Raste Band Hain… By Muhammad Mansha Yaad

Photo by: Myra Iqbal

“रास्ते बंद हैं”

लेखक : मुहम्मद मनशा याद
उर्दू से हिंदी : शीराज़ हसन

वो मेला देखने आया हुआ है और उसकी जेब में फूटी कोड़ी नहीं|

मैं उस से पूछता हूँ,”जब तुम्हारी जेब में फूटी कोड़ी नहीं थी, तो तुम मेला देखने क्यूँ आये हो?”

वो पहले रोता और फिर हँसता है और कहता है,”मैं मेले में नहीं आया… मेला ख़ुद मेरे चारों तरफ लग गया है और मैं इसमें घिर गया हूँ | मैंने बाहर निकलने की कई बार कोशिश की है, मगर मुझे रास्ता सुझाई नहीं दिया”
मुझे उस की बात पर यक़ीन ना करने की कोई वजह नज़र नहीं आती, इसलिए मैं परेशान हो जाता हूँ क्यूंकि मैं उस की निगेह्दाश्त[१] पर मामूर[२] हूँ| मुझे पता नहीं मुझे उसकी निगेहदाश्त पर किसने मामूर किया है? मैं बस इतना जानता हूँ कि मुझे हर वक़्त उस के साथ रहना और उसे भटकने से बचाना है|

मेला ज़ोरों पर है| चारों जानिब इंसान ही इंसान नज़र आते हैं| जितने लोग मेले से जाते हैं उससे कई गुना ज़्यादा आ जाते हैं| सड़कों पर, हर तरफ ताँगे, बैल गाड़ियाँ, बसें, ट्रक, कारें और मोटर साइकलें एक दूसरे से आगे निकलने की नाकाम कोशिश करती| होर्न बजाती, धुआँ उड़ाती नज़र आती हैं| होर्न बजा बजा कर ड्राईवरों के और मुसलसल[४] घंटियाँ बजा बजा कर साईकल सवारों के हाथ थक गए हैं| पैदल चलने वालों के चेहरे धूल से अटे हुए हैं और कपड़ों पर गर्द जमी है| लेकिन मेले के शोर ने उनके थके हुए निढाल जिस्मों में नई रूह फूँक दी है| मेले की फिज़ा को धूएँ, गर्द और शोर ओ गुल के बादलों ने ढाँप रखा है| बड़े बड़े लाऊड़ स्पीकरों पर इंसानी आवाज़ें गरजती और चिंघाड़ती हैं| झूलों की चीख़ें, ढोलों की घुम्कारें, मदारियों की बांसुरियों की कूकें और ख्वान्चा फ्रोशों[५] की सदाएं एक दुसरे में ख़लत मलत[६] हो रही हैं|

इन सैंकड़ों क़िस्म की आवाज़ो के शोर में उसे सोडा वॉटर की बोतल खुलने की “बक” जैसी आवाज़ सब से अच्छी लगती है| वो उसे किसी सुरीले नग़मे की तरह सुनता और चाटता है| मैंने कई बार चिल्ला चिल्ला कर उसे आगे बढ़ने के लिए कहा है, मगर वो सोडा वॉटर की बोतलों की दुकान के सामने पत्थर हो गया है| मेरे लिए अजीब मुश्किल है| काश मैं उस से अलेहदा[७] हो सकता, उसे उसके हाल पर छोड़ कर जा सकता| मैं उस की कमीनी हरकतों से आजिज़ आ गया हूँ| अजीब नदीदा[८] आदमी है| सुबह वो कितनी ही देर उसी भट्टी के करीब खड़ा झुलसता रहा जिस पर पुरियां तली जा रही थीं, और यह जानते हुए भी कि उस की जेब में फूटी कोड़ी नहीं, वो बार बार जेब में हाथ डालता फिर ख़ाली हाथ को यूं घूरता जैसे उसकी हथेली पर गर्म गर्म पुरी रखी हो| अजीब वाहियात इंसान है| खाना खाते हुए आदमी के सामने उकडूं बेठे कुत्ते की आँखों में इतना नदीदापन नहीं होता, जितना हलवा पुरी खाते और फ़लूदा पीते लोगों को देख कर उस की निगाहों में झलकने लगता है|

