Lala Jaswant Singh Ki Haveli….by Mirza Hamid Baig

लाला जसवंत सिंह की हवेली

मिर्ज़ा हामिद बेग़

उर्दू से हिंदी: शीराज़ हसन 

वागाह से क्लेअरेंस क बाद जब समझोता एक्सप्रेस लाहौर रेलवे स्टेशन पहुंची तो चर्लोजी और काजू के पैकिट, पान छालिया के थैले, बनारसी और ज़रदोज़ी के बोरी (की बोरियां?) बंद ठेलों पर लादे कुलियों और फेरी बाजों की धकम पील में एक वो भी था.

वो, जो लाहौर में अपने पुर्खों की हवेली देखने आया था, ताकि दिल्ली वापिस जा कर अपनी बूढ़े और बीमार बापू को बता सके कि उसने जो कहानी उनकी ज़ुबानी सुना था, सब वैसा ही है या बदल गया. और चंद एक छोटी-छोटी फ़रमाइशें थीं बापू की, जिन्हें पूरा करना था उसे.

वागाह की क्लेअरेंस के उल्झेड़े1 अज़हद2 थका देने वाले थे और उसे किसी बात की जल्दी न थी.

गाड़ी से उतर कर वो लाहौर रेलवे स्टेशन के दूर फैले आहनी3 शेड के एक मेहराबी सुतून4 के साथ लग कर खड़ा देर तक अपने बापू की हिदायात याद करता रहा.

दिल्ली रेलवे स्टेशन पर जब ट्रेन के डब्बे जोड़े जा रहे थे तो बापू ने ताकीद की थी कि पाकिस्तान पहुँच कर सब से पहले पोलीस स्टेशन में अपनी आमद की रिपोर्ट करना, फ़िर रेलवे स्टेशन से करीब ही किसी साफ़ सुथरे होटल में कमरा लेने के बाद खैरियत का फोने कर देना.

“जी.”

“कुछ देर आराम कर के ही निकलना.”

“जी बापू.”

“लाहौर रेलवे स्टेशन से ज़्यादा दूर नहीं है अपनी हवेली. तुम्हें तांगा, टैक्सी लेने की ज़रुरत नहीं पड़े गी. पैदल है हवेली का रास्ता.”

“जी.”

“अगर अब भी तांगा चलता है ना, तो भाटी लोहारी की आवाज़ लगाएगा कोचवान. जी चाहा तो पकड़ लेना तांगा. लुंडा बाज़ार और सुल्तान सराए वाली सड़क के मत्वाज़ी5 रेलवे रोड निकलती है. उसी रोड पर है इस्लामिया कॉलेज और अरब होटल.  चौक बर्फ़ खाना से गवलमंडी की तरफ वो ही सड़क जाती है. तुम उतर जाना चौक दाल्ग्रान. करीब ही है सराए सुल्तान का पिछला गेट. चौक दाल्ग्रान से गुज़र कर साड़ी लारियाँ सराए सुल्तान ही जा कर रूकती हैं. फ़िर निकल जाती हैं रेलवे स्टेशन, नौलखा और दौ मोरिया पुल की तरफ.”

“जी बापू.”

“कहीं पाथी ग्राऊँड की तरफ न निकल जाना. बाद में बेशक उधर भी चले जाना, लेकिन हवेली से हो कर. उधर  गुज्जर गवाले रहते हैं. मेरे यार बाले का घर वहीं है. चौक दाल्ग्रान से ही पूछ लेना लाला जसवंत सिंह की हवेली. करीब ही तो है. जो कोई भी वहां रहता हो, मिल लेना. प्रणाम, नमस्ते नहीं ….. सलाम करना.”

“उन्हें बताना कि मैं लाला जसवंत सिंह का पोता हूँ. बैठने को कहें तो बेशक थोड़ी देर बैठ जाना, शर्मना नहीं. फ़िर अगर वो इजाज़त दें तो सहन6 में से ज़रूर हो आना. उन दिनों सहन बरामदे की पर्छाती के नीचे लकड़ी का भरी (भारी?) तख़्तपोश धरा रहता था. मैं जब छोटा सा था ना, तो राम गली वाले स्कूल में पढ़ता था और तख्ती उसी तख़्तपोश पर बैठ कर लिखा करता था. . . सहन में बाजू वाले घर की साझी दीवार के ऐन नीचे एक कुआं था. इधर से हम चर्खी की रस्सी से बंधा डोल डालते, उधर से वो कौन पानी से भरा डोल पहले खेंच निकालता है. इस का मुकाबला होता था, चंदु लोगों के साथ. ऊपर, छत पर जाने की ज़रुरत नहीं. बेशक सहन में ही खड़े खड़े छत पर नज़र दाल लेना, छज्जे पर कबूतर हुए तो वहीं से दिखाई दे जायेंगे….. हमने उन्हीं दिनों शीराज़ी7, लक़ा8, और लोटन पाल रखे थे. बाले और चंदु लोगों ने भी हमारे देखा देखि पाल लिए थे कबूतर. इसलिए बराबर वाली छतें भी शायद ख़ाली न हों कबूतरों से. अगर अपनी हवेली के छज्जे पैर बेठे कबूतर दिखाई दे जाएँ ना तो बातों बातों में हवेली वालों से यह ज़रूर पूछ लेना कि कबूतरों को लुगदी9 में क्या देते हैं. जो कुछ बताएँ , काग़ज़ पर लिख लेना. भूलना नहीं.”

“जी अच्छा.”

“हवेली किसी खानदानी आदमी को इलात10 हुई होगी. शायद वो तुम्हें अपने यहाँ ठहरने को कहें.  लेकिन बेटा उन पर बोझ न बनना. होटल में ही रह लेना. पैसे हैं ना, लो और रख लो.”

“बापू पैसे हैं मेरे पास. आप फ़िक्र न करें.”

“बचत करने की ज़रुरत नहीं. ज़रा देख भाल कर बेटा. पासपोर्ट को कमीज़ के नीचे बंडी में ही रखना, एहतियात से.”

“जी बापू.”

“हवेली से निकल कर ऋषि भवन की देख रेख केसी हो रही है, वापसी पर बताना.”

“जी अच्छा.”

जब ट्रेन ने विसल दी थी तब कुलियों की भाग दोड़ मैं इज़ाफ़ा हो गया था और सामान से लदे फदे रेहड़ियों का शोर शराबा बढ़ गया था .

बापू ऊंची आवाज़ में बात न कर सकते थे लेकिन उस समय इतने शोर में उनकी आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी.

“हाँ बेटा, हवेली से हो कर ग्वालमंडी  की तरफ निकलोगे तो राम गली वाले स्कूल के सामने से हो कर गुज़रना. बेशक बाहर ही से नज़र डाल लेना और हाँ, अरब होटल में ज़रूर झाँक लेना. बड़े बड़े अदीब शायर बैठते हैं वहां…. बहुत अहतराम से बेटा.”

“जी बापू.”

उस वक़्त आहिस्ता आहिस्ता रेंगती हुई ट्रेन के साथ बापू जुड़ कर चल रहे थे और शोर बहुत था.

“चौक बरफखाना से नाक की सीध में ग्वालमंडी की तरफ निकलोगे ना तो वहीं पर बहुत बड़ा पुस्तक भंडार है. वापसी पर अगर कुछ पैसे बच गए ना तो मेरे लिए वहीं से कोई पुराना नावल ख़रीद लाना….पिताजी नास्तकसे थे… हमारे हमसाए थे ना बाला लोग… उन के घर से मंगवा कर पढ़ा करते थे हर तरह के नावल… बहुत से नाम थे नावलों के, बस उन्ही में से कोई एक… नाम लिखवा दिए थे तुम्हें…”

“जी बापू, सब कुछ काग़ज़ पर लिख रखा है. आप फ़िक्र न करें.”

“देखो, हो सके तो लाहौर की ठंडी सड़क* पर रीगल सिनेमा हो आना … मैं ने रीगल ही में सहगल और जमुना की “देवदास” देखी थी … ठंडी सड़क पर चेरिंग क्रास … एक तरफ चिड़िया घर और दूसरी जानिब वाईसराये का दफ्तर … उसी चौक में रखा है मलिका विक्टोरिया का बड़ा सा पीतल मुजसिमा … मलिका, वाईसराये के दफ्तर की जानिब मुंह किये बैठी होगी. मैं अक्सर गर्मियों की दोपहरों में निकल जाता था उधर  …. मलिका के क़दमों  में लेट जाता था … सो जाता था वहीं … और घर वाले … बापू वही बातें दोहरा रहे थे जिन्हें वो बचपन से बार बार सुनता चला आया था.

और हाँ बेटा ….”

“जी बापू.”

फ़िर चलती ट्रेन के साथ मुसलसल दोड़े चले आने से उन का सांस फूल गया और वो पीछे रह गए. खिड़की से मुड़ कर देखा तो वो सब से अलग प्लेटफार्म पर उकडूं11 बैठे, झुक कर खांसते हुए साफ़ दिखाई दे रहे थे और पसमंज़र12 में मुसाफिरों को अलविदा कहने वाले बकिया13 लोग खड़े हाथ हिला रहे थे.

उस के बाद ट्रेन ने रफ्तार पकड़ ली और सब कुछ पीछे रह गया.

“तवज्ज फ़रमाइये… कराची से आने वाली अवाम एक्सप्रेस ….”

उसने अपना चर्मी थैला और सूटकेस उठा कर बहिर का रुख़ किया.

लाउड स्पीकर पर कराची से लाहौर आने वाली किसी गाड़ी के लेट हो जाने की अनाउन्समेंट जारी थी. लाहौर रेलवे स्टेशन से बाहिर निकलते हुए उस ने वीज़ा आफ़िस से मिलने वाली पर्ची दिखा कर मालूम कर लिया कि भारत से पाकिस्तान आमद की रिपोर्ट कहाँ करना है.

बाहिर अच्छी खासी रौशनी थी और शाम से पहले पहले यह मामला निबटा देना ज़रूरी था.

वागाह से पहले अट्टारी में उस ने पांच सौ रूपए की करेंसी तब्दील करवा ली थी, जो फोरी14 ज़रुरत के लिए काफ़ी थी. उस ने ऑटो रिक्शा पकड़ने में देर नहीं की और रिपोर्टिंग सेंटर के लिए निकल खड़ा हुआ.

एस. एस. पी., जिला कचहरी में दाख़िल होते वक़्त वो क़द्रे15 घबराया हुआ और थका थका सा था.

उसके कागज़ात हर तरफ से मुकम्मल थे, पासपोर्ट दुरुस्त था. वीज़ा सही लगा था. इस के बावजूद वो एक अनजाना सा खौफ़ था जैसे आसमान सर पर मौजूद न हो.

रिपोर्टिंग आफ़िसर के सामने बिछी हुई बड़ी सी मेज़ के बराबर में अपना सामान रख कर वो एक ख़ाली कुर्सी पर बैठ गया, लेकिन जैसे मुल्ज़िम बैठते हैं.

रिपोर्टिंग आफ़िसर ने  टेलीफोन पर बात करते हुए  लहज़ा के लिए  उसकी जानिब लाताल्लुकी से देखी. फ़िर उस ने फोन बंद कर दिया और कुर्सी से उठने हुए सर्द महरी से बोला:

“जी…. फ़रमाइये.”

