Badbu… By Sushant Supriya

badbu

بدبو
سُشانت سُپریا
ہندی سے اردو ترجمہ: شیراز حسن

ریل کے سفر کا بھی اپنا ہی مزہ ہے۔ ایک ہی ڈبے میں پورے بھارت کی سیر ہو جاتی ہے. طرح طرح کے لوگ مل جاتے ہیں۔ عجیب و غریب قسم کے تجربات ہو جاتے ہیں۔

گزشتہ سردیوں میں میرے ساتھ ایسا ہی ہوا۔ میں اور میرے ایک واقف ومل راج دھانی ایکسپریس سے کسی کام کے سلسلے میں دہلی سے رائے پور جا رہے تھے۔ ہمارے سامنے والی سیٹ پر فرنچ کٹ دھاڑی والا ایک شخص اپنی بیوی اور تین سال کے بچے کے ساتھ سفر کر رہا تھا۔ باہمی سلام ہوا۔ کچھ رسمی باتیں موسم کے بارے میں ہوئیں۔ اس کی درخواست پر ہم نے اپنی نیچے والی برتھ اسے دے دی اور ہم دونوں اوپروالی برتھ پر چلے آئے۔

میں اخبار کے صفحے پلٹ رہا تھا۔ تبھی میری نگاہ نیچے بیٹھے اس شخص پر پڑی۔ وہ بار بار ہوا کو سونگھنے کی کوشش کرتا، پھر ناک – بھونویں سکریڑ تا۔ اس کے اس انداز سے صاف تھا کہ اسے کسی چیز کی بدبو آ رہی تھی۔ وہ رہ رہ کر اپنے دائیں ہاتھ سے اپنی ناک کے اردگرد کی ہوا کو اڑاتا۔ وِمل بھی یہ سارا تماشا دیکھ رہا تھا۔ آخر اس سے رہا نہیں گیا۔ وہ پوچھ بیٹھا، “کیا ہوا بھائی صاحب؟”
“بڑی بدبو آ رہی ہے۔ ” فرنچ کٹ داڑھی والے اس شخص نے چڑچڑے پن سے کہا۔

ومل نے میری طرف سوالیہ نظروں سے دیکھا۔ مجھے بھی کچھ سمجھ نہیں آیا۔

میں نے زندگی میں کبھی یہ دعویٰ نہیں کیا کہ میری ناک کتے جیسی ہے۔ ہم دونوں کو ہی مخصوص بو نہیں ستا رہی تھی۔ اس لئے اس شخص کے انداز اطوار ہمیں کچھ عجیب سے لگے۔ میں پھر اخبار پڑھنے میں مصروف ہو گیا۔ ومل نے بھی اخبار کا ایک صفحہ اٹھا لیا۔

پانچ سات منٹ گزرے ہوں گے کہ میری نگاہ نیچے گئی۔ نیچے بیٹھا شخص اب پریشان نظر آ رہا تھا۔ وہ چاروں طرف ٹوہی نگاہوں سے دیکھ رہا تھا۔ جیسے بدبو کے ذریعہ کا پتہ لگتے ہی وہ کوئی انقلابی قدم اٹھا لے گا۔ رہ رہ کر اس کا ہاتھ اپنی ناک پر چلا جاتا۔ آخر اس نے اپنی بیوی سے کچھ کہا۔ بیوی نے بیگ میں سے ‘روم فریشنر’ جیسا کچھ نکالا اور ہوا میں چاروں طرف کچھ سپرے کر دیا۔ میں نے ومل کو آنکھ ماری۔ وہ مسکرا دیا۔ کنارے والی برتھ پر بیٹھے ایک سردارجی بھی یہ سارا تماشا حیرت سے دیکھ رہے تھے۔

“چلو، اب شاید اس تکلیف زدہ شخص کو کچھ آرام ملے گا۔” میں نے دل ہی دل میں سوچا۔

لیکن تھوڑی دیر کے بعد کیا دیکھتا ہوں کہ فرنچ کٹ داڑھی والا پریشان حال شخص وہی پرانی حرکتیں کر رہا ہے۔ تبھی اس نے اپنی بیوی کے کان میں کچھ کہا۔ بیوی پریشان سی اٹھی اور ہمیں مخاطب کرکے کہنے لگی، “بھائی صاحب، یہ جوتے کس کے ہےں؟ اسی میں سے بدبو آ رہی ہے۔ “

جوتا ومل کا تھا۔ وہ جوش سے بولا، “یہاں پانچ چھ جوڑی جوتے پڑے ہیں۔ آپ یہ کیسے کہہ سکتی ہیں کہ اس جوتے میں سے بدبو آ رہی ہے؟ ویسے بھی، میرا جوتا اور میری جرابےں، دونوں نئی ہیں اور صاف ستھری ہیں۔ “

اس پر اس شخص کی بیوی کہنے لگی، “بھائی صاحب، برا مت مانیئے گا۔ انہیں بدبو برداشت نہیں ہوتی۔ قے آنے لگتی ہے۔ آپ سے گزارش کرتی ہوں، آپ اپنے جوتے پولیتھین میں ڈال دیجئے۔ بڑی مہربانی ہوگی۔ “

ومل غصے اور تذبذب کی حالت میں تھا۔ تب میں نے صورت حال کو سنبھالا، “دیکھیے، ہمیں تو کوئی بدبو نہیں آ رہی۔ پر آپ جب اتنی ضد کر رہی ہیں تو یہی سہی۔ ”
بڑی بے دلی سے ومل نے نیچے اتر کر اپنے جوتے پولیتھین میں ڈال دیے۔

میں نے سوچا، چلو اب بات یہیں ختم ہو جائے گی۔ پر تھوڑی دیر بعد وہ شخص اٹھا اور مجھ سے کہنے لگا، “بھائی صاحب، مجھے نیچے اب بھی بہت بدبو آ رہی ہے۔ آپ نیچے آ جائیے۔ میں پیچھے اوپر والی برتھ پر جانا چاہتا ہوں۔ “

اب مجھ سے نہیں رہا گیا۔ میں نے کہا، “کیا آپ پہلی بار ریلکا سفر کر رہے ہیں؟ بھائی صاحب، آپ اپنے گھر کے ڈرائنگ روم میں نہیں بیٹھے ہیں۔ سفر میں کئی طرح کی بو آتی ہی ہیں۔ ٹائلٹ کے پاس والی برتھ مل جائے تو وہاں کی بدبو آتی ہے۔ گاڑی جب شراب بنانے والی فیکٹری کے ساتھ سے گزرتی ہے تو وہاں کی بو آتی ہے۔ سفر میں سب سہنے کی عادت ڈالنی پڑتی ہے۔ ”
ومل نے بھی دھیرے سے کہا، “انسان کو اگر کتے کی ناک مل جائے تو بڑی مشکل ہوتی ہے۔”

پر اس شخص نے شاید ومل کی بات نہیں سنی۔ وہ اڑا رہا کہ میں نیچے آ جاﺅں اور وہ اوپروالی برتھ پر ہی آئے گا۔

میں نے بات کو اور بڑھانا ٹھیک نہیں سمجھا، اس لئے میں نے اوپروالی برتھ اس کے لیے خالی کر دی۔ وہ اوپر چلا گیا۔

تھوڑی دیر بعد جب اس شخص کی بیوی اپنے بڑے بیگ میں سے کچھ نکال رہی تھی تو وہ اچانک چیخ کر پیچھے ہٹ گئی۔

سب اس کی طرف دیکھنے لگے۔

“کیا ہوا؟” اوپر سے اس شخص نے پوچھا۔

“بیگ میں مری ہوئی چھکلی ہے۔” بیوی نے جواب دیا۔

یہ سن کر ومل نے مجھے آنکھ ماری۔ میں مسکرا دیا۔

وہ شخص کھسیانا سا منہ لئے نیچے اترا۔

“بھائی صاحب، بدبو کا راج اب پتہ چلا.” سردار جی نے اسے چھیڑا۔ وہ اور جھینپ گیا۔

خیر، اس شخص نے مری ہوئی چھپکلی کو کھڑکی سے باہر پھینکا۔ پھر وہ بیگ میں سے سارا سامان نکال کر اسے ڈبے کے آخر میں لے جا کر جھاڑ آیا۔ ہم سب نے چین کی سانس لی۔ چلو مصیبت ختم ہوئی …. میں نے سوچا۔

پےنٹری کار سے کھانا آ گیا تھا۔ سب نے کھانا کھایا۔ اِدھر اُدھر کی باتیں ہوئیں۔ پھر سب سونے کی تیاری کرنے لگے۔

تبھی میری نظر اس شخص پر پڑی۔ پریشانی کی جھریاں اس کے چہرے پر لوٹ آئی تھیں. وہ پھر سے ہوا کو سونگھنے کی کوشش کر رہا تھا۔

“مجھے اب بھی بدبو آ رہی ہے …” آخر اس نے اپنی خاموشی توڑتے ہوئے کہا۔

“ہے بھگوان!” میرے منہ سے نکلا۔

یہ سن کر ومل نے مورچہ سنبھالا، “بھائی صاحب، میری بات توجہ سے سنئے۔ بتائیے، ہم کس دور میں جی رہے ہیں؟ یہ کیسا وقت ہے؟ ہم کیسے لوگ ہیں؟ “

“کیا مطلب؟” وہ شخص کچھ سمجھ نہیں پایا۔

“دیکھیے، ہم سب ایک بدبودار دور میں جی رہے ہیں۔ یہ وقت بدبودار ہے؛ ہم لوگ بدبودار ہیں. یہاں لیڈر کرپٹ ہیں، وہ بدبودار ہیں۔ اداکار انڈرورلڈ سے ملے ہوئے ہیں، وہ بدبودار ہیں۔ افسر رشوت خور ہیں، وہ بدبودار ہیں۔ دوکاندار ملاوٹ کرتے ہیں، وہ بدبودار ہیں۔ ہم اور آپ جھوٹ بولتے ہیں، دوسروں کا حق مارتے ہیں، غیر اخلاقی کام کرتے ہیں، ہم تمام بدبودار ہیں۔ جب یہ سارا دور بدبودار ہے، یہ وقت بدبودار ہے، یہ سماج بدبودار ہے، ہم لوگ بدبودار ہیں تو ایسے میں اگر آپ کو اب بھی بدبو آ رہی ہے تو یہ فطری ہے۔ آخر اس ڈبے میں ہم بدبودار لوگ ہی تو بیٹھے ہیں۔ “