और मेले में देखने की सैंकड़ों चीज़ें हैं| थीएटर के मसख़रे, नाचती गाती औरतें, सर्कस के जानवरों के करतब, मोत के कुँए में चलती मोटर साइकल और चलाने वाले की गोद बैठी लेडी, ऊपर नीचे जाते झूले, फिल्म की टाकी पर दो गाने गाते हुए आशिक़ ओ माशूक़[९] और मदारी के तोप चलाते तोते लेकिन उसे इन में से किसी चीज़ से दिलचस्पी नहीं हालांकि सर्कस के बाहर फ़िल्मी रिकार्डों की धुनों पर नाचते मसख़रों[१०] को देखने पर तो ख़र्च भी कुछ नहीं आता, मगर उसे सिर्फ़ फ़लों, मिठाइयों, फालूदों, आइस-क्रीमोँ , सोडा वॉटर की बोतलों और सीख़ोँ में पिरोय मुर्ग़ों को देखना, घूरना और उनकी ख़ुशबू सूंघना अच्छा लगता है| और हालांकि दोनों वक़्त पीर साहब के डेरे पर से भंडारे की दाल रोटी मिल जाती है, लेकिन उसका पेट नहीं भरता. रात वो मुझे देर तक उन मिठाइयों, फ़लों और चीज़ों के नाम गिनवाता रहा जो उसने कभी नहीं चखी थीं| यह फ़ेहरिस्त इतनी त्वील थी कि मैं उकता गया और उसे मशवरा दिया कि वो सिर्फ़ उन चीज़ों के नाम बताए जिनके ज़ायके से वो आशना था| लेकिन वो रज़ामंद ना हुआ| उसका कहना था की वो लज़ीज़ चीज़ों के ज़िक्र से हासिल होने वाली लज़्ज़त से महरूम[११] होना नहीं चाहता|

मेले में उनकी जान पहचान के और लोग भी हैं|

इलाही बख्श नंबर-दार[१२] का लड़का आशिक़ जो अपने यार दोस्तों के हमराह मेले पर आया है, और उस के डेरे पर हर वक़्त मुजरा होता रहता है और शराब की बोतलें ख़ाली होती रहती हैं| तवाइफ़ें सरों पर रखे और दांतों से पकड़े नोट चुन चुन कर थक जाती हैं| उसने कई बार इरादा किया कि वो आशिक़ के डेरे पर चला जाए| लेकिन मैंने उसे मना कर दिया है| मैं नहीं चाहता कि वो वहाँ दिन रात चिलमें भरता रहे|फिर सरदार मुहम्मद थानेदार है, उसे एतबारी आदमियों की ज़रुरत भी है लेकिन मैंने उसे सरदार मुहम्मद के पास जाने से भी मना कर दिया है| अलिया नाई अपने हाल में मस्त है| जो मेले में ख़ाली हाथ नहीं आया अपने साथ रछानी लेता आया है| उसका जब जी चाहता है हजामतें बनाने लगता है और जब जी चाहता है, थीएटर देखने चला जाता है| थीएटर देखते हुए भी वो करीब बेठे हुए लोगों के नाखुन तराशता रहता है. सिर्फ़ मेहरू सांसी एक ऐसा आदमी है जो उसे देख कर ख़ुश होता है और ख़ुशी के इज़हार के लिए जब भी सामने आता है दांत निकलता है, या फिर कालू है जो उसे देखते ही दुम हिलाने लगता हालांकि उसने ज़िन्दगी भर उसे सूखी रोटी का टुकड़ा तक नहीं डाला|

उसे मेहरू सांसी अच्छा लगता है, शायद इस लिए कि मेहरू गन्दी चीज़ें सही, हर तरह की खाने पीने की चीज़ों के ज़ाएको से आशना है| पिछली बार तो उस ने हद ही कर दी थी| रात को जब अचानक आंधी आ गई तो कालू के साथ पनाह लेने के लिए एक तख़्त पोश[१३] के नीचे घुस गया| तख़्त पोश के नीचे क़लाकंद से भरी कढाई रखी थी, जिसे उसने और कालू ने ख़ाली कर दिया+ उस दिन मेहरू को बाहर निकल कर दो बार गल्ले में उंगली डाल कर क़े करना पड़ी थी. अगर कालू की दुम उस के पाँव के नीचे ना आ जाती तो एक आध बार और कै कर के वो गुलाब जामुनों का भी सफाया कर देता| उसे मेहरू और कालू पर रश्क आता था| अगर मैं उस के हमराह होता या उस से बेपरवाह हो कर सोया रहता तो वो यकीनन भटक जाता| चिलमें भरता| दलाली करता या फिर किसी तख़्त पोश के नीचे घुस कर क़लाकंद या गुलाब जामुनें खा रहा होता| उसने कई बार इरादा किया कि किसी हलवाई की दूकान या किसी होटल में घुस कर जी भर के खाए और ख़ुद को दुकानदार या पुलिस के हवाले कर दे| लेकिन मैंने हर लम्हा उसे ऐसी हरकतों से बाज़ रखा है|
मेले का आज तीसरा रोज़ है|

