Badbu… By Sushant Supriya

badbu

بدبو
سُشانت سُپریا
ہندی سے اردو ترجمہ: شیراز حسن

ریل کے سفر کا بھی اپنا ہی مزہ ہے۔ ایک ہی ڈبے میں پورے بھارت کی سیر ہو جاتی ہے. طرح طرح کے لوگ مل جاتے ہیں۔ عجیب و غریب قسم کے تجربات ہو جاتے ہیں۔

گزشتہ سردیوں میں میرے ساتھ ایسا ہی ہوا۔ میں اور میرے ایک واقف ومل راج دھانی ایکسپریس سے کسی کام کے سلسلے میں دہلی سے رائے پور جا رہے تھے۔ ہمارے سامنے والی سیٹ پر فرنچ کٹ دھاڑی والا ایک شخص اپنی بیوی اور تین سال کے بچے کے ساتھ سفر کر رہا تھا۔ باہمی سلام ہوا۔ کچھ رسمی باتیں موسم کے بارے میں ہوئیں۔ اس کی درخواست پر ہم نے اپنی نیچے والی برتھ اسے دے دی اور ہم دونوں اوپروالی برتھ پر چلے آئے۔

میں اخبار کے صفحے پلٹ رہا تھا۔ تبھی میری نگاہ نیچے بیٹھے اس شخص پر پڑی۔ وہ بار بار ہوا کو سونگھنے کی کوشش کرتا، پھر ناک – بھونویں سکریڑ تا۔ اس کے اس انداز سے صاف تھا کہ اسے کسی چیز کی بدبو آ رہی تھی۔ وہ رہ رہ کر اپنے دائیں ہاتھ سے اپنی ناک کے اردگرد کی ہوا کو اڑاتا۔ وِمل بھی یہ سارا تماشا دیکھ رہا تھا۔ آخر اس سے رہا نہیں گیا۔ وہ پوچھ بیٹھا، “کیا ہوا بھائی صاحب؟”
“بڑی بدبو آ رہی ہے۔ ” فرنچ کٹ داڑھی والے اس شخص نے چڑچڑے پن سے کہا۔

ومل نے میری طرف سوالیہ نظروں سے دیکھا۔ مجھے بھی کچھ سمجھ نہیں آیا۔

میں نے زندگی میں کبھی یہ دعویٰ نہیں کیا کہ میری ناک کتے جیسی ہے۔ ہم دونوں کو ہی مخصوص بو نہیں ستا رہی تھی۔ اس لئے اس شخص کے انداز اطوار ہمیں کچھ عجیب سے لگے۔ میں پھر اخبار پڑھنے میں مصروف ہو گیا۔ ومل نے بھی اخبار کا ایک صفحہ اٹھا لیا۔

پانچ سات منٹ گزرے ہوں گے کہ میری نگاہ نیچے گئی۔ نیچے بیٹھا شخص اب پریشان نظر آ رہا تھا۔ وہ چاروں طرف ٹوہی نگاہوں سے دیکھ رہا تھا۔ جیسے بدبو کے ذریعہ کا پتہ لگتے ہی وہ کوئی انقلابی قدم اٹھا لے گا۔ رہ رہ کر اس کا ہاتھ اپنی ناک پر چلا جاتا۔ آخر اس نے اپنی بیوی سے کچھ کہا۔ بیوی نے بیگ میں سے ‘روم فریشنر’ جیسا کچھ نکالا اور ہوا میں چاروں طرف کچھ سپرے کر دیا۔ میں نے ومل کو آنکھ ماری۔ وہ مسکرا دیا۔ کنارے والی برتھ پر بیٹھے ایک سردارجی بھی یہ سارا تماشا حیرت سے دیکھ رہے تھے۔

“چلو، اب شاید اس تکلیف زدہ شخص کو کچھ آرام ملے گا۔” میں نے دل ہی دل میں سوچا۔

لیکن تھوڑی دیر کے بعد کیا دیکھتا ہوں کہ فرنچ کٹ داڑھی والا پریشان حال شخص وہی پرانی حرکتیں کر رہا ہے۔ تبھی اس نے اپنی بیوی کے کان میں کچھ کہا۔ بیوی پریشان سی اٹھی اور ہمیں مخاطب کرکے کہنے لگی، “بھائی صاحب، یہ جوتے کس کے ہےں؟ اسی میں سے بدبو آ رہی ہے۔ “

