Parmeshar Singh… by Ahmad Nadeem Qasmi

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Permasher Singh, a story of the parition. Photo Courtesy: trekearth.com/bobomietie

परमेशर सिंह

अहमद नदीम कास्मी

 उर्दू से हिन्दी: शीराज़ हसन 

अख़्तर अपनी माँ से यूं अचानक बिछड़ गया जैसे भागते हुए किसी जेब से रुपया गिर पड़े. अभी था और अभी गायब. ठनडया पड़ी मगर बस इस हद तक कि लुटे-पिटे क़ाफ़िले के आख़िरी सिरे पर एक हंगामा साबुन के झाग की तरह उठा और बैठ गया. “कहीं आ ही रहा होगा.”  किसी ने कहा “हजारों का तो क़ाफ़िला है” और अख़्तर की माँ इस तसल्ली की लाठी थामे पाकिस्तान ओर रेंगती चली आई थी. “आ रहा होगा “वह सोचती. “कोई तितली पकड़ने निकल गया होगा और फिर माँ को न पाकर रोया होगा और फिर. फिर अब कहीं आ ही रहा होगा. समझदार है पाँच साल से कुछ ऊपर हो चला है. आ जाएगा वहां पाकिस्तान में ज़रा ठिकाने से बैठूँगी तो ढूंढ लूंगी.”

लेकिन अख़्तर तो सीमा से कोई पन्द्रह मील उधर यूँ ही बस किसी वजह के बिना इतने बड़े क़ाफ़िले से कट गया था. अपनी मां के विचार के अनुसार उसने तितली का पीछा किया या किसी खेत में गन्ने तोड़ने गया और तोड़ता रह गया. बहरहाल, जब रोताल चिल्लाता एक तरफ़ भागा जा रहा था तो सिखों ने उसे घेर लिया और अख़्तर ने तैश में आकर कहा “मैं नारा-ए-तकबीर मारूंगा”और यह कहकर वह सहम गया था.

 

सभी सिख बेइख्तियार हंस पड़े थे, सिवाए एक सिख के जिसका नाम परमेशर सिंह था. ढीली-ढाली पगड़ी में से उसके उलझे हुए केश  झांक रहे थे और जूडा तो बिल्कुल नंगा था. वह बोला “हंसो नहीं यारों, इस बच्चे को तो वाहे गुरू बनाया है जिसने तुम्हें और तुम्हारे बच्चों को पैदा किया है.”

एक नोजवान सिख जिस अब तक अपनी कृपाण निकाल ली थी , बोला “ज़रा ठहर परमेशर. कृपाण अपना धर्म पूरा कर ले, तो हम धर्म की बात करेंगे.”

“मारो नहीं यारो” परमेशर सिंह की आवाज़ में पुकार थी. इसे मारो नहीं है और वे बुरी तरह कांप रहा था.

अख़्तर के पास आकर वह घुटनों के बल बैठ गया और बोला.

“नाम क्या है तुम्हारा?”

“अख्तर” . . . अबकी अख़्तर की आवाज़ भराई हुई नहीं थी.

“अख़्तर बेटे” परमेशर सिंह ने बड़े प्यार से कहा.

“ज़रा मेरी उंगलियों में झांको तो”

अख़्तर ज़रा सा झुक गया. परमेशर सिंह ने दोनों हाथों में ज़रा सी झरी बनाई और तुरंत बंद कर ली “अहा” अख़्तर ने ताली बजाकर अपने हाथों को परमेशर सिंह के हाथों की तरह बंद कर लिया और आँसुओं में मुस्करा कर बोला. “तितली”

“लोगे?” परमेशर सिंह ने पूछा.

“हाँ” अख़्तर ने अपने हाथों को मला.

“लो” परमेशर सिंह ने अपने हाथों को खोला. अख़्तर ने तितली को पकड़ने की कोशिश की मगर वह रास्ता पाते ही उड़ गई और अख़्तर की उंगलियों की पोरों पर अपने परों के रंगों के ज़र्रे छोड़ गयी. अख़्तर उदास हो गया और परमेशर सिंह दूसरे सिखों की तरफ़ देखकर बोला “सभी बच्चे एक से क्यों होते हैं यारों! करतार की तितली भी उड़ जाती थी यूँ ही मुँह लटका लेता था…”

 

“परमेशर सिंह तू आधा पागल हो गया है.” नोजवान सिख ने ना-गवारी से कहा और फिर सारी टोली वापिस जाने लगी.

परमेशर सिंह ने अख़्तर को किनारे पर बिठा लिया और जब उसी तरफ़ चलने लगा जिधर दूसरे सिख गए थे तो अख़्तर फड़क फड़क कर रोने लगा” हम अम्मा पास जाएँगे. अम्मा पास जाएँगे”. परमेशर सिंह ने हाथ उठाकर उसे थपकने की कोशिश की मगर अख़्तर ने उसका हाथ झटक दिया फिर जब परमेशर सिंह ने यह कहा कि “हाँ हाँ बेटे,तुम्हें तुम्हारी अम्मा पास लिए चलता हूँ”. तो अख़्तर चुप हो गया. कभी-कभी सिसक लेता था और परमेशर सिंह की थपकियों को बड़ी ना-गवारी से बर्दाश्त करता जा रहा था.

 

परमेशर सिंह उसे अपने घर ले आया. पहले यह किसी मुसलमान का घर था. लुटा-पिटा परमेशर सिंह जब ज़िला लाहौर से ज़िला अमृतसर में आया था तो गाँव वालों ने उसे यह मकान अलाट कर दिया था वह अपनी पत्नी और बेटी के साथ जब चारदीवारी में दाख़िल हुआ था, ठिठक कर रह गया था. “यह इतना जरा सा तो है और उसे भी तो उसी वाहे गुरूजी बनाया है जिस ने . . . ”

“पूछ लेते हैं इसी से… ” एक और सिख बोला तो उस ने डरे हुए अख़्तर के पास जाकर कहा . . . “बोलो तुम्हें किसने पैदा किया है? ख़ुदा ने या वाहेगुरुजी ने?”

अख़्तर ने सारी ख़ुशकी को निगलने की कोशिश की जो ज़ुबान की नोक से लेकर नाभि तक फैल चुकी थी, आंखें झपक कर उसने अपने आंसुओं को गिरा देना चाहा कि रेत की तरह उसके पपोटों में खटक रहे थे . उसने परमेशर सिंह की तरफ़ यूं देखा जैसे माँ को देख रहा है. मुंह में गए हुए एक आंसू को थूक डाला और बोला.

“पता नहीं.”

“लो और सुनो” किसी ने कहा और अख़्तर को गाली देकर हंसने लगा.

अख़्तर ने अभी अपनी बात पूरी नहीं की थी, बोला . . . “अम्मा तो कहती है भूसे की कोठरी में पड़ा मिला था.”

 

सभी सिख हंसने लगे मगर परमेशर सिंह बच्चों की तरह बिलबिला कर कुछ यूं रोया कि दूसरे सिख भौंचक्का से रह गए और परमेशर सिंह रोनी आवाज़ में जैसे बैन करने लगा . . . “सभी बच्चे एक से होते हैं, यारों. मेरा करतारा भी तो यही कहता था वह भी तो उसकी माँ को भूसे की कोठरी में पड़ा मिला था . ”

 

कृपाण म्यान में चली गई. सिखों ने परमेशर सिंह से अलग थोड़ी देर खुसर-फुसर की. फिर एक सिख आगे बढ़ा. बिलखते हुए अख़्तर को हाथ से पकड़े वह चुपचाप रोते हुए परमेशर सिंह के पास आया और बोला . . . “ले परमेशरे… संभाल इसे केश बढ़ा कर इसे अपना करतार बना ले . . . ले पकड़ “.

 

परमेशर ने अख़्तर को यूँ झपट कर उठा लिया कि उसकी पगड़ी खुल गई और केश की लटें लटकने लगीं. उसने अख़्तर को पागलों की तरह चूमा. उसे अपने सीने से भींचा और फिर उसकी आंखों में आंखें डाल कर और मुस्कुरा मुस्कुरा कर कुछ ऐसी बातें सोचने लगा जिन्होंने उसके चेहरे को चमका दिया फिर उसने पलट कर दूसरे सिखों की तरफ देखा. अचानक वह अख़्तर को नीचे उतार कर सिखों की तरफ़ लपका, लेकिन उनके पास से गुज़र कर दूर भागा चला गया. झाड़ियों के एक झुंड में बंदरों की तरह कूदता और छिपता रहा और उसके केश इस लपक-झपट में उसका साथ देते रहे. दूसरे सिख हैरान खड़े देखते रहे, वे एक हाथ दूसरे हाथ में रखे भागता हुआ वापस आया. उसकी भीगी हुई दाढ़ी में फंसे हुए होठों पर मुस्कान थी और लाल आँखों में चमक थी. आंखें पथरा-सी गई थीं और वह बड़ा उद्विग्न होकर फुसफुसाते हुए बोला था . “यहाँ कोई चीज़ कुरान पढ़ रही है”

 

ग्रंथी जी और गाँव के दूसरे लोग हँस पड़े थे. परमेशर सिंह की बीवी ने उन्हें पहले से बता दिया था कि करतार सिंह के बिछड़ते ही उन्हें कुछ हो गया है. “जाने क्या हो गया है उसे” उसने कहा. वाहेगुरुजी झूठ न बुलवाएं तो वहां दिन में दस बार तो करतार सिंह को गधों की तरह पीट डालता था. और जब करतार सिंह बछड़ा है तो मैं तो खैर रो-धो ली पर इसका रोने से भी जी हल्का नहीं हुआ. वहाँ मजाल है जो बेटी अमर कौर को मैं ज़रा भी गुस्से से देख लेती, बिफर जाता था, कहता था, बेटी को बुरा मत कहो. बेटी बड़ी विनम्र होती है. यह तो एक यात्री है बेचारी. हमारे घरौंदे में सुस्ताने बैठ गई है. समय आएगा तो चली जाएगी और अब अमर कौर से ज़रा-सा भी कोई दोष हो तो आपे में नहीं रहता. यहां तक बक देता है कि “बेटियाँ बीवियाँ अपहरण होती सुनी थीं यारो. यह नहीं सुना था कि पाँच साल के बेटे भी उठ जाते हैं.”

 

वह एक महीने से इस घर में रहते थे मगर हर रात उसका नियम था कि पहले सोते में बहुत ज्यादा करवटें बदलता फिर बड़बड़ाने लगता और फिर उठ बैठता. बड़ी डरी हुई फुसफुसाहट में पत्नी से कहता “सुनती हो! यहाँ कोई चीज़ कुरान पढ़ रही है” . . . पत्नी उसे सिर्फ “ओंह” से टाल सो जाती थी, मगर अमर कौर को उसकी इस फुसफुसाहट के बाद रात भर नींद न आई. उसे अंधेरे में बहुत-सी परछाइयां हर तरफ़ बैठी कुरान पढ़ती नज़र आईं और फिर जब जरा-सी पौ फटती तो वह कानों में उँगलियाँ दे लेती थी. वहाँ ज़िला लाहौर में उनका घर मस्जिद के पड़ोस ही में था और जब सुबह अज़ान होती थी तो कैसा मज़ा आता था. ऐसा लगता था कि जैसे पूरब से फूटता हुआ उजाला गाने लगा है. फिर जब उसकी पड़ौसन प्रीतम कौर को कुछ नौजवानों ने खराब करके चीथड़े की तरह घूरे पर फेंक दिया था तो जाने क्या हुआ कि मुअज़्ज़न की अज़ान में भी उसे प्रीतम कौर की चीख़ सुनाई दे रही थी, अज़ान का खयाल तक उसे भयभीत कर देता था और वह यह भी भूल जाती थी कि अब उनके पड़ोस में मस्जिद नहीं है. यूँ ही कानों में उँगलियाँ देते हुए वह सो जाती और रात भर जागते रहने की वजह से दिन चढ़े तक सोई रहती थी और परमेशर सिंह इस बात पर बिगड़ जाता . . . ” ठीक है सोए नहीं तो और क्या करे. निकम्मी तो होती हैं यह छोकरियां. पुरुष तो अब तक जाने कितने काम कर चुका होता यारों.”

परमेशर सिंह आंगन में दाख़िल हुआ तो आज सदा से विपरीत उसके होठों पर मुस्कान थी. इसके खुले केश कंघे समेत उसकी पीठ और कंधे पर बिखरे हुए थे और उसका एक हाथ अख़्तर की कमर थपके जा रहा था. उसकी पत्नी एक तरफ़ बैठी छाज में गेहूं फटक रही थी. उसके हाथ जहाँ थे वहीं रुक गए और टुकुर-टुकुर परमेशर सिंह को देखने लगी. फिर वह छाज पर से कूदती हुई आयी और बोली.

“यह कौन है?”

 

परमेशर सिंह यथापूर्वक मुस्कुराते हुए बोला. . . “डरो नहीं बेवक़ूफ़, इसकी आदतें बिल्कुल करतारे की सी हैं यह भी अपनी माँ को भूसे की कोठरी में पड़ा मिला था. यह भी तितलियों का आशिक है, इसका नाम अख्तर है.”

 

“अख़्तर”, पत्नी के तेवर बदल गए.

 

“तुम इसे अख़्तर सिंह कह लेना” परमेशर सिंह ने समझाया. . . “और फिर केशों का क्या है, दिनों में बढ़ जाते हैं. कड़ा और कच्छा पहना दो, कंघा केशों के बढ़ते ही लग जाएगा.”

 

“पर ये है किसका?” पत्नी ने स्पष्टीकरण चाही.

 

“किसका है!” परमेशर सिंह ने अख़्तर को कन्धे पर से उतार कर उसे ज़मीन पर खड़ा कर दिया और उसके सिर पर हाथ फेरने लगा. वाहे गुरुजी का है, हमारा अपना है और फिर यारों यह औरत इतना भी नहीं देख सकती कि अख़्तर के माथे पर जो ज़रा-सा तिल है यह करतारे ही का तिल है. करतारे का भी तो एक तिल था और यहीं था. ज़रा बड़ा था पर हम उसे यहीं तिल पर तो चूमते थे. और अख़्तर के कानों की लवीं गुलाब की तरह गुलाबी हैं तो यारों. यह औरत यह तक नहीं सोचती कि करतारे के कान की लवीं भी तो ऐसी ही थीं. फ़र्क़ सिर्फ इतना है कि वह ज़रा मोटी थीं, यह जरा पतली और . . . ”

 

अख़्तर अब तक मारे आश्चर्य के धैर्य किए बैठा था. बिलबिला उठा . . . “हम नहीं रहेंगे, हम अम्मा पास जाएँगे… अम्मा पास”

 

परमेशर सिंह ने अख़्तर का हाथ पकड़कर उसे बीवी की तरफ़ बढ़ाया . . . “अरी लो. यह अम्मा के पास जाना चाहता है”

 

“तो जाए.” पत्नी की आँखों में और चेहरे पर वही दुष्टता आ गयी थी जिसे परमेशर सिंह अपनी आँखों और चेहरे से नोच कर बाहर खेतों में झटक आया था… “डाका मारने गया था सूरमा. और उठा लाया यह हाथ-भर लौंडा. अरे कोई लड़की ही उठा लाता. तो हज़ार में न सही, दो सौ में बिक जाती. इस उजड़े घर का खाट खटोला बन जाता और फिर … पगले तुझे तो कुछ हो गया है, देखते नहीं यह लड़का मुसल्ला है? जहाँ से उठा लाये हो वहीं वापिस डाल आओ. ख़बरदार जो इसने मेरे चौके में पाँव रखा. ”

परमेशर सिंह ने विनती की. . . “करतारे और अख़्तर को एक ही वाहे गुरुजी ने पैदा किया है, समझीं”

“नहीं” अब के पत्नी चीख़ उठी … “मैं नहीं समझी और न कुछ समझना चाहती हूँ, मैं रात ही रात झटका कर डालूंगी इसका, काटकर फेंक दूँगी. उठा लाया है वहाँ से ले जा इसे फेंक दे बाहर.”