और मैं निहायत मुश्किल में हूँ|

वो बग़ावत पर आमादा है|

मुझे उसके तेवर बिगड़े हुए नज़र आते हैं| सोडा वॉटर की बोतल खुलने की “बक” जैसी आवाज़ सुन कर उसकी तशफ़ी नहीं होती|

वो हलवा पुरी , क़लाकंद और बालूशाही के ज़िक्र से मुतमईन[१४] नहीं होता|

भुने हुए गोश्त और रोस्ट मुर्ग़ की खुशबू से उसका जी नहीं बहलता और वो फ़लों के नाम गिनवा कर लज़्ज़त हासिल करने पर क़नात नहीं करना चाहता|
मैंने उसे बहुत समझाया है| लान तान और मुलामात की है, लेकिन वो मिस्र है कि वो हर क़ीमत पर उन सब चीज़ों को चख कर देखना चाहता है जिन के ज़ायेके से वो ना आशना है. गुज़श्ता[१५] रात हम दोनों देर तक लड़ते झगड़ते रहे हैं| मैंने उसे साफ़ साफ़ बता दिया है कि अगर वो बाज़ न आया तो मुझे ज़िन्दा न देखेगा लेकिन उसका कहना है कि अगर उस ने अपनी ख्वाहिश[१६] का गला घोंट दिया तो घुट कर मर जाएगा|

मैं अजीब उलझन में हूँ| शायद वो वक़्त आ गया है, जब हमें फैसला करना होगा कि हम दोनों में से किसे ज़िन्दा रहना चाहिए|

लेकिन मैं उसे भी ज़िन्दा, ख़ुश और मुतमईन देखता चाहता हूँ| मैं उसकी तवज्जो[१७] हटाने कि कोशिश करता हूँ और उसे मदारी के करतब, झूलों के मंज़र और मसख़रों के नाच दिखाना चाहता हूँ, लेकिन वो कीमा करेले, भुने हुए गोश्त और रोस्ट मुर्गी और क़लाकंद के ज़ाएको के लिए क़त्ल ओ ग़ारत पर उतर आया है|

वो कहता है “जब यह सब चीजें मौजूद हैं तो मैं इन के ज़ाएको से महरूम क्यूँ हूँ? “

मेरी समझ में नहीं आता कि मैं क्या करूँ, उसे कैसे समझाऊं और भटकने से कैसे बचाऊँ? मेले का चौथा और आख़री रोज़ है|

रात मुझे एक निहायत अछूता सूझा है और मैंने बड़ी मुश्किल से यह बात उस के ज़हन नशीं[१८] कराई है कि असल में सब इंसान एक ही इंसान का परतौ हैं या असल में इंसान एक ही है जो मुख्तलिफ़[१९] शक्लों में जगह जगह नज़र आता है| कहीं वो क़लाकंद खा रहा है| कहीं नाखुन तराश रहा है. कहीं रोस्ट मुर्ग़ उड़ाता है, और कहीं भंडारे कि दाल रोटी पे इक्तफ़ा करता है| इसलिए जो कुछ भी दुनिया में हो रहा है या खाया पिया जा रहा है, उस कि लज़्ज़त इंसान कि मुश्तरिका लज़्ज़त है| चुनांचा जब वो किसी को हलवा पुरी खाते देखता है, तो उसे महसूस करना चाहिए कि खुद हलवा पुरी खा रहा है और इस लज़्ज़त में बराबर का हिस्सा दार है|

मुझे उसकी यह आदत बेहद पसंद आई है कि जब उस के ज़हन में कोई बात बिठा दी जाए तो वो उससे सर मुँह इधर उधर नहीं होता| चुनांचा[२०] उसने जल्द ही मेरी इस अनोखी तजवीज़ [२१] पर अमल करना शुरू कर दिया है|

“बक” बोतल खुलने कि आवाज़ आती है|

एक पतला दुबला आदमी बोतल मुँह से लगाता है| वो अपनी जगा खड़ा मुस्कुरा कर मेरी तरफ़ देखता है और कहता है,” वाह ! वाह ! .क्या ठंडी ठार और मज़ेदार बोतल है!” फिर आस्तीन से मुँह पोंछ कर कहता है “मज़ा आ गया!” सीख़ कबाबों कि ख़ुशबू लपकती हुई आती है और उस के क़दम रोक लेती है|
वो मुँह खोले बग़ैर तिक्कों को दांतों से काटता चबाता है| फिर इन कि लज़्ज़त महसूस करते हुए कहता है,”ज़रा सख्त हैं| मगर गोश्त सख्त ही हो तो मज़ा देता है|”

मैं इत्मीनान का साँस लेता हूँ|

उसकी नज़रें बालूशाही के थाल पर हैं| वो दूकान से कुछ फासले पर खड़े खड़े बालूशाही खाना शुरू कर देता है| खाते खाते उसका मुँह थक जाता है| पेट फूल जाता है मगर बालूशाही ख़त्म होने का नाम नहीं लेती| मैं कहता हूँ, “और खाओ!”