***

बदबू
सुशांत सुप्रिय

रेल-यात्राओं का भी अपना ही मजा है। एक ही डिब्बे में पूरे भारत की सैर हो जाती है। तरह-तरह के लोग मिल जाते हैं। विचित्र किस्म के अनुभव हो जाते हैं।
पिछली सर्दियों में मेरे साथ ऐसा ही हुआ। मैं और मेरे एक परिचित विमल राजधानी-एक्सप्रेस से किसी काम के सिलसिले में दिल्ली से रायपुर जा रहे थे। हमारे सामने वाली सीट पर फ्रेंचकट दाढ़ीवाला एक व्यक्ति अपनी पत्नी और तीन साल के बच्चे के साथ यात्रा कर रहा था। परस्पर अभिवादन हुआ। शिष्टाचारवश मौसम से जुड़ी कुछ बातें हुईं। उसके अनुरोध पर हमने अपनी नीचे वाली बर्थ उसे दे दी और हम दोनों ऊपरवाली बर्थ पर चले आए।
मैं अखबार के पन्ने पलट रहा था। तभी मेरी निगाह नीचे बैठे उस व्यक्ति पर पड़ी। वह बार-बार हवा को सूँघने की कोशिश करता, फिर नाक-भौंह सिकोड़ता। उसके हाव-भाव से साफ था कि उसे किसी चीज की बदबू आ रही थी। वह रह-रह कर अपने दाहिने हाथ से अपनी नाक के इर्द-गिर्द की हवा को उड़ाता। विमल भी यह सारा तमाशा देख रहा था। आखिर उससे रहा नहीं गया। वह पूछ बैठा,“क्या हुआ भाईसाहब?”
“बड़ी बदबू आ रही है।” फ्रेंचकट दाढ़ीवाले उस व्यक्ति ने चिड़चिड़े-स्वर में कहा।
विमल ने मेरी ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा। मुझे भी कुछ समझ नहीं आया।
मैंने जीवन में कभी यह दावा नहीं किया कि मेरी नाक कुत्ते जैसी है। हम दोनों को ही विशेष गंध नहीं सता रही थी। इसलिए उस व्यक्ति के हाव-भाव हमें कुछ अजीब-से लगे। मैं फिर अखबार पढ़ने में व्यस्त हो गया। विमल ने भी अखबार का एक पन्ना उठा लिया।
पाँच-सात मिनट बीते होंगे कि मेरी निगाह नीचे गई। नीचे बैठा व्यक्ति अब काफी उद्विग्न नजर आ रहा था। वह चारों ओर टोही निगाहों से देख रहा था। जैसे बदबू के स्रोत का पता लगते ही वह कोई क्रांतिकारी कदम उठा लेगा। रह-रह कर उसका हाथ अपनी नाक पर चला जाता। आखिर उसने अपनी पत्नी से कुछ कहा। पत्नी ने बैग में से ‘रूम-फ्रैशनर’ जैसा कुछ निकाला और हवा में चारों ओर कुछ स्प्रे कर दिया। मैंने विमल को आँख मारी। वह मुस्करा दिया। किनारेवाली बर्थ पर बैठे एक सरदारजी भी यह सारा तमाशा हैरानी से देख रहे थे।
“चलो, अब शायद इस पीड़ित व्यक्ति को कुछ आराम मिलेगा।” मैंने मन ही मन सोचा।
पर थोड़ी देर बाद क्या देखता हूँ कि फ्रेंचकट दाढ़ीवाला वह उद्विग्न व्यक्ति वही पुरानी हरकतें कर रहा है। तभी उसने अपनी पत्नी के कान में कुछ कहा। पत्नी परेशान-सी उठी और हमें संबोधित करके कहने लगी, “भाईसाहब, यह जूता किसका है? इसी में से बदबू आ रही है।”
जूता विमल का था। वह उत्तेजित-स्वर में बोला,“यहाँ पाँच-छ्ह जोड़ी जूते पड़े हैं। आप यह कैसे कह सकती हैं कि इसी जूते में से बदबू आ रही है? वैसे भी, मेरा जूता और मेरी जुराबें, दोनों नई हैं और साफ-सुथरी हैं।”
इस पर उस व्यक्ति की पत्नी कहने लगी,“भाईसाहब, बुरा मत मानिएगा। इन्हें बदबू सहन नहीं होती। उल्टी आने लगती है। आप से गुजारिश करती हूँ, आप अपने जूते पालिथीन में डाल दीजिए। बड़ी मेहरबानी होगी।”
विमल गुस्से और असमंजस में था। तब मैंने स्थिति को सँभाला,“देखिए, हमें तो कोई बदबू नहीं आ रही। पर आप जब इतनी जिद कर रही हैं तो यही सही।”
बड़े बेमन से विमल ने नीचे उतरकर अपने जूते पालिथीन में डाल दिए।
मैंने सोचा, चलो अब बात यहीं खत्म हो जाएगी। पर थोड़ी देर बाद वह व्यक्ति उठा और मुझसे कहने लगा,“भाईसाहब, मुझे नीचे अब भी बहुत बदबू आ रही है। आप नीचे आ जाइए। मैं वापस ऊपरवाली बर्थ पर जाना चाहता हूँ।”
अब मुझसे नहीं रहा गया। मैंने कहा,“क्या आप पहली बार रेल-यात्रा कर रहे हैं? भाईसाहब, आप अपने घर के ड्राइंगरूम में नहीं बैठे हैं। यात्रा में कई तरह की गंध आती ही हैं। टायलेट के पासवाली बर्थ मिल जाए तो वहाँ की दुर्गंध आती है। गाड़ी जब शराब बनानेवाली फैक्ट्री के बगल से गुजरती है तो वहाँ की गंध आती है। यात्रा में सब सहने की आदत डालनी पड़ती है।”
विमल ने भी धीरे-से कहा,“इंसान को अगर कुत्ते की नाक मिल जाए तो बड़ी मुश्किल होती है।”
पर उस व्यक्ति ने शायद विमल की बात नहीं सुनी। वह अड़ा रहा कि मैं नीचे आ जाऊँ और वह ऊपरवाली बर्थ पर ही आएगा।
मैंने बात को और बढ़ाना ठीक नहीं समझा, इसलिए मैंने ऊपरवाली बर्थ उसके लिए खाली कर दी। वह ऊपर चला गया।
थोड़ी देर बाद जब उस व्यक्ति की पत्नी अपने बड़े बैग में से कुछ निकाल रही थी तो वह अचानक चीखकर पीछे हट गई।
सब उसकी ओर देखने लगे।
“क्या हुआ?” ऊपर से उस व्यक्ति ने पूछा।
“बैग में मरी हुई छिपकली है।” पत्नी ने जवाब दिया।
यह सुनकर विमल ने मुझे आँख मारी। मैं मुस्करा दिया।
वह व्यक्ति खिसियाना-सा मुँह लिए नीचे उतरा।
“भाईसाहब, बदबू का राज अब पता चला।” सरदारजी ने उसे छेड़ा। वह और झेंप गया।
खैर, उस व्यक्ति ने मरी हुई छिपकली को खिड़की से बाहर फेंका। फिर वह बैग में से सारा सामान निकालकर उसे डिब्बे के अंत में ले जाकर झाड़ आया। हम सबने चैन की साँस ली। चलो मुसीबत खत्म हुई—मैंने सोचा।
पैंट्री-कार से खाना आ गया था। सबने खाना खाया। इधर-उधर की बातें हुईं। फिर सब सोने की तैयारी करने लगे।
तभी मेरी निगाह उस व्यक्ति पर पड़ी। उद्विग्नता की रेखाएँ उसके चेहरे पर लौट आई थीं। वह फिर-से हवा को सूँघने की कोशिश कर रहा था।
“मुझे अब भी बदबू आ रही है…” आखिर उसने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा।
“हे भगवान!” मेरे मुँह से निकला।
यह सुनकर विमल ने मोर्चा सँभाला,”भाई साहब, मेरी बात ध्यान से सुनिए। बताइए, हम किस युग में जी रहे हैं? यह कैसा समय है? हम कैसे लोग हैं?”
“क्या मतलब?” वह व्यक्ति कुछ समझ नहीं पाया।
“देखिए, हम सब एक बदबूदार युग में जी रहे हैं। यह समय बदबूदार है; हम लोग बदबूदार हैं। यहाँ नेता भ्रष्ट हैं, वे बदबूदार हैं। अभिनेता अंडरवर्ल्ड से मिले हैं, वे बदबूदार हैं। अफसर घूसखोर हैं, वे बदबूदार हैं। दुकानदार मिलावट करते हैं, वे बदबूदार हैं। हम और आप झूठ बोलते हैं, दूसरों का हक मारते हैं, अनैतिक काम करते हैं, हम सभी बदबूदार हैं। जब यह सारा युग बदबूदार है, यह समय बदबूदार है, यह समाज बदबूदार है, हम लोग बदबूदार हैं तो ऐसे में यदि आपको अब भी बदबू आ रही है तो यह स्वाभाविक है। आखिर इस डिब्बे में हम बदबूदार लोग ही तो बैठे हैं।”