“तुम्हें न फेंक दूँ बाहर?”… अब के परमेशर सिंह बिगड़ गया.

“तुम्हारा न कर डालूँ झटका?” वह पत्नी की तरफ़ बढ़ा और बीवी अपने सीने को दो हथड़ों से पीटती, चीख़ती, चिल्लाती भागी. पड़ोस से अमर कौर दौड़ी आई. इसके पीछे गली की दूसरी औरतें भी आ गयीं. मर्द भी जमा हो गए और परमेशर सिंह की बीवी पिटने से बच गई. फिर सबने उसे समझाया कि नेक काम है, एक मुस्लिम को सिख करना कोई मामूली काम तो नहीं. पुराना ज़माना होता तो अब तक परमेशर सिंह गुरु मशहूर हो चुका होता. पत्नी की ढाढस बंधी पर अमर कौर एक कोने में बैठी घुटनों में सिर दिये रोती रही. अचानक परमेशर सिंह की गरज ने सारी भीड़ को हिला दिया… “अख़्तर किधर गया है वह चला गया यारो … अख़्तर … अख़्तर … !” वह चीख़ता हुआ मकान के कोनों खुद्रों में झाँकता हुआ बाहर भाग गया. बच्चे मारे दिलचस्पी के उसके पीछे थे. महिलाएं छतों पर चढ़ गई थीं और परमेशर सिंह गलियों से बाहर खेतों में निकल गया था… ” अरे, में तो उसे अम्मा पास ले चलता यारों. अरे, वह गया कहां? अख़्तर … हे अख़्तर… !”

“मैं तुम्हारे पास नहीं आऊँगा.” पगडंडी के एक मोड़ पर ज्ञान सिंह के गन्ने के खेत की आड़ में रोते हुए अख़्तर ने परमेशर सिंह को डाँट दिया “तुम तो सिख हो.”

“हाँ भैया मैं तो सिख हूं.” परमेशर सिंह ने जैसे मजबूर होकर स्वीकार अपराध कर लिया.

“तो फिर हम नहीं आएंगे.” अख़्तर ने पुराने आँसुओं को पोंछ कर नए आँसुओं के लिए रास्ता साफ़ किया.

“नहीं आओगे?” परमेशर सिंह का लहजा अचानक बदल गया .

“नहीं”

“नहीं आओगे ? ”

“नहीं…नहीं नहीं”

 

“कैसे नहीं आओगे?” परमेशर सिंह ने अख़्तर को कान से पकड़ा और फिर निचले होंठ को दांतों में दबा कर उसके मुंह पर चटाख से एक थप्पड़ मार दिया. “चलो” वह कड़का.

अख़्तर यूँ सहम गया जैसे एकदम उसका सारा खून नुचड़ कर रह गया है. फिर एका-एकी वह ज़मीन पर गिर पैर पटकने, धूल उड़ाने और बिलख-बिलख कर रोने लगा. “नहीं चलता बस नहीं चलता! तुम सिख हो मैं सिखों के पास नहीं जाऊँगा. में अम्मा पास जाऊँगा, मैं तुम्हें मार दूंगा”

 

और अब जैसे परमेशर सिंह के सहने की बारी थी. उसका भी सारा ख़ून जैसे निचुड कर रह गया था. उसने अपने हाथ को दाँतों में जकड़ लिया. उसके नथने फड़कने लगे और फिर इस ज़ोर से रोया कि खेत की दूसरी तरफ़ मेड पर आते हुए कुछ पड़ोसी और उनके बच्चे भी सहम कर रह गए और ठिठक गए. परमेशर सिंह घुटनों के बल अख़्तर के सामने बैठ गया. बच्चों की तरह यूँ सिसक सिसक कर रोने लगा कि उसका निचला होंठ भी बच्चों की तरह लटक आया और फिर बच्चों की सी रोती आवाज़ में बोला.

 

“मुझे माफ़ कर दे अख़्तर, मुझे तुम्हारे ख़ुदा की कसम मैं तुम्हारा दोस्त हूँ, तुम अकेले यहाँ से जाओगे तो तुम्हें कोई मार देगा. फिर तुम्हारी माँ पाकिस्तान से आकर मुझे मारेगी. मैं ख़ुद जाकर तुम्हें पाकिस्तान छोड़ आऊँगा. सुना? फिर वहाँ अगर तुम्हें एक लड़का मिल जाए ना. करतार नाम  का तो तुम उसे इधर गाँव में छोड़ जाना. अच्छा?”

 

“अच्छा!” अख़्तर ने उलटे हाथों से आँसू पोंछते हुए परमेशर सिंह से सौदा कर लिया .

परमेशर सिंह ने अख़्तर को कन्धे पर बिठा लिया और चला मगर एक ही कदम उठाकर रुक गया. सामने बहुत-से बच्चे और पड़ोसी खड़े उसकी तमाम हरकतें देख रहे थे. अधेड़ उम्र का एक पड़ोसी बोला … “रोते क्यों हो परमेशरे कुल एक महीने की तो बात है, एक महीने में केश बढ़ आएंगे तो बिल्कुल करतारा लगेगा.”

 

कुछ कहे बिना वह तेज़ तेज़ कदम उठाने लगा. फिर एक जगह रुककर उसने पलट कर अपने पीछे आने वाले पड़ोसियों की ओर देखा. . . “तुम कितने ज़ालिम लोग हो यारो. अख़्तर को करतारा बनाते हो और उधर अगर करतारे को अख़्तर बना ले तो? उसे ज़ालिम ही कहोगे ना.” फिर उसकी आवाज़ में गरज आ गई… ” यह लड़का मुसलमान ही रहेगा . दरबार साहब की सौं. में कल अमृतसर जाकर इसके अंग्रेजी बाल बनवा लाऊँगा. तुम ने मुझे समझ क्या रखा है , खालसा हूँ, सीने में शेर का दिल है, मुर्गी का नहीं”

 

परमेशर सिंह अपने घर में दाहिल होकर अभी अपनी पत्नी और बेटी को अख़्तर की जुलना के सिलसिले में आदेश ही दे रहा था कि गांव का ग्रंथी सरदार सनतो सिंह अंदर आया और बोला, “परमेशर सिंह.”

“जी”, परमेशर सिंह ने पलट कर देखा. ग्रंथी जी के पीछे उसके सब पड़ोसी भी थे.

 

“देखो” ग्रंथी जी ने बड़े दबदबे से कहा… “कल से यह लड़का खालसे की सी पगड़ी बांधेगा, कड़ा पहनेगा, धर्मशाला आएगा और इसे प्रसाद खिलाया जाएगा. उसके केश को कैंची नहीं छूएगी. छू गई तो कल ही से यह घर ख़ाली कर दो. समझे?”

“जी” परमेशर सिंह ने धीरे से कहा.

“हाँ.” ग्रंथीजी ने आख़री चोट लगाई.

“ऐसा ही होगा ग्रंथीजी.” परमेशर सिंह की पत्नी बोली… “पहले ही उसे रात को घर के कोने-कोने से कोई चीज़ कुरान पढ़ती सुनाई देती है. लगता है पहले जन्म में मुसल्ला रह चुका है. अमर कौर बेटी ने जब से यह सुना है कि हमारे घर में मुसल्ला छोकरा आया तो बैठी रो रही है, कहती है घर पर कोई आफ़त आएगी. परमेशरे ने आपका कहा न माना तो मैं भी धर्मशाला में चली आऊँगी और अमर कौर भी. फिर यह छोकरे को चाटे मुआ निकम्मा, वाहे गुरुजी का भी लिहाज़ नहीं करता”

 

“वाहे गुरुजी का अनुसार कौन नहीं करता गधी” परमेशर सिंह ने ग्रंथीजी की बात का गुस्सा बीवी पर निकाला. फिर वह मुह में ही गालियाँ देता रहा. कुछ देर के बाद वह उठकर ग्रंथीजी के पास गया. “अच्छा जी अच्छा” उसने कहा. ग्रंथीजी पड़ोसियों के साथ फ़ौरन विदा हो गए.

 

कुछ ही दिनों में अख़्तर को दूसरे सिख लड़कों से पहचानना मुश्किल हो गया. वही कानों की लवों तक कस कर बंधी हुई पगड़ी, वही हाथ का कड़ा और वही कच्छा. केवल जब वह घर में आकर पगड़ी उतारता था तो उसके गैर सिख होने का रहस्य खुलता था. लेकिन बाल धड़ा-धड़ बढ़ रहे थे. परमेशर सिंह की बीवी इन बालों को छूकर बहुत खुश होती… “ज़रा इधर तो आ अमर कौर, यह देख केश बन रहे हैं. फिर एक दिन जोड़ा बनेगा. कंघा लगेगा और उसका नाम रखा जाएगा करतार सिंह”

 

“नहीं माँ.” अमर कौर वहीं से जवाब देती… “जैसे वाहे गुरुजी एक हैं और ग्रन्थ साहब एक हैं और चाँद एक है. इसी तरह करतार भी एक है. मेरा नन्हा-मुन्ना भाई!” वह फूट-फूट कर रो देती और मचल कर कहती… “मैं इस खिलौने से नहीं बहलूंगी माँ, मैं जानती हूँ माँ यह मुसल्ला है और जो करतार होता है वह मुसल्ला नहीं होता.”

 

“मैं कब कहती हूँ यह सचमुच का करतार है. मेरा चाँद-सा लाडला बच्चा!”… परमेशर सिंह की बीवी भी रो देती. दोनों अख़्तर को अकेला छोड़कर किसी कोने में बैठ जातीं. ख़ूब ख़ूब रोतीं, एक दूसरे को तसल्लियाँ  देती और फिर ज़ार-ज़ार रोने लगतीं वह अपने करतार के लिए, अख़्तर कुछ दिन अपनी माँ के लिए रोया, अब किसी और बात पर रोता जब परमेशर सिंह शरणार्थियों की सहायता पंचायत से कुछ अनाज या कपड़ा ले आता तो अख़्तर भाग कर जाता और उसकी टांगों से लिपट जाता और रो रोकर कहता. . . “मेरे सिर पर पगड़ी बांध दो परमों … मेरे केश  बढ़ा दो. मुझे कंघा खरीद दो..”

 

परमेशर सिंह उसे सीने से लगा लेता और भराई हुई आवाज़ में कहता . . . “यह सब होगा बच्चे. सब कुछ हो जाएगा पर एक बात कभी नहीं होगी. वह बात कभी नहीं होगी. वह नहीं होगा मुझसे समझे? यह केश-वेश सब बढ़ आएँगे”

अख़्तर अपनी माँ को बहुत कम याद करता था. जब तक परमेशर सिंह घर में रहता वह उससे चिमटा रहता और जब वह कहीं बाहर जाता तो अख़्तर उसकी पत्नी और अमर कौर की ओर यूँ देखता रहता जैसे उनसे एक एक प्यार की भीख मांग रहा है. परमेशर सिंह की पत्नी उसे नहलाती, उसके कपड़े धोती और फिर उसके बालों में कंघी करते हुए रोने लगती और रोती रह जाती. लेकिन अमर कौर ने जब ​​देखा, नाक उछाल दी. शुरू शुरू में तो उसने अख़्तर को धमोका भी जड़ दिया था लेकिन जब अख़्तर ने परमेशर सिंह से इसकी शिकायत की तो परमेशर सिंह बिफर गया और अमर कौर को बड़ी नंगी-नंगी गालियां देता उसकी ओर बढ़ा कि अगर उसकी पत्नी रास्ते में पैर न पड़ जाती तो वह बेटी को उठाकर दीवार पर से गली में पटक देता . . . ” उल्लू की पट्ठी.” उस दिन उसने कड़क कर कहा था.

“सुना तो यही था कि लड़कियाँ उठ रही हैं पर यहाँ यह मुश्टंडी हमारे साथ लगी चली आई और उठ गया तो पांच साल का लड़का जिसे अभी अच्छी तरह नाक पोंछना भी नहीं आता. अजीब अंधेर है यारों.” इस घटना के बाद अमर कौर ने अख़्तर पर हाथ तो ख़ैर कभी न उठाया मगर उसकी नफ़रत दुगनी हो गई.

एक दिन अख़्तर को तेज़ बुख़ार आ गया. परमेशर सिंह वैद के पास चला गया और उसके जाने के कुछ देर बाद उसकी पत्नी पड़ोसन से पिसी हुई सौंफ माँगने चली गई. अख़्तर को प्यास लगी.

 

“पानी”, उसने कहा, कुछ देर बाद लाल लाल सूजी-सूजी आँखें खोलें इधर-उधर देखा और पानी का शब्द एक कराह बनकर उसके हलक से निकला. कुछ देर के बाद वह लिहाफ़ एक तरफ़ झटककर उठ बैठा. अमर कौर सामने दरवाज़े पर बैठी खजूर के पत्तों से चंगैर बना रही थी… “पानी दे!” अख़्तर ने उसे डाँटा. अमर कौर ने भंवें सिकोडकर उसे घूर कर देखा और अपने काम में जुट गई. अब के अख़्तर चिल्लाया… “पानी देती है कि नहीं … पानी दे वर्ना मारूंगा” . . . अमर कौर ने अब इसकी ओर देखा ही नहीं. बोली… “मार तो सही. तो करतार नहीं कि मैं तेरी मार सह लूंगी. मैं तो तेरी बोटी-बोटी कर डालूं” अख़्तर बिलख-बिलख रो दिया. और आज उसने अवधि के बाद अपनी माँ को याद किया. फिर जब परमेशर सिंह दवा ले आया और उसकी पत्नी भी पिसी हुई सौंफ लेकर आ गयी, तब तक अख़्तर ने रोते-रोते बुरी हालत बना ली थी और वह सिसक-सिसक कर कह रहा था. “हम तो अब अम्मा पास चलेंगे. यह अमर कौर सुअर की बच्ची तो पानी भी नहीं पिलाती. हम तो अम्मा पास जाएँगे” परमेशर सिंह ने अमर कौर की ओर गुस्से से देखा. वह रो रही थी और अपनी मां से कह रही थी . . . ” क्यों पानी पिलाऊँ? करतार भी तो कहीं इसी तरह पानी माँग रहा होगा किसी से. किसी को उस पर तरस न आये तो हमें क्यों तरस आये इस पर … हाँ?”