“नहीं बस|” वो डकार लेते हुए जवाब देता है| पापड देखकर कहता है|

” मूह सलून करो गे?”

“हाँ…”

पापड उस के दांतों तले कड़कड़ाते हैं|

“कैसे हैं?”

“बहुत अच्छे हैं! बस ज़रा मसाला तेज़ है|”

“और क्या पसंद करोगे?”

“मैंने आज तक सेब नहीं चखा|”

मैं उसे फलों कि दुकान के सामने ले जाता हूँ, और सेबों कि तरफ़ इशारा कर के कहता हूँ,”यह सेब हैं, तुम जितने चाहो खा सकते हो|”

वो एक सैन निगाहों से उठाता है| दांतों से काटता है, और कहता है

“यह तो नाशपाती है|”

“यह नाशपाती नहीं सेब है, तुम इसे सेब कि तरह महसूसकर के खाओ|”

वो फिर दाँतो से काटता है और कहता है “यह अमरुद है|”

“यह अमरुद नहीं सेब है सेब|”

वो फिर कोशिश करता है, फिर कहता है

“यह आडू है”…..

मुझे ग़ुस्सा आ जाता है … “तुम उल्लू के पठ्ठे हो!”

वो मुझे उदास नज़रों से देखता है, और फिर रुआंसा हो कर कहता है

“मुझे क्या पता सेब का ज़ायेका कैसा होता है, मैंने कभी खाया ही नहीं|”

“अच्चा छोड़ो|”…

मैं कहता हूँ,”अब आगे चलते हैं”

हम बारी बारी एक दुसरे की उंगली पकड़े चलने लगते हैं. एक जगा बहुत से लोग जमा हैं.

“क्या बात है भाई?”….

वो पूछता है ”हादसा हो गया| आदमी ट्रक के नीचे आ कर कुचला गया”….

वो परेशान हो कर मेरी तरफ़ देखता है ….

फिर कहता है….

“ट्रक…. मेरे ऊपर से ट्रक गुज़र रहा है”….

“नहीं” …. मैं चिल्लाता हूँ|

लेकिन इससे पहले कि मैं कुछ और कहूँ वो धड़ाम से नीचे गिर जाता है, और देखते ही देखते ठंडा हो जाता है……|

 

 Glossary:

[१] निगेह्दाश्त: Taking caring. Care.
 
[२] मामूर: Assigned [on duty]
 
[३]  जानिब: To. Facet [Direction]
 
[४] मुसलसल: Continuously 
 
[५]   ख्वान्चा फ्रोशों Hawkers
 
 [६] ख़लत मलत: Moider. Mixed
 
[७] अलेहदा Separate
 
[८]  नदीदा Belly-pinched
 
[९]  आशिक़ ओ माशूक़ Lovers. Lover and Beloved.
 
[१०] मसख़रों Clowns
 
[११] महरूम : Deprived
 
[१२] नंबर-दार Chief of  village.
 
[१३] तख़्त पोश Throne Cover. A big table [in simple words]
 
[१४] मुतमईन Satisfied
 
[१५] गुज़श्ता By-gone. Previous
 
[१६] ख्वाहिश Desire
 
[१७] तवज्जो Attention
 
[१८] ज़हन नशीं Realize. To carry conviction.
 
[१९] मुख्तलिफ़ Different
 
[२०] चुनांचा Haynne. Therefore.
 
