तसकीन होगी?’
‘जी हाँ।’ चौधराइन का जवाब बहुत मुख्तसर था।
‘उनकी आख़री ख़्वाहिश पूरी करने से ही मुझे तसकीन होगी।’

दिन चढ़ते-चढ़ते चौधराइन की बेचैनी बढ़ने लगी। जिस बात को वह सुलह सफाई से निपटना चाहती थी वह तूल पकड़ने लगी। चौधरी साहब की इस ख़्वाहिश के पीछे कोई पेचीदा प्लाट, कहानी या राज़ की बात नहीं थी। ना ही कोई ऐसा फलसफ़ा था जो किसी दीन मज़हब या अकीदे से ज़ुड़ता हो। एक सीधी-सादी इन्सानी ख्व़ाहिश थी कि मरने के बाद मेरा कोई नाम व निशान ना रहे।
‘जब हूँ तो हूँ, जब नहीं हूँ तो कहीं नहीं हूँ।’

बरसों पहले यह बात बीवी से हुई थी, पर जीते जी कहाँ कोई ऐसी तफ़सील में झाँक कर देखता है। और यह बात उस ख़्वाहिश को पूरा करना चौधराइन की मुहब्बत और भरोसे का सुबूत था। यह क्या कि आदमी आँख से ओझल हुआ और आप तमाम ओहदो पैमान भूल गए।

चौधराइन ने एक बार बीरू को भेजकर रामचंद्र पंडित को बुलाने की कोशिश भी की थी लेकिन पंडित मिला ही नहीं। उसके चौकीदार ने कहा —
‘देखो भई, हम जलाने से पहले मंत्र पढ़के चौधरी को तिलक जरूर लगाएँगे।’
‘अरे भई जो मर चुका उसका धर्म अब कैसे बदलेगा?’
‘तुम ज़्यादा बहस तो करो नहीं। यह हो नहीं सकता कि गीता के श्लोक पढ़े बगैर हम किसी को मुख अग्नि दें। ऐसा ना करें तो आत्मा हम सब को सताएगी, तुम्हें भी, हमें भी। चौधरी साहब के हम पर बहुत एहसान हैं। हम उनकी आत्मा के साथ ऐसा नहीं कर सकते।’
बीरू लौट गया।
बीरू जब पंडित के घर से निकल रहा था तो पन्ना ने देख लिया। पन्ना ने जाकर मस्जिद में ख़बर कर दी।

आग जो घुट-घुट कर ठंडी होने लगी थी, फिर से भड़क उठी। चार-पाँच मुअतबिर मुसलमानों ने तो अपना कतई फैसला भी सुना दिया। उन पर चौधरी के बहुत एहसान थे वह उनकी रूह को भटकने नहीं देंगे। मस्जिद के पिछवाड़े वाले कब्रिस्तान में, कब्र खोदने का हुक्म भी दे दिया।

शाम होते-होते कुछ लोग फिर हवेली पर आ धमके। उन्होंने फ़ैसला कर लिया था कि चौधराइन को डरा धमका कर, चौधरी का वसीयतनामा उससे हासिल कर लिया जाए और जला दिया जाए फिर वसीयतनामा ही नहीं रहेगा तो बुढ़िया क्या कर लेगी।

चौधराइन ने शायद यह बात सूंघ ली थी। वसीयतनामा तो उसने कहीं छुपा दिया था और जब लोगों ने डराने धमकाने की कोशिश की तो उसने कह दिया,
‘मुल्ला खैरूद्दीन से पूछ लो, उसने वसीयत देखी है और पूरी पढ़ी है।’
‘और अगर वह इन्कार कर दे तो?’
‘कुरआन शरीफ़ पर हाथ रख के इन्कार कर दे तो दिखा दूँगी, वरना…’
‘वरना क्या?’
‘वरना कचहरी में देखना।’