“मैं आज ही दिल्ली से लाहौर पहुंचा हूँ.”

“जी…. दिखाइए काग़ज़ात.”

रिपोर्टिंग आफ़िसर ने इतना कहा और बाहिर निकल गया. कमरे का दरवाज़ा  अज्हुद16 बंद हो गया था.

अब वो कमरे में तनहा था और उस के लिए अकेले में एक एक पल गुज़ारना मुश्किल हो रहा था.

कुछ देर बाद कमरे का दरवाज़ा खुला तो रिपोर्टिंग आफ़िसर ने जल्द ही सारा काम निबटा दिया.

“वापिस जाते भी आप को यहीं रिपोर्ट करना होगी. उस वक़्त (तक?) आपके यह  काग़ज़ात हमारे पास रहेंगे.”

“बिलकुल साहिब … में तो बहुत घबराया हुआ था… आपकी कृपा, नमस्कार”

जब वो दोबारा रेलवे स्टेशन की हुदूद में पहुंचा तो शाम गहरी हो चली थी. लाहौर रेलवे स्टेशन के सामने बहुत से छोटे-बड़े होटल थे, जिनके निओन साइन जल-बुझ रहे थे.

वो ऑटो रिक्शा से उतर कर होटलों का जाएज़ा लेने की ख़ातिर पार्क के साथ फुटपाथ पर हो लिया. पार्क में बैठे और लेटे हुए बहुत से लोग उस वक़्त मुट्ठी चप्पी करवा रहे थे और पार्क के गिर्द चकर खाती हुई मोटर कारें और मिनी बसें चहार17 रौशनी की कम्न्दें18 फेंकती हुई गुज़र रही थीं. . .

“भाई साहिब … यहां से चौक दाल्ग्रान कितनी दूर होगा?” उस ने पार्क की रेलिंग का सहारा लिए हुए एक भले मानस से पूछा.

“क़रीब ही तो है जी. उन होटलों के सामने से जो सड़क दाएँ हाथ जा रही है उस पर हो जायें. चंद क़दम ही होगा.”

“जी, अच्छा,” वो आगे बढ़ आया.

बापू सच कहते थे. कुछ भी तो नहीं बदला. स्टेशन से चंद क़दम पर दाल्ग्रान चौक. ऋषि भवन के करीब लाला जसवंत सिंह की हवेली. उसी सड़क पर सारा कुछ और आखिर में पुस्तक भंडार…. सारा पैदल का रास्ता.

रिहायश के लिए उस ने जो होटल चुना, उसी के सामने वाले मनी चेन्जर से उस ने मज़ीद19 करंसी तब्दील करवाली और होटल का रुख़ किया. उस वक़्त पार्क में से मुट्ठी चप्पी करने वाले लड़कों के हाथों में थामी तेल की बोतलों की झंकार साफ़ सुनाई दे रही थी.

दूसरी मंज़िल पर होटल का कमरा ख़ासा कुशादा20 और साफ़ सुथरा था. फोम के गद्दे, खिडकियों पर भारी परदे, ठन्डे गर्म पानी की टूँटियां और  टॉयलेट-बाथ. ऐसा होटल तो जामिया मस्ज़िद के क़ुरब ओ ज्वर21 में एक न होगा, अलबत्ता कनाट प्लेस में ज़रूर होंगे. नहा धो कर हॉल में खाना खाते हुए उस ने सोचा.

होटल के बाहर और लाउंज में चकाचौंध रौशनी के सबब वो अब तक यही समझ रहा था कि ज़्यादा वक़्त नहीं गुज़रा, लेकिन जब उस ने कलाई कि घडी पर निगाह की तो मालूम हुआ के रात के दस बज रहे हैं.

बहुत देर हो गई. बापू तो नौ बजे सो जाते हैं और इस वक़्त भारत में आध घंटे के फर्क के साथ साढ़े दस होंगे. खैरियत का फोन तो किया नहीं. उसने सोचा और तेजी से निकला. पब्लिक कॉल ऑफिस के आपरेटर ने जब घर का नंबर मिला कर दिया तो बापू जाग रहे थे.

“हैलो… हैलो बापू … जी पहुँच गया… आप अभी तक जाग… जी बिलकुल ठीक हूँ… आप प्लेटफ़ार्म पर खांस रहे थे, तबियत तो …  जी रिपोर्ट कर दी … आप ठीक कहते थे , सब वैसे  का वैसा ही है … जी होटल से चंद क़दम के फासले पर … माता जी से बात … जी मुझे याद है चौक दाल्ग्रान से सीधी सड़क निकलेगी … ताज कम्पनी, इस्लामिया कॉलेज और अरब होटल फिर चौक बरफ खाना और ग्वालमंडी से पहले दवाख़ाना हकीम मूसा अमृतसरी …. जी मुझे याद है, दारुल इशात … जी बापू … बापू मैंने सब कुछ काग़ज़ पर लिख रखा है … अब तो सुबह ही निकलूँ गा …. जी हवेली से हो कर निकलूँ गा. फ़िक्र न करें. फोन लम्बा हो रहा है …. सब वैसे का वैसा ही है बापू … बस बापू …”

उस ने चोंगा क्रेडल पर रख दिया. फोन का अच्छा ख़ासा बिल बन गया था.

खैर कोई बात नहीं. बापू की परेशानी तो ख़त्म हुई. पब्लिक कॉल ऑफिस से होटल तक आते आते उस ने सोचा.

कमरे में आया तो दरवाज़े को अन्दर से लाक करने के बाद वो कुछ देर के लिए स्टेशन की जानिब खुलने वाली खिड़की के करीब खड़ा हो गया.

रात के ग्यारह बजने वाले थे. अब सड़क पर ट्राफ़िक कम हुई थी और स्टेशन के सामने वाले पार्क के गिर्द रौशनी की कम्न्दें पड़ रही थीं, पर ज़रा रुक रुक कर.

अचानक उस की नज़रें पार्क के बीचो बीच ऐस्तादा22 रौशन पहाड़ पर जम गईं.

“अरे, यह क्या है?”

पार्क के बीच रौशन पहाड़ था और उसके बराबर में एक बहुत बड़ा मिज़ाइल आसमान की सम्त23 सर उठाए खड़ा था.

यह सब दिन के उजियारे में तो नहीं था यहाँ. या शायद दिन को हंगामा बहुत था इन के गिर्दागिर्द, इसलिए नज़र नहीं पड़ी इन पर.

दिन को यह पहाड़ यहाँ पर था भी या नहीं? वो मख़मसे24  में पड़ गया.

पार्क में पहाड़ और मिज़ाइल चहार जानिब से पड़ने वाले सर्च लाएटों से रौशन थे और पार्क की मद्धम रौशनी में जो लोग शाम को चादरें ताने मुठी चप्पी करवा रहे थे, अब पहाड़ के दमन में बेहिस-ओ-हरकत गठरियों की सूरत पड़े थे. मुठी चप्पी करने वाले लड़कों के हाथों में थामी तेल की बोतलों की झंकार अब सुनाई नहीं दे रही थी.

देखते ही देखते यह क्या हो गया. वो सख्त चकराया हुआ था.

फिर वो खिड़की से दूर हट आया. उस ने कमरे की लाइट बुझा दी और बिस्तर पर लेट गया.

बापू ने उसे पाथी ग्राऊँड जाने से मना किया था लेकिन वो अनदेखे चौक दाल्ग्रान

से सीधा उधर ही को हो लिया. राम गली वाले स्कूल में छुट्टी के बाद सारे बच्चे पाथी ग्राऊँड में फ़ुटबाल खेल रहे थे. ओ बाले, ऐ चंदु …. उस की माएँ चिल्ला-चिल्ला कर उन्हें खाना खाने के लिए बुला रही थीं और बच्चे, पसीने में शराबूर, जवाब में कह रहे थे कि नहीं खाना, बस खेलने दो.. और सराए सुल्तान की जानिब निकल जाने वाली बसें थीं कि भोंपू बजाती हुई, क़तार अंदर क़तार चली जाती थीं.

सुबह जब उसकी आँख खुली तो ख़ासा दिन चढ़ आया था.

होटल की लाबी में नाश्ता करने के दौरान मैनेजर से बात हुई तो उसने बताया कि रेलवे स्टेशन के सामने वाले पार्क में चाग़ी25 के उस पहाड़ का नमूना दे दिया गया है जो पाकिस्तान के पहले ऐटमी तजरबे में अपना रंग बदल गया था.

“ओह ….”  उसने गहरी सांस ली.

फिर मैनेजर ने उसे लाहौर के तमाम काबिल-ए- दीद मुकामात के नाम काग़ज़ पर लिखवा दिए. भाटी गेट, मीनार-ए-पाकिस्तान, शाही क़ला, बादशाही मस्ज़िद … ग़र्ज़ यह कि बहुत से नाम थे.

होटल की लाबी से उठ कर वो अपने कमरे में कपड़े तब्दील करने गया तो उसने सोचा हवेली तो क़रीब ही है, महज़ चंद क़दम के फासले पर … किसी भी वक़्त जाया जा सकता है वहाँ. क्यूँ ना ऑटो रिक्शा पकड़ कर पहले चंद काबिल-ए-दीद मुक़मात से हो आऊँ.

फिर यूं भी बहुत दिन चढ़ आया था. मार्च का आखिर था और धूप की हिद्दत26 बढ़ चली थी. उस ने सोचा और ऑटो रिक्शा पकड़ कर निकल खड़ा हुआ.

भाटी गेट का इलाक़ा तो जामिया मस्ज़िद पुरानी दिल्ली जैसा ही था. जब घूमता घुमाता मीनार-ए-पाकिस्तान पहुँचा तो सूरज ऐन सर पर आ गया था.

रणजीत सिंह की समाधी से हो कर शाही कल्ला का चक्कर लगाया और हुज़ूरी बाग़ में बादशाही मस्ज़िद के सामने बैठ गया.

भाटी गेट से मीनार-ए-पाकिस्तान पैदल चल कर आने और कल्ला की सैर के बाद वो क़द्रे थक सा गया था. वापसी पर ऑटो रिक्शा पकड़ते हुए उस ने अनारकली और पंजाब युनिवर्सटी जाने का इरादा तर्क कर दिया. अलबता अजायब घर जाने की ज़रूर ख्वाहिश ज़रूर थी.

“भाई, अजायब घर चलो.”

वहां पहुंचा तो देखा मलिका विक्टोरिया का एक बहुत बड़ा पीतल का मुजसिमा अजायब घर के अन्दर रखा है. क्या बापू छुटपने में अजायब घर आया करते थे या

कोई और मुजसिमा है यह? वो थोड़ा सा गड़बड़ाया. वक़्त भी तो बहुत गुज़र गया था. बहुत मुमकिन है बापू भूल कर ग़लत जगह बता गए हों. उस ने सोचा.
“भाई, वाइसराए का दफ़्तर कहाँ होगा?” उस ने क़रीब ही खड़े अजायब घर के एक अहलकार27 से पूछा.

“भाई, वाइसराए का दफ़्तर? नहीं मालूम कौन से दफ़्तर का पूछ रहे हैं आप”

ग़लती हो गई पहले क्यूँ न हो आया ठंडी सड़क के चेरिंग क्रास से. उस ने एहसास -ए-निदामत28 के साथ सोचा.