 

परमेशर सिंह अख़्तर की ओर बढ़ा और अपनी बीवी की तरफ़ इशारा करते हुए बोला.

“यह भी तो तुम्हारी माँ है बेटे.”

“नहीं” अख़्तर बड़े गुस्से से बोला. “यह तो सिख है. मेरी अम्मा तो पाँच वक्त की नमाज़ पढ़ती है और बिस्मिल्लाह कहकर पानी पिलाती है.”

परमेशर सिंह की बीवी जल्दी से एक प्याला भरकर लाई तो अख़्तर ने प्याले को दीवार पर दे मारा और चिल्लाया. “तुम्हारे हाथ से नहीं पीएंगे”

“यह भी तो मुझ सुअर की बच्ची का पिता है” अमर कौर ने जलकर कहा.

“तो हुआ करे” अख़्तर बोला. . . “तुम्हें इस से क्या”

परमेशर सिंह के चेहरे पर सुखद भाव अजीब धूप छाँव-सी पैदा कर गए. वह अख़्तर की माँग पर मुस्कुराया  भी और रो भी दिया. फिर उसने अख़्तर को पानी पिलाया. उसके माथे को चूमा. उसकी पीठ पर हाथ फेरा, उसे बिस्तर पर लिटा कर उसके सिर को हौले हौले सहलाता रहा और कहीं शाम को जाकर जब उसने पहलू बदला,  उस वक़्त अख़्तर का बुखार उतर चुका था और वह बड़े मज़े से सो रहा था.

 

आज बहुत समय के बाद रात को परमेशर सिंह भड़क उठा और निहायत धीरे-से बोला.

“अरी सुनती हो? सुन रही हो यहाँ कोई चीज़ कुरान पढ़ रही है.”

पत्नी ने पहले तो उसे परमेशर सिंह की पुरानी आदत कहकर टालना चाहा मगर फिर एकदम बड़बड़ाकर उठी और अमर कौर की खाट की तरफ़ हाथ बढ़ाकर उसे हौले हौले हिला कर धीरे से बोली. . . “बेटी”

“क्या है माँ?” अमर कौर चौंक उठी.

और उसने फुसफुसाहट की: “सुनो तो. सचमुच कोई चीज़ कुरान पढ़ रही है.”

यह एक क्षण का सन्नाटा बड़ा भयानक था. अमर कौर की चीख़ उससे भी अधिक भयानक थी और फिर अख़्तर की चीख़ सब से ज्यादा डरावनी थी.

“क्या हुआ बेटा” परमेशर सिंह तड़पकर उठा और अख़्तर की खाट पर जाकर उसे छाती से भींच लिया. “डर गए बेटा?”

“हाँ” अख़्तर लिहाफ से सिर निकाल कर बोला. “कोई चीज़ चीख़ी थी.”

“अमर कौर चीख़ी थी” परमेशर सिंह ने कहा. . . “हम सब यूँ समझे जैसे कोई चीज़ यहां कुरान पढ़ रही है”

“मैं पढ़ रहा था” अख़्तर बोला.

अब के भी अमर कौर के मुँह से हल्की चीख़ निकल गई.

पत्नी ने जल्दी से चिराग जला दिया और अमर कौर की खाट पर बैठकर वह दोनों अख़्तर को यूँ देखने लगीं जैसे वह अभी धुआं बनकर दरवाज़े की झुरियों से बाहर उड़ जाएगा और बाहर से एक डरावनी आवाज़ आएगी. “जिन हूँ मैं! कल रात फिर आकर कुरान पढूंगा.”

“क्या पढ़ रहे थे भला?” परमेशर सिंह ने पूछा.

“पढ़ूँ?” अख़्तर ने पूछा.

“हाँ हाँ” परमेशर सिंह ने बड़े शौक से कहा.

और अख़्तर “क़ुल हु वल्लाह उहद” पढ़ने लगा. “कुफुवन् अहद” पर पहुँचकर उसने अपने गिरेबान में छू की और फिर परमेशर सिंह की तरफ़ मुस्कुराते हुए बोला. . . “तुम्हारे सीने में भी छू कर दूँ?”

“हाँ हाँ” परमेशर सिंह ने गिरेबान का बटन खोल दिया और अख़्तर ने छू कर दी. अब के अमर कौर ने बड़ी मुश्किल से चीख़ पर काबू पाया.

परमेशर सिंह बोला. . . “क्या नींद नहीं आती थी?”

 

“हाँ” अख़्तर बोला… “अम्मा याद आ गई. अम्मा कहती है नींद न आए तो तीन बार “क़ुल हू वल्लाह” पढ़ो, नींद आ जाएगी, अभी आ रही थी, पर अमर कौर ने डरा दिया.”

“फिर से पढ़कर सो जाओ” परमेशर सिंह ने कहा. . . “रोज़ पढ़ा करो. ऊँचे-ऊँचे पढ़ा करो इसे भूलना नहीं वर्ना तुम्हारी अम्मा तुम्हें मारेगी. लो, अब सो जाओ.” उसने अख़्तर को लिटा कर उसे लिहाफ से ओढ़ा दिया. फिर दिया बुझाने के लिए बढ़ा तो अमर कौर पुकारी. . . “नहीं, नहीं बाबा. बुझाओ नहीं. डर लगता है.”

“जलता रहे, क्या है?” पत्नी बोली.

और परमेशर सिंह दिया बुझाकर हँस दिया… “पगालियाँ” वह बोला… “गधियाँ!”

रात के अंधेरे में अख़्तर आहिस्ता-आहिस्ता “क़ुल हू वल्लाह” पढ़ता रहा. फिर कुछ देर बाद ज़रा-ज़रा से खर्राटे लेने लगा. परमेशर सिंह भी सो गया और उसकी पत्नी भी. मगर अमर कौर रात-भर कच्ची नींद में “पडौस” की मस्जिद की अज़ान सुनती रही और डरती रही.

अब अख़्तर के अच्छे ख़ासे केश  बढ़ आए थे. छोटे से जूडी में कंघा भी अटक जाता था. गांव वालों की तरह परमेशर सिंह की पत्नी भी उसे करतार कहने लगी थी और इससे काफी प्यार से पेश आती थी मगर अमर कौर अख़्तर को यूँ देखती थी जैसे वह कोई बहरुपिया है और अभी वह पगड़ी और केश उतार कर फेंक देगा और “क़ुल हू वल्लाह” पढ़ता हुआ गायब हो जाएगा.

एक दिन परमेशर सिंह बड़ी तेज़ी से घर आया और हाँफते हुए अपनी पत्नी से पूछा.

 

“वह कहाँ है?”

“कौन? अमर कौर?”

“नहीं.”

“करतारा?”

“नहीं …” फिर कुछ सोचकर बोला. . . “हाँ, हाँ, वही करतारा”

“बाहर खेलने गया है. गली में होगा.”

परमेशर सिंह वापिस लपका. गली में जाकर भागने लगा. बाहर खेतों में जाकर उसकी रफ़्तार और तेज़ हो गई. फिर उसे दूर ज्ञान सिंह की गन्ने की फ़सल के पास कुछ बच्चे कबड्डी खेलते नज़र आए. खेत की ओट से उसने देखा कि अख़्तर ने एक लड़के को घुटनों तले दबा रखा है. लड़के के होठों से ख़ून फूट रहा है लेकिन कबड्डी कबड्डी की रट जारी है. फिर उस लड़के ने जैसे हार मान ली. और जब अख़्तर की पकड़ से छूटा तो बोला. . . “क्यों बे करतारु! तू ने मेरे मुंह पर घटना क्यों मारा?”

“अच्छा किया जो मारा” अख़्तर अकड़ कर बोला और बिखरे हुए जूड़े की लटें सँभालकर उनमें कंघी फंसाने लगा.

“तुम्हारे रसूल ने तुम्हें यही समझाया है?” लड़के ने तंज़ से पूछा.

अख़्तर एक क्षण के लिए चकरा गया. फिर सोचकर बोला. . . “और क्या तुम्हारे गुरु ने तुम्हें यही समझाया है?”

“मुसल्ला” लड़के ने उसे गाली दी.

“सखड़ा” अख़्तर ने उसे गाली दी.

सब लड़के अख़्तर पर टूट पड़े मगर परमेशर सिंह की एक ही कड़क से मैदान साफ़ ​​था. उसने अख़्तर की पगड़ी बाँधी और उसे एक तरफ ले जाकर बोला. . . “सुनो बेटे, मेरे पास रहोगे कि अम्मा के पास जाओगे …?”

 

अख़्तर कोई फ़ैसला न कर सका. कुछ देर तक परमेशर सिंह की आँखों में आँखें डाले खड़ा रहा फिर मुस्कुराने लगा और बोला. . . “अम्मा पास जाऊँगा.”

“और मेरे पास नहीं रहोगे?”

परमेशर सिंह का रंग यूँ सुर्ख़ हो गया जैसे वह रो देगा.

“तुम्हारे पास भी रहूँगा?” अख़्तर ने समस्या का हल पेश कर दिया. परमेशर सिंह ने उसे उठाकर सीने से लगा लिया और वह आँसू जो मायूसी ने ऑंखों में जमा किए थे, खुशी के आंसू बनकर टपक पड़े. वह बोला… “देखो बेटे! अख़्तर बेटे आज यहां सेना आ रही है यह सैनिक तुम्हें मुझसे छीनने आ रहे हैं, समझे तुम कहीं छुप जाओ. फिर जब वे चले जाएँगे ना, तो मैं तुम्हें ले आऊँगा.”

परमेशर सिंह को उस वक्त दूर गुबार का एक फैलता हुआ बगूला दिखाई दिया. मैंड पर चढ़कर उसने लम्बे होते हुए बगूले को गौर से देखा और अचानक तड़प कर बोला. . . “सैनिकों की लारी आ गई …” वह मैंड से कूद पड़ा और गन्ने के खेत का पूरा चक्कर काट गया.

“ज्ञाने, ओ ज्ञान सिंह!” वह चिल्लाया. ज्ञान सिंह फसल के अंदर से निकल आया. उसके एक हाथ में दरांती और दूसरे हाथ में थोड़ी-सी घास थी… परमेशर सिंह उसे अलग ले गया, उसे कोई बात समझाई फिर दोनों अख़्तर के पास आए. ज्ञान सिंह ने फसल में से एक गन्ना तोड़कर दरांती से उसके पत्ते काटे और उसे अख़्तर के हवाले करके बोला… “आओ भाई करतार! तुम मेरे पास बैठकर गन्ना चूसो जब तक सैनिक चले जाएं. अच्छा-खासा बना-बनाया खालसा हथियाने आये हैं. हूंह”… परमेशर सिंह ने अख़्तर से जाने की अनुमति मांगी… “जाऊँ …?”

 

और अख़्तर ने दाँतों में गन्ने का लम्बा सा छिल्का जकड़े हुए मुस्कुराने की कोशिश की. अनुमति पाकर परमेशर सिंह गाँव के तरफ़ भाग गया. बगूला गांव की तरफ़ बढ़ा आ रहा था.

घर जाकर उसने बीवी और बेटी को समझाया. फिर भागम-भाग ग्रंथीजी के पास गया. उनसे बात करके इधर उधर दूसरे लोगों को समझाता फिरा. जब सैनिकों की लारी धर्मशाला से उधर खेतों में रुक गई तो सभी सैन्य और पुलिस वाले ग्रंथीजी के पास आए. उनके साथ इलाक़े का नम्बरदार भी आया था. मुसलमान लड़कियों के बारे में पूछताछ होती रही. ग्रंथीजी ने ग्रन्थ साहब की कसम खाकर कह दिया कि गाँव में कोई मुसलमान लड़की नहीं. “लड़के की बात दूसरी है” किसी ने परमेशर सिंह के कान में कानाफूसी की और आसपास के सिख परमेशर सिंह समेत मुस्कराने लगे. फिर एक सैन्य अधिकारी ने गांव वालों के सामने एक भाषण दिया. उसने मामता पर बड़ा ज़ोर दिया कि इन माताओं के दिलों में इन दिनों टीस बन कर रह गई थी जिनकी बेटियों छिन गई थीं और उन भाइयों और पतियों के प्यार की बड़ी दर्दनाक तस्वीर खींची जिनकी बहनें और पत्नियाँ उनसे हथिया ली गई थीं … “और धर्म क्या है, दोस्तो?” उसने कहा… “दुनिया का हर धर्म इंसान को इंसान बनना सिखाता है और तुम धर्म के नाम लेकर मनुष्य को मनुष्य से लड़ा देते हैं. उनकी आबरू पर नाचते हो और कहते हो हम सिख हैं, हम मुसलमान हैं … हम  वाहे गुरुजी के चेले हैं, हम रसूल के गुलाम हैं”

तक़रीर के बाद भीड़ छूटने लगी. सैनिकों के अधिकारी ने ग्रंथीजी को धन्यवाद कहा. उनसे हाथ मिलाया और लारी चली गई.

पहले ग्रंथीजी ने परमेशर सिंह को बधाई दी. फिर दूसरे लोगों ने परमेशर सिंह को घेर लिया और उसे बधाई देने लगे लेकिन परमेशर सिंह लारी आने से पहले होश बाख़्ता हो रहा था तो लारी जाने के बाद लुट-पुटा सा लग रहा था. फिर वह गाँव से निकलकर ज्ञान सिंह के खेत में आया. अख़्तर को कंधे पर बैठाकर घर में ले आया. खाना खिलाने के बाद उसे खाट पर लिटा कर कुछ यूं थपका कि उसे नींद आ गई. परमेशर सिंह देर तक खाट पर बैठा रहा. कभी दाढ़ी खुजाते और इधर उधर देखकर फिर सोच में बैठ जाता. पड़ोस की छत पर खेलता हुआ एक बच्चा अचानक अपनी एड़ी पकड़ कर बैठ गया और जोर से रोने लगा. “हाए, इतना बड़ा कांटा उतर गया पूरे का पूरा.” वह चिल्लाया और फिर उसकी माँ नंगे सिर ऊपर भागी. उसे गोद में बिठा लिया फिर नीचे बेटी को पुकार कर सुई मंगवाई. कांटा निकालने के बाद इसे बहुत चूमा और फिर नीचे झुककर पुकारा… “अरे, मेरा दुपट्टा तो ऊपर फेंक. कैसी बेहयाई से ऊपर भागी चली आयी.”

परमेशर सिंह ने कुछ देर बाद चौंककर पत्नी से पूछा.

“सुनो, क्या तुम्हें करतारा अब भी याद आता है.”

“लो और सुनो” पत्नी बोली और फिर एकदम छाजों रो दी… “करतारा तो मेरे कलेजे का नासूर बन गया है परमेशरे!”

करतारे का नाम सुनकर उधर से अमर कौर उठकर आई और रोती हुई मां के घुटने के पास बैठकर रोने लगी.