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Aag… Asghar Wajahat

Aag

آگ
افسانہ نگار: اصغر وجاہت
ہندی سے اردو ترجمہ: شیراز حسن

اس آدمی کا گھر جل رہا تھا۔ وہ اپنے خاندان سمیت آگ بجھانے کی کوشش کر رہا تھا، لیکن آگ بہت تیز تھی، بجھنے کا نام نہ لیتی تھی۔ ایسا لگتا تھا جیسے صدیوں سے لگی آگ ہے، یا کسی تیل کے کنویں میں ماچس لگا دی گئی ہے یا کوئی آتش فشاں پھٹ پڑا ہے۔ آدمی نے اپنی بیوی سے کہا،” اس طرح کی آگ تو ہم نے کبھی نہیں دیکھی تھی”

بیوی بولی،” اوہ، کیونکہ اس طرح کی آگ تو ہمارے پیٹ میں لگا کرتی ہے۔ ہم اسے دیکھ نہیں پاتے تھے۔”

وہ آگ بجھانے کی کوشش کر رہے تھے کہ دو پڑھے لکھے وہاں آ پہنچے۔ آدمی نے ان سے کہا،” بھائی، ہماری مدد کرو۔” دونوں نے آگ دیکھی اور ڈر گئے، بولے،” دیکھو، ہم دانشور ہیں، ادیب ہیں، صحافی ہیں، ہم آپ کی آگ کے بارے میں جا کر لکھتے ہیں۔” وہ دونوں چلے گئے۔

کچھ دیر بعد وہاں ایک شخص اور آیا۔ اس سے بھی اس شخص نے آگ بجھانے کی بات کہی۔ وہ بولا،” ایسی آگ تو میں نے کبھی نہیں دیکھی …….. اس کو جاننے اور پتا لگانےکے لیے تحقیق کرنا پڑے گی۔ میں اپنا تحقیقی مواد لے کر آتا ہوں، اس وقت تک تم یہ آگ نہ بجھنے دینا۔” وہ چلا گیا۔ آدمی اور اس کا خاندان پھر آگ بجھانے میں جُت گئے۔ لیکن آگ تھی کہ قابو میں ہی نہ آتی تھی۔

دونوں تھک ہار کر بیٹھ گئے۔ کچھ دیر میں وہاں ایک اور آدمی آیا۔ اس آدمی نے مدد مانگی۔ اس آدمی نے آگ دیکھی۔ انگارے دیکھے۔ وہ بولا،” یہ بتاﺅ کہ انگاروں کا تم کیا کرو گے؟”

وہ آدمی حیران تھا، کیا بولتا!
آنے والا بولا،” میں انگارے لے جاﺅں گا۔”
” صرف انگارے لے جاوگے؟ ”
” اوہ، ٹھنڈے ہونے کے بعد …. جب وہ کوئلہ بن جائیں گے ……..۔”

کچھ دیر بعد آگ بجھانے والے آ گئے۔ انہوں نے آگ کا جو بھیانک روپ دیکھا تو چھکے چھوٹ گئے۔ ان کے پاس جو پانی تھا وہ آگ کیا بجھاتا! اس کے ڈالنے سے تو آگ اور بھڑک جاتی۔ آگ بجھانے والے فکر میں ڈوب گئے۔ ان میں سے ایک بولا،” یہ آگ اسی طرح لگی رہے، اسی میں ملک کی بھلائی ہے۔ ”

” کیوں؟” آدمی نے پوچھا۔
” اس لئے کہ اس کو بجھانے کے لئے پورے ملک میں جتنا پانی ہے، اس کا آدھا چاہئے ہوگا۔”

 ” پر میرا کیا ہوگا؟
” دیکھو، تمہارا نام گینز بک آف ورلڈ ریکارڈ میں آ جائے گا۔ تمہارے ساتھ ملک کا نام بھی …. سمجھے؟ ”

یہ بات چیت ہو ہی رہی تھی کہ ماہرین کی ٹیم وہاں آ پہنچی۔ وہ آگ دیکھ کر بولے،” اتنی تیز آگ …. اس کو تو برآمد کیا جا سکتا ہے ….. غیر ملکی کرنسی آ سکتی ہے …….. یہ آگ خلیج کے ممالک میں بھیجی جا سکتی ہے۔ ”

دوسرے ماہرین نے کہا،” یہ آگ تو پورے ملک کے لیے توانائی کا سستا ذریعہ بن سکتی ہے ”
” توانائی کی بہت کمی ہے ملک میں۔”
” اس توانائی سے تو بغیر پٹرول کے گاڑیاں چل سکتی ہیں۔ یہ توانائی ملک کی ترقی میں بڑی مدد فراہم کر سکتی ہے۔ ”

” اس میں توانائی سے ملک میں ‘اتحاد’ بھی قائم ہو سکتی ہے۔ اسے اور پھیلا دو ….”

” پھیلاﺅ!” وہ آدمی چلایا۔
” اوہ، بڑے بڑے پنکھے لگاﺅ …….. تیل ڈالو تاکہ اس آگ پھیلے۔”
” پر میرا کیا ہوگا؟” وہ آدمی بولا۔
” تمہارا فائدہ ہی فائدہ ہے …….. تمہارا نام تو ملک کی تعمیر کی تاریخ میں سنہرے حروف میں لکھا جائے گا ….. تم ہیرو ہو۔ ”

کچھ دنوں بعد دیکھا گیا کہ وہ آدمی جس کے گھر میں اس کے پیٹ جیسی بھیانک آگ لگی تھی، آگ کو بھڑکا رہا ہے، ہوا دے رہا ہے۔

*******

आग
असगर वज़ाहत

उस आदमी का घर जल रहा था । वह अपने परिवार–सहित आग बुझाने का प्रयास कर रहा था, लेकिन आग प्रचंड थी, बुझने का नाम न लेती थी । ऐसा लगता था जैसे शताब्दियों से लगी आग है, या किसी तेल के कुएँ में माचिस लगा दी गई है या कोई ज्वालामुखी फट पड़ा है । आदमी ने अपनी पत्नी से कहा,‘‘ इस तरह की आग तो हमने कभी नहीं देखी थी !’’

पत्नी बोली,‘‘ हॉ, क्योंकि इस तरह की आग तो हमारे पेट में लगा करती है । हम उसे देख नहीं पाते थे ।’’
वे आग बुझाने की कोशिश कर रहे थे कि दो पढ़े–लिखे वहॉ आ पहुँचे। आदमी ने उनसे कहा,‘‘ भाई, हमारी मदद करों ।’’ दोनों ने आग देखी और डर गए। बोले,‘‘ देखो, हम बुद्धिजीवी हैं, लेखक हैं, पत्रकार हैं, हम तुम्हारी आग के बारे में जाकर लिखते हैं ।’’ वे दोनों चले गए ।

कुछ देर बाद वहॉ एक आदमी और आया । उससे भी इस आदमी ने आग बुझाने की बात कही । वह बोला,‘‘ ऐसी आग तो मैंने कभी नहीं देखी़ ………. इसको जानने और पता लगाने के लिए शोध करना पड़ेगा । मैं अपनी शोध–सामग्री लेकर आता हूँ, तब तक तुम यह आग न बुझने देना।’’ वह चला गया । आदमी और उसका परिवार फिर आग बुझाने में जुट गए । पर आग थी कि काबू में ही न आती थी ।

दोनों थक–हारकर बैठ गए। कुछ देर में वहॉ एक और आदमी आया। उससे आदमी ने मदद मॉगी। उस आदमी ने आग देखी। अंगारे देखे। वह बोला,‘‘ यह बताओ कि अंगारों का तुम क्या करोगे ?’’

वह आदमी चकित था,क्या बोलता !
आगंतुक बोला, ‘‘ मैं अंगारे ले जाऊँगा।’’
‘‘ केवल अंगारे ले जाओंगें? ’’
‘‘ हॉ, ठंडे होने के बाद ……. जब वे कोयला बन जाएँगे………’’
कुछ देर बाद आग बुझाने वाले आ गए। उन्होंने आग का जो विकराल रूप् देखा तो छक्के छूट गए। उनके पास जो पानी था वह आग क्या बुझाता ! उसके डालने से तो आग और भड़क जाती । दमकलवाले चिंता में डूब गए। उनमें से एक बोला,‘‘ यह आग इसी तरह लगी रहे, इसी में देश की भलाई है । ’’

‘‘ क्यों?’’ आदमी ने पूछा ।
‘‘ इसलिए कि इसको बुझाने के लिए पूरे देश में जितना पानी है, उसका आधा चाहिए होगा ।’’

‘‘ पर मेरा क्या होगा ?’’
‘‘ देखों, तुम्हारा नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड मे आ जाएगा। तुम्हारे साथ देश नाम भी …….समझे? ’’

यह बातचीत हो ही रही थी कि विशेषज्ञों का दल वहॉ आ पहुँचा। वे आग देखकर बोले, ‘‘ इतनी विराट आग……. इसका तो निर्यात हो सकता है …..विदेशी मुद्रा आ सकती है……..यह आग खाड़ी के देशों में भेजी जा सकती है ………..’’

दूसरे विशेषज्ञ ने कहा,‘‘ यह आग तो पूरे देश के लिए सस्ता ऊर्जा–स्रोत बन सकती है । ’’
‘‘ ऊर्जा की बहुत कमी है देश में ।’’
‘‘ इस ऊर्जा से तो बिना पैट्रोल के गाडि्याँ चल सकती हैं । यह ऊर्जा देश के विकास में महान योगदान दे सकती है । ’’

‘‘ इस ऊर्जा से देश में ‘एकता’ भी स्थापित हो सकती है । इसे और फैला दो ….’’