جوتا ومل کا تھا۔ وہ جوش سے بولا، “یہاں پانچ چھ جوڑی جوتے پڑے ہیں۔ آپ یہ کیسے کہہ سکتی ہیں کہ اس جوتے میں سے بدبو آ رہی ہے؟ ویسے بھی، میرا جوتا اور میری جرابےں، دونوں نئی ہیں اور صاف ستھری ہیں۔ “

اس پر اس شخص کی بیوی کہنے لگی، “بھائی صاحب، برا مت مانیئے گا۔ انہیں بدبو برداشت نہیں ہوتی۔ قے آنے لگتی ہے۔ آپ سے گزارش کرتی ہوں، آپ اپنے جوتے پولیتھین میں ڈال دیجئے۔ بڑی مہربانی ہوگی۔ “

ومل غصے اور تذبذب کی حالت میں تھا۔ تب میں نے صورت حال کو سنبھالا، “دیکھیے، ہمیں تو کوئی بدبو نہیں آ رہی۔ پر آپ جب اتنی ضد کر رہی ہیں تو یہی سہی۔ ”
بڑی بے دلی سے ومل نے نیچے اتر کر اپنے جوتے پولیتھین میں ڈال دیے۔

میں نے سوچا، چلو اب بات یہیں ختم ہو جائے گی۔ پر تھوڑی دیر بعد وہ شخص اٹھا اور مجھ سے کہنے لگا، “بھائی صاحب، مجھے نیچے اب بھی بہت بدبو آ رہی ہے۔ آپ نیچے آ جائیے۔ میں پیچھے اوپر والی برتھ پر جانا چاہتا ہوں۔ “

اب مجھ سے نہیں رہا گیا۔ میں نے کہا، “کیا آپ پہلی بار ریلکا سفر کر رہے ہیں؟ بھائی صاحب، آپ اپنے گھر کے ڈرائنگ روم میں نہیں بیٹھے ہیں۔ سفر میں کئی طرح کی بو آتی ہی ہیں۔ ٹائلٹ کے پاس والی برتھ مل جائے تو وہاں کی بدبو آتی ہے۔ گاڑی جب شراب بنانے والی فیکٹری کے ساتھ سے گزرتی ہے تو وہاں کی بو آتی ہے۔ سفر میں سب سہنے کی عادت ڈالنی پڑتی ہے۔ ”
ومل نے بھی دھیرے سے کہا، “انسان کو اگر کتے کی ناک مل جائے تو بڑی مشکل ہوتی ہے۔”

پر اس شخص نے شاید ومل کی بات نہیں سنی۔ وہ اڑا رہا کہ میں نیچے آ جاﺅں اور وہ اوپروالی برتھ پر ہی آئے گا۔

میں نے بات کو اور بڑھانا ٹھیک نہیں سمجھا، اس لئے میں نے اوپروالی برتھ اس کے لیے خالی کر دی۔ وہ اوپر چلا گیا۔

تھوڑی دیر بعد جب اس شخص کی بیوی اپنے بڑے بیگ میں سے کچھ نکال رہی تھی تو وہ اچانک چیخ کر پیچھے ہٹ گئی۔

سب اس کی طرف دیکھنے لگے۔

“کیا ہوا؟” اوپر سے اس شخص نے پوچھا۔

“بیگ میں مری ہوئی چھکلی ہے۔” بیوی نے جواب دیا۔

یہ سن کر ومل نے مجھے آنکھ ماری۔ میں مسکرا دیا۔

وہ شخص کھسیانا سا منہ لئے نیچے اترا۔

“بھائی صاحب، بدبو کا راج اب پتہ چلا.” سردار جی نے اسے چھیڑا۔ وہ اور جھینپ گیا۔

خیر، اس شخص نے مری ہوئی چھپکلی کو کھڑکی سے باہر پھینکا۔ پھر وہ بیگ میں سے سارا سامان نکال کر اسے ڈبے کے آخر میں لے جا کر جھاڑ آیا۔ ہم سب نے چین کی سانس لی۔ چلو مصیبت ختم ہوئی …. میں نے سوچا۔