परमेशर सिंह यूं बिदक कर जल्दी से उठ बैठा जैसे उसने शीशे के बर्तनों से भरा तश्त अचानक ज़मीन पर दे मारा हो.

 

शाम के खाने के बाद वह अख़्तर को उंगली से पकड़े बाहर दालान में आया और बोला. “आज तो दिन भर खूब सोए हो बेटा. चलो आज ज़रा घूमने चलते हैं. चांदनी रात है.”

अख़्तर तुरंत मान गया. परमेशर सिंह ने उसे कंबल में लपेटा और कन्धे पर बिठा लिया. खेतों में आकर वह बोला. “यह चाँद जो पूरब से निकल रहा है न बेटे, जब यह हमारे सिर पर पहुँचेगा तो सुबह हो जाएगी.”

अख़्तर चाँद की ओर देखने लगा.

“यह चाँद जो यहाँ चमक रहा है ना. यह वहाँ भी चमक रहा होगा. तुम्हारी अम्मा के देश में.”

अब के अख़्तर ने झुककर परमेशर सिंह की ओर देखने की कोशिश की.

“यह चाँद हमारे सिर पर आएगा तो वहाँ तुम्हारी अम्मा के सिर पर भी होगा.”

अब के अख़्तर बोला “हम चाँद देख रहे हैं तो क्या अम्मा भी चाँद देख रही होगी?”

“हाँ” परमेशर सिंह की आवाज़ में गूंज थी … “चलोगे अम्मा के पास? ”

“हाँ” अख़्तर बोला… “पर तुम जाते नहीं, तुम बहुत बुरे हो, तुम सिख हो.”

परमेशर सिंह बोला. . . “नहीं बेटे, आज तो तुम्हें ज़रूर ले जाऊँगा. तुम्हारी अम्मा की चिट्ठी आई है. वह कहती है अख़्तर बेटे के लिए दुखी हूँ.”

“मैं भी तो दुखी हूँ.” अख़्तर को जैसे कोई भूली हुई बात याद आ गई.

“मैं तुम्हें तुम्हारी अम्मा के पास लिए जा रहा हूँ.”

“सच …?” अख़्तर परमेशर सिंह के कंधे पर कूदने लगा और ज़ोर ज़ोर से बोलने लगा. . . “हम अम्मा पास जा रहे हैं. परमों हमें अम्मा पास ले जाएगा. हम वहाँ परमों को चिट्ठी लिखेंगे.”

परमेशर सिंह चुपचाप रोए जा रहा था. आँसू पोंछकर और गला साफ़ करके उसने अख़्तर से पूछा.

“गाना सुनोगे?”

“हाँ”

“पहले तुम कुरान सुनाओ.”

“अच्छा” और अख़्तर “क़ुल हु वल्लाह” अहद पढ़ने लगा, “कुफुवन् अहद” पर पहुँचकर उसने अपने सीने पर छू करदी, और बोला. . . “लाओ तुम्हारे सीने पर भी छू कर दूं.”

रुक कर परमेशर सिंह ने गिरेबान का एक बटन खोला और ऊपर देखा. अख़्तर ने लटक कर उसके सीने पर छू कर दी और बोला. . . “अब तुम सुनाओ.”

 

परमेशर सिंह ने अख़्तर को दूसरे कन्धे पर बिठा लिया. उसे बच्चों का कोई गीत याद नहीं था. इसलिए उसने तरह-तरह के गीत गाने शुरू किये और गाते हुए तेज़-तेज़ चलने लगा. अख़्तर चुपचाप सुनता रहा.

“बन्तो दा सर बन वरगा जे बन्तो दा मुंह चन् वरगा जे बन्तो दा लक चित्रा जे लोको बन्तो दा लक चित्रा…”

“बन्तो कौन है?” अख़्तर ने परमेशर सिंह को टोका.

परमेशर सिंह हँसा फिर विराम के बाद बोला… “मेरी पत्नी है ना? अमर कौर की मां? उसका नाम बन्तो है. अमर कौर का नाम भी बन्तो है. तुम्हारी अम्मा का नाम भी बन्तो ही होगा.”

“क्यों?” अख़्तर खफ़ा हो गया… “वह कोई सिख है?”

परमेशर सिंह चुप हो गया.

चाँद बहुत ऊँचा हो गया था. रात ख़ामोश थी, कभी-कभी गन्ने के खेतों के आस पास गीदड़ रोते और फिर सन्नाटा छा जाता. अख़्तर पहले तो गीदड़ों की आवाज़ से बहुत डरा मगर परमेशर सिंह के समझाने से बहल गया और एक बार खामोशी के लंबे अंतराल के बाद उसने परमेशर सिंह से पूछा. . . “अब क्यों नहीं रोते गीदड़?” परमेशर सिंह हँस दिया. फिर उसे एक कहानी याद आ गई. यह गुरु गोविन्द सिंह की कहानी थी. लेकिन उसने बड़े सलीके से सिखों के नामों को मुसलमानों के नामों में बदल दिया और अख़्तर “फिर? फिर?” की रट लगाता रहा और कहानी अभी जारी थी जब अख़्तर एकदम बोला. “अरे, चाँद तो सिर पर आ गया!”

परमेशर सिंह ने भी रुक कर ऊपर देखा. वह पास के टीले पर चढ़कर दूर से देखने लगा और बोला. . . “तुम्हारी अम्मा का देश जाने किधर चला गया.”

वह कुछ देर टीले पर खड़ा रहा. जब अचानक कहीं दूर से अज़ान की आवाज़ आने लगी और अख़्तर मारे खुशी के यूँ कूदा कि परमेशर सिंह उसे बड़ी मुश्किल से संभाल सका. उसे कंधे से उतारकर वह ज़मीन पर बैठ गया और खड़े हुए अख़्तर के कन्धों पर हाथ रखकर बोला… “जाओ बेटा, तुम्हें तुम्हारी अम्मा ने पुकारा है. बस तुम इस आवाज़ की सीध में…”

“श्श” अख़्तर ने अपने होठों पर उंगली रख दी और फुसफुसाहट की.

“अज़ान के वक्त नहीं बोलते.”

“पर मैं तो सिख हूं बेटे!” परमेशर सिंह बोला.

“श्श” अब के अख़्तर ने बिगड़ कर उसे घूरा.

और परमेशर सिंह ने उसे गोद में बिठा लिया. उसके माथे पर एक बहुत लम्बा प्यार दिया और अज़ान समाप्त होने के बाद आस्तीन से आँखें रगड़ कर भराई हुई आवाज़ में बोला.

“मैं यहाँ से आगे नहीं आऊँगा. बस तुम …”

“क्यों …? क्यों नहीं आओगे …?” अख़्तर ने पूछा.

“तुम्हारी अम्मा ने चिट्ठी में यही लिखा है कि अख़्तर अकेला आए.”

परमेशर सिंह ने अख़्तर को फुसलाया … “बस तुम सीधे चले जाओ. सामने एक गाँव आएगा. वहाँ जाकर अपना नाम बताना करतारा नहीं, अख़्तर. फिर अपनी मां का नाम बताना. अपने गाँव का नाम बताना और देखो, मुझे एक चिट्ठी ज़रूर लिखना.”

“लिखूंगा” अख़्तर ने वादा किया.

“और हाँ, तुम्हें करतारा नाम का कोई लड़का मिले न, तो उसे इधर भेज देना.”

“अच्छा” परमेशर सिंह ने एक बार फिर अख़्तर का माथा चूमा और जैसे कुछ निगल कर बोला.

“जाओ!”

अख़्तर कुछ कदम चला मगर पलट आया. . . “तुम भी आ जाओ, ना.”

“नहीं भाई!” परमेशर सिंह ने उसे समझाया. . . “तुम्हारी अम्मा ने चिट्ठी में यह नहीं लिखा.”

“मुझे डर लगता है.” अख़्तर बोला.

“कुरान क्यों नहीं पढ़ते?” परमेशर सिंह ने सुझाव दिया.

“अच्छा” बात समझ में आ गई और वह “क़ुल हु वल्लाह” का पाठ करता हुआ जाने लगा.

नरम-नरम पौ क्षितिज के दायरे पर अँधेरे से लड़ रही थी और नन्हा-सा अख़्तर दूर धुंधली पगडंडी पर एक लंबे तडंगे सिख जवान की तरह तेज़-तेज़ जा रहा था. परमेशर सिंह उस पर नज़रें गाड़े टीले पर बैठा रहा और जब अख़्तर बिंदु वातावरण का एक हिस्सा बन गया तो वहाँ से उतर आया.

अख़्तर अभी गाँव के क़रीब नहीं पहुँचा था कि दो सिपाही लपक कर आये और उसे रोककर बोले. “कौन हो तुम?”

“अख़्तर”

वह यूँ बोला जैसे सारी दुनिया उसका नाम जानती है.

“अख़्तर!” दोनों सिपाही कभी अख़्तर के चेहरे को देखते और कभी उसकी सिखों की सी पगड़ी को. फिर एक ने आगे बढ़कर उसकी पगड़ी झटके से उतार ली तो अख़्तर के केश खुलकर इधर उधर बिखर गए.

अख़्तर ने भिन्ना कर पगड़ी छीन ली और फिर एक हाथ सेसिर को टटोलते हुए वह ज़मीन पर लेट गया और ज़ोर-ज़ोर से रोते हुए बोला… “मेरा कंघा लाओ. आप ने मेरा कंघा ले लिया है. दो वरना मैं तुम्हें मारूंगा.”

एकदम दोनों सिपाही धप ज़मीन पर गिरे और राइफल को कंधे से लगाकर जैसे निशाना बाँधने लगे.

“हाल्ट!” एक पुकारा, जैसे जवाब का इंतजार करने लगा. फिर बढ़ते हुए उजाले में उन्होंने एक दूसरे की ओर देखा और एक ने फायर कर दिया. अख़्तर फायर की आवाज से दहल कर रह गया और सिपाहियों को एक तरफ भागता देखकर वह भी रोता-चिल्लाता हुआ उनके पीछे भागा.

सिपाही जब एक जगह जाकर रुके तो परमेशर सिंह अपनी रान पर कस कर पट्टी बाँध चुका था मगर खून उसकी पगड़ी की सैकड़ों परतों में से भी फूट आया. और वह कह रहा था… “मुझे क्यों मारा तुमने? मैं तो अख़्तर के केश काटना भूल गया, मैं अख़्तर को उसका धर्म वापस देने आया था यारों.”

और अख़्तर भागा आ रहा था और इस केश हवा में उड़ रहे थे.

 ***

پرمیشر سنگھ
از احمد ندیم قاسمی

اختر اپنی ماں سے یوں اچانک بچھڑ گیا جیسے بھاگتے ہوئے کسی جیب سے روپیہ گر پڑے۔ ابھی تھا اور ابھی غائب۔ ڈھنڈیا پڑی مگر بس اس حد تک کہ لٹے پٹے قافلے کے آخری سرے پر ایک ہنگامہ صابن کی جھاگ کی طرح اٹھا اور بیٹھ گیا۔ “کہیں آ ہی رہا ہو گا۔ ” کسی نے کہہ دیا “ہزاروں کا تو قافلہ ہے” اور اختر کی ماں اس تسلی کی لاٹھی تھامے پاکستان کی طرف رینگتی چلی آئی تھی۔ “آہی رہا ہو گا” وہ سوچتی “کوئی تتلی پکڑنے نکل گیا ہو گا اور پھر ماں کو نہ پا کر رویا ہو گا اور پھر۔ پھر اب کہیں آ ہی رہا ہو گا۔ سمجھ دار ہے پانچ سال سے تو کچھ اوپر ہو چلا ہے۔ آ جائے گا وہاں پاکستان میں ذرا ٹھکانے سے بیٹھوں گی تو ڈھونڈ لوں گی۔ “

لیکن اختر تو سرحد سے کوئی پندرہ میل دور اُدھر یونہی بس کسی وجہ کے بغیر اتنے بڑے قافلے سے کٹ گیا تھا۔ اپنی ماں کے خیال کے مطابق اس نے تتلی کا تعاقب کیا یا کسی کھیت میں سے گنّے توڑنے گیا اور توڑتا رہ گیا۔ بہر حال وہ جب روتا چلاتا ایک طرف بھاگا جا رہا تھا تو سکھوں نے اسے گھیر لیا تھا اور اختر نے طیش میں آ کر کہا تھا “میں نعرۂ تکبیر ماروں گا” اور یہ کہہ کر سہم گیا تھا۔

سب سکھ بے اختیار ہنس پڑے تھے، سوائے ایک سکھ کے، جس کا نام پرمیشر سنگھ تھا۔ ڈھیلی ڈھالی پگڑی میں سے اس کے الجھے ہوئے کیس جھانک رہے تھے اور جوڑا تو بالکل ننگا تھا۔ وہ بولا “ہنسو نہیں یارو، اس بچے کو بھی تو اس واہ گورو نے پیدا کیا ہے جس نے تمھیں اور تمھارے بچوں کو پیدا کیا ہے۔ “

ایک نوجوان سکھ جس نے اب تک اپنی کرپان نکال لی تھی، بولا “ذرا ٹھہر پرمیشر” کرپان اپنا دھرم پورا کر لے، پھر ہم اپنی دھرم کی بات کریں گے۔ “

“مارو نہیں یارو” پرمیشر سنگھ کی آواز میں پکار تھی۔ اسے مارو نہیں اور وہ بری طرح ہانپ رہا تھا۔

اختر کے پاس آ کر وہ گھٹنوں کے بل بیٹھ گیا اور بولا۔

“نام کیا ہے تمھارا؟”

“اختر”۔ ۔ ۔ اب کی اختر کی آواز بھرائی ہوئی نہیں تھی۔

“اختر بیٹے” پرمیشر سنگھ نے بڑے پیار سے کہا۔

“ذرا میری انگلیوں میں جھانکو تو”

اختر ذرا سا جھک گیا۔ پرمیشر سنگھ نے دونوں ہاتھوں میں ذرا سی جھری پیدا کی اور فوراً بند کر لی “آہا” اختر نے تالی بجا کر اپنے ہاتھوں کو پرمیشر سنگھ کے ہاتھوں کی طرح بند کر لیا اور آنسوؤں میں مسکرا کر بولا۔ “تتلی”

“لو گے؟” پرمیشر سنگھ نے پوچھا۔

“ہاں” اختر نے اپنے ہاتھوں کو ملا۔

“لو” پرمیشر سنگھ نے اپنے ہاتھوں کو کھولا۔ اختر نے تتلی کو پکڑنے کی کوشش کی مگر وہ راستہ پاتے ہی اڑ گئی اور اختر کی انگلیوں کی پوروں پر اپنے پروں کے رنگوں کے ذرّے چھوڑ گئی۔ اختر اداس ہو گیا اور پرمیشر سنگھ دوسرے سکھوں کی طرف دیکھ کر بولا “سب بچے ایک سے کیوں ہوتے ہیں یارو! کرتارے کی تتلی بھی اڑ جاتی تھی یوں ہی منھ لٹکا لیتا تھا۔ ۔ ۔ “

“پرمیشر سنگھ تو آدھا پاگل ہو گیا ہے۔ ” نوجوان سکھ نے ناگواری سے کہا اور پھر سارا گروہ واپس جانے لگا۔