कोई बात नहीं. अब चलता हूँ ठंडी सड़क चेरिंग क्रास पर.

उस ने अजायब घर से निकल कर ऑटो रिक्शा रोका.

“ठंडी सड़क जाना है भाई, चेरिंग क्रास ले चलो.”

“जी? ठंडी सड़क का तो मालूम नहीं. चेरिंग क्रास पहुंचा देता हूँ आपको. वहां से मालूम कर लीजियेगा ठंडी सड़क का भी.”

“चलो.”

अभी सूरज डूबा नहीं था, इस के बावजूद सड़क के दोनों अतराफ़ में जैसे रोशनियों का सैलाब उमड आया था.

चेरिंग क्रास पहुंचा तो वहां न तो ठंडी सड़क थी न वाइसराए का दफ़्तर. चेरिंग क्रास पर खड़े-खड़े इक्का दुक्का राहगीरों से पुछा. सभी उस रौशनियों के सैलाब में नहाई हुई बड़ी सड़क को शाहरा-ए-काइद-ए-आज़म या मॉल रोड बताते थे और वाइसराए के दफ़्तर का कहीं नाम ओ निशां न था. चिड़ियाघर की मौजूदगी तो साबित थी, लेकिन चेरिंग क्रास की एक जानिब वापदा हाउस की फलक बोस इमारत थी और दूसरी जानिब पंजाब एसंबली हाल. चेरिंग क्रास के तिकोने आहाते में पार्क तो था लेकिन इर्दगिर्द का नक्शा वो नहीं था जो बापू ने बार बार ज़हन नशीं करवाया था.

फ़िर उस ने चेरिंग क्रास के नीम29 रौशन तिकोने आहाते के अन्दर जा कर देखा तो मलिका विक्टोरिया का मुजसिमा गायब था और उसकी जगह संग-ए-मरमर से तराशा गई रिहल30 धरी थी और उस के ऊपर संग-ए-मरमर ही से तराशा गया कुरान.

वो पीछे हट गया.

अब वो इस बात पर हैरान था कि अगर यही चेरिंग क्रास है तो ठंडी सड़क क्या हुई, जिस के दोनो अतराफ में घने दरख़्त थे; और वाइसराए का दफ़्तर किधर गया.

“तो क्या बापू की यादाश्त गड़बड़ हो गई?”

“आज किसी तौर बापू को फोन करना नहीं बनता,” उस ने सोचा.

ठंडी सड़क, मलिका विक्टोरिया के मुजसिमे और वाइसराए के दफ़्तर का चेरिंग क्रास से गायब होजाना यकीनन उन के लिए सदमे का बायस होगा.

“कल कर दूंगा फोन, कोई बहाना बना दूंगा. कह दूंगा कि फोन कि लाइनें नहीं मिल रही थीं,” उस ने सोचा और देर तलक चेरिंग क्रास पर शिष्दर31 खड़ा रहा.

होटल की लाबी में रात का खाना खाते हुए उस ने बैठे-बैठे मैनेजर से कहा:

“भाई साहिब! मुझे वाइसराए के दफ़्तर जाना था, बहुत ढूंढा पर नहीं मिला.”

“कहाँ जाना था?”

“भई ठंडी सड़क पर वाइसराए का दफ़्तर है न …”

“जी, कौन सा दफ़्तर? अभी मालूम किये देता हूँ … मैं तो यह नाम पहली बार सुन रहा हूँ.”

फ़िर मैनेजर ने काम में मुन्हमिक32 एक-एक वेटर से पूछा और सोच में डूबा रहा.

“मुझे लाहौर में रहते हुए आठ-दस बरस तो हो गए, पर इस दफ़्तर का नाम नहीं सुना मैंने.

खैर, मालूम कर लेंगे. और सुनाएँ, आप हो आए मीनार-ए-पक्सितान और शाही कल्ले से?”

“जी, हो आया…. किसी तरह मालूम कर के बताइये. मैंने जाना था उधर.”

“ठीक है. आप फ़िक्र न करें.”

रात को सोते वक़्त इस ख्याल ने ढाढस बंधाई कि कल हवेली का चक्कर लगेगा तो गली-मोहल्ले और हवेली की ख़ैर ख़बर सुन कर बापू खुश हो जायेंगे.

रात सोते वक़्त उसने घड़ी पर अलार्म लगा दिया था ताकि सुबह उठने में तख़ीर33 ना हो और धूप की हिद्दत बढ़ने से पहले हवेली से हो आए.

सुबह उठ कर उस ने देर नहीं की. वाश रूम से झटपट तैयार हो कर निकला और होटल कि लाबी में चला आया. उस वक़्त मेनेजर अपनी सीट पर नहीं था. फ़िर उसने हल्का सा नाश्ता किया और होटल से निकल कर बापू के बताए हुए रास्ते पर हो लिया.

बापू की हिदायात के ऍन  मुताबिक उस ने लुंडा बाज़ार वाली सड़क के मत्वाज़ी34 निकल जाने वाली रेलवे रोड ही को चुना, लेकिन दूर तक उसे उधर को जाता ना तो कोई तांगा दिखाई दिया न सराए सुल्तान की जानिब से रेलवे स्टेशन की सम्त आती कोई लारी दिखाई दी.

“वक़्त भी तो बहुत गुज़र गया,” उस ने सोचा.

इस के बावजूद राह चलते वो कई बार ठिठक कर रुका लेकिन उस वक़्त सब जल्दी में थे और फुटपाथ के बराबर वाली दुकानें अभी खुली न थीं. वो किससे पूछता? बस चलता गया.

जब एक चौरस्ते में पहुंचा तो नान छानने की रेहड़ी के गिर्दागिर्द नाश्ता करने वालों का हुजूम देख कर रुक गया.

“भाई साहिब! क्या यही चौक दाल्ग्रान है? मैंने जाना था उधर.”

यह सुन कर नाश्ता करते हुए एक भारी तन-ओ-तोश वाला शख्स ख़ुश तबई35 बोला: “जाना नहीं था. आप ख़ैर से चौक दाल्ग्रान पहुँच गए. आओ, बिस्मिल्लाह, नाश्ता करो.”

“जी… जी शुक्रिया. मेरा मतलब है, सराए सुल्तान का लारी अड्डा करीब ही है क्या?”

“सराए सुल्तान का लारी अड्डा?”

सब हेरानी से बड़बड़ाए और इक दूजे की जानिब इस्ताजाबिया36 अंदाज़ में देखने लगे.

“चलिए यह बता दीजिये लाला जसवंत सिंह की हवेली किस तरफ को है?”

“लाला जसवंत सिंह की हवेली?”

एक बार फ़िर सब के सब ताज्जुब से उसे देखने लगे.

“अच्छा … कोई बात नहीं. ऋषि भवन तो करीब ही होगा.”

“ऋषि भवन?”

अब सारे ताज्जुब से उसे देख रहे थे.

वो बौखला कर तेज़-तेज़ क़दम उठाता आगे बढ़ गया.

फ़िर जब तक  चौरस्ते वो इसी बदहवासी में कभी दाएँ और कभी बाएँ उसी बाज़ार में भटकता फिरा. दोबारा किसी से पूछने की हिमत जवाब दे गई थी.

वो मायूस हो चला था कि अचानक उसकी नज़रें एक कबाड़ख़ाने के छज्जे से मुल्हिका37 बड़े से मेहराबी38 गेट पर जम गईं. उस गेट की  काईज़दा39 दीवार पर “सराए सुल्तान” दर्ज था और उस के नीचे ना पढ़ी जाने वाली कोई सन: लिखी थी.

ख़ुशी की एक लहर उठी, जिसने उस के जिस्म में बिजली सी भर दी.

वो कबाड़ख़ाने की जानिब यूं बढ़ा जैसे सब कुछ पा लिया.

सराए सुल्तान के मह्राबी दरवाज़े के अन्दर नीम तारीक खाबाड़ख़ाने में एक ख़ुमीदा40 कमर बुढा कबाड़ के ढेर से अश्य41 की छांटी का काम कर रहा था.

“बाबा जी सलाम! यही सराए सुल्तान है ना?”

“हाँ … कभी थी”

ख़ुमीदा कमर कबाड़ीये ने उस की जानिब मुड़ कर देखे बग़ैर जवाब दिया.

“बाबा जी, क्या यही लारी अड्डा था पहले?”

“हाँ, था. बहुत पुरानी बात है…………..”

“मैं लाला जसवंत सिंह का पोता हूँ बाबा जी ……… दिल्ली से आया हूँ.”

“क्या कहा …… लाला जसवंत?”

बूढा कबाड़िया काम छोड़ कर मुड़ा और उसने बैठने के लिए मुंढा आगे को सिरका दिया.

“जी मैं लाला जसवंत सिंह का पोता हूँ. हवेली जाना था. बापू ने बताया था को ऋषि भवन के करीब चौक में ही है कहीं.”

उस ने मुंढे पर बैठते हुए कहा.

“हाँ ….. लाला जसवंत सिंह की हवेली…… पर अब क्या जाओगे हवेली. वहां तो  ख़रादिये42 बैठ गए. इस चौक से दायें हाथ इमामबाड़े का आलम दिखाई देगा. उससे ज़रा पहले ख़राद का कारख़ाना है. वही हवेली थी, लाला जसवंत सिंह की.”

“ओह …. क्या सब कुछ ख़त्म हो गया बाबा जी?”

“नहीं….इमारत मौजूद है. पर अब वहां कोई रहता नहीं.  ख़रादिये जो बैठ गए….. चाय पियोगे?”

“और ऋषि भवन बाबा जी?”

“पी लो चाय, दूर से आये हो. कोक, फ़ाँटा पियोगे?”

“बाबा जी बहुत मेहेरबानी आपकी. अभी नाश्ता कर के आया हूँ. आप काम कीजिए. आगे भी जाना है मुझे, ग्वालमंडी की तरफ….. ऋषि भवन का तो बताया नहीं आपने.”

“बेटा, बताया तो है …….. तुम्हारी हवेली के बराबर वाला इमामबाड़ा ही कभी ऋषि भवन था. सन सैंतालिस के बाद महकमा औकाफ़43 वालों ने बड़ी मुद्दत बंद रखा…… फिर इमामबाड़ा बन गया.”

“यह सुन कर वो उठ खड़ा हुआ लेकिन टांगों में जैसे जान न थी.”

“बैठो न बेटा.”

“बस बाबा जी. कुछ काम हैं छोटे-मोटे. अब चलता हूँ. नमस्कार.”

“जीते रहो.”

कबाड़ी बाबा ने दोबारा कबाड़ के ढेर से छांटी का काम शुरू कर दिया.

जब वो सामान से लदे फदे रेह्डों और धुंआ उगलते ऑटो रिक्शों में से रास्ता बनाता, डोला संभालता, चौक से बाएँ हाथ मुड़ा तो सामने इमामबाड़ा था.

उस ने वो चंद क़दमों का (रास्ता?) सदियों में तय किया और इमामबाड़े की बराबर वाली बोसीदा हवेली की देओढी के सामने देर तलक खड़ा रहा. अन्दर मशीनों पर  ख़रादिये झुके हुए थे और मशीनों से चिन्गारें उठ रही थीं. लोहे को लोहा काट रहा था.