پےنٹری کار سے کھانا آ گیا تھا۔ سب نے کھانا کھایا۔ اِدھر اُدھر کی باتیں ہوئیں۔ پھر سب سونے کی تیاری کرنے لگے۔

تبھی میری نظر اس شخص پر پڑی۔ پریشانی کی جھریاں اس کے چہرے پر لوٹ آئی تھیں. وہ پھر سے ہوا کو سونگھنے کی کوشش کر رہا تھا۔

“مجھے اب بھی بدبو آ رہی ہے …” آخر اس نے اپنی خاموشی توڑتے ہوئے کہا۔

“ہے بھگوان!” میرے منہ سے نکلا۔

یہ سن کر ومل نے مورچہ سنبھالا، “بھائی صاحب، میری بات توجہ سے سنئے۔ بتائیے، ہم کس دور میں جی رہے ہیں؟ یہ کیسا وقت ہے؟ ہم کیسے لوگ ہیں؟ “

“کیا مطلب؟” وہ شخص کچھ سمجھ نہیں پایا۔

“دیکھیے، ہم سب ایک بدبودار دور میں جی رہے ہیں۔ یہ وقت بدبودار ہے؛ ہم لوگ بدبودار ہیں. یہاں لیڈر کرپٹ ہیں، وہ بدبودار ہیں۔ اداکار انڈرورلڈ سے ملے ہوئے ہیں، وہ بدبودار ہیں۔ افسر رشوت خور ہیں، وہ بدبودار ہیں۔ دوکاندار ملاوٹ کرتے ہیں، وہ بدبودار ہیں۔ ہم اور آپ جھوٹ بولتے ہیں، دوسروں کا حق مارتے ہیں، غیر اخلاقی کام کرتے ہیں، ہم تمام بدبودار ہیں۔ جب یہ سارا دور بدبودار ہے، یہ وقت بدبودار ہے، یہ سماج بدبودار ہے، ہم لوگ بدبودار ہیں تو ایسے میں اگر آپ کو اب بھی بدبو آ رہی ہے تو یہ فطری ہے۔ آخر اس ڈبے میں ہم بدبودار لوگ ہی تو بیٹھے ہیں۔ “