پرمیشر سنگھ نے اختر کو کنارے پر بٹھا لیا اور جب اسی طرف چلنے لگا جدھر دوسرے سکھ گئے تھے تو اختر پھڑک پھڑک کر رونے لگا “ہم اماں پاس جائیں گے۔ اماں پاس جائیں گے” پرمیشر سنگھ نے ہاتھ اٹھا کر اسے تھپکنے کی کوشش کی مگر اختر نے اس کا ہاتھ جھٹک دیا پھر جب پرمیشر سنگھ نے اس سے یہ کہا کہ “ہاں ہاں بیٹے” تمھیں تمھاری اماں پاس لیے چلتا ہوں۔ تو اختر چپ ہو گیا۔ صرف کبھی کبھی سسک لیتا تھا اور پرمیشر سنگھ کی تھپکیوں کو بڑی ناگواری سے برداشت کرتا جا رہا تھا۔

پرمیشر سنگھ اسے اپنے گھر میں لے آیا۔ پہلے یہ کسی مسلمان کا گھر تھا۔ لٹا پٹا پرمیشر سنگھ جب ضلع لاہور سے ضلع امرت سر میں آیا تھا تو گاؤں والوں نے اسے یہ مکان الاٹ کر دیا تھا وہ اپنی بیوی اور بیٹی سمیت جب اس چار دیواری میں داخل ہوا تھا، ٹھٹھک کر رہ گیا تھا۔ اس کی اتنا ذرا سا تو ہے اور اسے بھی تو اسی واہگوروجی نے پیدا کیا ہے جس نے۔ ۔ ۔ “

“پوچھ لیتے ہیں اسی سے۔ ۔ ۔ ” ایک اور سکھ بولا پھر اس نے سہمے ہوئے اختر کے پاس جا کر کہا۔ ۔ ۔ “بولو تمھیں کس نے پیدا کیا ہے؟ خدا نے کہ واہگوروجی نے؟”

اختر نے ساری خشکی کو نگلنے کی کوشش کی جو اس کی زبان کی نوک سے لے کر اس کی ناف تک پھیل چکی تھی، آنکھیں جھپک کر اس نے ان آنسوؤں کو گرا دینا چاہا جو ریت کی طرح اس کے پپوٹوں میں کھٹک رہے تھے۔ اس نے پرمیشر سنگھ کی طرف یوں دیکھا جیسے ماں کو دیکھ رہا ہے۔ منھ میں گئے ہوئے ایک آنسو کو تھوک ڈالا اور بولا۔

“پتہ نہیں۔ “

“لو اور سنو” کسی نے کہا اور اختر کو گالی دے کر ہنسنے لگا۔

اختر نے ابھی اپنی بات پوری نہیں کی تھی، بولا۔ ۔ ۔ “اماں تو کہتی ہے میں بھوسے کی کوٹھری میں پڑا ملا تھا۔ “

سب سکھ ہنسنے لگے مگر پرمیشر سنگھ بچوں کی طرح بلبلا کر کچھ یوں رویا کہ دوسرے سکھ بھونچکا سے رہ گئے اور پرمیشر سنگھ رونی آواز میں جیسے بین کرنے لگا۔ ۔ ۔ “سب بچے ایک سے ہوتے ہیں یارو۔ میرا کرتار ابھی تو یہی کہتا تھا وہ بھی تو اس کی ماں کو بھوسے کی کوٹھری میں پڑا ملا تھا۔ “

کرپان میان میں چلی گئی۔ سکھوں نے پرمیشر سنگھ سے الگ تھوڑی دیر کھُسر پھُسر کی۔ پھر ایک سکھ آگے بڑھا۔ بلکتے ہوئے اختر کو بازو سے پکڑے وہ چپ چاپ روتے ہوئے پرمیشر سنگھ کے پاس آیا اور بولا۔ ۔ ۔ “لے پرمیشرے” سنبھال اسے، کیس بڑھوا کر اسے اپنا کرتارا بنا لے۔ ۔ ۔ لے پکڑ”۔

پرمیشر نے اختر کو یوں جھپٹ کر اٹھا لیا کہ اس کی پگڑی کھل گئی اور کیسوں کی لٹیں لٹکنے لگیں۔ اس نے اختر کو پاگلوں کی طرح چوما۔ اسے اپنے سینے سے بھینچا اور پھر اس کی آنکھوں میں آنکھیں ڈال کر اور مسکرا مسکرا کر کچھ ایسی باتیں سوچنے لگا جنھوں نے اس کے چہرے کو چمکا دیا پھر اس نے پلٹ کر دوسرے سکھوں کی طرف دیکھا۔ اچانک وہ اختر کو نیچے اتار کر سکھوں کی طرف لپکا، مگر ان کے پاس سے گزر کر دور تک بھاگا چلا گیا۔ جھاڑیوں کے ایک جھنڈ میں بندروں کی طرح کودتا اور چھپتا رہا اور اس کے کیس اس کی لپک جھپٹ کا ساتھ دیتے رہے۔ دوسرے سکھ حیران کھڑے دیکھتے رہے، پھر وہ ایک ہاتھ کو دوسرے ہاتھ میں رکھے بھاگتا ہوا واپس آیا۔ اس کی بھیگی ہوئی داڑھی میں پھنسے ہوئے ہونٹوں پر مسکراہٹ تھی اور سرخ آنکھوں میں چمک تھی۔ آنکھیں پتھرا سی گئی تھیں اور وہ بڑی پر اسرار سرگوشی میں بولا تھا۔ “یہاں کوئی چیز قرآن پڑھ رہی ہے۔ “

گرنتھی جی اور گاؤں کے دوسرے لوگ ہنس پڑے تھے۔ پرمیشر سنگھ کی بیوی نے انھیں پہلے سے بتا دیا تھا کہ کرتار سنگھ کے بچھڑتے ہی انھیں کچھ ہو گیا ہے۔ “جانے کیا ہو گیا ہے اسے” اس نے کہا تھا۔ واہگوروجی جھوٹ نہ بلوائیں تو وہاں دن میں کوئی دس بار تو یہ کرتار سنگھ کو گدھوں کی طرح پیٹ ڈالتا تھا۔ اور جب سے کرتار سنگھ بچھڑا ہے تو میں تو خیر رو دھو لی پر اس کا رونے سے بھی جی ہلکا نہیں ہوا۔ وہاں مجال ہے جو بیٹی امر کور کو میں ذرا بھی غصے سے دیکھ لیتی، بپھر جاتا تھا، کہتا تھا، بیٹی کو برا مت کہو۔ بیٹی بڑی مسکین ہوتی ہے۔ یہ تو ایک مسافر ہے بے چاری۔ ہمارے گھروندے میں سستانے بیٹھ گئی ہے۔ وقت آئے گا تو چلی جائے گی اور اب امر کور سے ذرا سا بھی کوئی قصور ہو جائے تو آپے ہی میں نہیں رہتا۔ یہاں تک بک دیتا ہے کہ بیٹیاں بیویاں اغوا ہوتے سنی تھیں یارو۔ یہ نہیں سنا تھا کہ پانچ برس کے بیٹے بھی اٹھ جاتے ہیں۔ “

وہ ایک مہینے سے اس گھر میں مقیم تھا مگر ہر رات اس کا معمول تھا کہ پہلے سوتے میں بے تحاشا کروٹیں بدلتا پھر بڑبڑانے لگتا اور پھر اٹھ بیٹھتا۔ بڑی ڈری ہوئی سرگوشی میں بیوی سے کہتا۔ “سنتی ہو؟ یہاں کوئی چیز قرآن پڑھ رہی ہے۔ “۔ ۔ ۔ بیوی اسے محض “اونہہ” سے ٹال کر سو جاتی تھی مگر امر کور کو اس سرگوشی کے بعد رات بھر نیند نہ آئی۔ اسے اندھیرے میں بہت سی پرچھائیاں ہر طرف بیٹھی قرآن پڑھتی نظر آئیں اور پھر جب ذرا سی پو پھٹتی تو وہ کانوں میں انگلیاں دے لیتی تھی۔ وہاں ضلع لاہور میں ان کا گھر مسجد کے پڑوس ہی میں تھا اور جب صبح اذان ہوتی تھی تو کیسا مزا آتا تھا۔ ایسا لگتا تھا کہ جیسے پورب سے پھوٹتا ہوا اجالا گانے لگا ہے۔ پھر جب اس کی پڑوسن پریتم کور کو چند نوجوانوں نے خراب کر کے چیتھڑے کی طرح گھورے پر پھینک دیا تھا تو جانے کیا ہوا کہ مؤذن کی اذان میں بھی اسے پریتم کور کی چیخ سنائی دے رہی تھی، اذان کا تصور تک اسے خوف زدہ کر دیتا تھا اور وہ یہ بھی بھول جاتی تھی کہ اب ان کے پڑوس میں مسجد نہیں ہے۔ یوں ہی کانوں میں انگلیاں دیتے ہوئے وہ سو جاتی اور رات بھر جاگتے رہنے کی وجہ سے دن چڑھے تک سوئی رہتی تھی اور پرمیشر سنگھ اس بات پر بگڑ جاتا۔ ۔ ۔ “ٹھیک ہے سوئے نہیں تو اور کیا کرے۔ نکمی تو ہوتی ہیں یہ چھوکریاں۔ لڑکا ہو تو اب تک جانے کتنے کام کر چکا ہوتا یارو۔ “

پرمیشر سنگھ آنگن میں داخل ہوا تو آج خلاف معمول اس کے ہونٹوں پر مسکراہٹ تھی۔ اس کے کھلے کیس کنگھے سمیت اس کی پیٹھ اور ایک کندھے پر بکھرے ہوئے تھے اور اس کا ایک ہاتھ اختر کی کمر تھپکے جا رہا تھا۔ اس کی بیوی ایک طرف بیٹھی چھاج میں گندم پھٹک رہی تھی۔ اس کے ہاتھ جہاں تھے وہیں رک گئے اور وہ ٹکر ٹکر پرمیشر سنگھ کو دیکھنے لگی۔ پھر وہ چھاج پر سے کودتی ہوئی آئی اور بولی۔

“یہ کون ہے؟”

پرمیشر سنگھ بدستور مسکراتے ہوئے بولا۔ ۔ ۔ “ڈرو نہیں بیوقوف اس کی عادتیں بالکل کرتارے کی سی ہیں یہ بھی اپنی ماں کو بھوسے کی کوٹھری میں پڑا ملا تھا۔ یہ بھی تتلیوں کا عاشق ہے اس کا نام اختر ہے۔ “

“اختر” بیوی کے تیور بدل گئے۔

“تم اسے اختر سنگھ کہہ لینا” پرمیشر سنگھ نے وضاحت کی۔ ۔ ۔ “اور پھر کیسوں کا کیا ہے، دنوں میں بڑھ جاتے ہیں۔ کڑا اور کچھیرا پہنا دو، کنگھا کیسوں کے بڑھتی لگ جائے گا۔ “

“پر یہ ہے کس کا؟” بیوی نے مزید وضاحت چاہی۔

“کس کا ہے!” پرمیشر سنگھ نے اختر کو کندھے پر سے اتار کر اسے زمین پر کھڑا کر دیا اور اس کے سر پر ہاتھ پھیرنے لگا۔ واہگورو جی کا ہے ہمارا اپنا ہے اور پھر یارو یہ عورت اتنا بھی دیکھ نہیں سکتی کہ اختر کے ماتھے پر جو یہ ذرا سا تل ہے یہ کرتارے ہی کا تل ہے۔ کرتارے کے بھی تو ایک تل تھا اور یہیں تھا۔ ذرا بڑا تھا پر ہم اسے یہیں تل پر تو چومتے تھے۔ اور یہ اختر کے کانوں کی لویں گلاب کے پھول کی طرح گلابی ہیں تو یارو۔ یہ عورت یہ تک نہیں سوچتی کہ کرتارے کے کانوں کی لویں بھی تو ایسی ہی تھیں۔ فرق صرف اتنا ہے کہ وہ ذرا موٹی تھیں یہ ذرا پتلی ہیں اور۔ ۔ ۔ “

اختر اب تک مارے حیرت کے ضبط کیے بیٹھا تھا۔ بلبلا اٹھا۔ ۔ ۔ “ہم نہیں رہیں گے، ہم اماں پاس جائیں گے، اماں پاس۔ “

پرمیشر سنگھ نے اختر کا ہاتھ پکڑ کر اسے بیوی کی طرف بڑھایا۔ ۔ ۔ “اری لو۔ یہ اماں کے پاس جانا چاہتا ہے۔ “

“تو جائے۔ ” بیوی کی آنکھوں میں اور چہرے پر وہی آسیب آگیا تھا جسے پرمیشر سنگھ اپنی آنکھوں اور چہرے میں سے نوچ کر باہر کھیتوں میں جھٹک آیا تھا۔ ۔ ۔ “ڈاکہ مارنے گیا تھا سورما۔ اور اٹھا لایا یہ ہاتھ بھر کا لونڈا۔ ارے کوئی لڑکی ہی اٹھا لاتا۔ تو ہزار میں نہ سہی، ایک دو سو میں بک جاتی۔ اس اجڑے گھر کا کھاٹ کھٹولہ بن جاتا اور پھر۔ ۔ ۔ پگلے تجھے تو کچھ ہو گیا ہے، دیکھتے نہیں یہ لڑکا مُسلّا ہے؟ جہاں سے اٹھا لائے ہو وہیں واپس ڈال آؤ۔ خبردار جو اس نے میرے چوکے میں پاؤں رکھا۔ “

پرمیشر سنگھ نے التجا کی۔ ۔ ۔ “کرتارے اور اختر کو ایک ہی واہگورو جی نے پیدا کیا ہے، سمجھیں۔ “

“نہیں ” اب کے بیوی چیخ اٹھی۔ ۔ ۔ “میں نہیں سمجھی اور نہ کچھ سمجھنا چاہتی ہوں، میں رات ہی رات میں جھٹکا کر ڈالوں گی اس کا، کاٹ کے پھینک دوں گی۔ اٹھا لایا ہے وہاں سے، لے جا اسے پھینک دے باہر۔ “

“تمھیں نہ پھینک دوں باہر؟”۔ ۔ ۔ اب کے پرمیشر سنگھ بگڑ گیا۔

“تمھارا نہ کر ڈالوں جھٹکا؟ وہ بیوی کی طرف بڑھا اور بیوی اپنے سینے کو دو ہتڑوں سے پیٹتی، چیختی، چلاتی بھاگی۔ پڑوس سے امر کور دوڑی آئی۔ اس کے پیچھے گلی کی دوسری عورتیں بھی آ گئیں۔ مرد بھی جمع ہو گئے اور پرمیشر سنگھ کی بیوی پٹنے سے بچ گئی۔ پھر سب نے اسے سمجھایا کہ نیک کام ہے، ایک مسلمان کا سکھ بنانا کوئی معمولی کام تو نہیں۔ پرانا زمانہ ہوتا تو اب تک پرمیشر سنگھ گرو مشہور ہو چکا ہوتا۔ بیوی کی ڈھارس بندھی مگر امر کور ایک کونے میں بیٹھی گھٹنوں میں سر دیے روتی رہی۔ اچانک پرمیشر سنگھ کی گرج نے سارے ہجوم کو ہلا دیا۔ ۔ ۔ “اختر کدھر گیا ہے۔ ” وہ چڑھ گیا یارو۔ ۔ ۔ ؟اختر۔ ۔ ۔ اختر۔ ۔ ۔ !” وہ چیختا ہوا مکان کے کونوں کھدّوں میں جھانکتا ہوا باہر بھاگ گیا۔ بچے مارے دلچسپی کے اس کے تعاقب میں تھے۔ عورتیں چھتوں پر چڑھ گئی تھیں اور پرمیشر سنگھ گلیوں میں سے باہر کھیتوں میں نکل گیا تھا۔ ۔ ۔ “ارے میں تو اسے اماں پاس لے چلتا یارو۔ ارے وہ گیا کہاں؟ اختر۔ ۔ ۔ ! اے اختر۔ ۔ ۔ !”