उस ने वहीं खड़े-खड़े ऋषि भवन पर निगाह की.

इमाम बाड़े के ऊपर सियाह अलम44 लहरहा रहा था और पुरानी इमारत नए सिरे से प्लास्टर कर के रंग दी गई थी.

वो पलटा और चौक दाल्ग्रान से होता हुआ ग्वालमंडी की जानिब चल दिया.

सामने वाले एक ख़स्ता हाल मकान की मुमटी45 पर कबूतर बैठे थे. क्या पता इन कबूतरों में शीराज़ी, लका और लोटन कबूतर भी हों, उस ने सोचा.

चलते चलते ताज कम्पनी के सदर दरवाज़े पर निगाह की तो उस के अन्दर की टूट फूट में से शादमानी46 की एक लहर उठी और साथ ही दम तोड़ गई. उस ने ताज कम्पनी की ग्रांडील47 बिल्डिंग की बैरूनी48 दिवार पर आवेर्ज़ान49 नीलामी का इश्तेहार पढ़ लिया था.

आगे दायें हाथ इस्लामिया कॉलेज तो मौजूद था लेकिन उसके सामने अरब होटल का निशान तक ना था. जस्ती पायप, सैनेटरी और रबड़ की दो तरफ़ा दुकानें थीं और बस. मालूम किया तो पता चला कि बरसा बरस हो गए अरब होटल को ख़त्म हुए. साथ ही राम गली थी. वो उधर को मुड गया.

राम गली कि वही पुरानी बाल्कोनियाँ, जो बापू की यादों में आबाद थीं, अब म्न्हीदम50 होने को थीं.

राम गली में आगे चल कर एक स्कूल दिखाई दिया, जो अब मुस्लिम मॉडल हाई स्कूल बन चुका था; इमारत पुरानी थी.

यक़ीनन बापू इसी स्कूल में बाला और चंदू के हमजमात रहे होंगे. उसने ख़याल किया.

उस वक़्त स्कूल का गेट बंद था और बच्चों की भागा-भाग से पैदा होने वाली हलचल पूरी गली में महसूस की जा रही थी.

चौक बरफख़ाना से आगे दावाख़ाना हकीम मूसा अमृतसरी तो मौजूद था लेकिन दूर ओ नज़दीक किसी पुस्तक भण्डार का वजूद न था. उसी इलाके के दुकानदारों से मालूम करने पर पता चला कि गुज़रता बरस दारुल इशात पंजाब51 की इमारत गिरा दी गई, जो एक मुद्दत से उजाड़ पड़ी थी.

अब दारुल इशात की जगह एक नौतामीरशुदा52 प्लाज़ा खड़ा था, “हम्ज़ा सेण्टर” के नाम से. जिस के अन्दर जस्ती पाइप, सैनेटरी के सामान और रबड़ की शीटों के अंबार लगे थे.

ज़रा फासले पर खड़े हो कर उस ने नौतामीरशुदा इमारत पर नज़र डाली ताकि बापू को बता सके कि वो जगह अब कैसी थी.

फिर अचानक उसकी नज़रें हम्ज़ा प्लाज़ा की बैरूनी दीवार और बिजली के खम्भे के बीच झूलते हुए कैन्वस के एक बहुत बड़े इश्तेहार पर जम गई. पर उर्दू कमज़ोर होने के सबब उससे पूरा इश्तेहार पढ़ा नहीं गया. लिखा था:

“चलो चलो, मुल्तान चलो

तीन रोज़ा सुन्नतों भरा इज्तमा53

शेर शाह बाई पास सहराए मदीना, मुल्तान.

फर्ज़ान्दान-ए-इस्लाम54 के काफ्लों का सिलसिला जारी है”

वो थके-थके क़दम उठाता होटल की जानिब पलट पड़ा. यह सोचते हुए कि आज बापू को फोन भी करना है.

अब उसकी मुश्किल यह थी कि बापू को क्या बताये और क्या ना बताए.

होटल की लाबी में पहुंचा तो वो गहरी सोच में डूबा हुआ था.

“आज तो आप सवेरे सवेरे ही निकल लिए. कहाँ कहाँ का चक्कर लगा?” मैनेजर ने खुश मिज़ाजी से पुछा.

“सभी जगहों.”

GLOSSARY

  1. उल्झेड़े: व्यस्त करने वाले काम, something hectic
  2. अज़हद : बहुत ज़्यादा, excessive
  3. आहनी: लोहे का, made of iron
  4. सुतून: खम्भा, pillar
  5. मत्वाज़ी: बीच में से, at the junction of
  6. सहन: वरांडा, verandah
  7. शीराज़ी: एक किस्म का कबूतर, a breed of pigeon
  8. लक़ा: एक किस्म का कबूतर, a breed of pigeon
  9. लुगदी: कबूतरों के खाने का सामान, special feed for pigeons
  10. इलात: हुकूमत के तरफ से दिया जाना, to allot
  11. उकडूं: उकड़ कर बैठना, to sit with a hunchback
  12. पसमंज़र: पृष्ठभूमि, background
  13. बकिया: जो बाक़ी हो, remaining part or remaining money
  14. फोरी: तुरंत, immediate
  15. क़द्रे: थोड़ा, a little
  16. अज्हुद: अपने आप, on its own
  17. चहार: चरों तरफ, all four sides
  18. कम्न्दें: रस्सा, rope-ladder
  19. मज़ीद: ज़्यादा, Extra
  20. कुशादा: फैला हुआ, spacious
  21. क़ुरब ओ ज्वर: आस पास, around
  22. ऐस्तादा: सीधा खडा हुआ, Standing straight (tall)
  23. सम्त: दिशा में, in a direction
  24. मख़मसे: असमंजस, confusion
  25. चाग़ी:  बलोचिस्तान में वो जगह जहां पाकिस्तान ने परमाणु परिक्षण किये थे, a town in Balochistan where Pakistan conducted nuclear experiments
  26. हिद्दत: गर्मी, heat
  27. अहलकार: कर्मचारी, personnel
  28. निदामत: शर्मिन्दगी, embarrassment
  29. नीम: थोड़ा, partial
  30. रिहल: कुरान शरीफ को रखने का ‘स्टैंड’, a stand to place the Quran
  31. शिष्दर: डर जाना, horrified
  32. मुन्हमिक: डूब जाना, व्यस्त हो जाना, being engrossed
  33. तख़ीर: टालना, deferment
  34. मत्वाज़ी: समानांतर, parallel
  35. ख़ुश तबई: ज़िंदादिली से, with liveliness
  36. इस्ताजाबिया: आश्चर्यपूर्वक, exclamatory
  37. मुल्हिका: जुडा हुआ, एक साथ, attached
  38. मेहराबी: मेहराब जैसा बनाया हुआ vaulted or embowed
  39. काईज़दा: काई लगी हुई, infested with fungus
  40. ख़ुमीदा: मुडा हुआ, curved
  41. अश्य: चीज़ें, things
  42. ख़रादिये: ख़राद का काम करने वाले, associated with lathe work
  43. महकमा औकाफ़: एक सरकारी विभाग का नाम (जो विस्थापित लोगों की संपती से जुड़े काम करता है), department of evacuee trust property
  44. अलम. झंडा, flag
  45. मुमटी : घर के छत पर पानी की टंकी, water tank at the roof of a house
  46. शादमानी: उल्लास, happiness, gladness
  47. ग्रांडील: भारी भरकम, heavy built (Samsonian)
  48. बेरूनी: बाहरी, outer side
  49. आवेर्ज़ान: लटका हुआ, pendent, pensile
  50. म्न्हीदम: निष्ट, धराशायी, destroyed, demolished
  51. दारुल इशात पंजाब: प्रकाशन विभाग पंजाब, publishing house/department, Punjab
  52. नौतामीरशुदा: नया बना हुआ, newly build
  53. इज्तमा: समूह, gathering
  54. फर्ज़ान्दान-ए-इस्लाम: इस्लाम को मानने वाले (मुसलमान), followers of Islam (Muslims)
  55. माल रोड को पहले  ज़माने में ठंडी सड़क भी कहा जाता था

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لالہ جسونت سنگھ کی حویلی

مرزا حامد بیگ

واگہ سے کلیرنس کے بعد جب سمجھوتہ ایکسپریس، لاہور ریلوے اسٹیشن پہنچی تو چرولجی اور کاجو کے پیکٹ، پان چھالیہ کے تھیلے، بنارسی اور زردوزی کے بوری بند تھان ٹھیلوں پر لادے قُلیوں اور پھیری بازوں کی دھکم پیل میں ایک وہ بھی تھا۔

وہ، جو لاہور میں اپنے پُرکھوں کی حوالی اور گلی محلہ دیکھنے آیا تھا، تاکہ دِلی واپس جا کر اپنے بوڑھے اور بیمار باپو کو بتا سکے کہ اس نے جو کچھ ان کی زبانی سُنا تھا، سب ویسا ہی ہے یا بدل گیا۔ اور چند ایک چھوٹی چھوٹی فرمائشیں تھیں باپو کی جنھیں پُورا کرنا تھا اُسے۔

واگہ سے کلیرنس کے اُلجھیڑے ازحد تھکا دینے والے تھے اور اُسے کسی بات کی جلدی نہ تھی۔

گاڑی سے اُتر کر وہ لاہور ریلوے اسٹیشن کے دور پھیلے آہنی شیڈ کے محرابی ستون کے ساتھ لگ کر کھڑا دیر تک اپنے باپو کی ہدایات یاد کرتا رہا تھا۔

دہلی ریلوے اسٹیشن پر جب ٹرین کے ڈبے جوڑے جا رہے تھے تو باپو نے تاکید کی تھی کہ پاکستان پہنچ کر سب سے پہلے پولیس اسٹیشن میں اپنی آمد کی رپرٹ کرنا، پھر ریکوے اسٹیشن سے قریب ہی کسی صاف ستھرے ہوٹل میں کمرہ لینے کے بعد خیریت کا فون کر دینا۔

جی۔

کچھ دیر آرام کرکے ہی نکلنا کہیں۔

جی باپو۔

لاہور ریلوے اسٹیشن سے زیادہ دور نہیں ہے اپنی حویلی۔ تمھیں تانگہ، ٹیکسی لینے کی ضرورت نہیں پڑے گی۔ پیدل کا راستہ ہے حویلی کا۔

جی۔

اگر اب بھی تانگہ چلتا ہے نا، تو بھاٹی لوہاری کی آواز لگائے گا کوچوان۔ جی چاہا تو پکڑ لینا۔ لُنڈا بازار و سلطان سرائے والی سڑک کے متوازی ریلوے روڈ نکلتی ہے۔ اُسی روڈ پر ہے اسلامیہ کالج اور عرب ہوٹل۔ چوک برف خانہ سے گوالمنڈی کی طرف وہی سڑک جاتی ہے۔ تم اُتر جانا چاک دالگراں۔ قریب ہی ہے سرائے سلطان کا پچھلا گیٹ۔ چوک دالگراں سے گزر کر ساری لاریاں سرائے سلطان ہی میں جا کر رکتی ہیں۔ پھر نکل جاتی ہیں ریلوے اسٹیشن، نو لکھا اور دو موریہ پل کی طرف۔