[२१]  तजवीज़ Suggestion

 

***

راستے بند ہیں

محمد منشا یاد

وہ میلہ دیکھتے آیا ہوا ہے اور اس کی جیب میں پھوٹی کوڑی نہیں۔

میں اس سے پوچھتا ہوں۔

‘جب تمہاری جیب میں پھوٹی کوڑی نہیں تھی تو تم میلہ دیکھتے کیوں آئے ہو؟’

وہ پہلے روتا ہے اور پھر ہنستا ہے اور کہتا ہے۔

‘میں میلے میں نہیں آیا۔۔۔ میلہ خود میرے چاروں طرف لگ گیا ہے اور میں اس میں گھِر گیا ہوں۔ میں نے باہر نکلنے کی کئی بار کوشش کی ہے مگر مجھے راستہ سجھائی دیا۔’

مجھے اس کی بات پر یقین نہ کرنے کی کوئی وجہ نظر نہیں آتی اس لیے پریشان ہو جاتا ہوں کیونکہ میں اس کی نگہداشت پر مامور ہوں۔ مجھے پتہ نہیں مجھے اس کی نگہداشت ہر کس نے مامور کیا ہے؟ میں بس اتنا جانتا ہوں کہ مجھے ہر وقت اس کے ساتھ رہنا ہے اور اسے بھٹکنے سے بچانا ہے۔

میلہ زوروں پر ہے۔

چاروں طرف انسان ہی انسان نظر آتے ہیں جتنے لوگ میلے سے جاتے ہیں اس سے کئی گنا زیادہ آجاتے ہیں۔ سڑکوں پر ہر طرف تانگے، بیل گاڑیاں، بسیں ، ٹرک، کاریں اور موٹر سائیکلیں ایک دوسرے سے آگے نکلنے کی ناکام کوشش کرتی ہیں۔ ہارن بجاتی، دھواں اُڑاتی نظر آتی ہیں۔ ہارن بجا بجا کر ڈرائیوروں کے اور مسلسل گھنٹیاں بجا بجا کر سائیکل سواروں کے ہاتھ تھک گئے ہیں۔ پیدل چلے والوں کے چہرے دھول سے اٹے ہوئے ہیں اور کپڑوں پر گرد جمی ہے۔ لیکن میلے کے شور نے ان کے تھکے ہوئے نڈھال جسموں میں نئی روح پھونک دی ہے۔ میلے کی فضا کو دھوئیں، گرد اور شور و غل کے بادلوں نے ڈھانپ رکھا ہے۔ بڑے بڑے لاﺅڈ سپیکروں پر انسانی آوازیں گرجتی اور چنگھاڑتی ہیں۔ جھولوں کی چیخیں، ڈھولوں کی گھمکاریں، مداریوں کی بانسریوں کی کوکیں اور خوانچہ فروشوں کی صدائیں ایک دوسرے میں غلط ملط ہورہی ہیں۔ ان سینکڑوں قسم کی آوازوں کے شور میں اسے سوڈا واٹر کی بوتل کھلنے کی ‘بَک’ جیسی آواز سب سے اچھی لگتی ہے۔ وہ اسے کسی سریلے نغمے کی طرح سنتا اور چاٹتا ہے۔ میں نے کئی بار چلا چلا کر اسے آگے بڑھنے کے لئے کہا ہے مگر وہ سوڈا واٹر کی بوتلوں کی دکان کے سامنے پتھر ہوگیا ہے۔ میرے لیے عجیب مشکل ہے۔ کاش میں اس سے علیحدہ ہوسکتا، اسے اس کی حال پر چھوڑ کر جا سکتا۔ میں اس کی کمینی حرکتوں سے آجز آگیا ہوں۔ عجیب ندیدہ آدمی ہے۔ صبح وہ کتنی ہی دیر تک اس بھٹی کے قریب کھڑا جھلستا رہا جس پر پوریاں تلی جا رہی تھیں اور یہ جانتے ہوئے بھی کہ اس کی جیب میں پھوٹی کوڑی نہیں، وہ بار بار جیب میں ہاتھ ڈالتا پھر خالی ہاتھ کو یوں گھورتا جیسے اس کی ہتھیلی پر گرم گرم پوری رکھی ہو۔ عجیب واہیات انسان ہے۔ کھانا کھاتے ہوئے آدمی کے سامنے اکڑوں بیٹھے کتے کی آنکھوں میں اتنا ندیدہ پن نہیں ہوتا، جتنا حلوہ پوری کھاتے اور فالودہ پیتے لوگوں کو دیکھ کر اس کی نگاہوں سے جھلکنے لگتا ہے۔