बात कचहरी तक जा सकती है, यह भी वाज़े हो गया। हो सकता है चौधराइन शहर से अपने वकील को और पुलिस को बुला ले। पुलिस को बुला कर उनकी हाज़री में अपने इरादे पर अमल कर ले। और क्या पता वह अब तक उन्हें बुला भी चुकीं हों। वरना शौहर की लाश बर्फ़ की सिलों पर रखकर कोई कैसे इतनी खुद एतमादी से बात कर सकता है।

रात के वक्त ख़बरे अफ़वाहों की रफ्तार से उड़ती है।
किसी ने कहा, ‘एक घोडा सवार अभी-अभी शहर की तरफ़ जाते हुए देखा गया है। घुड़सवार ने सर और मुँह साफे से ढांप रखा था, और वह चौधरी की हवेली से ही आ रहा था।’
एक ने तो उसे चौधरी के अस्तबल से निकलते हुए भी देखा था।
ख़ादू का कहना था कि उसने हवेली के पिछले अहाते में सिर्फ़ लकड़ियाँ काटने की आवाज़ ही नहीं सुनी, बल्कि पेड़ गिरते हुए भी देखा है।
चौधराइन यकीनन पिछले अहाते में, चिता लगवाने का इन्तज़ाम कर रही हैं। कल्लू का खून खौल उठा।
‘बुजदिलों – आज रात एक मुसलमान को चिता पर जलाया जाएगा और तुम सब यहाँ बैठे आग की लपटें देखोगे।’
कल्लू अपने अड्डे से बाहर निकला। खून खराबा उसका पेशा है तो क्या हुआ? ईमान भी तो कोई चीज़ है।
‘ईमान से अज़ीज तो माँ भी नहीं होती यारों।’

चार पाँच साथियों को लेकर कल्लू पिछली दीवार से हवेली पर चढ़ गया। बुढ़िया अकेली बैठी थी, लाश के पास। चौंकने से पहले ही कल्लू की कुल्हाड़ी सर से गुज़र गई।
चौधरी की लाश को उठवाया और मस्जिद के पिछवाड़े ले गए, जहाँ उसकी कब्र तैयार थी। जाते-जाते रमजे ने पूछा,
‘सुबह चौधराइन की लाश मिलेगी तो क्या होगा?’
‘बुढ़िया मर गई क्या?’
‘सर तो फट गया था, सुबह तक क्या बचेगी?’
कल्लू रुका और देखा चौधराइन की ख़्वाबगाह की तरफ़। पन्ना कल्लू के ‘जिगरे’ की बात समझ गया।
‘तू चल उस्ताद, तेरा जिगरा क्या सोच रहा है मैं जानता हूँ। सब इन्तज़ाम हो जाएगा।’

कल्लू निकल गया, कब्रिस्तान की तरफ़।
रात जब चौधरी की ख्व़ाबगाह से आसमान छुती लपटें निकल रही थी तो सारा कस्बा धुएँ से भरा हुआ था।
ज़िन्दा जला दिए गए थे,
और मुर्दे दफ़न हो चुके थे।

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Aurat… By Vikesh Nijhawan

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عورت
افسانہ نگار: وکیش نجھاون

ترجمہ: شیراز حسن 

گرجا آج پھر اس عورت کو لے کر آیا تھا۔ وہی دبلی پتلی، موٹی موٹی آنکھیں، تیکھی ناک اور سانولے رنگ والی عورت۔

گزشتہ تین ماہ میں یہ عورت ساتویں بار آ چکی ہے۔ سمترا نے دیکھا تو پل بھر کے لئے سہم سی گئی۔ کالے سوٹ میں یہ عورت اسے کسی چڑیل سے کم نہیں لگ رہی تھی۔ لیکن یہ سفید بھی پہن لے ہے تو چڑیل ہی۔ کس طرح سے اس کے گھر کو کھائے چلی جا رہی ہے، سمترا نے دل ہی دل میں سوچا۔