جی باپو۔

کہیں پاتھی گراﺅنڈ کی طرف نہ نکل جانا۔ بعد میں بے شک اُدھر بھی چلے جانا، لیکن حویلی سے ہو کر، اُدھر گُجر گوالے رہتے ہیں۔ میرے یار، بالے کا گھر وہیں تھا۔ چوک دالگراں سے ہی پوچھ لینا لالہ جسونت کی حویلی۔ قریب ہی تو ہے۔ جو کوئی بھی وہاں رہتا ہو۔ مل لینا۔ پرنام، نمستے نہیں۔۔۔۔ سلام کرنا۔

انھیں بتانا کہ مَیں لالہ جسونت سنگھ کا پوتا ہوں۔ بیٹھنے کو کہیں تو بے شک تھوڑی دیر بیٹھ جانا، شرمانا نہیں۔ پھر، اگر وہ اجازت دیں تو صحن میں سے ضرور ہو آنا۔ اُن دنوں صحن میں برآمدے کی پرچھتی کے نیچے لکڑی کا بھاری تخت پوش دھرا رہتا تھا۔ میں جب چھوٹا سا تھا نا، تو رام گلی والے اسکول میں پڑھتا تھا اور تختی اسی تخت پوش پر بیٹھ کر لکھا کرتا تھا۔۔۔۔ صحن میں بازو والے گھر کی ساجھی دیوار کے عین نیچے ایک کنواں تھا۔ اِدھر سے ہم چرخی کی رسی سے بندھا ڈول ڈالتے، اُدھر سے وہ۔ کون پانی سے بھرا ڈول پہلے کھینچ نکالتا ہے۔ اس کا مقابلہ ہوتا تھا، چندو لوگوں کے ساتھ۔ اُوپر چھت پر جانے کی ضرورت نہیں۔ بے شک صحن میں سے ہی کھڑے کھڑے چھت پر نظر ڈال لینا، جھجے پر کبوتر ہوئے تو وہیں سے دکھائی دے جائیں گے۔۔۔۔ ہم نے اُن دنوں شیرازی، لقا اور لوٹن پال رکھے تھے۔ بالے اور چندو لوگو نے بھی ہمارے دیکھا دیکھی پال لیے تھے کبوتر۔ اس لیے برابر والی چھتیں بھی شاید خالی نہ ہوں کبوتروں سے۔ اگر اپنی حویلی کے جھجے پر بیٹھے کبوتر دکھائی دے جائیں نا تو باتوں باتوں میں حویلی والوں سے یہ ضرور پوچھ لینا کہ کبوتروں کو لُگدی میں کیا دیتے ہیں۔ جو کچھ بتائیں، کاغذ پر لکھ لینا، بھُولنا نہیں۔

جی اچھا۔

حویلی کسی خاندانی آدمی کو ہی الاٹ ہوئی ہوگی۔ شاید وہ کہیں تمھیں اپنے ہاں ٹھہرنے کے لیے۔ لیکن بیٹا اُن پر بوجھ نہ بننا۔ ہوٹل میں ہی رہ لینا۔ پیسے ہیں نا، لو اور رکھ لو۔

باپو، پیسے ہیں میرے پاس۔ آپ فکر نہ کریں۔

بچت کرنے کی ضرورت نہیں۔ ذرا دیکھ بھال کر بیٹا۔ پاسپورٹ کی قمیض کے نیچے بنڈی میں ہی رکھنا، احتیاط سے۔

جی باپو۔

حویلی سے نکل کر رِشی بھَون بھی ہو آنا۔ رِشی بھَون کی دیکھ ریکھ کیسی ہو رہی ہے، واپسی پر بتانا۔

جی اچھا۔

جب ٹرین نے وِسل دی تھی تو قُلیوں کی بھاگ دوڑ میں اضافہ ہوگیا تھا اور سامان سے لدے پھندے ریڑھوں کا شور بڑھ گیا تھا۔

باپو اونچی آواز میں بات نہ کر سکتے تھے لیکن اُس سمے اتنے شر میں اُن کی آواز صاف سنائی دے رہی تھی۔

ہاں بیٹا، حویلی سے ہو کر گوالمنڈی کی طرف نکلو گے نا تو رام گلی والے اسکول کے سامنے سے ہر کر گزر جانا۔ بے شک باہر ہی سے ایک نظر ڈال لینا اور ہاں، عرب ہوٹل میں ضرور جھانک لینا۔ بڑے بڑے ادیب شاعر بیٹھتے ہیں وہاں۔۔۔۔۔ بہت ادب احترام سے بیٹا۔

جی باپو۔

اس وقت آہستہ آہستہ رینگتی ہوئی ٹرین کے ساتھ باپو جُڑ کر چل رہے تھے اور شور بہت تھا۔ چوک برف خانہ سے ناک کی سیدھ میں گوالمنڈی کی طرف نکلو گے نا تو وہیں پر بہت بڑا پُستک بھنڈار ہے۔ واپسی پر اگر کچھ پیسے بچ گئے نا تو میرے لیے وہیں سے کوئی پُرانا ناول خرید لانا۔۔۔۔ پتا جی ناستک سے تھے۔ ہمارے ہمسائے تھے نا۔

بالا لوگ۔۔۔۔ ان کے گھر سے منگوا کر پڑھا کرتے تھے ہر طرح کے ناول۔۔۔۔ بہت سے نام تھے ناولوں کے، بس اُنھی میں سے کوئی ایک۔۔۔۔ نام لکھوا دیے تھے تمھیں ۔۔۔ جی باپو، سب کچھ کاغذ پر لکھ رکھا ہے۔ آپ فکر نہ کریں۔

دیکھو، ہو سکے تو لاہور کی ٹھنڈی سڑک پر ویگل سینما ہو آنا۔۔۔ میں نے ریگل ہی میں سہگل اور جمنا کی ”دیوداس“ دیکھی تھی۔۔۔۔ ٹھنڈی سڑک پر چیئرنگ کراس۔۔۔ ایک طرف چڑیا گھر اور دوسری جانب وائسرائے کا دفتر۔۔۔۔ اسی چوک میں رکھا ہے ملکہ وکٹوریہ کا بڑا سا پیتل کا مجسمہ۔۔۔۔ ملکہ، وائسرائے کے دفتر کی جانب مونہہ کیے بیٹھی ہوگی۔ میں اکثر گرمیوں کی دوپہروں میں نکل جاتا تھا ادھر۔۔۔۔ ملکہ کے قدموں میں لیٹ جاتا تھا۔۔۔۔ سو جاتا تھا وہیں۔۔۔۔ اور گھر والے۔۔۔۔ باپو وہی باتیں دوہرا رہے تھے، جنھیں وہ بچپن سے بار بار سنتا چلا آرہا تھا۔

اور ہاں بیٹا۔۔۔۔

جی باپو۔

پھر چلتی ہوئی ٹرین کے ساتھ سلسل دوڑتے چلے آنے سے ان کا سانس پھول گیا اور وہ پیچھے رہ گئے۔ کھڑکی سے مُڑ کر دیکھا تو وہ سب سے الگ پلیٹ فارم پر اُکڑوں بیٹھے تھے، جھک کر کھانستے ہوئے صاف دکھائی دے رہے تھے اور پس منظر میں مسافروں کو الوداع کہنے والے بقیہ لوگ کھڑے ہاتھ ہلا رہے تھے۔

اُس کے بعد ٹرین نے رفتار پکڑ لی اور سب کچھ پیچھے رہ گیا۔

‘توجہ فرمایئے۔۔۔۔ کراچی سے آنے والی عوام ایکسپریس ۔۔۔۔۔’

اس نے اپنا چرمی تھیلا اور سوٹ کیس اٹھا کر باہر کا رخ کیا۔

لاﺅڈ اسپیکر پر کراچی سے لاہور آنے والی کسی گاڑی کے لیٹ ہونے کی اناﺅنسمنٹ جاری تھی۔ لاہور ریلوے اسٹیشن سے باہر نکلتے ہوئے اس نے ویزہ آفس سے ملنے والی پرچی دکھا کر معلوم کر لیا کہ بھارت سے پاکستان آمد کی رپورٹ کہاں کرنا ہے۔

باہر اچھی خاصی روشنی تھی اور شام سے پہلے پہلے یہ معاملہ نمٹا دینا ضروری تھا۔

واگہ سے پہلے اٹاری میں اس نے پانچ سو روپے کی کرنسی تبدیل کروالی تھی، جو فوری ضرورت کے لئے کافی تھی۔ اس نے آٹو رکشہ پکڑنے میں دیر نہیں کی اور رپورٹنگ سینٹر کے لئے نکل کھڑا ہوا ۔

ایس ایس پی آفس، ضلع کچہری میں داخل ہوتے وقت وہ قدرے گھبرایا ہوا اور تھکا تھکا سا تھا۔

اس کے کاغذات ہر طرف سے مکمل تھے، پاسپورٹ درست تھا۔ ویزا صحیح لگا تھا، اس کے باوجود ایک انجانا سا خوف تھا جیسے سر پر آسمان موجود نہ ہو۔

رپورٹنگ آفیسر کے سامنے بچھی ہوئی بڑی سے میز کے برابر میں اپنا سامان رکھ کر وہ ایک خالی کرسی پر بیٹھ گیا لیکن جیسے مُلزم بیٹھتے ہیں۔

رپورٹنگ آفیسر نے ٹیلی فون پر بات کرتے ہوئے لحظہ بھر کے لیے اس کی جانب لاتعلقی سے دیکھا۔ پھر اس نے فون بند کر دیا اور کرسی سے اٹھتے ہوئے سردمہر سے بولا:

‘جی۔۔۔۔ فرمایئے۔’

‘میں آج ہی دلی سے لاہور پہنچا ہوں’

‘جی۔۔۔۔ دکھایئے کاغذات’

رپورٹنگ آفیسر نے اتنا کہا اور باہر نکل گیا۔ کمرے کا دروازہ از خود بند ہوگیا تھا۔

اب وہ کمرے میں تنہا تھا اور اس کے لیے اکیلے میں ایک ایک پل گزارنا مشکل ہورہا تھا۔

کچھ دیر بعد کمرے کا دروازہ کھلا تو رپورٹنگ آفیسر نے جلد ہی سارا کام نمٹا دیا۔

‘واپس جاتے ہوئے آپ کو یہیں پر رپورٹ کرنا ہوگی۔ اس وقت تک آپ کے یہ کاغذات ہمارے پاس رہیں گے۔’

‘بالکل صاحب۔۔۔۔ میں تو بہت گھبرایا ہوا تھا۔۔۔۔ آپ کی کِرپا، نمسکار’

جب وہ دوبارہ ریلوے اسٹیشن کی حدود میں پہنچا تو شام گہری ہو چلی تھی۔ لاہور ریلوے اسٹیشن کے سامنے بہت سے چھوٹے بڑے ہوٹل تھے، جن کے نیون سائن جل بجھ رہے تھے۔

وہ آٹو رکشہ سے اتر کر ہوٹلوں کا جائزہ لینے کی خاطر پارک کے ساتھ فٹ پاتھ پر ہو لیا۔ پارک میں بیٹھے اور لیٹے ہوئے، بہت سے لوگ اس وقت مُٹھی چپّی کروارہے تھے اور پارک کے گرد چکر کھاتی ہوئی موٹر کاریں اور منی بسیں چہار جانب روشنی کی کمندیں پھینکتی ہوئی گزر رہی تھیں۔۔۔۔