‘‘ फैलाओ!’’ वह आदमी चिल्लाया ।
‘‘ हॉ, बड़े–बड़े पंखे लगाओ………. तेल डालों ताकि ये आग फैले।’’
‘‘ पर मेरा क्या होगा?’’ वह आदमी बोला ।
‘‘ तुम्हारा फायदा ही फायदा है ……… तुम्हारा नाम तो देश के निर्माण के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा….. तुम नायक हो । ’’
कुछ दिनों बाद देखा गया कि वह आदमी जिसके घर में उसके पेट जैसी भयानक आग लगी थी, आग को भड़का रहा है, हवा दे रहा है ।

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Curfew… by Anukshree

کرفیو

انکوشری
ہندی سے اردو ترجمہ: علمانہ فصیح

“رُک سالا! کرفیو میں کہاں گھوم رہا ہے؟ ” سپاہی کی کڑک دار آواز سن کر منگرا گیا۔ شہر میں کرفیو لگ جانے کی اسے جانکاری نہیں تھی۔

روز کمانے کھانے والا منگرا چار ماہ پہلے بیمار پڑا تو محلے کے ایک دکاندار نے مدد کی تھی۔ اس کے صحت یاب ہونے تک دکاندار کا کافی اُدھار ہو گیا۔ روز کما کما کر وہ دکاندار کا ادھار بھر رہا تھا، لیکن ادھار ختم نہیں ہو رہا تھا۔

دکاندار کے ایک روز کے تقاضے سے منگرا گھبرا گیا تھا۔ ایک پٹھان سے پندرہ روپے سینکڑا مہینہ سُود لے کر منگرا کو بہت خوشی ہوئی تھی۔ وہ بستی پار کر کے ابھی میں روڈ پر آیا ہی تھا کے سپاہی مل گیا تھا۔

سپاہی نے اسے ایک لاٹھی لگا دی۔ منگرا نے کہا،” کرفیو کی مجھے کوئی جانکاری نہیں تھی۔”

“چل سالے ! جیل میں جانے پر جانکاری مل جائے گی۔ ” سپاہی نے منگرا کو ایک بار اوپر سے نیچے تک دیکھا اور آگے بولا،”یہاں کے جیل میں تو جگہ ہے نہیں، سنٹرل جیل جائے پڑے گا۔”

“سپاہی جی چھوڑ دیجئے۔” جیل کا نام سن کر منگرا گھبرا گیا۔

“نا ! چل اب وہیں رہنا ہوگا۔ دو تین مہینہ بعد چھوٹ جائے گا۔”

منگرا بہت پریشان ہوا۔ جیل جانے سے خاندان میں فاقوں کی نوبت آجائے گی، دکاندار کا ادھار پھر بڑھ جائے گا۔ کہاں سے لوٹا پائے گا وہ یہ ادھار؟

“کا کام کرتے ہو؟” سپاہی نے پوچھا۔

“مجدور ہوں حاکم ۔ چھوڑ دیجئے، پریوار کا اکیلا آدمی ہوں سرکار”

“چل وہیں چل کے بڑے حاکم کو کہنا۔ ایک ڈیڑھ حجار خرچہ کرنے پر ہوان سے چھوٹ جائے گا۔”

منگرا کی پریشانی بڑھتی جا رہی تھی۔ اپنی جیب سے نکال کر مٹھی بند کر کے اس نے سپاہی کی طرف بڑھا دیا۔

نوٹ کھول کر دیکھنے کے بعد سپاہی بدک گیا اور کہا، “نوٹ دکھلاتا ہے سالے.” پھر دھڑلے سے کہا ،”ایک حجار لگے گا۔”

“سرکار ! غریب آدمی ہوں۔بیماری کا۔۔۔”

منگرا گڑگڑاتا رہا۔ مگر سپاہی نے اس کی ایک نہ سنی۔ ایک ایک کر کے منگرا نے اپنی جیب سے چاروں نوٹ نکال کر اس کو تھما دیئے۔ سپاہی کو جب یقین ہو گیا کہ منگرا کے پاس دینے لائق اور کچھ نہیں ہے تو اس نے کہا، “مورکھ ہے۔ کرفیو میں نہیں نا گھومنا چاہیے” سپاہی نے آگے کہا ،”توہار مجبوری کو دیکھ کر کوئیاُپائے کرنا ہوگا۔”

“جی ہاں مائی باپ ! مجھے بچا لیجئے۔”

“ٹھیک ہے، ٹھیک ہے۔” سپاہی نے انمنا سا کہا۔ اس نے انگلی سے اشارہ کرتے ہوے کہا، “اوہ گلی سے ہو کے بھاگ جا۔”

منگرا جس گلی سے آیا تھا خوشی خوشی اسی گلی میں واپس گھس گیا۔

٭٭٭

कर्फ़्यू

लेखक: अनूक्श्री 

‘‘रुक स्साला ! कर्फ़्यू में कंहवा घूम रहा है ?’’ सिपाही की कड़कदार आवाज सुन कर मंगरा सकपका गया। शहर में कर्फ़्यू लग जाने की उसे जानकारी नहीं थी।

रोज कमाने–खाने वाला मंगरा चार माह पूर्व बीमार पड़ा तो मुहल्ले के एक दुकानदार ने मदद की थी। उसके स्वस्थ होने तक दुकानदार के काफी उधार हो गये। रोज कमा–कमा कर दो माह से वह उधार भर रहा था, लेकिन उधार खत्म नहीं हो रहा था।

दुकानदार के रोज–रोज के तकाजा से मंगरा घबरा गया था। एक पठान से पंद्रह रुपये सैकड़ा मासिक सूद पर चार सौ रुपये कर्ज लेकर मंगरा को बहुत खुशी हुई थी। वह बस्ती पार कर अभी मेन रोड पर आया ही था कि सिपाही मिल गया था। सिपाही ने उसे एक लाठी लगा दी। मार खाकर मंगरा ने कहा, ‘‘कर्फ़्यू की मुझे कोई जानकारी नहीं थी। ’’

‘‘चल, स्साले ! जेहल में जाने पर जानकारी मिल जाएगी। ’’ सिपाही ने मंगरा को एक बार ऊपर से नीचे तक देखा और आगे बोला, ‘‘ईंहवा के जेहल में जगह त है नहीं, तोरा सेंट्रल जेहल जाये पड़ेगा। ’’

‘‘सिपाही जी, छोड़ दीजिये’’जेल का नाम सुन कर मंगरा घबरा गया।
‘‘ना ! चल, अब ऊंहवे रहना होगा। दू–तीन महीना बाद छूट जायेगा। ’’
मंगरा बहुत परेशान हुआ। जेल जाने से परिवार के सामने भूखमरी आ जायेगी, दुकानदार का उधार फिर बढ़ जायेगा। कहाँ से लौटा पायेगा वह उधार रुपये ?
‘‘का काम करते हो ? ’’ सिपाही ने पूछा।

‘‘मजदूर हूँ हाकिम। छोड़ दीजिए, परिवार का अकेला आदमी हूँ सरकार ! ’’

‘‘चल, ऊंहवे चलके बड़का हाकिम से कहना। एक–डेढ़ हजार खरचा करने पर ऊंहवा से छूट जायेगा। ’’

मंगरा की परेशानी बढ़ती जा रही थी। अपनी जेब से सौ का एक नोट धीरे से निकाल कर मुट्ठी बंद कर उसने सिपाही की ओर बढ़ा दिया।

नोट खोल कर देखने के बाद सिपाही बिदक कर कहा, ‘‘नोट दिखलाता है ? ’’ उसने धीरे से कहा, ‘‘एक हजार लगेगा।’’

‘‘सरकार ! गरीब आदमी हूँ । बीमारी का ।’’

मंगरा गिड़गिड़ाता रहा। मगर सिपाही ने उसकी एक नहीं सुनी। एक–एक कर मंगरा ने अपनी जेब से सौ के चारों नोट निकाल कर उसको थमा दिये। सिपाही को जब विश्वास हो गया कि मंगरा के पास देने लायक और कुछ नहीं है तो उसने कहा, ‘‘मुरुख है। कर्फ़्यू में नहीं नू घूमना चाहिये। ’’ सिपाही ने आगे कहा, ‘‘तुम्हारी मजबूरी देख कर कोई उपाय करना ही होगा। ’’

‘‘जी हाँ माई–बाप ! मुझे बचा लीजिए। ’’

‘‘ठीक है, ठीक है। ’’ सिपाही ने अनमना–सा कहा। उसने उँगली से इशारा करते हुए कहा, ‘‘ओह गली से होके भाग जो। ’’

मंगरा जिस गली से आया था, ख़ुशी ख़ुशी  उसी में घुस गया।

***
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Naseeb Bad-Naseeb… by Anand


نصیب بد نصیب

افسانہ نگار: آنند
ترجمہ:علمانہ فصیح

ایک گروپ آف کمپنیز کے مالک، بے حد مصروف اور اپنے شہر کے مشہور مالداروں میں سے تھے۔ وہ اپنی مصروفیات کے باعث اپنے خاندان کو بھی بہت کم وقت دے پاتے تھے۔ لیکن آج ذرا فرصت میں تھے اور بیوی اور تین بچوں کے ساتھ تھے۔ نہایت اعتماد کے ساتھ بات چیت کرنے کے دوران اچانک انہوں نے بڑے بیٹے کی طرف اشارہ کیا اور بیوی سے پوچھا ، ” کیوں جی ، اپنا یہ بڑے والا راج کمار کب ہوا تھا؟“

”اب سال تو یاد نہیں، مگر، اتنا یاد ہے کہ ہوا یہ تبھی تھا ، جب آپ ٹیکس چوری کے مقدمے میں پھنسے تھے اور لگتا تھا کہ سزا ہوگی ہی ہوگی۔ لیکن جوں جوں اسکے جنم کا وقت نزدیک آتا گیا ، حالات تیزی سے ٹھیک ہوتے گئے اور جتنی رشوت دینے کو ہم تیار تھے، آخر اس سے بھی کم پیسے میں معاملہ نمٹ گیا۔ صبح اسکا جنم ہوا، دوپہر کو کورٹ نے آپ کو بری کر دیا۔“

”ویری گڈ۔ اور اپنی یہ راج کماری کب ہوئی تھی؟“

بیوی نے بیٹی کو پیار سے چوما، ”یہ…؟ یہ صوبائی اسمبلی کے انتخابات والے سال ہوئی تھی۔ کیا آپ کو اتنا بھی یاد نہیں کہ جب یہ دو ہی دن کی تھی کہ اپنی کالونی میں انتخابی جلسے سے تقریر کرنے آئے وزیر اعلیٰ چائے پینے اپنے گھر تھے۔ اور یہ بھی اسی دن شام کو ہوا تھا کہ آپ نے چپکے چپکے شہر کے ایک معروف انڈر  ورلڈ  سرغنہ کو اپنا پگڑی بدل بھائی بنا لیا تھا۔“