اے! یہ بٹر بٹر کیا دیکھے جا رہی ہے؟ اندر جا اور جلدی سے دو پیالی چائے بنا کر لا۔ گرجا چلایا تو سمترا نے جھٹ سے اپنے کو سنبھالا۔ وہ تیزی سے باورچی خانے کی طرف مڑی تھی۔

باورچی خانے میں آتے ہی سمترا کے اندر کا بند آنکھوں کے راستے پھوٹ پڑا۔ ایک بار تو وہ پھپھک پڑی تھی۔ لیکن اگلے ہی لمحے اس نے دوپٹے کو دانتوں کے درمیان ٹھوس لیا۔ کہیں رونے کی آواز گرجا تک پہنچ گئی تو اس کی خیر نہیں۔

پہلی بار جب سمترا کے رونے کی آواز گرجا کے کانوں تک پہنچی تھی تو وہ دھاڑتا ہوا اندر آیا تھا – اے یہ گٹرگوں کیا لگا رکھی ہے؟ بند کر یہ مگرمچھ کے آنسو۔ سمترا کی زیادہ پرواہ کئے بِنا گرجا اس عورت کو لے کر اپنے کمرے میں بند ہو گیا تھا۔

یہ سب کیا ہے، سمترا سمجھ نہیں پا رہی تھی۔ اس کا جسم ٹھنڈا پڑ گہا تھا۔ زبان تو جیسے کسی نے کاٹ ہی ڈالی ہو۔

ایک ہی کمرہ ہے گرجا کے پاس اور اس میں بھی وہ پرائی عورت کو لے کر بند ہو گیا۔ ایسا تو سمترا نے نہ کبھی دیکھا نہ سنا تھا۔ اپنا یہ دکھ وہ کہے بھی کس سے۔ لوگوں کے لئے تو تماشا بن کر رہ جائے گا۔ اماں سے ؟ نہ ، نہ ! رو رو کر جان گنوا دے گی۔

پورے تین گھنٹے وہ عورت اندر رہی تھی۔ اور ان تین گھنٹے میں سمترا باورچی خانے کی دیوار سے چھپکلی کی طرح چپکی رہی تھی۔ اس عورت کے جاتے ہی گرجا باورچی خانے میں گھسا تھا۔ کچھ دال روٹی بنائی کہ نہیں؟

سمترا اسی حالت میں بیٹھی رہی تو گرجا اس ٹھوڑھی کو اوپر اٹھاتے ہوئے بولا تھا – اے! تھوبڑا کیوں سوج گیا تیرا؟ جل بھن گئی کیا اس عورت کو دیکھ کر؟ اری اپن نے تیرے کو تو اس گھر سے نہیں نکالا۔ رام قسم جو کبھی تیرے کو اپنا نہ سمجھا ہو۔ یہ تو ٹیمپریری تھی۔ مل گئی سو لے آیا۔ تو کاہے جی کو جلاتی ہے۔ چل اٹھ اور روٹی بنا۔

آنکھوں کو دوپٹے سے پوچھتی ہوئی سمترا اٹھی تھی۔ گرجا کی صاف سی باتوں سے وہ نرم بھی پڑگئی۔ خود کو گرجا کی چھاتی سے سٹاتی بولی تھی ، مجھے تو نہیں چھوڑ دے گا تو؟

کیسی بات کرتی ہے تو! میرے پر یقین نہیں تیرے کو؟ گرجا دیر تک سمترا کے بالوں کو سہلاتا رہا۔ سمترا کے اندر کا اوش دھیرے دھیرے ڈھلتا چلا گیا تھا۔ پیار بھری نظروں سے وہ گرجا کی طرف دیکھتے ہوئے بولی تھی ، گرجا تو اگر مجھے سچ میں چاہتا ہے تو کہہ کہ آگے سے اس عورت کو نہیں لائے گا۔