‘بھائی صاحب۔۔۔۔ یہاں سے چوک دالگراں کتنی دور ہوگا؟’ اس نے پارک کی ریلنگ کا سہارا لیے ہوئے ایک بھلے مانس سے پوچھا۔

‘قریب ہی تو ہے جی۔ اُن ہوٹلوں کے سامنے سے وہ جو سڑک دائیں ہاتھ جارہی ہے اُس پر ہوجائیں۔ چند قدم پر ہی ہوگا۔’

‘جی، اچھا۔ ‘ وہ آگے بڑھ آیا۔

باپو سچ کہتے تھے۔ کچھ بھی تو نہیں بدلا۔ اسٹیشن سے چند قدموں پر چوک دالگراں۔ رِشی بھَون کے قریب لالہ جسونت کی حویلی۔ اسی سڑک پر سارا کچھ اور آخر میں پُستک بھنڈار۔۔۔۔ سارا پیدل کا راستہ۔

رہائش کے لیے اس نے کو ہوٹل چُنا، اسی کے سامنے والی منی چینجر سے اس نے مزید کرنسی تبدیل کروالی اور ہوٹل کا رُخ کیا۔ اس وقت پارک میں سے مُٹھی چپّی کرنے والے لڑکوں کے ہاتھوں میں تھامی تیل کی بوتلوں کی جھنکار صاف سنائی دے رہی تھی۔

دوسری منزل پر ہوٹل کا کمرہ خاصا کشادہ اور صاف ستھرا تھا۔ فوم کے گدے، کھڑکیوں پر بھاری پردے، ٹھنڈے پانی کی ٹونٹیاں اور ٹائلڈ باتھ۔ ایسا ہوٹل تو جامع مسجد کے قرب و جوار میں ایک نہ ہوگا، ہاں البتہ کناٹ پلیس میں ضرور ہونگے۔ نہا دھو کر ہال میں کھانا کھاتے ہوئے اس نے سوچا۔

ہوٹل کے باہر اور لاﺅنج میں چکاچوند روشنی کے سبب وہ اب تک یہی سمجھ رہا تھا کہ زیادہ وقت نہیں گزرا، لیکن جب اس نے کلائی کی گھڑی پر نگاہ کی تو معلوم ہوا کہ رات کے دس بج رہے ہیں۔

بہت دیر ہوگئی۔ باپو تو نو بجے سو جاتے ہیں اور وقت بھارت میں آدھ گھنٹے کے فرق کے ساتھ ساڑھے دس ہوں گے۔ خیریت کا فون تو کیا نہیں۔ اس نے سوچا اور تیزی سے نکلا پبلک کال آفس کے آپریٹر نے جب گھر کا نمبر ملا کر دیا تو باپو جاگ رہے تھے۔

ہیلو۔۔۔ ہیلو باپو۔۔۔ جی پہنچ گیا۔۔۔۔ آپ ابھی تک جاگ ۔۔۔ جی بالکل ٹھیک ہوں۔۔۔۔ آپ پلیٹ فارم پر کھانس رہے تھے، طبیعت تو۔۔۔ جی رپورٹ کردی۔۔۔۔ آپ ٹھیک کہتے تھے، سب ویسے کا ویسا ہی ہے۔۔۔۔ جی، ہوٹک سے چند قدم کے فاصلے پر۔۔۔ ماتاجی سے بات۔۔۔۔ جی مجھے یاد ہے چوک دالگراں سے سیدھی سڑک نکلے گی۔۔۔ تاج کمپنی، اسلامیہ کالج اور عرب ہوٹل پھر چوک برف خانہ اور گوالمنڈی سے پہلے دواکانہ حکیم موسیٰ امرتسری۔۔۔۔ جی مجھے یاد ہے۔۔۔ دارالاشاعت۔۔۔۔ جی باپو۔۔۔ باپو میں نے سب کچھ کاغذ پر لکھ رکھا ہے۔۔۔۔ اب تو صبح ہی نکلوں گا۔ فکر نہ کریں ۔ فون لمبا ہو رہا ہے۔۔۔۔ سب ویسے کا ویسا ہی ہے باپو۔۔۔ بس باپو۔

اس نے چونگا کریڈل پر رکھ دیا۔ فون کا اچھا خاصا بِل بن گیا تھا۔

خیر کوئی بات نہیں۔ باپو کی پریشانی تو ختم ہوئی۔ پبلک کال آفس سے ہوٹل تک آتے آتے اس نے سوچا۔

کمرے میں آیا تو دروازے کو اندر سے لاک کرنے کے بعد وہ کچھ دیر کے لیے اسٹیشن کی جانب کھلنے والی کھڑکی کے قریب کھڑا ہوگیا۔

رات کے گیارہ بجنے والے تھے۔ اب نیچے سڑک پر ٹریفک کم ہوئی تھی اور اسٹیشن کے سامنے والے پارک کے گرد روشنی کی کمندیں تو پڑ رہی تھیں پر ذرا رک رک کر۔

اچانک اس کی نظریں پارک کے بیچوں بیچ ایستادہ روشن پہاڑ پر جم گئیں۔

ارے، یہ کیا ہے؟

پارک کے بیچ روشن پہاڑ تھا اور اس کے برابر میں ایک بہت بڑا میزائل آسمان کی سمت سر اٹھائے کھڑا تھا۔

یہ سب دن کے اُجیارے میں تو نہیں تھا یہاں۔ یا شاید دن کو ہنگامہ بہت تھا ان کے گرد، اس لیے نظر نہیں پڑی ان پر۔

دن کو یہ پہاڑ یہاں پر تھا بھی یا نہیں؟ وہ مخمسے میں پڑگیا۔

پارک میں پہاڑ اور میزائل چہار جانب سے پڑنے والی سرچ لائیٹوں سے روشن تھے اور پارک کی مدھم روشنی میں جو لوگ شام کو چادریں تانے مُٹھی چپّی کروارہے تھے، اب پہاڑ کے دامن میں بے حس و حرکت گٹھڑیوں کی صورت پڑے تھے۔ مُٹھی چپّی کرنے والے لڑکوں کے ہاتھوں میں تھامی تیل کی بوتلوں کی جھنکار اب سنائی نہیں دے رہی تھی۔

دیکھتے ہی دیکھتے یہ کیا ہوگیا۔ وہ سخت چکرایا ہوا تھا۔

پھر وہ کھڑکی سے دور ہٹ آیا۔ اس نے کمرے کی لائٹ بجھا دی اور بستر پر لیٹ گیا۔

باپو نے پاتھی گراﺅنڈ کی طرف جانے سے منع کیا تھا لیکن وہ اَن دیکھے چوک دالگراں سے سیدھا اُدھر ہی کو ہولیا۔ رام گلی والے اسکول میں چھٹی کے بعد سارے بچے پاتھی گراﺅنڈ میں فٹ بال کھیل رہے تھے۔ او بالے، اے چندو۔۔۔۔ اُن کی مائیں چلّا چلّا کر انھیں کھانا کھانے کے لئے بُلا رہی تھیں اور بچے، پسینے سے شرابور، جواب میں کہہ رہے تھے کہ نہیں کھانا، بس کھیلنے دو۔ اور سرائے سلطان کی جانب نکل جانے والی بسیں پھونپو بجاتی ہوئی، قطار اندر قطار چلی جاتی تھیں۔

صبح جب آنکھ کھلی تو خاصا دن چڑھ آیا تھا۔

ہوٹل کی لابی میں ناشتہ کرنے کے دورا منیجر سے بات ہوئی تو اس نے بتایا کہ ریلوے اسٹیشن کے سامنے والے پارک میں چاغی کے اس پہاڑ کا نمونہ دے دیا گیا ہے جو پاکستان کے پہلے ایٹمی تجربے میں اپنا رنگ بدل گیا تھا۔

‘اوہ۔۔۔۔ ‘ اس نے گہرا سانس لیا۔

پھر منیجر نے اسے لاہور کے تمام قابلِدید مقامات کے نام کاغذ پر لکھوا دیے۔ بھاٹی گیٹ، مینارِ پاکستان، شاہی قلعہ، بادشاہی مسجد۔۔۔۔۔ غرض یہ کہ بہت سے نام تھے۔

ہوٹل کی لابی سے اٹھ کر جب وہ اپنے کمرے میں کپڑے تبدیل کرنے گیا تو اس نے سوچا حویلی تو قریب ہی ہے، محض چند قدم کے فاصلے پر۔۔۔۔ کسی بھی وقت جایا جا سکتا ہے وہاں۔ کیوں نا آٹو رکشہ پکڑ کر پہلے قابلِ دید مقامات سے ہو آﺅں۔

پھر یوں بھی دن بہت چڑھ آیا تھا۔ مارچ کا اخیر تھا اور دھوپ کی حدت برح چلی تھی۔ اس نے سوچا اور آٹو رکشہ پکڑ کر نکل کھڑا ہوا۔

بھاٹی گیٹ کا علاقہ تو جامع مسجد پرانی دلی جیسا ہی تھا۔ جب گھومتا گھماتا مینارِپاکستان پہنچا تو سورج عین سر پر آگیا تھا۔

رنجیت سنگھ کی سمادھی سے ہو کر شاہی قلعہ کا چکر لگایا اور حضوری باغ میں بادشاہی مسجد کے سامنے بیٹھ گیا۔

بھاٹی گیٹ سے مینارِ پاکستان پیدل چل کر آنے اور قلعہ کی سیر کے بعد وہ قدرے تھک سا گیا تھا۔ واپسی پر آٹو رکشہ پکڑتے ہوئے اس نے انارکلی بازار اور پنجاب یونیورسٹی جانے کا ارادہ ترک کردیا ۔ البتہ عجائب گھر جانے کی خواہش ضرور تھی۔

‘بھائی، عجائب گھر چلو’

وہاں پہنچا تو دیکھا ملکہ وکٹوریہ کا ایک بہت بڑا پیتل کا مجسمہ عجائب گھر کے اندر رکھا ہے۔ کیا باپو چھُُپٹنے میں عجائب گھر آیا کرتے تھے یا کوئی اور مجسمہ ہے یہ؟ وہ تھوڑا سا گڑبڑایا۔ وقت بھی تو بہت گزر گیا۔ بہت ممکن ہے باپو بھول کر غلط جگہ بتا گئے ہوں۔ اس نے سوچا۔

‘بھائی، وائسرائے کا دفتر کہاں ہے؟’ اس نے قریب ہی کھڑے عجائب گھر کے ایک اہلکار سے پوچھا۔

‘وائسرائے کا دفتر؟ نہیں معلوم کون سے دفتر کا پوچھ رہے ہیں آپ۔’

غلطی ہوگئی۔ پہلے کیوں نا ہو آیا ٹھنڈی سڑک کے چیئرنگ کراس سے۔ اس نے احساس ندامت سے سوچا۔

کوئی بات نہیں۔ اب چلتا ہوں ٹھنڈی سڑک کے چیئرنگ کراس پر۔

اُس نے عجائب گھر سے نکل کر آٹو رکشہ روکا۔

‘ٹھنڈی سڑک جانا ہے بھائی۔ چیئرنگ کراس لے چلو۔’