“میں تمھارے پاس نہیں آؤں گا۔ ” پگڈنڈی کے ایک موڑ پر گیان سنگھ کے گنے کے کھیت کی آڑ میں روتے ہوئے اختر نے پرمیشر سنگھ کو ڈانٹ دیا۔ “تم تو سکھ ہو۔ “

“ہاں بھیا میں تو سکھ ہوں۔ ” پرمیشر سنگھ نے جیسے مجبور ہو کر اعتراف جرم کر لیا۔

“تو پھر ہم نہیں آئیں گے۔ ” اختر نے پرانے آنسوؤں کو پونچھ کر نئے آنسوؤں کے لیے راستہ صاف کیا۔

“نہیں آؤ گے؟” پرمیشر سنگھ کا لہجہ اچانک بدل گیا۔

“نہیں۔ “

“نہیں آؤ گے؟”

“نہیں۔ نہیں نہیں۔ “

“کیسے نہیں آؤ گے؟” پرمیشر سنگھ نے اختر کو کان سے پکڑا اور پھر نچلے ہونٹ کو دانتوں میں دبا کر اس کے منہ میں چٹاخ سے ایک تھپڑ مار دیا۔ “چلو” وہ کڑکا۔

اختر یوں سہم گیا جیسے ایک دم اس کا سارا خون نچڑ کر رہ گیا ہے۔ پھر ایکا ایکی وہ زمین پر گر کر پاؤں پٹخنے، خاک اڑانے اور بلک بلک کر رونے لگا۔ “نہیں چلتا، بس نہیں چلتا تم سکھ ہو، میں سکھوں کے پاس نہیں جاؤں گا۔ میں اپنی اماں پاس جاؤں گا، میں تمھیں مار دوں گا۔ “


اور اب جیسے پرمیشر سنگھ کے سہنے کی باری تھی۔ اس کا بھی سارا خون جیسے نچڑ کر رہ گیا تھا۔ اس نے اپنے ہاتھ کو دانتوں میں جکڑ لیا۔ اس کے نتھنے پھڑکنے لگے اور پھر اس زور سے رویا کہ کھیت کی پرلی مینڈ پر آتے ہوئے چند پڑوسی اور ان کے بچے بھی سہم کر رہ گئے اور ٹھٹک گئے۔ پرمیشر سنگھ گھٹنوں کے بل اختر کے سامنے بیٹھ گیا۔ بچوں کی طرح یوں سسک سسک کر رونے لگا کہ اس کا نچلا ہونٹ بھی بچوں کی طرح لٹک آیا اور پھر بچوں کی سی روتی آواز میں بولا۔

“مجھے معاف کر دے اختر، مجھے تمھارے خدا کی قسم میں تمھارا دوست ہوں، تم اکیلے یہاں سے جاؤ گے تو تمھیں کوئی مار دے گا۔ پھر تمھاری ماں پاکستان سے آ کر مجھے مارے گی۔ میں خود جا کر تمھیں پاکستان چھوڑ آؤں گا۔ سنا؟ پھر وہاں اگر تمھیں ایک لڑکا مل جائے نا۔ کرتارا نام کا تو تم اسے ادھر گاؤں میں چھوڑ جانا۔ اچھا؟”

“اچھا!” اختر نے الٹے ہاتھوں سے آنسو پونچھتے ہوئے پرمیشر سنگھ سے سودا کر لیا۔

پرمیشر سنگھ نے اختر کو کندھے پر بٹھا لیا اور چلا مگر ایک ہی قدم اٹھا کر رک گیا۔ سامنے بہت سے بچے اور پڑوسی کھڑے اس کی تمام حرکات دیکھ رہے تھے۔ ادھیڑ عمر کا ایک پڑوسی بولا۔ ۔ ۔ “روتے کیوں ہو پرمیشرے، کل ایک مہینے کی تو بات ہے، ایک مہینے میں اس کے کیس بڑھ آئیں گے تو بالکل کرتار ا لگے گا۔ “

کچھ کہے بغیر وہ تیز تیز قدم اٹھانے لگا۔ پھر ایک جگہ رک کر اس نے پلٹ کر اپنے پیچھے آنے والے پڑوسیوں کی طرف دیکھا۔ ۔ ۔ “تم کتنے ظالم لوگ ہو یارو۔ اختر کو کرتارا بناتے ہو اور ادھر اگر کوئی کرتارے کو اختر بنا لے تو؟ اسے ظالم ہی کہو گے نا۔ ” پھر اس کی آواز میں گرج آ گئی۔ ۔ ۔ “یہ لڑکا مسلمان ہی رہے گا۔ دربار صاحب کی سوں۔ میں کل ہی امرت سر جا کر اس کے انگریزی بال بنوا لاؤں گا۔ تم نے مجھے سمجھ کیا رکھا ہے، خالصہ ہوں، سینے میں شیر کا دل ہے، مرغی کا نہیں۔ “

پرمیشر سنگھ اپنے گھر میں داخل ہو کر ابھی اپنی بیوی اور بیٹی ہی کو اختر کی مدارات کے سلسلے میں احکام ہی دے رہا تھا کہ گاؤں کا گرنتھی سردار سنتو سنگھ اندر آیا اور بولا۔

“پرمیشر سنگھ۔ “

“جی” پرمیشر سنگھ نے پلٹ کر دیکھا۔ گرنتھی جی کے پیچھے اس کے سب پڑوسی بھی تھے۔

“دیکھو” گرنتھی جی نے بڑے دبدبے سے کہا۔ ۔ ۔ “کل سے یہ لڑکا خالصے کی سی پگڑی باندھے گا، کڑا پہنے گا، دھرم شالہ آئے گا اور اسے پرشاد کھلایا جائے گا۔ اس کے کیسوں کو قینچی نہیں چھوئے گی۔ چھو گئی تو کل ہی سے یہ گھر خالی کر دو سمجھے؟”

“جی” پرمیشر سنگھ نے آہستہ سے کہا۔

“ہاں۔ ” گرنتھی جی نے آخری ضرب لگائی۔

“ایسا ہی ہو گا گر نتھی جی۔ ” پرمیشر سنگھ کی بیوی بولی۔ ۔ ۔ “پہلے ہی اسے راتوں کو گھر کے کونے کونے سے کوئی چیز قرآن پڑھتی سنائی دیتی ہے۔ لگتا ہے پہلے جنم میں مُسلّا رہ چکا ہے۔ امر کور بیٹی نے تو جب سے یہ سنا ہے کہ ہمارے گھر میں مُسلّا چھوکرا آیا ہے تو بیٹھی رو رہی ہے، کہتی ہے گھر پر کوئی اور آفت آئے گی۔ پرمیشرے نے آپ کا کہا نہ مانا تو میں بھی دھرم شالہ میں چلی آؤں گی اور امر کور بھی۔ پھر یہ اس چھوکرے کو چاٹے مُوا نکما، واہگورو جی کا بھی لحاظ نہیں کرتا۔ “

“واہگوروجی کا لحاظ کون نہیں کرتا گدھی” پرمیشر سنگھ نے گرنتھی جی کی بات کا غصہ بیوی پر نکالا۔ پھر وہ زیر لب گالیاں دیتا رہا۔ کچھ دیر کے بعد وہ اٹھ کر گرنتھی جی کے پاس آگیا۔ “اچھا جی اچھا۔ ” اس نے کہا۔ گرنتھی جی پڑوسیوں کے ساتھ فوراً رخصت ہو گئے۔

چند ہی دنوں میں اختر کو دوسرے سکھ لڑکوں سے پہچاننا دشوار ہو گیا۔ وہی کانوں کی لوؤں تک کس کر بندھی ہوئی پگڑی، وہی ہاتھ کا کڑا اور وہی کچھیرا۔ صرف جب وہ گھر میں آ کر پگڑی اتارتا تھا تو اس کے غیر سکھ ہونے کا راز کھلتا تھا۔ لیکن اس کے بال دھڑا دھڑ بڑھ رہے تھے۔ پرمیشر سنگھ کی بیوی ان بالوں کو چھوکر بہت خوش ہوتی۔ ۔ ۔ “ذرا ادھر تو آ امر کورے، یہ دیکھ کیس بن رہے ہیں۔ پھر ایک دن جوڑا بنے گا۔ کنگھا لگے گا اور اس کا نام رکھا جائے گا کرتار سنگھ۔ “

“نہیں ماں۔ ” امر کور وہیں سے جواب دیتی۔ ۔ ۔ “جیسے واہگورو جی ایک ہیں، اور گرنتھ صاحب ایک ہیں اور چاند ایک ہے۔ اسی طرح کرتارا بھی ایک ہے۔ میرا ننھا منا بھائی!” وہ پھوٹ پھوٹ کر رو دیتی اور مچل کر کہتی۔ ۔ ۔ “میں اس کھلونے سے نہیں بہلوں گی ماں، میں جانتی ہوں ماں یہ مسلا ہے اور جو کرتارا ہوتا ہے وہ مسلا نہیں ہوتا۔ “

“میں کب کہتی ہوں یہ سچ مچ کا کرتارا ہے۔ میرا چاند سا لاڈلا بچہ!”۔ ۔ ۔ پرمیشر سنگھ کی بیوی بھی رو دیتی۔ دونوں اختر کو اکیلا چھوڑ کر کسی گوشے میں بیٹھ جاتیں۔ خوب خوب روتیں، ایک دوسرے کو تسلیاں دیتیں اور پھر زارزار رونے لگتیں وہ اپنے کرتارے کے لیے روتیں، اختر چند روز اپنی ماں کے لیے رویا، اب کسی اور بات پر روتا، جب پرمیشر سنگھ شرنارتھیوں کی امدادی پنچایت سے کچھ غلّہ یا کپڑا لے کر آتا تو اختر بھاگ کر جاتا اور اس کی ٹانگوں سے لپٹ جاتا اور رو رو کر کہتا۔ ۔ ۔ “میرے سر پر پگڑی باندھ دو پرموں۔ ۔ ۔ میرے کیس بڑھا دو۔ مجھے کنگھا خرید دو۔ “

پرمیشر سنگھ اسے سینے سے لگا لیتا اور بھرائی ہوئی آواز میں کہتا۔ ۔ ۔ “یہ سب ہو جائے گا بچے۔ سب کچھ ہو جائے گا پر ایک بات کبھی نہ ہو گی۔ وہ بات کبھی نہ ہو گی۔ وہ نہیں ہو گا مجھ سے سمجھے؟ یہ کیس ویس سب بڑھ آئیں گے۔ “

اختر اپنی ماں کو بہت کم یاد کرتا تھا۔ جب تک پرمیشر سنگھ گھر میں رہتا وہ اس سے چمٹا رہتا اور جب وہ کہیں باہر جاتا تو اختر اس کی بیوی اور امر کور کی طرف یوں دیکھتا رہتا جیسے ان سے ایک ایک پیار کی بھیک مانگ رہا ہے۔ پرمیشر سنگھ کی بیوی اسے نہلاتی، اس کے کپڑے دھوتی، اور پھر اس کے بالوں میں کنگھی کرتے ہوئے رونے لگتی اور روتی رہ جاتی۔ البتہ امر کور نے جب بھی دیکھا، ناک اچھال دی۔ شروع شروع میں تو اس نے اختر کو دھموکا بھی جڑ دیا تھا مگر جب اختر نے پرمیشر سنگھ سے اس کی شکایت کی تو پرمیشر سنگھ بپھر گیا اور امر کور کو بڑی ننگی ننگی گالیاں دیتا اس کی طرف بڑھا کہ اگر اس کی بیوی راستے میں اس کے پاؤں نہ پڑ جاتی تو وہ بیٹی کو اٹھا کر دیوار پر سے گلی میں پٹخ دیتا۔ ۔ ۔ “الو کی پٹھی۔ ” اس روز اس نے کڑک کر کہا تھا۔


“سنا تو یہی تھا کہ لڑکیاں اٹھ رہی ہیں پر یہاں یہ مشٹنڈی ہمارے ساتھ لگی چلی آئی اور اٹھ گیا تو پانچ سال کا لڑکا جسے ابھی اچھی طرح ناک پونچھنا نہیں آتا۔ عجیب اندھیر ہے یارو۔ ” اس واقعے کے بعد امر کور نے اختر پر ہاتھ تو خیر کبھی نہ اٹھایا مگر اس کی نفرت دو چند ہو گئی۔

ایک روز اختر کو تیز بخار آگیا۔ پرمیشر سنگھ وید کے پاس چلا گیا اور اس کے جانے کے کچھ دیر بعد اس کی بیوی پڑوسن سے پسی ہوئی سونف مانگنے چلی گئی۔ اختر کو پیاس لگی۔

“پانی” اس نے کہا، کچھ دیر بعد لال لال سوجی سوجی آنکھیں کھولیں۔ ادھر ادھر دیکھا اور پانی کا لفظ ایک کراہ بن کر اس کے حلق سے نکلا۔ کچھ دیر کے بعد وہ لحاف کو ایک طرف جھٹک کر اٹھ بیٹھا۔ امر کور سامنے دہلیز پر بیٹھی کھجور کے پتوں سے چنگیر بنا رہی تھی۔ ۔ ۔ “پانی دے!” اختر نے اسے ڈانٹا۔ امر کور نے بھنویں سکیڑ کر اسے گھور کر دیکھا اور اپنے کام میں جٹ گئی۔ اب کے اختر چلایا۔ ۔ ۔ “پانی دیتی ہے کہ نہیں۔ ۔ ۔ پانی دے ورنہ ماروں گا”۔ ۔ ۔ امر کور نے اب کے اس کی طرف دیکھا ہی نہیں۔ بولی۔ ۔ ۔ “مار تو سہی۔ تو کرتارا نہیں کہ میں تیری مار سہہ لوں گی۔ میں تو تیری بوٹی بوٹی کر ڈالوں گی۔ ” اختر بلک بلک کر رو دیا۔ اور آج اس نے مدّت کے بعد اپنی اماں کو یاد کیا۔ پھر جب پرمیشر سنگھ دوا لے آیا اور اس کی بیوی بھی پسی ہوئی سونف لے کر آ گئی تو اختر نے روتے روتے بری حالت بنا لی تھی اور وہ سسک سسک کر کہہ رہا تھا۔ “ہم تو اب اماں پاس چلیں گے۔ یہ امر کور سور کی بچی تو پانی بھی نہیں پلاتی۔ ہم تو اماں پاس جائیں گے۔ ” پرمیشر سنگھ نے امر کور کی طرف غصے سے دیکھا۔ وہ رو رہی تھی اور اپنی ماں سے کہہ رہی تھی۔ ۔ ۔ “کیوں پانی پلاؤں؟ کرتارا بھی تو کہیں اسی طرح پانی مانگ رہا ہو گا کسی سے۔ کسی کو اس پر ترس نہ آئے تو ہمیں کیوں ترس آئے اس پر۔ ۔ ۔ ہاں “۔