اچھا بابا نہیں لائونگا۔

سچ میں اس عورت کو نہیں لائے گا نہ؟

صرف اس عورت کو ہی نہیں کسی کو بھی نہیں لائونگا۔

اور تو بھی کسی کے پاس نہیں جائے گا؟

نہیں جاوںگا بابا! اور کچھ؟

ساتویں دن جب گرجا اسی عورت کو لے کر گھر میں گھسا تو سمترا کے پائوں تلے سے زمین ہی کھسک گئی۔گرجا نے اندر آتے ہی حکم دیا تھا ۔ اے! باہر چل کر بیٹھ۔ دیکھنا کوئی اندر نہ آئے۔ کوئی میرا پوچھے تو بولنا گھر پر نہیں ہے۔

دوپٹے میں آدھا منہ چھپائے وہ عورت گرجا کے پیچھے پیچھے اندر چلی آئی تھی۔

چھوٹی چھوٹی بندیوں والا نیلے رنگ کا سوٹ اور اس پر نیلے ہی رنگ کا دوپٹہ۔ پہلے تو سمترا کو لگا جیسے یہ کوئی دوسری عورت ہے۔ لیکن جب اس نے اپنے آدھے چہرے سے دوپٹہ ہٹایا تو سمترا کی نظر براہ راست اس کے موٹے تل پر جا پڑی تھی۔ سمترا سمجھ گئی تھی کہ اب یہ عورت اس کا گھر برباد کر کے ہی چھوڑے گی۔

سمترا کا خیال ٹھیک ہی نکلا تھا۔ اب تو ہفتہ میں ایک بار نہیں دو دو بار آنے لگی تھی وہ۔ پچھلی بار تو سمترا نے اپنی آنکھوں سے گرجا کو اسے نوٹ پکڑاتے دیکھا تھا۔ تب تو سمترا خود کو روک ہی نہیں پائی تھی۔ اس عورت کے جاتے ہی پھٹ پڑی تھی۔ یہ سب کیا ہو رہا ہے گرجا؟

کچھ بھی تو نہیں! بڑے اطمینان کے ساتھ گرجا بولا تھا۔

تو نے میرے ساتھ وعدہ کیا تھا کہ۔۔

تیرا کچھ لے گئی کیا؟ گرجا اس کی بات کاٹتے ہوئے بولا تھا۔

ابھی تک تو نہیں لے گئی۔ لیکن ایک دن تو لے جائے گی۔

تو اس دن کا انتظار کر۔

نہیں گرجا میں۔۔

اے شیرنی کی بچی! دہاڈنے کی ضرورت نہیں ہے۔

گرجا نے تپاک سے ایک تھپڑ سمترا کے گال پر رسید کر دیا تھا۔ اگر مزید بک بک کی نہ یہاں سے چلتی کروں گا تیرے کو، سمجھی؟ چپ رہی تو ساری زندگی ٹکائے رکھوں گا۔

سمترا زار زار رو دی تھی۔ اجڑ گئی وہ تو۔ من تو ہوا تھا اس کا کہ چھاتی پیٹ لے۔ لیکن بات اماں تک پہنچ گئی تو یوں ہی جان دے دے گی۔ بہت دکھ دیکھے ہیں اس نے زندگی میں۔ اب اور نہیں سہہ پائے گی۔ خون کے گھونٹ پی کر رہ گئی تھی سمترا۔

آج ان دونوں کو دیکھ کر سمترا کو حیرت تو نہیں ہوئی تھی لیکن اندر سے جی تو اتنا ہی جلتا ہے۔ اپنے غصے کو تو اس نے پوری طرح سے قابو کر لیا تھا۔
سمترا تین پیالی چائے بنا لائی۔

یہ تیسری پیالی کس کے لئے؟ گرجا حیرت سے بھر کر بولا۔
میں پیوں گی! سمترا سامنے والی چھوٹی تپائی پر بیٹھتے ہوئے بولی، گرجا کی آنکھوں میں حیرت اور شبہ کے ملے جلے جذبات تیر آئے تھے۔