”اور اپنا یہ چھوٹا والا راج کمار ؟ کیا اسکے جنم کے وقت بھی ایسا ہی کچھ ہوا تھا؟“ اس نے پوچھا۔

“ہاں، کیوں نہیں؟” بیوی نے فخر سے کہا، ” یہ تو ہمارا وہ خوش نصیب بچہ ہے جو اپنی بند مٹھیوں میں بیوٹی پروڈکٹس بنانے والی اس کمپنی کا تحفہ لئے آیا تھا، جس کا نام آج ہر لڑکی کی زبان پر ہے۔ ابھی یہ مشکل سے ایک ہفتے کا ہوا ہوگا کہ اپنی کمپنی نے پہلی دس پروڈکٹس بازار میں اتاری تھیں اور کچھہ ہی سالوں میں دیس کی نمبر ایک کمپنی بن گئی تھی“۔

“کتنے خوش نصیب ہیں ہم، جو اِیشور نے ہمیں ایسے با برکت بچے دیے ہیں“۔ اسکا چہرہ فخر اور خود اعتمادی سے چمک رہا تھا۔

“مجھے برابر لگتا ہے کہ ہمارے پاس جو کچھ ہے، سب بچوں کے نصیب سے ہے، ورنہ آپ تو مشکل سے دال روٹی کا خرچ نکال پاتے تھے۔“ بیوی نے کہا۔

نوکر کے بھی تین بچے تھے۔ گھر آ کر بیوی سے اس نے پرجوش انداز میں پوچھا، ” کیوں ری، اپنا بڑا بیٹا کس سال ہوا؟“

” یہ کلموہا بھیانک برسات والے اُسی سال تو ہوا تھا جب سیلاب میں چَھپر بہہ گیا تھا۔ ہے بھگوان ! کیسی کیسی مصیبتیں لے کر آیا تھا، یہ بد نصیب ، سوچتی ہوں تو کلیجہ کانپتا ہے۔ کتنے دن اسے اٹھائے اٹھائے اسی اونچے سے ٹیلے پر ، بھوکے پیاسے، ہارے تھکے ٹھکانہ ڈھونڈھتے پھرے۔ بعد میں جب زمیندار کی کھنڈر نما حویلی میں پناہ لئے ہوئے تھے ایک دن مجھے اکیلی پا کر اس کے بگڑے ہوئے بیٹے نے میرے ساتھ بدکاری کی“۔ یہ بولتے بولتے وہ ماضی کی دکھ بھری یادوں میں کھو گئی اور پھوٹ پھوٹ کر رونے لگی۔

نوکر اداس اور خاموش تھا۔ اس نے اپنے باقی بچوں کے بارے میں نہیں پوچھا۔

***

शुभ अशुभ 

लेखक: आनंद 

अनेक उद्योग–समूहों के मालिक बेहद व्यस्त और अपने महानगर के प्रमुख धनकुबेरों में से एक थे। वे अपनी व्यस्तताओं के चलते, हालाँकि अपने परिवार को भी बहुत कम वक्त दे पाते थे वे, लेकिन आज जरा फुर्सत में थे और पत्नी और तीनों बच्चों के साथ थे। आत्मीयतापूर्ण हास–परिहास के बीच अचानक उन्होंने बड़े बेटे की ओर इशारा किया और पत्नी से पूछा, ‘‘क्यों जी, अपना ये बड़े वाला राजकुमार कब हुआ था?’’

‘‘अब साल तो याद नहीं, हाँ मगर, इतना याद है कि हुआ ये तभी था, जब आप टैक्स चोरी के मुकदमों में फँसे थे और लगता था कि सजा होगी–ही–होगी। लेकिन ज्यों–ज्यों इसके जन्म का समय नजदीक आता गया, हालात तेजी से अनुकूल होते गए और जितनी रिश्वत देने को हम तैयार थे, आखिर उससे भी कम पैसे में मामला निपट गया। सुबह इसका जन्म हुआ, दोपहर को न्यायालय ने आपको बरी कर दिया।’’
‘‘वेरी गुड! और अपनी ये राजकुमारी? ये कब हुई थी?’’
पत्नी ने बेटी को प्यार से चूमा, ‘‘ये …? ये विधान सभा के चुनाव वाले साल हुई थी। क्या आपको इतना भी याद नहीं कि अभी जब ये दो ही दिन की थी कि अपनी कालोनी में चुनाव सभा को सम्बोधित करने आए मुख्यमन्त्री चाय पीने अपने घर आए थे। और ये भी उसी दिन शाम को हुआ कि आपने चुपके–चुपके शहर के एक प्रमुख अंडर वर्ल्ड सरगना को अपना पगड़ी बदल भाई बना लिया था।’’
‘‘और अपना ये छोटे वाला राजकुमार? क्या इसके जन्म के समय भी ऐसा कुछ हुआ था?’’ उसने पूछा।
‘‘हाँ, क्यों नहीं।’’ पत्नी ने गर्व से कहा, ‘‘यही तो है हमारा वह सौभाग्यशाली बच्चा जो अपनी बन्द मुट्ठियों में सौन्दर्य प्रसाधन बनाने वाली अपनी उस कम्पनी का उपहार लिये था, जिसका नाम आज हर युवती की जुबान पर है। अभी ये मुश्किल से एक सप्ताह का रहा होगा
कि अपनी कम्पनी ने पहले दस उत्पाद बाजार में उतारे थे और कुछ ही सालों में देश की नम्बर एक कम्पनी बन गई थी।’’
‘‘कितने सौभाग्यशाली हैं हम, जो ईश्वर ने हमें ऐसे भाग्यवान बच्चे दिये हैं।’’ उसका चेहरा गर्व और आत्मसंतोष से चमक रहा था।
‘‘मुझे बराबर लगता है कि आज हमारे पास जो कुछ है, सब बच्चों के भाग्य से है, वरना आप तो मुश्किल से दाल–रोटी का खर्च निकाल पाते थे।’’ पत्नी ने कहा।
नौकर के भी तीन बच्चे थे। घर आकर पत्नी से उसने उत्साह से पूछा,‘‘क्यों री, अपना बड़ा बेटा किस साल हुआ?’’
‘‘ये कलमुँहा भयंकर बरसात वाले उसी साल तो हुआ था जब बाढ़ में छप्पर बह गया था। हे भगवान! कैसी–कैसी मुसीबतें लेकर आया था यह अभागा, सोचती हूँ तो कलेजा काँपता है। कितने दिन इसे उठाये –उठाये इसे ऊँचे टीले से उस ऊँचे टीले पर, भूखे–प्यासे, हारे–थके आश्रय खोजते फिरे। बाद में जब जमींदार की खंडहरनुमा पुरानी हवेली में आश्रय लिये हुए थे एक दिन मुझे अकेली पाकर उसके बिगड़ैल बेटे ने मेरे साथ दुष्कर्म किया।’’ बोलते–बोलते वह अतीत की दुखद यादों में खो गई और फूट–फूट कर रोने लगी।
नौकर उदास और खामोश था। उसने अपने बाकी दो बच्चों के बारे में नहीं पूछा।

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Farq… by Vishnu Prabhakar

Photo by Irish_Guy


فرق

وشنو پربھاکر
ترجمہ : شیراز حسن

اس دن اس کے دل میں خواہش پیدا ہوئی کہ بھارت اور پاکستان کے درمیان کی سرحد کو دیکھا جائےجو کہ ایک ملک تھا، وہ اب دو ہو کر کیسا لگتا ہے۔ دو تھے، تو دونوں ایک دوسرے کو شک کی نگاہ سے دیکھتے تھے۔ دونوں جانب پہرہ تھا۔ درمیان میں کچھ زمین ہوتی ہے، جس پر کسی کا حق نہیں ہوتا۔ دونوں اس پر کھڑے ہو سکتے ہیں۔ وہ وہیں کھڑا تھا، لیکن تنہا نہیں تھا۔ بیوی تھی اور تھے اٹھارہ مسلح فوجی اور ان کا کمانڈر بھی۔ دوسرے ملک کے فوجیوں کے سامنے وہ اسے اکیلا کیسے چھوڑ سکتے تھے۔ اتنا ہی نہیں، کمانڈر نے اس کے کان میں کہا، “ادھر کے فوجی آپ کو چائے کے لئے بلا سکتے ہیں، جایئے گا نہیں۔ پتہ نہیں کیا ہو جائے؟ آپ کی بیوی ساتھ میں ہے اور پھر کل ہم نے ان کے چھ اسمگلر مار ڈالے تھے۔”

اس نے جواب دیا، “جی نہیں، میں اُدھر کیسے جا سکتا ہوں؟”

اور من ہی من میں کہا، ‘مجھے آپ اتنا بے وقوف کیسے سمجھتے ہیں؟ میں انسان ہوں، اپنے پرائے میں فرق کرنا جانتا میں ہوں۔ اتنی سجھ مجھ میں ہے۔ ‘

وہ یہ سب سوچ ہی رہا تھا کہ واقعی اُدھر کے فوجی وہاں آ پہنچے۔ رعب دار پٹھان تھے۔ بڑے تپاک سے ہاتھ ملایا۔ اس دن عید تھی ۔ اس نے انہیں مبارک باد کہا۔ بڑی گرمجوشی کے ساتھ ایک بار پھر ہاتھ ملا کر وہ بولے، ‘ادھر تشریف لائیں۔ ہم لوگوں کے ساتھ ایک پیالہ چائےپیجیے۔’