پرمیشر سنگھ اختر کی طرف بڑھا اور اپنی بیوی کی طرف اشارہ کرتے ہوئے بولا۔

“یہ بھی تو تمھاری ماں ہے بیٹے۔ “

“نہیں ” اختر بڑے غصے سے بولا۔ “یہ تو سکھ ہے۔ میری اماں تو پانچ وقت نماز پڑھتی ہے اور بسم اللہ کہہ کر پانی پلاتی ہے۔ “

پرمیشر سنگھ کی بیوی جلدی سے ایک پیالہ بھر کر لائی تو اختر نے پیالے کو دیوار پر دے مارا اور چلایا۔ “تمھارے ہاتھ سے نہیں پئیں گے۔ “

“یہ بھی تو مجھی سور کی بچی کا باپ ہے۔ ” امر کور نے جل کر کہا۔

“تو ہوا کرے” اختر بولا۔ ۔ ۔ “تمھیں اس سے کیا۔ “

پرمیشر سنگھ کے چہرے پر عجیب کیفیتیں دھوپ چھاؤں سی پیدا کر گئیں۔ وہ اختر کے مطالبے پر مسکرایا بھی اور رو بھی دیا۔ پھر اس نے اختر کو پانی پلایا۔ اس کے ماتھے کو چوما۔ اس کی پیٹھ پر ہاتھ پھیرا، اسے بستر پر لٹا کر اس کے سر کو ہولے ہولے کھجاتا رہا اور کہیں شام کو جا کر اس نے پہلو بدلا۔ اس وقت اختر کا بخار اتر چکا تھا اور وہ بڑے مزے سے سو رہا تھا۔

آج بہت عرصے کے بعد رات کو پرمیشر سنگھ بھڑک اٹھا اور نہایت آہستہ سے بولا۔

“اری سنتی ہو؟۔ ۔ ۔ سن رہی ہو؟ یہاں کوئی چیز قرآن پڑھ رہی ہے۔ “

بیوی نے پہلے تو اسے پرمیشر سنگھ کی پرانی عادت کہہ کر ٹالنا چاہا مگر پھر ایک دم ہڑبڑا کر اٹھی اور امر کور کی کھاٹ کی طرف ہاتھ بڑھا کر اسے ہولے ہولے ہلا کر آہستہ سے بولی۔ ۔ ۔ “بیٹی!”

“کیا ہے ماں؟” امر کور چونک اٹھی۔

اور اس نے سرگوشی کی۔ “سنو تو۔ سچ مچ کوئی چیز قرآن پڑھ رہی ہے۔ “

یہ ایک ثانیے کا سناٹا بڑا خوف ناک تھا۔ امر کور کی چیخ اس سے بھی زیادہ خوف ناک تھی اور پھر اختر کی چیخ خوف ناک تر تھی۔

“کیا ہوا بیٹا” پرمیشر سنگھ تڑپ کر اٹھا اور اختر ی کھاٹ پر جا کر اسے چھاتی سے بھینچ لیا۔ “ڈر گئے بیٹا۔ “

“ہاں ” اختر لحاف میں سے سر نکال کر بولا۔ “کوئی چیز چیخی تھی۔ “

“امر کور چیخی تھی” پرمیشر سنگھ نے کہا۔ ۔ ۔ “ہم سب یوں سمجھے جیسے کوئی چیز یہاں قرآن پڑھ رہی ہے۔ “

“میں پڑھ رہا تھا” اختر بولا۔

اب کے بھی امر کور کے منہ سے ہلکی چیخ نکل گئی۔

بیوی نے جلدی سے چراغ جلا دیا اور امر کور کی کھاٹ پر بیٹھ کر وہ دونوں اختر کو یوں دیکھنے لگیں جیسے وہ ابھی دھواں بن کر دروازے کی جھریوں میں سے باہر اڑ جائے گا اور باہر سے ایک ڈراؤنی آواز آئے گی۔ “میں جن ہوں میں کل رات پھر آ کر قرآن پڑھوں گا۔ “

“کیا پڑھ رہے تھے بھلا؟” پرمیشر سنگھ نے پوچھا۔

“پڑھوں؟” اختر نے پوچھا۔

“ہاں ہاں” پرمیشر سنگھ نے بڑے شوق سے کہا۔

اور اختر قُل ہو اللہ اَحَد پڑھنے لگا۔ کُفواً اَحَد پر پہنچ کر اس نے اپنے گریبان میں چھوکی اور پھر پرمیشر سنگھ کی طرف مسکراتے ہوئے بولا۔ ۔ ۔ “تمھارے سینے میں بھی چھو کر دوں؟”

“ہاں ہاں” پرمیشر سنگھ نے گریبان کا بٹن کھول دیا اور اختر نے چھو کر دی۔ اب کے امر کور نے بڑی مشکل سے چیخ پر قابو پایا۔

پرمیشر سنگھ بولا۔ ۔ ۔ “کیا نیند نہیں آتی تھی؟”

“ہاں” اختر بولا۔ ۔ ۔ “امّاں یاد آ گئی۔ اماں کہتی ہے، نیند نہ آئے تو تین بار قُل ہو اللّٰہ پڑھو نیند آ جائے گی، اب آ رہی تھی، پر امر کور نے ڈرا دیا۔ “

“پھر سے پڑھ کر سو جاؤ” پرمیشر سنگھ نے کہا۔ ۔ ۔ “روز پڑھا کرو۔ اونچے اونچے پڑھا کرو اسے بھولنا نہیں ورنہ تمھاری اماں تمھیں مارے گی۔ لو اب سو جاؤ۔ ” اس نے اختر کو لٹا کر اسے لحاف اوڑھا دیا۔ پھر چراغ بجھانے کے لیے بڑھا تو امر کور پکاری۔ ۔ ۔ “نہیں، نہیں بابا۔ بجھاؤ نہیں۔ ڈر لگتا ہے۔ “

“جلتا رہے، کیا ہے؟” بیوی بولی۔

اور پرمیشر سنگھ دیا بجھا کر ہنس دیا۔ ۔ ۔ “پگلیاں” وہ بولا۔ ۔ ۔ “گدھیاں۔ “

رات کے اندھیرے میں اختر آہستہ آہستہ قل ھو اللّٰہ پڑھتا رہا۔ پھر کچھ دیر بعد ذرا ذرا سے خراٹے لینے لگا۔ پرمیشر سنگھ بھی سو گیا اور اس کی بیوی بھی۔ مگر امر کور رات بھر کچی نیند میں “پڑوس” کی مسجد کی اذان سنتی رہی اور ڈرتی رہی۔

اب اختر کے اچھے خاصے کیس بڑھ آئے تھے۔ ننھے سے جوڑے میں کنگھا بھی اٹک جاتا تھا۔ گاؤں والوں کی طرح پرمیشر سنگھ کی بیوی بھی اسے کرتارا کہنے لگی تھی اور اس سے خاصی شفقت سے پیش آتی تھی مگر امر کور اختر کو یوں دیکھتی تھی جیسے وہ کوئی بہروپیا ہے اور ابھی وہ پگڑی اور کیس اتار کر پھینک دے گا اور قُل ہو اللّٰہ پڑھتا ہوا غائب ہو جائے گا۔

ایک دن پرمیشر سنگھ بڑی تیزی سے گھر آیا اور ہانپتے ہوئے اپنی بیوی سے پوچھا۔

“وہ کہاں ہے؟”

“کون؟ امر کور؟”

“نہیں۔ “

“کرتارا؟”

“نہیں۔ ۔ ۔ ” پھر کچھ سوچ کر بولا۔ ۔ ۔ “ہاں ہاں وہی کرتارا۔ “

“باہر کھیلنے گیا ہے۔ گلی میں ہو گا۔ “

پرمیشر سنگھ واپس لپکا۔ گلی میں جا کر بھاگنے لگا۔ باہر کھیتوں میں جا کر اس کی رفتار اور تیز ہو گئی۔ پھر اسے دور گیان سنگھ کے گنوں کی فصل کے پاس چند بچے کبڈی کھیلتے نظر آئے۔ کھیت کی اوٹ سے اس نے دیکھا کہ اختر نے ایک لڑکے کو گھٹنوں تلے دبا رکھا ہے۔ لڑکے کے ہونٹوں سے خون پھٹ رہا ہے مگر کبڈی کبڈی کی رٹ جاری ہے۔ پھر اس لڑکے نے جیسے ہار مان لی۔ اور جب اختر کی گرفت سے چھوٹا تو بولا۔ ۔ ۔ “کیوں بے کرتارو! تو نے میرے منھ پر گھٹنا کیوں مارا ہے؟”

“اچھا کیا جو مارا” اختر اکڑ کر بولا اور بکھرے ہوئے جوڑے کی لٹیں سنبھال کر ان میں کنگھا پھنسانے لگا۔

“تمھارے رسول نے تمھیں یہی سمجھایا ہے؟” لڑکے نے طنز سے پوچھا۔

اختر ایک لمحے کے لیے چکرا گیا۔ پھر سوچ کر بولا۔ ۔ ۔ “اور کیا تمھارے گُرو نے تمھیں یہی سمجھایا ہے؟”

“مُسلّا” لڑکے نے اسے گالی دی۔

“سکھڑا” اختر نے اسے گالی دی۔

سب لڑکے اختر پر ٹوٹ پڑے مگر پرمیشر سنگھ کی ایک ہی کڑک سے میدان صاف تھا۔ اس نے اختر کی پگڑی باندھی اور اسے ایک طرف لے جا کر بولا۔ ۔ ۔ “سنو بیٹے! میرے پاس رہو گے کہ اماں کے پاس جاؤ گے۔ ۔ ۔ ؟”

اختر کوئی فیصلہ نہ کر سکا۔ کچھ دیر تک پرمیشر سنگھ کی آنکھوں میں آنکھیں ڈالے کھڑا رہا پھر مسکرانے لگا اور بولا۔ ۔ ۔ “اماں پاس جاؤں گا۔ “

“اور میرے پاس نہیں رہو گے؟”

پرمیشر سنگھ کا رنگ یوں سُرخ ہو گیا جیسے وہ رو دے گا۔

“تمھارے پاس بھی رہوں گا؟” اختر نے معمے کا حل پیش کر دیا۔ پرمیشر سنگھ نے اسے اٹھا کر سینے سے لگا لیا اور وہ آنسو جو مایوسی نے آنکھوں میں جمع کیے تھے، خوشی کے آنسو بن کر ٹپک پڑے۔ وہ بولا۔ ۔ ۔ “دیکھو بیٹے!۔ ۔ ۔ اختر بیٹے آج یہاں فوج آ رہی ہے یہ فوجی تمھیں مجھ سے چھیننے آ رہے ہیں، سمجھے؟ تم کہیں چھپ جاؤ۔ پھر جب وہ چلے جائیں گے نا، تو میں تمھیں لے آؤں گا۔ “

پرمیشر سنگھ کو اس وقت دور غبار کا ایک پھیلتا ہوا بگولہ دکھائی دیا۔ مینڈ پر چڑھ کر اس نے لمبے ہوتے ہوئے بگولے کو غور سے دیکھا اور اچانک تڑپ کر بولا۔ ۔ ۔ “فوجیوں کی لاری آ گئی۔ ۔ ۔ ” وہ مینڈ پر سے کود پڑا اور گنے کے کھیت کا پورا چکر کاٹ گیا۔

“گیا نے، او گیان سنگھ!” وہ چلایا۔ گیان سنگھ فصل کے اندر سے نکل آیا۔ اس کے ایک ہاتھ میں درانتی اور دوسرے ہاتھ میں تھوڑی سی گھاس تھی۔ ۔ ۔ پرمیشر سنگھ اسے الگ لے گیا، اسے کوئی بات سمجھائی پھر دونوں اختر کے پاس آئے۔ گیان سنگھ نے فصل میں سے ایک گنا توڑ کر درانتی سے اس کے پتے کاٹے اور اسے اختر کے حوالے کر کے بولا۔ ۔ ۔ “آؤ بھائی کرتارے تم میرے پاس بیٹھ کر گنا چوسو جب تک یہ فوجی چلے جائیں۔ اچھا خاصا بنا بنایا خالصہ ہتھیانے آئے ہیں۔ ہونہہ!”۔ ۔ ۔ پرمیشر سنگھ نے اختر سے جانے کی اجازت مانگی۔ ۔ ۔ “جاؤں۔ ۔ ۔ ؟”

اور اختر نے دانتوں میں گنے کا لمبا سا چھلکا جکڑے ہوئے مسکرانے کی کوشش کی۔ اجازت پا کر پرمیشر سنگھ گاؤں کی طرف بھاگ گیا۔ بگولا گاؤں کی طرف بڑھا آ رہا تھا۔

گھر جا کر اس نے بیوی اور بیٹی کو سمجھایا۔ پھر بھاگم بھاگ گرنتھی جی کے پاس گیا۔ ان سے بات کر کے ادھر ادھر دوسرے لوگوں کو سمجھاتا پھیرا۔ اور جب فوجیوں کی لاری دھرم شالہ سے ادھر کھیت میں رک گئی تو سب فوجی اور پولیس والے گرنتھی جی کے پاس آئے۔ ان کے ساتھ علاقے کا نمبردار بھی تھا۔ مسلمان لڑکیوں کے بارے میں پوچھ گچھ ہوتی رہی۔ گرنتھی جی نے گرنتھ صاحب کی قسم کھا کر کہہ دیا کہ اس گاؤں میں کوئی مسلمان لڑکی نہیں “لڑکے کی بات دوسری ہے۔ ” کسی نے پرمیشر سنگھ کے کان میں سرگوشی کی اور آس پاس کے سکھ پرمیشر سنگھ سمیت زیر لب مسکرانے لگے۔ پھر ایک فوجی افسر نے گاؤں والوں کے سامنے ایک تقریر کی۔ اس نے مامتا پر بڑا زور دیا جو ان ماؤں کے دلوں میں ان دنوں ٹیس بن کر رہ گئی تھی جن کی بیٹیاں چھن گئی تھیں اور ان بھائیوں اور شوہروں کی پیار کی بڑی دردناک تصویر کھینچی جن کی بہنیں اور بیویاں ان سے ہتھیا لی گئی تھیں۔ ۔ ۔ “اور مذہب کیا ہے دوستو۔ ” اس نے کہا تھا۔ ۔ ۔ “دنیا کا ہر مذہب انسان کو انسان بننا سکھاتا ہے اور تم مذہب کے نام لے کر انسان کو انسان سے لڑا دیتے ہو۔ ان کی آبرو پر ناچتے ہو اور کہتے ہو ہم سکھ ہیں، ہم مسلمان ہیں۔ ۔ ۔ ہم واہگورو جی کے چیلے ہیں، ہم رسول کے غلام ہیں۔ “