سمترا نے بڑے آرام سے ان دونوں کے سامنے چائے پی، چائے ختم ہوتے ہی سمترا نے نظر بھر کر اس عورت کی طرف دیکھا اور تیزی سے باہر کو آ گئی۔ باہر آتے ہوئے اس نے اندر والا دروازہ بغیر سنگل لگائے بند کر دیا۔

پہلے تو ایسی حالت میں سمترا ایک ہی جگہ بیٹھی گھنٹوں گزار دیتی تھی۔ لیکن آج تو وہ اپنے کام میں مصروف ہو گئی۔ باورچی خانے میں جا کر ثابت مونگ کی دال چڑھا دی جو گرجا کو بہت پسند ہے۔ صبح کریلوں کو چھیل کر ان پر نمک لگا کر رکھا تھا انہیں سرسوں کے تیل میں چھونک دیا. گرجا باہر آئے تو وہ گرم گرم پُھکلا اتار دے گی۔

سارا کام ختم ہونے کے بعد بھی سمترا کو ڈیوڑھی میں بیٹھ انتظار کرنا پڑا۔کوئی آدھ گھنٹے بعد دروازے قی چٹخنی کھلی۔ دوپٹہ سنبھالتی ہوئی وہ عورت باہر کو نکلی تھی۔

سمترا نے نظر بھر کر اس عورت کی طرف دیکھا تو وہ عورت اچانک چیخ پڑی۔ اے! یوں گھور گھور کر کیا دیکھ رہی ہے مجھے؟

سمترا چپ بنی رہی تو وہ دوبارہ چلائی۔ تو کیسی عورت ہے ری! تیرا مرد گھر پر عورت لاتا ہے اور تو چپ بنی بیٹھی ہے۔ تیری جگہ میں ہوتی نا، نوچ دیتی اسے۔

سمترا اب بھی چپ بنی رہی تو وہ اسی رَو میں بولی۔ میں تو آئوں گی۔ پیٹ نہیں بھرنا مجھے کیا۔ تجھے روکنا ہے تو اپنے مرد کو روک۔ کل کو میں نہیں آئوں گی تو کوئی دوسری لے آئے گا۔

وہ عورت ہاپنے لگی تھی۔ سمترا کو اب بھی چپ دیکھ اس نے پچ سے نالی میں تھوکا اور تیزی سے باہر کو نکل گئی۔

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औरत

विकेश निझावन

गिरजा आज फिर उस औरत को साथ लाया था.वही दुबली पतली मोटी-मोटी आंखें तीखी नाक और सांवले रंग वाली औरत.

पिछले तीन माह में यह औरत सातवीं बार आ चुकी है.सुमित्रा ने देखा तो पल भर के लिए सहम सी गई.काले सूट में यह औरत उसे किसी चुडैल से कम नहीं लग रही थी.लेकिन यह सफेद भी पहन ले है तो चुडैल ही.किस तरह से उसके घर को खाए चली जा रही है सुमित्रा ने मन ही मन सोचा.

ऐऽ! ये बिटर-बिटर क्या देखे जा रही है? भीतर जा और जल्दी से दो प्याली चाय बना कर ला.गिरजा चिल्लाया तो सुमित्रा ने झट से अपने को संभाला.वह तेजी से रसोई की ओर मुडी थी.

रसोई में आते ही सुमित्रा के भीतर का बांध आंखों के रास्ते फूट पडा.एक बार तो वह फफक पडी थी.लेकिन अगले ही पल उसने दुपट्टे को दांतों के बीच ठूंस लिया.कहीं रोने की आवाज ग़िरजा तक पहुंच गई तो उसकी खैर नहीं.

पहली बार जब सुमित्रा के रोने की आवाज गिरजा के कानों तक पहुंची थी तो वह दहाडता हुआ भीतर आया था – ऐ ये गुटर-गूं क्या लगा रखी है? बंद कर ये मगरमच्छ के आंसू.सुमित्रा की ज्यादा परवाह किये बिना गिरजा उस औरत को लेकर अपने कमरे में बंद हो गया था.