‘جی؟ ٹھنڈی سڑک کا تو مجھے معلوم نہیں۔ چیئرنگ کراس پہنچا دیتا ہوں آپ کو۔ وہاں سے معلوم کر لیجیے گا ٹھنڈی سڑک کا بھی۔’

ابھی سورج نہیں ڈوبا تھا، اس کے باوجود سڑک کے دونوں اطراف میں جیسے روشنیوں کا سیلاب امڈ آیا تھا۔

چیئرنگ کراس پہنچے تو وہاں نہ تو ٹھنڈی سڑک تھی نہ وائسرائے کا دفتر۔ چیئرنگ کراس پرکھڑے کھڑے اِکا دُکا راہ گیروں سے پوچھا۔ سبھی اس روشنیوں کے سیلاب میں نہائی ہوئی بڑی سڑک کو شاہراہِ قائداعظم یا مال روڈ بتاتے تھے اور وائسرائے کے دفتر کا کہیں نام و نشان نہ تھا۔ چڑیا گھر کی موجودگی تو ثابت تھی، لیکن چیئرنگ کراس کی ایک جانب واپڈا ہاﺅس کی بلک بوس عمارت تھی اور دوسری جانب پنجاب اسمبلی ہال۔ چیئرنگ کراس کے تکونے احاطے میں پارک تو تھا لیکن اردگرد کا نقشہ وہ نہیں تھا جو باپو نے بار بار ذہن نشین کروایا تھا۔

پھر اس نے چیئرنگ کراس کے اس نیم روشن تکونے احاطے کے اندر کا کر دیکھا تو ملکہ وکٹوریہ کا مجسمہ غائب تھا اور اس کی جگہ سنگ مر مر سے تراشی ایک بہت بڑی رِحل دھری تھی اور اس کے اوپر سنگ مر مر ہی سے تراشا گیا قرآن۔

وہ پیچھے ہٹ گیا۔

اب وہ اس بات پر حیران تھا کہ اگر یہی چیئرنگ کراس ہے تو ٹھنڈی سڑک کیا ہوئی، جس کے دونوں اطراف میں گھنے درخت تھے اور وائسرائے کا دفتر کدھر گیا۔

تو کیا باپو کی یادداشت گڑبڑ ہوگئی؟

آج کسی طور باپو کو فون کرنا نہیں بنتا۔ اس نے سوچا۔

ٹھنڈی سڑک، ملکہ وکٹوریہ کے مجسمے اور وائسرائے کے سفتر کا چیئرنگ کراس سے غائب ہو جانا یقیناً ان کے لیے صدمے کا باعث ہوگا۔

کل کر دوں گا فون، کوئی بہانہ بنا دوں گا، کہہ دوں گا کہ فون کی لائنیں نہیں مل رہی تھیں۔

اس نے سوچا اور دیر تلک چیئرنگ کراس پر ششدر کھڑا رہا۔

ہوٹل کی لابی میں رات کا کھانا کھاتے ہوئے اس نے بیٹھے بیٹھے منیجر سے کہا:

‘بھائی صاحب! مجھے وائسرائے کے دفتر جانا تھا، بہت ڈھونڈا پر نہیں ملا’

‘کہاں جانا تھا؟’

‘بھئی ٹھنڈی سڑک پر وائسرائے کا دفتر ہے نا۔’

‘جی، کون سا دفتر؟ ابھی معلوم کیے دیتا ہوں۔۔۔۔ میں تو یہ نام پہلی بار سن رہا ہوں’۔ پھر منیجر نے کام میں منہمک ایک سے پوچھا اور سوچ میں ڈوبا رہا۔

‘مجھے لاہور میں رہتے کرتے آٹھ دس برس تو ہوگئے ، پر اس دفتر کا نام نہیں سنا میں نے۔ خیر معلوم کر لیں گے۔ اور سنائیں آپ ہو آئے مینارِ پاکستان او شاہی قلعے سے؟’

‘جی، ہو آیا۔۔۔۔ کسی طرح معلوم کر کے بتایئے، میں نے جانا تھا اُدھر۔’

‘ٹھیک ہے۔ آپ فکر نہ کریں’

رات کو سوتے وقت اس خیال نے ڈھارس بندھائی کہ کل حویلی کا چکر لگے گا تو گلی محلے اور حویلی کی خیر خبر سن کر باپو خوش ہو جائیں گے۔

صبح اٹھ کر اس نے دیر نہیں کی۔ واش روم سے جھٹ پٹ تیار ہو کر نکلا اور ہوٹل کی لابی میں چلا آیا۔ اس وقت منیجر اپنی سیٹ پر نہیں بیٹھا تھا۔ پھر اس نے ہلکا سا ناشتہ کیا اور ہوٹل سے نکل کر باپو کے بتائے ہوئے راستے پر ہو لیا۔

باپو کی ہدایت کے عین مطابق اس نے لنڈا بازار والی سڑک کے متوازی نکل جانے والی ریلوے روڈ ہی کو چُنا، لیکن دور تک اسے اُدھر کو جاتا نہ کوئی تانگہ دکھائی دیا نہ سرائے سلطان کی جانب سے ریلوے اسٹیشن کی سمت آتی کوئی لاری دکھائی دی۔

وقت بھی تو بہت گزر گیا۔ اس نے سوچا۔

اس کے باوجود راہ چلتے وہ کئی بار ٹھنک کر رکا لیکن اس وقت سب جلدی میں تھے اور فٹ پاتھ کے برابر والی دکانیں ابھی کھلی نہ تھیں۔ وہ کس سے پوچھتا۔ بس چلتا گیا۔

جب ایک چورستے میں پہنچا ہے تو نان چنے کی ریڑھی کے گرداگرد ناشتہ کرنے والوں کا ہجوم دیکھ کر رُک گیا۔

‘بھائی صاحب! کیا یہی چوک دالگراں ہے؟ میں نے جانا تھا اُدھر؟’

یہ سُن کر ناشتہ کرتے ہوئے ایک بھاری تن و توش والا شخص خوش طبعی سے بولا

‘جانا نہیں تھا۔ آپ خیر سے چوک دالگراں پہنچ گئے۔ آﺅ بسم اللہ ناشتہ کرو’

‘جی۔۔۔ جی شکریہ۔ میرا مطلب ہے، سرائے سلطان کا لاری اڈہ قریب ہی ہے کیا؟’

‘سرائے سلطان کا لاری اڈہ؟’

سب حیرانی سے بڑبڑائے اور اک دوجے کی جانب استعجابیہ انداز میں دیکھنے لگے۔

‘چلئے یہ بتا دیجیے لالہ جسونت کی حویلی کس طرف کو ہے؟’

‘لالہ جسونت سنگھ کی حویلی؟’

ایک بار پھر سب کے سب تعجب سے اسے دیکھ رہے تھے۔

‘اچھا۔۔۔ کوئی بات نہیں۔ رِشی بھَون تو قریب ہی ہوگا’

‘رِشی بھَون؟’

اب سارے کے سارے تعجب سے اسے دیکھ رہے تھے۔

وہ بوکھلا کر تیز تیز قدم اٹھاتا آگے بڑھ گیا۔

پھر جب تک چورستے کی ساری دکانیں کھل نہیں گئیں وہ اسی بدحواسی میں کبھی دائیں اور کبھی بائیں اسی بازار میں بھٹکتا ہھرا۔ دوبارہ کسی سے پوچھنے کی ہمت جواب دے گئی تھی۔

وہ مایوس ہو چلا تھا کہ اچانک اس کی نظریں ایک کباڑخانے کے چھجے سے مُلحقہ بڑے سے محرابی گیٹ پر جم گئیں۔ اُس گیٹ کی کائی زدہ دیوار پر ‘سرائے سلطان’ درج تھا اور اس کے نیچے نہ پڑھی جاسکنے والی کوئی سنہ لکھی تھی۔

خوشی کی ایک لہر سی اٹھی، جس نے اس کے بدن میں بجلی سی بھر دی۔

وہ کباڑ خانے کی جانب یوں بڑھا جیسے سب کچھ پالیا۔

سرائے سلطان کے محرابی دروازوں کے اندر نیم تاریک کباڑ خانے میں ایک خمیدہ کمر بُڈھا کباڑ کے ڈھیر سے اشیا کی چھانٹی کا کام کر رہا تھا۔

‘بابا جی سلام! یہی سرائے سلطان ہے نا؟’

‘ہاں۔۔۔ کبھی تھی’

خمیدہ کمر کباڑیئے نے اس کی جانب مُڑ کر دیکھے بغیر جواب دیا۔

‘بابا جی، کیا یہی لاری اڈہ تھا پہلے؟’

‘ہاں، تھا۔ پرانی بات ہے۔۔۔۔’

‘میں لالہ جسونت سنگھ کا پوتا پوں بابا جی۔۔۔۔۔ دِلّی سے آیا ہوں’

‘کیا کہا۔۔۔ لالہ جسونت؟’

بڈھا کباڑیا کام چھوڑ کر مُڑا اور اس نے بیٹھنے کے لیے مونڈھا آگے کو سرکایا۔

‘جی میں لالہ جسونت سنگھ کا پوتا ہوں۔ حویلی جانا تھا۔ باپو نے بتائا تھا کہ رِشی بھون کے قریب چوک ہی میں ہے کہیں۔ ‘

اس نے مونڈھے پر بیٹھتے ہوئے کہا۔

‘ہاں۔۔۔۔ لالہ جسونت کی حویلی۔۔۔۔۔ پر اب کیا جاﺅ گے حویلی۔ وہاں تو خرادیے بیٹھ گئے۔ اس چوک سے بائیں ہاتھ امام باڑے کا عَلم دکھائی دے گا۔ اس سے ذرا پہلے خراد کا کارخانہ ہے۔ وہی حویلی تھی، لالہ جسونت سنگھ کی’

‘اوہ۔۔۔۔ کیا سب کچھ ختم ہو گیا بابا جی’

‘نہیں۔۔۔۔۔ عمارت موجود ہے۔ پر اب وہاں کوئی رہتا نہیئں۔ خرادیے جو بیٹھ گئے۔۔۔۔ چائے پیﺅ گے؟’

‘اور رِشی بھون بابا جی؟’

‘پی لو چائے، دُور سے آئے ہو۔ کوک، فانٹا پیﺅ گے؟’

‘بابا جی، بہت مہربانی آپ کی۔ ابھی ناشتہ کر کے آیا ہوں، چلوں گا۔ آپ کام کیجیے۔ آگے بھی جانا ہے مجھے۔ گوالمنڈی کی طرف۔۔۔۔ رِشی بھون کا تو بتایا نہیں آپ نے۔’

‘بیٹا۔ بتایا تو ہے۔۔۔۔ تمھاری حویلی کے برابر والا امام باڑہ ہی کبھی رشی بھون تھا۔ سنہ سینتالیس کے بعد محکمہ اوقاف والوں نے بڑی مدت بند رکھا۔۔۔۔ پھر امام باڑہ بن گیا’

یہ سن کر وہ اٹھ کھڑا ہوا لیکن ٹانگوں میں جیسے جان ہی نہیں تھی۔

‘بیٹھو نا بیٹا’