اس کا جواب اس کے پاس تیار تھا۔ انتہائی خاموشی سے مسکرا کر اس نے کہا، ‘بہت بہت شکریہ۔ بڑی خوشی ہوتی آپ کے ساتھ بیٹھ کر، لیکن مجھے آج ہی واپس لوٹنا ہے اور وقت بہت کم ہے۔ آج تو معافی چاہتا ہوں۔ ‘

اسی طرح نرمی سے کچھ اور باتیں ہوئیں کہ پاکستان کی جانب سے کلانچیں بھرتا ہوا بکریوں کا ایک ریوڑ ان کے پاس سے گزرا اور بھارت کی سرحد میں داخل ہو گیا۔ ایک ساتھ سب نے ان کی طرف دیکھا۔ ایک لمحہ بعد اس نے پوچھا، “یہ آپ کی ہیں؟ ‘

ان میں سے ایک فوجی نے گہری مسکراہٹ کے ساتھ جواب دیا، “جی ہاں، جناب، ہماری ہیں۔ جانور ہیں، فرق کرنا نہیں جانتے۔ ‘


***
फर्क

विष्णु प्रभाकर

उस दिन उसके मन में इच्छा हुई कि भारत और पाक के बीच की सीमा–रेखा को देखा जाए। जो कि एक देश था, वह अब दो होकर कैसा लगता है। दो थे, तो दोनों एक दूसरे के प्रति शंकालु थे। दोनों ओर पहरा था। बीच में कुछ भूमि होती है, जिस पर किसी का अधिकार नहीं होता। दोनों उस पर खड़े हो सकते हैं। वह वहीं खड़ा था, लेकिन अकेला नहीं था–पत्नी थी और थे अठारह सशस्त्र सैनिक और उनका कमांडर भी। दूसरे देश के सैनिकों के सामने वे उसे अकेला कैसे छोड़ सकते थे। इतना ही नहीं, कमांडर ने उसके कान में कहा, ‘उधर के सैनिक आपको चाय के लिए बुला सकते हैं, जाइएगा नहीं। पता नहीं क्या हो जाए ? आपकी पत्नी साथ में है और फिर कल हमने उनके छह तस्कर मार डाले थे।‘
उसने उत्तर दिया, ‘जी नहीं, मैं उधर कैसे जा सकता हूं ?‘
और मन नही मन कहा, ‘मुझे आप इतना मूर्ख कैसे समझते हैं ? मैं इंसान हूँ, अपने–पराये में भेद करना जानता मैं हूँ। इतना विवेक मुझमें है।‘
वह यह सब सोच ही रहा था कि सचमुच उधर के सैनिक वहां आ पहुंचे। रोबीले पठान थे। बड़े तपाक से हाथ मिलाया। उस दिन ईद थी–उसने उन्हें मुबारकबाद कहा। बड़ी गर्मजोशी के साथ एक बार फिर हाथ मिलाकर वे बोले, ‘उधर तशरीफ लाइए। हम लोगों के साथ एक प्याला चाय पीजिए।‘
इसका उत्तर उसके पास तैयार था। अत्यंत विनम्रता से मुस्कराकर उसने कहा, ‘बहुत–बहुत शुक्रिया। बड़ी खुशी होती आपके साथ बैठकर, लेकिन मुझे आज ही वापस लौटना है और वक्त बहुत कम है। आज तो माफी चाहता हूँ।‘
इसी प्रकार शिष्टाचार की कुछ और बातें हुईं कि पाकिस्तान की ओर से कुलाँचे भरता हुआ बकरियों का एक दल उनके पास से गुजरा और भारत की सीमा में दाखिल हो गया। एक साथ सबने उनकी ओर देखा। एक क्षण बाद उसने पूछा, ‘ये आपकी हैं ?‘
उनमें से एक सैनिक ने गहरी मुस्कराहट के साथ उत्तर दिया, ‘जी हाँ, जनाब, हमारी हैं। जानवर हैं, फर्क करना नहीं जानते।‘

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Tulsi Ka Pedh… By Anindita Basu

تلسی کا پیڑ
انندِتا باسو
ترجمہ: شیراز حسن 

 ماں، ماسٹرصاحب آئے ہیں، منی پھدکتے ہوئے آئی۔ سمِترا اس وقت رام بہادر کو ڈانٹ رہی  تھیں، مُنّی کو بولیں، “جا، جا کر ان کے پاس بیٹھ، میں ابھی آئی”، پھر پلٹ کر رام بہادر پر پھر برسنے لگیں، “ارے، ایسا کیسے ہو سکتا ہے کہ تلسی پتا ہی نہ ملے کہیں۔ سارے شہر میں تجھے کہیں تلسی پتا ملا ہی نہیں؟ جا، بڑے ہنومان جی کے مندر میں دیکھ، تلسی پتا مل جائے  گا”۔ 

رام بہادر ہچکچانے لگا، “پربہو ماں، وہ تودریا کے کنارے پر ہے، اتنی دور …” بولتے ہوئے چپ ہو گیا۔

“ٹھیک ہے، چھوٹے بھیّا کی سائیکل لے کر چلا جا”، کہہ کر سمترا بیٹھک کی طرف چل پڑیں، پھر رک کر بولیں، “اور سن، لوٹتے ہوئے ذرا پان لے کر آنا ماسٹرصاحب کے لئے۔ بھولنا مت۔”

بیٹھک میں منی ماسٹرصاحب کو سوالات سے پریشان کر رہی تھی۔ “لیکن آپ لوگ پیدل کیوں گئے؟ آپ کے پاس گاڑی نہیں تھی کیا؟”

ماسٹرصاحب ہنس رہے تھے، “ارے پگلی، پدیاترا میں کوئی سواری تھوڑے ہی کرتا ہے۔ اور پھر، باپو نے کہا تھا، کرو یا مرو۔ پورے شہر پر جنون سوار تھا عدم تعاون کی تحریک کا۔ ہم لوگ بھی نکل پڑے تھے مرنے کو۔

“عدم تعاون کی تحریک کیا ہوتا ہے؟” منی پوچھ رہی تھی جب سمترا کمرے میں آ کر بولیں، “نمستے ماسٹرصاحب۔”

“جیتے رہو”، وہ ہنس کر بولے، پھر پوچھے “کیا بات ہے، آپ کچھ پریشان نظر آ رہی ہیں، سب خیریت تو ہے؟”

ایک گہری سانس لے کر سمترا بولیں، “کیا بتاوں ماس صاب، کل ہمارے یہاں ستیہ نارائن کتھا ہے، ادھر تلسی کے پیڑ کو پالا لگ گیا ہے، رام بہادر کو بھیجا تھا پھول والے کے پاس تو آ کر بولتا ہے، تلسی پتا شہر میں کہیں نہیں ہے۔ اب کل پوجا کیسے ہوگی؟ “

اس بار شہر میں شدید سردی پڑی تھی۔خریف فصل تو برباد ہوا ہی تھا، یہاں تک کہ آم، املی جیسے بڑے بڑے پیڑوں کو بھی پالا پڑ گیا تھا۔ کچھ دن پہلے اپنے مائیکے سے سمترا تلسی چارہ لانے بھجوائی تھیں نوکر کو، معلوم ہوا وہاں کا درخت بھی مر گیا ہے۔ ادھر کل اچھا دن دیکھ کر ستیہ نارائن کتھا رکھی گئی تھی۔ باقی سب تیاریاں تو تقریباً ہو چکی تھیں، بس تلسی پتر کہیں نہیں مل رہا تھا۔ آس پڑوس کا بھی وہی حال تھا، سردی کے مارے تمام درخت مر گئے تھے۔ پڑوسی وِملا کی ماں نے (جس کی ساس بہت پرانے وچار والی تھی) تو پریشان ہو کر اپنے شوہر کو گورنمنٹ نرسری تک بھیجا تھا چارہ لانے، وہاں پتہ چلا کہ آس پاس کے کسی بھی گاو¿ں میں کہیں بھی تلسی چارہ نہیں ہے، لکھنو¿ نرسری کو آرڈر بھیجا گیا ہے چارے کے لئے، وہ بھی شاید ابھیمہینہ بھر بعد ہی آئے؛ اس دن سے وملا کی ماں کی ساس ہر روز اپنے بیٹے سے کہتی چاندی کے تلسی پتّے بنوا دے پوجا کے لیے۔

مگر سمترا کو تو کل ہی پتے چاہئے تھے، کل دن بھی تھا پورنماسی کا، جمعرات، وہ اس لئے کتھا کو ٹالنا نہیں چاہتی تھیں کسی اور دن کے لئے۔
تبھی رام بہادر پان لے کر آیا اور بولا، “بہو ماں، بڑے ہنومان جی کے مندر میں بھی نہیں ہے، وہاں تو گزشتہ بیس دن سے بغیر تلسی کے ہی پوجا پاٹھ چل رہا ہے۔”

سن کر ماسٹرصاحب بولے، “اگر آپ برا نہ مانےں تو ایک بات کہوں؟ ہمارے گھر میں تلسی ہے، وہاں سے پتّے منگوا لیجیے کسی کو بھجوا کر”۔

“مگر آپ کے یہاں تلسی کا پیڑ؟” کچھ جھجھکتے ہوئے سمترا نے سوال کیا۔

“کیوں، ہمارے یہاں صرف انار کا درخت ہی ہونا چاہیے کیا؟” ماسٹرصاحب ہنسنے لگے۔ “ارے آپ کو تو معلوم ہے ہمیں سردی بخار لگا ہی رہتا ہے، تو ہم نے بھی سوچا کہ چلو تلسی کی چائے پی لیا کریں گے۔ ابھی زیادہ دن نہیں ہوئے پیڑ کو لائے ہوئے، اسی لیے شاید آپ نے غور نہیں کیا ہوگا۔ بڑا سکون ملتا ہے اس بڑھاپے میں تلسی ادرک کی گرماگرم چائے سے۔ پھر، جب ہم نے دیکھا کی موسم کی ٹھنڈک بڑھتی جا رہی ہے تو گملے کو ہم نے اپنے کمرے کے اندر رکھوا لیا۔ بس، آج بھی درخت صحیح سلامت ہے۔ “