ये सब क्या है सुमित्रा समझ नहीं पा रही थी.उसका जिस्म ठंडा पड ग़या था.जुबान तो जैसे किसी ने काट ही डाली हो.

एक ही कमरा है गिरजा के पास और उसमें भी वह पराई औरत को लेकर बंद हो गया.ऐसा तो सुमित्रा ने न कभी देखा न सुना था.अपना यह दुख वह कहे भी किससे.लोगों के लिए तो तमाशा बन कर रह जाएगा.अम्मा से? न-न! रो-रो कर जान गंवा देगी.

पूरे तीन घंटे वह औरत भीतर रही थी.और उन तीन घंटे में सुमित्रा रसोई की दीवार से छिपकली की तरह चिपकी रही थी.उस औरत के जाते ही गिरजा रसोई में घुसा था – कुछ दाल-रोटी बनायी कि नहीं?

सुमित्रा उसी मुद्रा में बैठी रही तो गिरजा उसकी ठोढी क़ो ऊपर उठाते हुए बोला था- ऐऽ! थोबडा क्यों सूज गया तेरा? जलभुन गयी क्या उस औरत को देख कर?अरी अपन ने तेरे को तो इस घर से नहीं निकाला.राम कसम जो कभी तेरे को अपना न समझा हो.यह तो टेम्परेरी थी.मिल गयी सो लो आया.तू काहे जी को जलाती है.चल उठ और रोटी बना.

आंखों को दुपट्टे से पोंछती हुई सुमित्रा उठी थी.गिरजा की साफ सी बातों से वह नर्म भी पड अायी.अपने को गिरजा की छाती से सटाती बोली थी- मुझे तो नहीं छोड देगा तू?

-कैसी बात करती है तू! मेरे पर विश्वास नहीं तेरे को? गिरजा देर तक सुमित्रा के बालों को सहलाता रहा.सुमित्रा के भीतर का आकोश धीरे-धीरे धुलता चला गया था.प्यार भरी नजरों से वह गिराजा की ओर देखती बोली थी- गिरजा तू अगर मुझे सच में चाहता है तो कह कि आगे से उस औरत को नहीं लाएगा.

-अच्छा बाबा नहीं लाऊंगा.

-सच में उस औरत को नहीं लाएगा न ?

-सिर्फ उस औरत को ही नहीं किसी को भी नहीं लाऊंगा.

-और तू भी किसी के पास नहीं जाएगा?

-नहीं जाऊंगा बाबा! और कुछ?

सातवें दिन जब गिरजा उसी औरत को लेकर घर में घुसा तो सुमित्रा के पांव तले से जमीन ही खिसक गयी.गिरजा ने भीतर आते ही आदेश दिया था- ऐऽ! बाहर चल कर बैठ.देखना कोई भीतर न आए.कोई मेरा पूछे तो बोलना घर पर नहीं है.

दुपट्टे में आधा मुंह छिपाए वह औरत गिरजा के पीछे-पीछे भीतर चली आई थी.

छोटी-छोटी बिन्दियों वाला नीले रंग का सूट और उस पर नीले ही रंग का दुपट्टा .पहले तो सुमित्रा को लगा जैसे यह कोई दूसरी औरत है.लेकिन जब उसने अपने आधे चेहरे से दुपट्टा हटाया तो सुमित्रा की नजर सीधे उसके मोटे तिल पर जा पडी थी.सुमित्रा समझ गयी थी कि अब यह औरत उसका घर बरबाद करके ही छोडेग़ी.

सुमित्रा का सोचना ठीक ही निकला था.अब तो सप्ताह में एक बार नहीं दो-दो बार आने लगी थी वह.पिछली बार तो सुमित्रा ने अपनी आंखों से गिरजा को उसे नोट पकडाते देखा था.तब तो सुमित्रा खुद को रोक ही नहीं पाई थी.उस औरत के जाते ही फट पडी थी-ये सब क्या हो रहा है गिरजा?