‘بس بابا جی۔ کچھ کام ہیں چھوٹے موٹے۔ اب چلتا ہوں۔ نمسکار’

‘جیتے رہو’

کباڑی بابا نے دوبارہ کباڑ کے ڈھیر سے چھانٹی کا کام شروع کر دیا۔

جب وہ سامان سے لدے پھندے ریڑھوں اور دھواں اگلتے آٹو رکشوں میں سے رستہ بناتا، ڈولتا سنبھلتا چوک سے بائیں ہاتھ مُرا تو سامنے امام باڑہ تھا۔

اس نے وہ چند قدم کا فاصلہ صدیوں میں طے کیا اور امام باڑے کی برابر والی بوسیدہ حویلی کی ڈیوڑھی کے سامنے دیر تلک کھڑا ریا۔ اندر مشینوں پر خرادیے جھکے ہوئے تھے اور مشینوں سے چنگاریں اٹھ رہی تھیں۔ لوہے کو لوہا کاٹ رہا تھا۔

اس نے وہیں کھڑے کھڑے رشی بھون پر نگاہ کی۔

امام باڑے کے اُوپر سیاہ علم لہرا رہا تھا اور پرانی عمارت نئے سرے سے پلستر کر کے رنگ دی گئی تھی۔

وہ پلٹا اور چوک دالگراں سے ہوتا ہوا گوالمنڈی کی جانب چل دیا۔

سامنے والے ایک خستہ مکان کی ممٹی پر کبوتر بیٹھے تھے۔ کیا پتا ان میں شیرازی، لقا اور لوٹن کبوتر بھی ہوں۔ اس نے سوچا۔

چلتے چلتے تاج کمپنی کے صدر دروازے پر نگاہ پڑی تو اس کے اندر کی ٹوٹ پھوٹ میں سے شادمانی کی ایک لہر اٹھی اور ساتھ ہی دم توڑ گئی۔ اس نے تاک کمپنی کی گرانڈیل بلڈنگ کی بیرونی دیوار پر آویزاں نیلامی کا اشتہار پڑھ لیا تھا۔

آگے دائیں ہاتھ اسلامیہ کالج تو موجود تھا لیکن اس کے سامنے عرب ہوٹل کا نشان تک نہ تھا۔ جستی پائپ، سینیٹری اور ربڑ کی دوطرفہ دکانیں تھیں اور بس۔ معلوم کیا تو پتا چلا کہ برس ہا برس ہوگئے عرب ہوٹل کو ختم ہوئے۔ ساتھ ہی رام گلی تھی۔ وہ اُدھر کو مُڑ گیا۔

رام گلی کی وہی پرانی بالکونیاں، جو باپو کی یادوں میں آباد تھیں، اب منہدم ہونے کو تھیں۔

رام گلی میں آگے چل کر ایک اسکول دکھائی دیا، جو اب مسلم ماڈل ہائی سکول بن چکا تھا، عمارت پرانی تھی۔

یقیناً بابو، اسی اسکول میں بالا اور چندو لوگوں کے ہم جماعت رہے ہونگے۔ اس نے خیال کیا۔

اس وقت اسکول کا گیٹ بند تھا اور بچوں کی بھاگا بھاگ سے پیدا ہونے والی ہلچل پوری گلی میں محسوس کی جارہی تھی۔

چوک برف خانہ سے آگے دواخانہ حکیم موسیٰ امرتسری تو موجود تھا لیکن دور و نزدیک کسی پُستک بھنڈار کا وجود نہ تھا۔ اسی علاقہ کے دکاندارون سے معلوم کرنے پر پتا چلا کہ گزشتہ برس دارالاشاعت پنجاب کی عمارت گرادی دی گئی، جو ایک مدت سے اجاڑ پڑی تھی۔

اب دارالاشاعت کی جگہ ایک نو تعمیر شدہ پلازہ کھڑا تھا۔ ”حمزہ سینٹر“ کے نام سے۔ جس کے اندر جستی پائپ، سینیٹری کے سامان اور ربڑ کی شیٹوں کے انبار لگے تھے۔

ذرا فاصلے سے کھڑے ہو کر اس نے نو تعمیر شدہ عمارت پر نظر ڈالی تاکہ باپو کو بتا سکے کہ وہ جگہ کیسی تھی۔

پھر اچانک اس کی نظریں حمزہ پلازہ کی بیرونی دیوار اور بجلی کے کھمبے کے بیچ جھولتے ہوئے کینوس کے ایک بہت بڑے اشتہار پر جم گئیں۔ پر اُردو کمزور ہونے کے سبب اس سے پورا اشتیار نہیں پڑھا گیا۔ لکھا تھا

‘چلو چلو، ملتان چلو
تین روزہ سُنتوں بھرا اجتماع
شیر شاہ بائی پاس صحرائے مدینہ، ملتان
فرزندان اسلام کے قافلوں کا سلسلہ جاری ہے’

وہ تھکے تھکے قدم اٹھاتا ہوٹل کی جانب پلٹ پڑا۔ یہ سوچتے ہوئے کہ آج باپو کو فون بھی کرنا ہے۔

اب اُس کی مشکل یہ تھی کہ باپو کو کیا بتائے اور کیا نہ بتائے۔

ہوٹل کی لابی میں پہنچا تو وہ گہری سوچ میں ڈوبا ہوا تھا۔

‘آج تو آپ سویرے سویرے ہی نکل لیے۔ کہاں کہاں کا چکر لگا؟’ منیجر نے خوش مزاجی سے پوچھا۔

‘سبھی جگہوں سے ہو آیا،منیجر صاحب۔ بہت تھک گیا۔ آج بیٹھوں گا نہیں، کھانا اُوپر ہی بھجوا دیجیے گا۔’

‘طبیعت تو ٹھیک ہے نا آپ کی؟’

‘ہاں، ٹھیک ہوں۔ بس ذرا تھک گیا’۔ اس نے کمرے کی چابی وصول کرتے ہوئے اوپر کا رُخ کیا۔

سارا دن کمرے ہی میں گزار کر جب وہ نیچے آیا تو شام گہری ہو چلی تھی۔

منیجر نے دیکھ کر دور سے ہاتھ ہلایا لیکن وہ لابی میں نہیں رُکا اور باہر نکل آیا۔

جب پبلک کال آفس کے آپریٹر نے اسے دہلی کا فون ملا کر دیا تو گزشتہ کل، فون نہ کرنے پر باپو ناراض ہو رہے تھے۔

لیکن باپو، آج میں ہو آیا حویلی سے۔۔۔۔ سب ویسے کا ویسا ہی ہے باپو۔۔۔۔ کچھ بھی تو نہیں بدلا۔۔۔۔ میں حیران ہوں باپو کہ چوک دالگراں اور رام گلی کے سارے ورشٹ ناگرک، دادا جان کو ابھی تک نہیں بھولے۔۔۔۔ اقبال گجر جنھیں آپ بالا کہتے ہیں نا، وہ زندہ اور صحت مند ہیں۔ ملے تھے بہت محبت سے۔۔۔۔ کہہ رہے تھے کہ تیرے پتا جی تو مجھ سے دو چار ماہ چھوٹے ہی ہونگے، وہ بوڑھے اور کمزور کس طرح ہو سکتے ہیں۔ پھر انہوں نے آپ کی صحت کے لئے بھگوان سے پرارتھنا بھی کی۔۔۔ حویلی والے خاندانی لوگ ہیں باپو۔ مجھے اپنے ہی ہاں ٹھہرنے کو کہہ رہے تھے پر میں ہوٹل میں ہی ٹھہروں گا۔۔۔ باپو، میں اندر گیا تھا حویلی کے صحن میں۔ برآمدے کی پرچھتی کے نیچے اب تخت پوش تو نہیں۔۔۔ زمانہ بھی تو بہت گزر گیا نا۔۔۔۔ پر صحن کا کنواں ویسے کا ویسا ہی ہے، جیسا آپ نے بتایا تھا۔۔۔ کنویں پر موٹر لگا لی انھوں نے۔ اُوپر چھجے پر کبوتر بھی تھے۔۔۔۔ رِشی بھون کی سندرتا دیکھنے کے قابل ہے باپو۔۔۔۔ مندر میں پرارتھنا اور دین دھرم کے معاملے میں کوئی پابندی نہیں، دان پُن بھی بہت کیا جاتا ہے۔۔۔۔۔ سب ویسے کا ویسا باپو۔۔۔۔۔ واپسی پر سب بتاﺅں گا۔۔۔۔ دو چار دن سیر کر کے آجاﺅں گا باپو۔۔۔۔ زیادہ نہیں رُکنا۔۔۔ ٹھیک ہے باپو۔

بات جاری تھی پر اُس نے خود ہی فون بند کر دیا۔

‘ایک بوجھ اُتر گیا۔’ وہ بڑبڑایا۔

ہوٹل پلٹ کر اس نے لابی میں بیٹھ کر کھانا کھایا اور کچھ دیر منیجر سے گپ شپ کرنے کے بعد اپنے کمرے میں چلا آیا۔

دوپہر سے شام تلک سوچ بچار کرنے اور بے کلی سے کمرے میں ٹہلتے رہنے کے باعث وہ تھک گیا تھا۔ بستر پر لیٹنے کے کچھ ہی دیر بعد سو گیا۔

اُس نے دیکھا کہ گرمیوں کا موسم ہے اور ہر طرف گرم لُو چل رہی ہے۔ ایسے میں ٹھنڈی سڑک کے دو رویہ درختوں کی گھنی چھاﺅں میں لوگ بیٹھے سستا رہے ہیں اور چیئرنگ کراس کے تکونے احاطے کے پیچ ٹھنڈے سائے میں باپو کروٹ لیے لیٹے ہیں۔ اس بات سے بے نیاز کہ وہ ٹھنڈا سایہ ملکہ وکٹوریہ کے مجسمے کا ہے یا سنگِ مر مر سے تراشی گئی رِحل کا۔

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10 Responses to Lala Jaswant Singh Ki Haveli….by Mirza Hamid Baig

  1. It indeed is very difficult to decide ki bapu ko kya batayein, kya na batayein. Very nice story.

  2. Farwa says:

    Amazing write-up. Loved it 🙂

  3. Imtiaz Rasheed says:

    Great story…. Lahore’s lost past paradise ….

  4. Shahid Ahmed says:

    Time never stops, and change is must. One can never forget where they spent their childhood. A great spirtiual story. Although I never lived inside wall city of Lahore (lived in Graden Town), but have been to all those places many many times, so I can relate myself to the emotions of Lala Jaswant Singh. God bless him.

  5. its very difficult to read because of tooi phooti urdu 😦

  6. Sudip verma says:

    Dil ki chu gayi yeh kahani… Someday i will come to Lahore. Mujhe Shaheed Bhagat Singh or Data Sahib ka vaasta !

    Love to Lahore & Pakistan

  7. Preeti Kaul says:

    Very touching story… filled with memories of pre-partitioned Lahore and the stark reality of present day Lahore. What I particularly loved was the description of the haveli and Sehan by the old father and his days as a boy studying in Ramgali school.

    I loved it..

  8. Bhaswati Ghosh says:

    Wonderful story. I want to get in touch with the Hindi translator. Can you help?

  9. The previous comment was mine. The link on that is incorrect.

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