پھر وہ رکے، سانس لیا اور بولے، “اطمینان رکھیں، اس میں اِدھر اُدھر کا گندا پانی بالکل نہیں پڑتا ہے۔ اس کی دیکھ بھال ہم خود اپنے ہاتھوں سے کرتے ہیں. دو تین پتے اس میں سے آپ بھی لے لیجئے۔”

اور پھر، دوسرے دن ایک دم صبح سویرے رام بہادر جاکر حاجی اقبال احمد صدیقی کے گھر سے ستیہ نارائن پوجا کے لئے تلسی پتر لے کر آیا۔ لوگوں کے پوچھنے پر سمترا بولیں پٹنہ سے اس کے چچا زاد بھائی کا سالا ادھر کل آنے والا تھا جان کر اسی کے ہاتھوں منگوا لیا تھا۔ رام بہادر پرانا نوکر تھا، وہ بھی خاموشی سادھے رہا۔

***

तुलसी का पेड़
अनिन्दिता वसु

“माँ, मास्टरसाहब आये हैं”, मुन्नी फुदकती हुई आई । सुमित्रा उस वक़्त रामबहादुर को डाँट रही थीं, मुन्नी को बोलीं, “जा, जाकर उनके पास बैठ, मैं अभी आई”, फिर पलटकर रामबहादुर पर फिर बरसने लगीं, “अरे, ऐसा कैसे हो सकता है कि तुलसीपत्ता ही न मिले कहीं । सारे शहर में तुझे कहीं तुलसीपत्ता मिला ही नहीं ? जा, बड़े हनुमानजी के मन्दिर में देख, तुलसीपत्ता मिल जायेगा ।”

रामबहादुर हिचकिचाने लगा, “पर बहूमाँ, वो तो बाँध पर है, उतनी दूर…” बोलते हुए चुप हो गया ।

“ठीक है, छोटे भैय्या की साइकिल लेकर चला जा”, बोलकर सुमित्रा बैठक की ओर चल पड़ीं, फिर रुककर बोलीं, “और सुन, लौटते हुए ज़रा पान लेकर आना मास्टरसाहब के लिये । भूलना मत ।”

बैठक में मुन्नी मास्टरसाहब को सवालों से परेशान कर रही थी । “लेकिन आपलोग पैदल क्यों गये ? आपके पास गाड़ी नहीं थी क्या ?”

मास्टरसाहब हँस रहे थे, “अरे पगली, पदयात्रा में कोई सवारी थोड़े ही करता है । और फिर, बापू ने कहा था, करो या मरो । पूरे शहर पर जुनून सवार था असहयोग आन्दोलन का । हम लोग भी निकल पड़े थे मरने को ।”

“असहयोग आन्दोलन क्या होता है?” मुन्नी पूछ रही थी जब सुमित्रा कमरे में आकर बोलीं, “नमस्ते मास्टरसाहब” ।

“जीते रहो”, वो हँसकर बोले, फिर पूछे “क्या बात है, आप कुछ परेशान नज़र आ रहीं हैं, सब ख़ैरियत तो है?”

एक गहरी साँस लेकर सुमित्रा बोलीं, “क्या बताऊँ मास्साब, कल हमारे यहाँ सत्यनारायण कथा है, इधर तुलसी के पेड़ को पाला लग गया है, रामबहादुर को भेजा था फूलवाले के पास तो आकर बोलता है, तुलसीपत्ता शहर में कहीं नहीं है । अब कल पूजा कैसे होगी ?”

इस बार शहर में भयंकर सर्दी पड़ी थी । खरीफ़ फ़सल तो बर्बाद हुआ ही था, यहाँ तक कि आम, इमली जैसे बड़े-बड़े पेड़ों को भी पाला पड़ गया था । कुछ दिन पहले अपने मायके से सुमित्रा तुलसी-चारा लाने भिजवाई थीं नौकर को, पता चला वहाँ का पेड़ भी मर गया है । इधर कल अच्छा दिन देखकर सत्यनारायण कथा रखी गई थी । बाकि सब तैयारियाँ तो लगभग हो चुकि थीं, बस तुलसीपत्र कहीं नहीं मिल रहा था । आस-पड़ोस का भी वही हाल था, सर्दी के मारे सभी पेड़ मर गये थे । पड़ोसी विमला की माँ ने (जिसकी सास बहुत पुराने विचारों वाली थी) तो परेशान होकर अपने पति को गवर्मेन्ट नर्सरी तक भेजा था चारा लाने, वहाँ पता चला कि आस-पास के किसी भी गाँव में कहीं भी तुलसी-चारा नहीं है, लखनऊ नर्सरी को आर्डर भेजा गया है चारे के लिये, वो भी शायद अभी महीने-भर बाद ही आये; उस दिन से विमला की माँ की सास हर रोज़ अपने बेटे से कहती चाँदी के तुलसीपत्ते बनवा दे पूजा के लिये ।

मगर सुमित्रा को तो कल ही पत्ते चाहिये थे, कल दिन भी था पूरनमासी का, बृहस्पतीवार, वो इसलिये कथा को टालना भी नहीं चाहती थीं किसी और दिन के लिये ।

तभी रामबहादुर पान लेकर आया और बोला, “बहूमाँ, बड़े हनुमानजी के मन्दिर में भी नहीं है, वहाँ तो पिछले बीस दिन से बिना तुलसी के ही पूजा-पाठ चल रहा है ।”

सुनकर मास्टरसाहब बोले, “अगर आप बुरा न माने तो एक बात कहूँ ? हमारे घर में तुलसी है, वहाँ से पत्ते मंगवा लीजिये किसी को भिजवाकर ।”

“मगर आपके यहाँ तुलसी का पेड़ ?” कुछ झिझकते हुए सुमित्रा ने सवाल किया ।
“क्यों, हमारे यहाँ सिर्फ़ अनार का पेड़ ही होना चाहिये क्या ?” मास्टरसाहब हँसने लगे । “अरे आपको तो मालूम है हमें सर्दी-बुखार लगा ही रहता है, तो हमने भी सोचा कि चलो तुलसी की चाय पी लिया करेंगे । अभी ज़्यादा दिन नहीं हुए पेड़ को लाये हुए, इसीलिये शायद आपने ग़ौर नहीं किया होगा । बड़ा सुकून मिलता है इस बुढ़ापे में तुलसी-अदरक के गरमागरम चाय से । फिर, जब हमने देखा की मौसम की ठण्डक बढ़ती जा रही है तो गमले को हमने अपने कमरे के अन्दर रखवा लिया । बस, आज भी पेड़ सही सलामत है ।”

फिर वो रुके, साँस लिये और बोलें, “ईतमिनान रखें, उसमें इधर-उधर का गन्दा पानी बिलकुल नहीं पड़ता है । उसकी देखभाल हम ख़ुद अपनी हाथों से करते हैं । दो-तीन पत्ते उसमें से आप भी ले लीजिये ।”

और फिर, दूसरे दिन एकदम सुबह-सवेरे रामबहादुर जाकर हाजी इक़बाल अहमद सिद्दीक़ी के घर से सत्यनारायण पूजा के लिये तुलसीपत्र लेकर आया । लोगों के पूछने पर सुमित्रा बोलीं पटना से उसके चचेरे भाई का साला इधर कल आनेवाला था जानकर उसीके हाथों मंगवा लिया था । रामबहादुर पुराना नौकर था, वो भी चुप्पी साधे रहा ।

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Raste Band Hain… By Muhammad Mansha Yaad

Photo by: Myra Iqbal

“रास्ते बंद हैं”

लेखक : मुहम्मद मनशा याद
उर्दू से हिंदी : शीराज़ हसन

वो मेला देखने आया हुआ है और उसकी जेब में फूटी कोड़ी नहीं|

मैं उस से पूछता हूँ,”जब तुम्हारी जेब में फूटी कोड़ी नहीं थी, तो तुम मेला देखने क्यूँ आये हो?”

वो पहले रोता और फिर हँसता है और कहता है,”मैं मेले में नहीं आया… मेला ख़ुद मेरे चारों तरफ लग गया है और मैं इसमें घिर गया हूँ | मैंने बाहर निकलने की कई बार कोशिश की है, मगर मुझे रास्ता सुझाई नहीं दिया”
मुझे उस की बात पर यक़ीन ना करने की कोई वजह नज़र नहीं आती, इसलिए मैं परेशान हो जाता हूँ क्यूंकि मैं उस की निगेह्दाश्त[१] पर मामूर[२] हूँ| मुझे पता नहीं मुझे उसकी निगेहदाश्त पर किसने मामूर किया है? मैं बस इतना जानता हूँ कि मुझे हर वक़्त उस के साथ रहना और उसे भटकने से बचाना है|

मेला ज़ोरों पर है| चारों जानिब इंसान ही इंसान नज़र आते हैं| जितने लोग मेले से जाते हैं उससे कई गुना ज़्यादा आ जाते हैं| सड़कों पर, हर तरफ ताँगे, बैल गाड़ियाँ, बसें, ट्रक, कारें और मोटर साइकलें एक दूसरे से आगे निकलने की नाकाम कोशिश करती| होर्न बजाती, धुआँ उड़ाती नज़र आती हैं| होर्न बजा बजा कर ड्राईवरों के और मुसलसल[४] घंटियाँ बजा बजा कर साईकल सवारों के हाथ थक गए हैं| पैदल चलने वालों के चेहरे धूल से अटे हुए हैं और कपड़ों पर गर्द जमी है| लेकिन मेले के शोर ने उनके थके हुए निढाल जिस्मों में नई रूह फूँक दी है| मेले की फिज़ा को धूएँ, गर्द और शोर ओ गुल के बादलों ने ढाँप रखा है| बड़े बड़े लाऊड़ स्पीकरों पर इंसानी आवाज़ें गरजती और चिंघाड़ती हैं| झूलों की चीख़ें, ढोलों की घुम्कारें, मदारियों की बांसुरियों की कूकें और ख्वान्चा फ्रोशों[५] की सदाएं एक दुसरे में ख़लत मलत[६] हो रही हैं|