– कुछ भी तो नहीं! बडे सहज भाव से गिरजा बोला था.

-तूने मेरे साथ वादा किया था कि.

-तेरा कुछ ले गई क्या? गिरजा उसकी बात काटते हुए बोला था.

-अभी तक तो नहीं ले गई.लेकिन एक दिन तो ले जाएगी.

-तो उस दिन का इंतजार कर.

-नहीं गिरजा मैं.

-ऐऽ शेरनी की बच्ची! दहाडने की जरूरत नहीं है.

गिरजा ने तपाक से एक झापड सुमित्रा के गाल पर रसीद कर दिया था- अगर ज्यादा बक-बक की न यहां से चलती करूंगा तेरे को.समझी? चुप रही तो सारी जिन्दगी टिकाये रखूंगा.

सुमित्रा जार-जार रो दी थी.उजड ग़ई वह तो.मन तो हुआ था उसका कि छाती पीट ले.लेकिन बात अम्मा तक पहुंच गई तो यों ही प्राण दे देगी.बहुत दुख देखे हैं उसने जिन्दगी में.अब और नहीं सह पाएगी.खून के घूंट पी कर रह गई थी सुमित्रा.

आज इन दोनो को देख कर सुमित्रा को आश्चर्य तो नहीं हुआ था लेकिन भीतर से जी तो उतना ही जलता है.अपने गुस्से को तो उसने पूरी तरह से काबू कर लिया था.
सुमित्रा तीन प्याली चाय बना लायी.

-ये तीसरी प्याली किसके लिये? गिरजा आश्चर्य से भर कर बोला.
-मैं पिऊंगी! सुमित्रा सामने वाली छोटी तिपाई पर बैठती हुई बोली.गिरजा की आंखों में आश्चर्य और सन्देह के मिश्रित भाव तैर आए थे.

सुमित्रा ने बडे आराम से उन दोनो के सामने चाय पी.चाय खतम होते ही सुमित्रा ने नजर भर कर उस औरत की ओर देखा और तेजी से बाहर को आ गई.बाहर आते हुए उसने भीतरवाला दरवाजा बिना सांकल लगाए बंद कर दिया.

पहले तो ऐसी स्थिति में सुमित्रा एक ही जगह बैठी घंटों गुजार देती थी.लेकिन आज तो वह अपने काम में व्यस्त हो गई.रसोई में जाकर साबत मूंग की दाल चढा दी जो गिरजा को बहुत पसन्द है.सुबह करेलों को छील कर उन पर नमक लगा कर रखा था उन्हें सरसों के तेल में छोंक दिया.गिरजा बाहर आए तो वह गरम-गरम फुलका उतार देगी.

सारा काम खतम होने के बाद भी सुमित्रा को डयोढी में बैठ इन्तजार करना पडा.कोई आध घंटे बाद दरवाजे क़ी सिटकनी खुली.दुपट्टा संभालती हुई वह औरत बाहर को निकली थी.

सुमित्रा ने नजर भर कर उस औरत की ओर देखा तो वह औरत एकाएक चीख पडी- एऽ! यूं घूर-घूर कर क्या देख रही है मुझे?

सुमित्रा चुप बनी रही तो वह पुनः चिल्लाई- तू कैसी औरत है री! तेरा मरद घर पर औरत लाता है और तू चुप बनी बैठी है.तेरी जगह मैं होती न नोच देती इसे.

सुमित्रा अब भी चुप बनी रही तो वह उसी रौ में बोली- मैं तो आऊंगी.पेट नहीं भरना मुझे क्या.तुझे रोकना है तो अपने मरद को रोक.कल को मैं नहीं आऊंगी तो कोई दूसरी ले आएगा.

वह औरत हांफने लगी थी.सुमित्रा को अब भी चुप देख उसने पिच्च से नाली में थूका और तेजी से बाहर को निकल गई.

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Kahan Khazana Blog: 2012 in review

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