تقریر کے بعد مجمع چھٹنے لگا۔ فوجیوں کے افسر نے گرنتھی جی کا شکریہ ادا کیا۔ ان سے ہاتھ ملایا اور لاری چلی گئی۔

سب سے پہلے گرنتھی جی نے پرمیشر سنگھ کو مبارک باد دی۔ پھر دوسرے لوگوں نے پرمیشر سنگھ کو گھیر لیا اور اسے مبارک باد دینے لگے لیکن پرمیشر سنگھ لاری آنے سے پہلے حواس باختہ ہو رہا تھا تو اب لاری جانے کے بعد لُٹا لُٹا سا لگ رہا تھا۔ پھر وہ گاؤں سے نکل کر گیان سنگھ کے کھیت میں آیا۔ اختر کو کندھے پر بٹھا کر گھر میں لے آیا۔ کھانا کھلانے کے بعد اسے کھاٹ پر لٹا کر کچھ یوں تھپکا کہ اسے نیند آ گئی۔ پرمیشر سنگھ دیر تک کھاٹ پر بیٹھا رہا۔ کبھی داڑھی کھجاتا اور ادھر ادھر دیکھ کر پھر سوچ میں بیٹھ جاتا۔ پڑوس کی چھت پر کھیلتا ہوا ایک بچہ اچانک اپنی ایڑی پکڑ کر بیٹھ گیا اور زار زار رونے لگا۔ “ہائے اتنا بڑا کانٹا اتر گیا پورے کا پورا۔ ” وہ چلایا اور پھر اس کی ماں ننگے سر اوپر بھاگی۔ اسے گود میں بٹھا لیا پھر نیچے بیٹی کو پکار کر سوئی منگوائی۔ کانٹا نکالنے کے بعد اسے بے تحاشا چوما اور پھر نیچے جھک کر پکاری۔ ۔ ۔ “ارے میرا دوپٹہ تو اوپر پھینک دینا۔ کیسی بے حیائی سے اوپر بھاگی چلی آئی۔ “

پرمیشر سنگھ نے کچھ دیر بعد چونک کر بیوی سے پوچھا۔

“سنو کیا تمھیں کرتارا اب بھی یاد آتا ہے۔ “

“لو اور سنو” بیوی بولی اور پھر ایک دم چھاجوں رو دی۔ ۔ ۔ “کرتارا تو میرے کلیجے کا ناسور بن گیا ہے پرمیشرے!”

کرتارے کا نام سن کر ادھر سے امر کور اٹھ کر آئی اور روتی ہوئی ماں کے گھٹنے کے پاس بیٹھ کر رونے لگی۔

پرمیشر سنگھ یوں بدک کر جلدی سے اٹھ بیٹھا جیسے اس نے شیشے کے برتنوں سے بھرا ہوا طشت اچانک زمین پر دے مارا ہو۔

شام کے کھانے کے بعد وہ اختر کو انگلی سے پکڑے باہر دالان میں آیا اور بولا۔ “آج تو دن بھر خوب سوئے ہو بیٹا۔ چلو آج ذرا گھومنے چلتے ہیں۔ چاندنی رات ہے۔ “

اختر فوراً مان گیا۔ پرمیشر سنگھ نے اسے کمبل میں لپیٹا اور کندھے پر بٹھا لیا۔ کھیتوں میں آ کر وہ بولا۔ “یہ چاند جو پورب سے نکل رہا ہے نا بیٹے، جب یہ ہمارے سر پر پہنچے گا تو صبح ہو جائے گی۔ “

اختر چاند کی طرف دیکھنے لگا۔

“یہ چاند جو یہاں چمک رہا ہے نا۔ یہ وہاں بھی چمک رہا ہو گا۔ تمھاری اماں کے دیس میں۔ “

اب کے اختر نے جھک کر پرمیشر سنگھ کی طرف دیکھنے کی کوشش کی۔

“یہ چاند ہمارے سر پر آئے گا تو وہاں تمھاری اماں کے سر پر بھی ہو گا۔ “

اب کے اختر بولا “ہم چاند دیکھ رہے ہیں تو کیا اماں بھی چاند کو دیکھ رہی ہو گی؟”

“ہاں پرمیشر سنگھ کی آواز میں گونج تھی۔ ۔ ۔ “چلو گے اماں کے پاس؟”

“ہاں ” اختر بولا۔ ۔ ۔ “پر تم جاتے نہیں، تم بہت برے ہو، تم سکھ ہو۔ “

پرمیشر سنگھ بولا۔ ۔ ۔ “نہیں بیٹے، آج تو تمھیں ضرور ہی لے جاؤں گا۔ تمھاری اماں کی چٹھی آئی ہے۔ وہ کہتی ہے میں اختر بیٹے کے لیے اداس ہوں۔ “

“میں بھی تو اداس ہوں۔ ” اختر کو جیسے کوئی بھولی ہوئی بات یاد آ گئی۔

“میں تمھیں تمھاری اماں ہی کے پاس لیے جا رہا ہوں۔ “

“سچ۔ ۔ ۔ ؟” اختر پرمیشر سنگھ کے کندھے پر کودنے لگا اور زور زور سے بولنے لگا۔ ۔ ۔ “ہم اماں پاس جا رہے ہیں۔ پر موں ہمیں اماں پاس لے جائے گا۔ ہم وہاں سے پرموں کو چٹھی لکھیں گے۔ “

پرمیشر سنگھ چپ چاپ روئے جا رہا تھا۔ آنسو پونچھ کر اور گلا صاف کر کے اس نے اختر سے پوچھا۔

“گانا سنو گے؟”

“ہاں “

“پہلے تم قرآن سناؤ۔ “

“اچھا” اور اختر قُل ہو اللّٰہ پڑھنے لگا، کفواً اَحَد پر پہنچ کر اس نے اپنے سینے پر چھو، کی اور بولا۔ ۔ ۔ “لاؤ تمھارے سینے پر بھی چھو، کر دوں۔ “

رک کر پرمیشر سنگھ نے گریبان کا ایک بٹن کھولا اور اوپر دیکھا۔ اختر نے لٹک کر اس کے سینے پر چھو کر دی اور بولا۔ ۔ ۔ “اب تم سناؤ۔ “

پرمیشر سنگھ نے اختر کو دوسرے کندھے پر بٹھا لیا۔ اسے بچوں کا کوئی گیت یاد نہیں تھا۔ اس لیے اس نے قسم قسم کے گیت گانا شروع کیے اور گاتے ہوئے تیز تیز چلنے لگا۔ اختر چپ چاپ سنتا رہا۔

بنتو داس سر بن ورگا جے بنتو دا منہ ورگا جے بنتو دالک چترا جے لوکو بنتو دا لک چترا

“بنتو کون ہے؟” اختر نے پرمیشر سنگھ کو ٹوکا۔

پرمیشر سنگھ ہنسا پھر ذرا وقفے کے بعد بولا۔ ۔ ۔ “میری بیوی ہے نا۔ امر کور کی ماں۔ اس کا نام بنتو ہے۔ امر کور کا نام بھی بنتو ہے۔ تمھاری اماں کا نام بھی بنتو ہی ہو گا۔ “

“کیوں؟” اختر خفا ہو گیا۔ ۔ ۔ “وہ کوئی سکھ ہے؟”

پرمیشر سنگھ خاموش ہو گیا۔

چاند بہت بلند ہو گیا تھا۔ رات خاموش تھی، کبھی کبھی گنے کے کھیتوں کے آس پاس گیدڑ روتے اور پھر سناٹا چھا جاتا۔ اختر پہلے تو گیدڑوں کی آواز سے بہت ڈرا، مگر پرمیشر سنگھ کے سمجھانے سے بہل گیا اور ایک بار خاموشی کے طویل وقفے کے بعد اس نے پرمیشر سنگھ سے پوچھا۔ ۔ ۔ “اب کیوں نہیں روتے گیدڑ؟” پرمیشر سنگھ ہنس دیا۔ پھر اسے ایک کہانی یاد آ گئی۔ یہ گُرو گوبند سنگھ کی کہانی تھی۔ لیکن اس نے بڑے سلیقے سے سکھوں کے ناموں کو مسلمانوں کے ناموں میں بدل دیا اور اختر “پھر؟پھر؟” کی رٹ لگاتا رہا اور کہانی ابھی جاری تھی، جب اختر ایک دم بولا۔ “ارے چاند تو سر پر آگیا!”

پرمیشر سنگھ نے بھی رک کر اوپر دیکھا۔ پھر وہ قریب کے ٹیلے پر چڑھ کر دور دیکھنے لگا اور بولا۔ ۔ ۔ “تمھاری اماں کا دیس جانے کدھر چلا گیا۔ “

وہ کچھ دیر ٹیلے پر کھڑا رہا۔ جب اچانک کہیں دور سے اذان کی آواز آنے لگی اور اختر مارے خوشی کے یوں کودا کہ پرمیشر سنگھ اسے بڑی مشکل سے سنبھال سکا۔ اسے کندھے پر سے اتار کر وہ زمین پر بیٹھ گیا اور کھڑے ہوئے اختر کے کندھوں پر ہاتھ رکھ کر بولا۔ ۔ ۔ جاؤ بیٹے، تمھیں تمھاری اماں نے پکارا ہے۔ بس تم اس آواز کی سیدھ میں۔ ۔ ۔ “

“شش!” اختر نے اپنے ہونٹوں پر انگلی رکھ دی اور سرگوشی میں بولا۔

“اذان کے وقت نہیں بولتے۔ “

“پر میں تو سکھ ہوں بیٹے!” پرمیشر سنگھ بولا۔

“شش” اب کے اختر نے بگڑ کر اسے گھورا۔

اور پرمیشر سنگھ نے اسے گود میں بٹھا لیا۔ اس کے ماتھے پر ایک بہت طویل پیار دیا اور اذان ختم ہونے کے بعد آستینوں سے آنکھیں رگڑ کر بھرائی ہوئی آواز میں بولا۔

“میں یہاں سے آگے نہیں آؤں گا۔ بس تم۔ ۔ ۔ “

“کیوں۔ ۔ ۔ ؟ کیوں نہیں آؤ گے۔ ۔ ۔ ؟ اختر نے پوچھا۔

“تمھاری اماں نے چٹھی میں یہی لکھا ہے کہ اختر اکیلا آئے۔ “

پرمیشر سنگھ نے اختر کو پھسلایا۔ ۔ ۔ “بس تم سیدھے چلے جاؤ۔ سامنے ایک گاؤں آئے گا۔ وہاں جا کر اپنا نام بتانا کرتارا نہیں اختر، پھر اپنی ماں کا نام بتانا۔ اپنے گاؤں کا نام بتانا اور دیکھو، مجھے ایک چٹھی ضرور لکھنا۔ “

“لکھوں گا” اختر نے وعدہ کیا۔

“اور ہاں تمھیں کرتارا نام کا کوئی لڑکا ملے نا، تو اسے ادھر بھیج دینا۔ “

“اچھا” پرمیشر سنگھ نے ایک بار پھر اختر کا ماتھا چوما اور جیسے کچھ نگل کر بولا۔

“جاؤ!”

اختر چند قدم چلا مگر پلٹ آیا۔ ۔ ۔ “تم بھی آ جاؤ نا۔ “

“نہیں بھئی!” پرمیشر سنگھ نے اسے سمجھایا۔ ۔ ۔ “تمھاری اماں نے چٹھی میں یہ نہیں لکھا۔ “

“مجھے ڈر لگتا ہے۔ ” اختر بولا۔

“قرآن کیوں نہیں پڑھتے؟” پرمیشر سنگھ نے مشورہ دیا۔

“اچھا” بات سمجھ میں آ گئی اور وہ قُل ہو اللّٰہ کا ورد کرتا ہوا جانے لگا۔

نرم نرم پو افق کے دائرے پر اندھیرے سے لڑ رہی تھی اور ننھا سا اختر دور دھندلی پگڈنڈی پر ایک لمبے تڑنگے سکھ جوان کی طرح تیز تیز جا رہا تھا۔ پرمیشر سنگھ اس پر نظریں گاڑے ٹیلے پر بیٹھا رہا اور جب اختر کا نقطہ فضا کا ایک حصہ بن گیا تو وہاں سے اتر آیا۔

اختر ابھی گاؤں کے قریب نہیں پہنچا تھا کہ دو سپاہی لپک کر آئے اور اسے روک کر بولے۔ “کون ہو تم؟”

“اختر۔ “

وہ یوں بولا جیسے ساری دنیا اس کا نام جانتی ہے۔

“اختر!” دونوں سپاہی کبھی اختر کے چہرے کو دیکھتے اور کبھی اس کی سکھوں کی سی پگڑی کو۔ پھر ایک نے آگے بڑھ کر اس کی پگڑی جھٹکے سے اتار لی تو اختر کے کیس کھل کر ادھر ادھر بکھر گئے۔

اختر نے بھنا کر پگڑی چھین لی اور پھر ایک ہاتھ سے سر کو ٹٹولتے ہوئے وہ زمین پر لیٹ گیا اور زور زور سے روتے ہوئے بولا۔ ۔ ۔ “میرا کنگھا لاؤ۔ تم نے میرا کنگھا لے لیا ہے۔ دے دو ورنہ میں تمھیں ماروں گا۔ “

ایک دم دونوں سپاہی دھپ سے زمین پر گرے اور رائفل کو کندھوں سے لگا کر جیسے نشانہ باندھنے لگے۔

“ہالٹ۔ “

ایک پکارا جیسے جواب کا انتظار کرنے لگا۔ پھر بڑھتے ہوئے اجالے میں انھوں نے ایک دوسرے کی طرف دیکھا اور ایک نے فائر کر دیا۔ اختر فائر کی آواز سے دہل کر رہ گیا اور سپاہیوں کو ایک طرف بھاگتا دیکھ کر وہ بھی روتا چلاتا ہوا ان کے پیچھے بھاگا۔

سپاہی جب ایک جگہ جا کر رُکے تو پرمیشر سنگھ اپنی ران پر کس کر پٹی باندھ چکا تھا مگر خون اس کی پگڑی کی سیکڑوں پرتوں میں سے بھی پھوٹ آیا۔ اور وہ کہہ رہا تھا۔ ۔ ۔ “مجھے کیوں مارا تم نے، میں تو اختر کے کیس کاٹنا بھول گیا تھا؟ میں اختر کو اس کا دھرم واپس دینے آیا تھا یارو۔ “

اور اختر بھاگا آ رہا تھا اور اس کے کیس ہوا میں اڑ رہے تھے۔

***

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