وہ میلہ دیکھنے آیا ہے۔

اور میلے میں دیکھنے کی سینکڑوں چیزیں ہیں۔ تھیٹر کے مسخرے، ناچتی گاتی عورتیں، سرکس کے جانوروں کے کرتب، موت کے کنویں میں چلتی موٹر سائیکل اور چلانے والے کی گود میں بیٹھی لیڈی، اوپر نیچے جاتے جھولے ، فلم کی ٹاکی پر دوگانے گاتے ہوئے عاشق و معشوق اور مداری کے توپ چلاتے طوطے لیکن اسے ان میں سے کسی چیز سے دلچسپی نہیں حالانکہ سرکس کے باہر فلمی ریکارڈوں کی دھنوں پر ناچتے مسخروں کو دیکھنے پر تو خرچ بھی کچھ نہیں آتا مگر اسے صرف کھانے پینے کی چیزوں سے دلچسپی ہے۔ اسے پھلوں، مٹھائیوں، فالودوں، آئس کریموں، سوڈا واٹر کی بوتلوں اور سیخوں میں پروئے ہوئے مرغوں کو دیکھنا، گھورنا اور ان کی خوشبو سونگھنا اچھا لگتا ہے اور حالانکہ دونوں وقت پیر صاحب کے ڈیرے پر سے بھنڈارے کی دال روٹی مل جاتی ہے لیکن اس کا پیٹ نہیں بھرتا۔ رات وہ مجھے دیر تک ان مٹھائیوں، پھلوں اور چیزوں کے نام گنواتا رہا جو اس نے کبھی نہیں چکھی تھیں۔ یہ فہرست اتنی طویل تھی کہ میں اُکتا گیا اور اسے مشورہ دیا کہ وہ صرف ان چیزوں کے نام بتائے جن کے ذائقے سے وہ آشنا ہے۔ لیکن وہ رضامند نہ ہوا۔ اس کا کہنا تھا کہ وہ لذیذ چیزوں کے ذکر سے حاصل ہونے والی لذت سے محروم ہونا نہیں چاہتا۔

میلے میں اس کی جان پہچان کے اور لوگ بھی تھے۔

الٰہی بخش نمبردار کا لڑکا عاشق ہے جو اپنے یار دوستوں کے ہمراہ میلے پر آیا ہے اور اس کے ڈیرے پر ہر وقت مجرا ہوتا رہتا ہے اور شراب کی بوتلیں خالی ہوتی رہتی ہیں۔ طوائفیں سروں پر رکھے اور دانتوں سے پکڑے ہوئے نوٹ چُن چُن کر تھک جاتی ہیں ۔ اس نے کئی بار ارادہ کیا کہ وہ عاشق کے ڈیرے ہر چلا جائے۔ لیکن میں نے اسے منع کر دیا ہے۔ میں نہیں چاہتا کہ وہ وہاں دن رات چلمیں بھرتا رہے۔ پھر سردار محمد تھانیدار ہے اسے اعتباری آدمیوں کی ضرورت بھی ہے لیکن میں نے اسے سردار محمد کے پاس جانے سے بھی منع کر دیا ہے۔ علیا نائی اپنے حال میں مست ہے۔ جو میلے میں خالی ہاتھ نہیں آیا اپنے ساتھ رچھانی لیتا آیا۔ اس کا جب جی چاہتا ہے حجامتیں بنانے لگتا ہے اور جب جی چاہتا ہے تھیٹر دیکھنے چلا جاتا ہے۔ تھیٹر دیکھتے ہوئے بھی وہ قریب بیٹھے ہوئے لوگوں کے ناخن تراشتا رہتا ہے۔ صرف مہرو سانسی ایک ایسا آدمی ہے جو اسے دیکھ کر خوش ہوتا ہے اور خوشی کے اظہار کے لیے جب بھی سامنے آتا ہے دانت نکالتا ہے یا پھر کالو ہے جو اسے دیکھتے ہی دُم ہلانے لگتا ہے حالانکہ اس نے زندگی بھر اسے سوکھی روٹی کا ٹکڑا تک نہیں ڈالا۔

اسے مہرو سانسی اچھا لگتا ہے شاید اس لیے کہ مہرو گندی چیزیں سہی ہر طرح کی کھانے پینے کی چیزوں کے ذائقوں سے آشنا ہے۔ پچھلی تو اس نے حد ہی کر دی تھی۔ رات کو جب اچانک آندھی آگئی تو کالو کے ساتھ پناہ لینے کے لئے ایک تخت پوش کے نیچے گھُس گیا تھا، تخت پوش کے نیچے قلاقند سے بھری کراہی رکھی تھی جسے اس نے اور کالو نے خالی کر دیا۔ اس دن مہرو کو باہر نکل کر دو بار گلے میں انگلی ڈال کر قے کرنا پڑی تھی۔ اگر کالو کی دم اس کے پاﺅں کے نیچے نہ آجاتی تو ایک آدھ بار اور قے کر کے وہ گلاب جامنوں کا بھی صفایا کر دیتا۔ اسے مہرو اور کالو پر رشک آتا تھا اگر میں اس کے ہمراہ نہ ہوتا یا اس سے بے پرواہ ہو کر سویا رہتا تو وہ یقیناً بھٹک جاتا۔ چلمیں بھرتا۔ دلالی کرتا یا پھر کسی تخت پوش کے نیچے گھس کر قلاقند یا گلاب جامنیں کھا رہا ہوتا۔ اس نے کئی بار ارادہ کیا کہ کسی حلوائی کی دکان یا کسی ہوٹل میں گھس کر جی بھر کے کھائے اور خود کو دکاندار یا پولیس کے حوالے کر دے۔ لیکن میں نے ہر لمحہ اسے ایسی حرکتوں سے بار رکھا ہے۔