***

बदबू
सुशांत सुप्रिय

रेल-यात्राओं का भी अपना ही मजा है। एक ही डिब्बे में पूरे भारत की सैर हो जाती है। तरह-तरह के लोग मिल जाते हैं। विचित्र किस्म के अनुभव हो जाते हैं।
पिछली सर्दियों में मेरे साथ ऐसा ही हुआ। मैं और मेरे एक परिचित विमल राजधानी-एक्सप्रेस से किसी काम के सिलसिले में दिल्ली से रायपुर जा रहे थे। हमारे सामने वाली सीट पर फ्रेंचकट दाढ़ीवाला एक व्यक्ति अपनी पत्नी और तीन साल के बच्चे के साथ यात्रा कर रहा था। परस्पर अभिवादन हुआ। शिष्टाचारवश मौसम से जुड़ी कुछ बातें हुईं। उसके अनुरोध पर हमने अपनी नीचे वाली बर्थ उसे दे दी और हम दोनों ऊपरवाली बर्थ पर चले आए।
मैं अखबार के पन्ने पलट रहा था। तभी मेरी निगाह नीचे बैठे उस व्यक्ति पर पड़ी। वह बार-बार हवा को सूँघने की कोशिश करता, फिर नाक-भौंह सिकोड़ता। उसके हाव-भाव से साफ था कि उसे किसी चीज की बदबू आ रही थी। वह रह-रह कर अपने दाहिने हाथ से अपनी नाक के इर्द-गिर्द की हवा को उड़ाता। विमल भी यह सारा तमाशा देख रहा था। आखिर उससे रहा नहीं गया। वह पूछ बैठा,“क्या हुआ भाईसाहब?”
“बड़ी बदबू आ रही है।” फ्रेंचकट दाढ़ीवाले उस व्यक्ति ने चिड़चिड़े-स्वर में कहा।
विमल ने मेरी ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा। मुझे भी कुछ समझ नहीं आया।
मैंने जीवन में कभी यह दावा नहीं किया कि मेरी नाक कुत्ते जैसी है। हम दोनों को ही विशेष गंध नहीं सता रही थी। इसलिए उस व्यक्ति के हाव-भाव हमें कुछ अजीब-से लगे। मैं फिर अखबार पढ़ने में व्यस्त हो गया। विमल ने भी अखबार का एक पन्ना उठा लिया।
पाँच-सात मिनट बीते होंगे कि मेरी निगाह नीचे गई। नीचे बैठा व्यक्ति अब काफी उद्विग्न नजर आ रहा था। वह चारों ओर टोही निगाहों से देख रहा था। जैसे बदबू के स्रोत का पता लगते ही वह कोई क्रांतिकारी कदम उठा लेगा। रह-रह कर उसका हाथ अपनी नाक पर चला जाता। आखिर उसने अपनी पत्नी से कुछ कहा। पत्नी ने बैग में से ‘रूम-फ्रैशनर’ जैसा कुछ निकाला और हवा में चारों ओर कुछ स्प्रे कर दिया। मैंने विमल को आँख मारी। वह मुस्करा दिया। किनारेवाली बर्थ पर बैठे एक सरदारजी भी यह सारा तमाशा हैरानी से देख रहे थे।
“चलो, अब शायद इस पीड़ित व्यक्ति को कुछ आराम मिलेगा।” मैंने मन ही मन सोचा।
पर थोड़ी देर बाद क्या देखता हूँ कि फ्रेंचकट दाढ़ीवाला वह उद्विग्न व्यक्ति वही पुरानी हरकतें कर रहा है। तभी उसने अपनी पत्नी के कान में कुछ कहा। पत्नी परेशान-सी उठी और हमें संबोधित करके कहने लगी, “भाईसाहब, यह जूता किसका है? इसी में से बदबू आ रही है।”
जूता विमल का था। वह उत्तेजित-स्वर में बोला,“यहाँ पाँच-छ्ह जोड़ी जूते पड़े हैं। आप यह कैसे कह सकती हैं कि इसी जूते में से बदबू आ रही है? वैसे भी, मेरा जूता और मेरी जुराबें, दोनों नई हैं और साफ-सुथरी हैं।”
इस पर उस व्यक्ति की पत्नी कहने लगी,“भाईसाहब, बुरा मत मानिएगा। इन्हें बदबू सहन नहीं होती। उल्टी आने लगती है। आप से गुजारिश करती हूँ, आप अपने जूते पालिथीन में डाल दीजिए। बड़ी मेहरबानी होगी।”
विमल गुस्से और असमंजस में था। तब मैंने स्थिति को सँभाला,“देखिए, हमें तो कोई बदबू नहीं आ रही। पर आप जब इतनी जिद कर रही हैं तो यही सही।”
बड़े बेमन से विमल ने नीचे उतरकर अपने जूते पालिथीन में डाल दिए।
मैंने सोचा, चलो अब बात यहीं खत्म हो जाएगी। पर थोड़ी देर बाद वह व्यक्ति उठा और मुझसे कहने लगा,“भाईसाहब, मुझे नीचे अब भी बहुत बदबू आ रही है। आप नीचे आ जाइए। मैं वापस ऊपरवाली बर्थ पर जाना चाहता हूँ।”