میلے کا آج تیسرا روز ہے۔

اور میں نہایت مشکل میں ہوں۔

وہ بغاوت پر آمادہ ہے۔

مجھے اس کے تیور بگڑے ہوئے نظر آتے ہیں۔ سوڈا واٹر کی بوتل کھلنے کی ‘بَک’ جیسی آواز سن کر اس کی تشفی نہیں ہوتی۔

وہ حلوہ پوری، قلاوقند اور بالُو شاہی کے ذکر سے مطمئن نہیں ہوتا ۔

بھنے ہوئے گوشت اور روسٹ مرغ کی خوشبو سے اس کا جی نہیں بہلتا اور وہ پھلوں کے نام گنوا کر لذت حاصل کرنے پر قناعت نہیں کرنا چاہتا۔

میں نے اسے بہت سمجھایا ہے۔ لعن طعن اور ملامت کی ہے لیکن وہ مِصر ہے کہ وہ ہر قیمت پر ان سب چیزوں کو چکھ کر دیکھتا چاہتا ہے جن کے ذائقے سے وہ نا آشنا ہے۔ گزشتہ رات ہم دونوں دیر تک لڑتے جھگڑتے رہے ہیں۔ میں نے اسے صاف صاف بتا دیا ہے کہ اگر وہ باز نہ آیا تو مجھے زندہ نہ دیکھے گا لیکن اس کا کہنا ہے کہ اگر اس نے اپنی خواہش کا گلا گھونٹ دیا تو گھٹ کر مر جائے گا۔

میں عجیب الجھن میں ہوں۔ شاید وہ وقت آگیا ہے۔ جب ہمیں یہ فیصلہ کرنا ہوگا کہ ہم دونوں میں سے کسے زندہ رہنا چاہئے۔

میں زندہ رہتا چاہتا ہوں۔

لیکن میں اسے بھی زندہ، خوش اور مطمئن دیکھتا چاہتا ہوں۔ میں س کی توکی توجہ ہٹانے کی کوشش کرتا ہوں اور اسے مداری کے کرتب، جھولوں کے مناظر اور مسخروں کے ناچ دکھانا چاہتا ہوں لیکن وہ قیمہ کریلے، بھنے ہوئے گوشت اور روسٹ مرغی اور قلاقند کے ذائقوں کے لئے قتل و غارت پر اتر آتا ہے۔

وہ کہتا ہے ‘جب یہ سب چیزیں موجود ہیں تو میں ان کے ذائقوں سے محروم کیوں ہوں۔’

میری سمجھ میں نہیں آتا کہ میں کیا کروں۔ اسے کیسے سمجھاﺅں اور بھٹکنے سے کیسے بچاﺅں؟ میلے کا آخری اور چوتھا روز ہے۔

رات مجھے ایک نہایت اچھوتا خیال سوجھا ہے اور میں نے بڑی مشکل سے یہ بات اس کے ذہن نشین کرائی ہے کہ اصل میں سب انسان ایک ہی انسان کا پرتَو ہیں یا اصل میں انسان ایک ہی ہے جو مختلف شکلوں میں جگہ جگہ نظر آتا ہے۔ کہیں وہ قلاقند کھا رہا ہے۔ کہیں ناخن تراش رہا ہے۔ کہیں روسٹ مرغ اُڑتا ہے اور کہیں بھنڈارے کی دال روٹی ہر اکتفا کرتا ہے۔ اس لیے جو کچھ بھی دنیا میں ہو رہا ہے یا کھایا پیا جا رہا ہے اس کی لذت انسان کی مشترکہ لذت ہے۔ چنانچہ جب وہ کسی کو حلوہ پوری کھاتے ریکھتا ہے تو اسے محسوس کرنا چاہئے کہ خود حلوہ پوری کھا رہا ہے اور اس لذت میں برابر کا حصہ دار ہے۔

مجھے اس کی یہ عادت بے حد پسند آئی کہ جب اس کے ذہن میں کوئی بات بٹھا دی جائے تو وہ اس سے سومو ادھر اُدھر نہیں ہوتا۔ چنانچہ اس نے جلد ہی میری اس انوکھی تجویز پر عمل کرنا شروع کر دیا ہے۔

‘بَک’ بوتل کھلنے کی آواز آتی ہے۔

ایک دبلا پتلا آدمی بوتل منہ سے لگاتا ہے۔ وہ اپنی جگہ کھڑا مسکرا کر میری طرف دیکھتا ہے اور کہتا ہے۔

‘واہ، واہ، کیا ٹھنڈی ٹھار اور مزے دار بوتل ہے۔’ پھر آستین سے منہ پونجھ کر کہنا ہے۔ ‘مزا آ گیا۔’ سیخ کبابوں کی خوشبو لپکتی ہوئی آتی ہے اور اس کے قدم روک لیتی ہے۔

وہ منہ کھولے بغیر تِکوں کو دانتوں کا کاٹتا چباتا ہے۔ پھر ان کی لذت محسوس کرتے ہوئے کہتا ہے۔

‘ذرا سخت ہیں، مگر گوشت سخت ہی ہو تو مزا دیتا ہے۔’

میں اطمینان کا سانس لیتا ہوں۔

اس کی نظریں بالو شاہی کے تھال پر ہیں۔ وہ دکان کے کچھ فاصلے پر کھڑے کھڑے بالو شاہی کھانا شروع کر دیتا ہے۔ کھاتے کھاتے اس کا منہ تھک جاتا ہے۔ پیٹ پھول جاتا ہے مگر بالو شاہی ختم ہونے کا نام نہیں لیتی۔ میں کہتا ہوں ‘اور کھاﺅ’۔

‘نہیں بس’ وہ ڈکار لیتے ہوئے جواب دیتا ہے۔ پاپڑ دیکھ کر کہتا ہوں۔

‘منہ سلونا کروگے؟’

‘ہاں۔۔۔۔۔’

پاپڑ اس کے دانتوں تلے کڑکڑاتے ہیں۔

‘کیسے ہیں؟’

‘بہت اچھے ہیں بس ذرا مصالحہ تیز ہے’۔

‘اور کیا پسند کرو گے؟’

‘میں نے آج تک سیب نہیں چکھا’۔

میں اسے پھلوں کی دکان کے سامنے لے جاتا ہوں اور سیبوں کی طرف اشارہ کر کے کہتا ہوں

‘یہ سیب ہیں تم جتنے چاہے کھا سکتے ہو’۔

وہ ایک سیب نگاہوں سے اٹھاتا ہے۔ دانتوں سے کاٹتا ہے اور کہتا ہے۔

‘یہ تو ناشپاتی ہے’۔

‘یہ ناشپاتی نہیں سیب ہے تم اسے سیب کی طرح محسوس کر کے کھاﺅ’۔

وہ پھر دانتوں سے کاٹتا ہے اور کہتا ہے ‘یہ امرود ہے’۔

‘یہ امرود نہیں سیب ہے’۔

وہ پھر کوشش کرتا ہے اور پھر کہتا ہے۔

‘یہ آڑو ہے’۔۔۔

مجھے غصہ آجاتا ہے۔ ‘تم الّو کے پٹھے ہو’۔۔۔۔

وہ مجھے اداس نظرو سے دیکھتا ہے اور پھر روہانسا ہو کر کہتا ہے:

‘مجھے کیا پتہ سیب کا ذائقہ کیسا ہوتا ہے میں نے کبھی کھایا ہی نہیں’۔

‘اچھا چھوڑو’۔۔۔

میں کہتا ہوں۔

‘اب آگے چلتے ہیں’

ہم باری باری ایک دوسرے کی انگلی پکڑے چلنے لگتے ہیں۔ ایک جگہ بہت سے لوگ جمع ہیں۔

‘کیا بات ہے بھائی؟’۔۔۔

وہ پوچھتا ہے۔

‘حادثہ ہو گیا ہے۔ آدمی ٹرک کے نیچے آکر کچلا گیا’۔۔۔

وہ پریشان ہو کر میری طرف دیکھتا ہے۔

پھر کہتا ہے۔۔۔

‘ٹرک۔۔۔ میرے اوپر سے ٹرک گزر رہا ہے’۔۔۔۔

‘نہیں۔۔۔’ میں چلاتا ہوں۔

لیکن اس سے پہلے میں کچھ اور کہوں وہ دھڑام سے نیچے گر جاتا ہے اور دیکھتے ہی دیکھتے ٹھنڈا ہو جاتا ہے۔۔۔۔

 ***

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