अब मुझसे नहीं रहा गया। मैंने कहा,“क्या आप पहली बार रेल-यात्रा कर रहे हैं? भाईसाहब, आप अपने घर के ड्राइंगरूम में नहीं बैठे हैं। यात्रा में कई तरह की गंध आती ही हैं। टायलेट के पासवाली बर्थ मिल जाए तो वहाँ की दुर्गंध आती है। गाड़ी जब शराब बनानेवाली फैक्ट्री के बगल से गुजरती है तो वहाँ की गंध आती है। यात्रा में सब सहने की आदत डालनी पड़ती है।”
विमल ने भी धीरे-से कहा,“इंसान को अगर कुत्ते की नाक मिल जाए तो बड़ी मुश्किल होती है।”
पर उस व्यक्ति ने शायद विमल की बात नहीं सुनी। वह अड़ा रहा कि मैं नीचे आ जाऊँ और वह ऊपरवाली बर्थ पर ही आएगा।
मैंने बात को और बढ़ाना ठीक नहीं समझा, इसलिए मैंने ऊपरवाली बर्थ उसके लिए खाली कर दी। वह ऊपर चला गया।
थोड़ी देर बाद जब उस व्यक्ति की पत्नी अपने बड़े बैग में से कुछ निकाल रही थी तो वह अचानक चीखकर पीछे हट गई।
सब उसकी ओर देखने लगे।
“क्या हुआ?” ऊपर से उस व्यक्ति ने पूछा।
“बैग में मरी हुई छिपकली है।” पत्नी ने जवाब दिया।
यह सुनकर विमल ने मुझे आँख मारी। मैं मुस्करा दिया।
वह व्यक्ति खिसियाना-सा मुँह लिए नीचे उतरा।
“भाईसाहब, बदबू का राज अब पता चला।” सरदारजी ने उसे छेड़ा। वह और झेंप गया।
खैर, उस व्यक्ति ने मरी हुई छिपकली को खिड़की से बाहर फेंका। फिर वह बैग में से सारा सामान निकालकर उसे डिब्बे के अंत में ले जाकर झाड़ आया। हम सबने चैन की साँस ली। चलो मुसीबत खत्म हुई—मैंने सोचा।
पैंट्री-कार से खाना आ गया था। सबने खाना खाया। इधर-उधर की बातें हुईं। फिर सब सोने की तैयारी करने लगे।
तभी मेरी निगाह उस व्यक्ति पर पड़ी। उद्विग्नता की रेखाएँ उसके चेहरे पर लौट आई थीं। वह फिर-से हवा को सूँघने की कोशिश कर रहा था।
“मुझे अब भी बदबू आ रही है…” आखिर उसने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा।
“हे भगवान!” मेरे मुँह से निकला।
यह सुनकर विमल ने मोर्चा सँभाला,”भाई साहब, मेरी बात ध्यान से सुनिए। बताइए, हम किस युग में जी रहे हैं? यह कैसा समय है? हम कैसे लोग हैं?”
“क्या मतलब?” वह व्यक्ति कुछ समझ नहीं पाया।
“देखिए, हम सब एक बदबूदार युग में जी रहे हैं। यह समय बदबूदार है; हम लोग बदबूदार हैं। यहाँ नेता भ्रष्ट हैं, वे बदबूदार हैं। अभिनेता अंडरवर्ल्ड से मिले हैं, वे बदबूदार हैं। अफसर घूसखोर हैं, वे बदबूदार हैं। दुकानदार मिलावट करते हैं, वे बदबूदार हैं। हम और आप झूठ बोलते हैं, दूसरों का हक मारते हैं, अनैतिक काम करते हैं, हम सभी बदबूदार हैं। जब यह सारा युग बदबूदार है, यह समय बदबूदार है, यह समाज बदबूदार है, हम लोग बदबूदार हैं तो ऐसे में यदि आपको अब भी बदबू आ रही है तो यह स्वाभाविक है। आखिर इस डिब्बे में हम बदबूदार लोग ही तो बैठे हैं।”

Advertisements
This entry was posted in Indian Writers and tagged , , , , , , , , , , , , , , , , . Bookmark the permalink.

4 Responses to Badbu… By Sushant Supriya

  1. Rachna says:

    A story high in symbolism and impact, reflecting the true face of our society. And it is true for the entire South Asia region, perhaps, in varying degrees. Kahani Khazana is enriching its repertoire with powerful stories. 🙂

  2. Vibha says:

    What a wonderfully written story. Writer is a expert pen in sarcasm and has enveloped such a blatant truth in such an enjoyable reading that he needs a sure pat on the back for it. I cracked up at many instances in the story…..wonderful, just a wonderful piece of Hindi writing. MubaaraQ Sushant Supriya ji!

    • Sushant Supriye says:

      Thanks Vibha ji . Read your comments today only. Had no idea that my story had been posted in Kahani Khazana.anyway , so nice of u for your encouraging words.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s