इन सैंकड़ों क़िस्म की आवाज़ो के शोर में उसे सोडा वॉटर की बोतल खुलने की “बक” जैसी आवाज़ सब से अच्छी लगती है| वो उसे किसी सुरीले नग़मे की तरह सुनता और चाटता है| मैंने कई बार चिल्ला चिल्ला कर उसे आगे बढ़ने के लिए कहा है, मगर वो सोडा वॉटर की बोतलों की दुकान के सामने पत्थर हो गया है| मेरे लिए अजीब मुश्किल है| काश मैं उस से अलेहदा[७] हो सकता, उसे उसके हाल पर छोड़ कर जा सकता| मैं उस की कमीनी हरकतों से आजिज़ आ गया हूँ| अजीब नदीदा[८] आदमी है| सुबह वो कितनी ही देर उसी भट्टी के करीब खड़ा झुलसता रहा जिस पर पुरियां तली जा रही थीं, और यह जानते हुए भी कि उस की जेब में फूटी कोड़ी नहीं, वो बार बार जेब में हाथ डालता फिर ख़ाली हाथ को यूं घूरता जैसे उसकी हथेली पर गर्म गर्म पुरी रखी हो| अजीब वाहियात इंसान है| खाना खाते हुए आदमी के सामने उकडूं बेठे कुत्ते की आँखों में इतना नदीदापन नहीं होता, जितना हलवा पुरी खाते और फ़लूदा पीते लोगों को देख कर उस की निगाहों में झलकने लगता है|

और मेले में देखने की सैंकड़ों चीज़ें हैं| थीएटर के मसख़रे, नाचती गाती औरतें, सर्कस के जानवरों के करतब, मोत के कुँए में चलती मोटर साइकल और चलाने वाले की गोद बैठी लेडी, ऊपर नीचे जाते झूले, फिल्म की टाकी पर दो गाने गाते हुए आशिक़ ओ माशूक़[९] और मदारी के तोप चलाते तोते लेकिन उसे इन में से किसी चीज़ से दिलचस्पी नहीं हालांकि सर्कस के बाहर फ़िल्मी रिकार्डों की धुनों पर नाचते मसख़रों[१०] को देखने पर तो ख़र्च भी कुछ नहीं आता, मगर उसे सिर्फ़ फ़लों, मिठाइयों, फालूदों, आइस-क्रीमोँ , सोडा वॉटर की बोतलों और सीख़ोँ में पिरोय मुर्ग़ों को देखना, घूरना और उनकी ख़ुशबू सूंघना अच्छा लगता है| और हालांकि दोनों वक़्त पीर साहब के डेरे पर से भंडारे की दाल रोटी मिल जाती है, लेकिन उसका पेट नहीं भरता. रात वो मुझे देर तक उन मिठाइयों, फ़लों और चीज़ों के नाम गिनवाता रहा जो उसने कभी नहीं चखी थीं| यह फ़ेहरिस्त इतनी त्वील थी कि मैं उकता गया और उसे मशवरा दिया कि वो सिर्फ़ उन चीज़ों के नाम बताए जिनके ज़ायके से वो आशना था| लेकिन वो रज़ामंद ना हुआ| उसका कहना था की वो लज़ीज़ चीज़ों के ज़िक्र से हासिल होने वाली लज़्ज़त से महरूम[११] होना नहीं चाहता|

मेले में उनकी जान पहचान के और लोग भी हैं|

इलाही बख्श नंबर-दार[१२] का लड़का आशिक़ जो अपने यार दोस्तों के हमराह मेले पर आया है, और उस के डेरे पर हर वक़्त मुजरा होता रहता है और शराब की बोतलें ख़ाली होती रहती हैं| तवाइफ़ें सरों पर रखे और दांतों से पकड़े नोट चुन चुन कर थक जाती हैं| उसने कई बार इरादा किया कि वो आशिक़ के डेरे पर चला जाए| लेकिन मैंने उसे मना कर दिया है| मैं नहीं चाहता कि वो वहाँ दिन रात चिलमें भरता रहे|फिर सरदार मुहम्मद थानेदार है, उसे एतबारी आदमियों की ज़रुरत भी है लेकिन मैंने उसे सरदार मुहम्मद के पास जाने से भी मना कर दिया है| अलिया नाई अपने हाल में मस्त है| जो मेले में ख़ाली हाथ नहीं आया अपने साथ रछानी लेता आया है| उसका जब जी चाहता है हजामतें बनाने लगता है और जब जी चाहता है, थीएटर देखने चला जाता है| थीएटर देखते हुए भी वो करीब बेठे हुए लोगों के नाखुन तराशता रहता है. सिर्फ़ मेहरू सांसी एक ऐसा आदमी है जो उसे देख कर ख़ुश होता है और ख़ुशी के इज़हार के लिए जब भी सामने आता है दांत निकलता है, या फिर कालू है जो उसे देखते ही दुम हिलाने लगता हालांकि उसने ज़िन्दगी भर उसे सूखी रोटी का टुकड़ा तक नहीं डाला|

उसे मेहरू सांसी अच्छा लगता है, शायद इस लिए कि मेहरू गन्दी चीज़ें सही, हर तरह की खाने पीने की चीज़ों के ज़ाएको से आशना है| पिछली बार तो उस ने हद ही कर दी थी| रात को जब अचानक आंधी आ गई तो कालू के साथ पनाह लेने के लिए एक तख़्त पोश[१३] के नीचे घुस गया| तख़्त पोश के नीचे क़लाकंद से भरी कढाई रखी थी, जिसे उसने और कालू ने ख़ाली कर दिया+ उस दिन मेहरू को बाहर निकल कर दो बार गल्ले में उंगली डाल कर क़े करना पड़ी थी. अगर कालू की दुम उस के पाँव के नीचे ना आ जाती तो एक आध बार और कै कर के वो गुलाब जामुनों का भी सफाया कर देता| उसे मेहरू और कालू पर रश्क आता था| अगर मैं उस के हमराह होता या उस से बेपरवाह हो कर सोया रहता तो वो यकीनन भटक जाता| चिलमें भरता| दलाली करता या फिर किसी तख़्त पोश के नीचे घुस कर क़लाकंद या गुलाब जामुनें खा रहा होता| उसने कई बार इरादा किया कि किसी हलवाई की दूकान या किसी होटल में घुस कर जी भर के खाए और ख़ुद को दुकानदार या पुलिस के हवाले कर दे| लेकिन मैंने हर लम्हा उसे ऐसी हरकतों से बाज़ रखा है|
मेले का आज तीसरा रोज़ है|

और मैं निहायत मुश्किल में हूँ|

वो बग़ावत पर आमादा है|

मुझे उसके तेवर बिगड़े हुए नज़र आते हैं| सोडा वॉटर की बोतल खुलने की “बक” जैसी आवाज़ सुन कर उसकी तशफ़ी नहीं होती|

वो हलवा पुरी , क़लाकंद और बालूशाही के ज़िक्र से मुतमईन[१४] नहीं होता|

भुने हुए गोश्त और रोस्ट मुर्ग़ की खुशबू से उसका जी नहीं बहलता और वो फ़लों के नाम गिनवा कर लज़्ज़त हासिल करने पर क़नात नहीं करना चाहता|
मैंने उसे बहुत समझाया है| लान तान और मुलामात की है, लेकिन वो मिस्र है कि वो हर क़ीमत पर उन सब चीज़ों को चख कर देखना चाहता है जिन के ज़ायेके से वो ना आशना है. गुज़श्ता[१५] रात हम दोनों देर तक लड़ते झगड़ते रहे हैं| मैंने उसे साफ़ साफ़ बता दिया है कि अगर वो बाज़ न आया तो मुझे ज़िन्दा न देखेगा लेकिन उसका कहना है कि अगर उस ने अपनी ख्वाहिश[१६] का गला घोंट दिया तो घुट कर मर जाएगा|

मैं अजीब उलझन में हूँ| शायद वो वक़्त आ गया है, जब हमें फैसला करना होगा कि हम दोनों में से किसे ज़िन्दा रहना चाहिए|

लेकिन मैं उसे भी ज़िन्दा, ख़ुश और मुतमईन देखता चाहता हूँ| मैं उसकी तवज्जो[१७] हटाने कि कोशिश करता हूँ और उसे मदारी के करतब, झूलों के मंज़र और मसख़रों के नाच दिखाना चाहता हूँ, लेकिन वो कीमा करेले, भुने हुए गोश्त और रोस्ट मुर्गी और क़लाकंद के ज़ाएको के लिए क़त्ल ओ ग़ारत पर उतर आया है|

वो कहता है “जब यह सब चीजें मौजूद हैं तो मैं इन के ज़ाएको से महरूम क्यूँ हूँ? “

मेरी समझ में नहीं आता कि मैं क्या करूँ, उसे कैसे समझाऊं और भटकने से कैसे बचाऊँ? मेले का चौथा और आख़री रोज़ है|

रात मुझे एक निहायत अछूता सूझा है और मैंने बड़ी मुश्किल से यह बात उस के ज़हन नशीं[१८] कराई है कि असल में सब इंसान एक ही इंसान का परतौ हैं या असल में इंसान एक ही है जो मुख्तलिफ़[१९] शक्लों में जगह जगह नज़र आता है| कहीं वो क़लाकंद खा रहा है| कहीं नाखुन तराश रहा है. कहीं रोस्ट मुर्ग़ उड़ाता है, और कहीं भंडारे कि दाल रोटी पे इक्तफ़ा करता है| इसलिए जो कुछ भी दुनिया में हो रहा है या खाया पिया जा रहा है, उस कि लज़्ज़त इंसान कि मुश्तरिका लज़्ज़त है| चुनांचा जब वो किसी को हलवा पुरी खाते देखता है, तो उसे महसूस करना चाहिए कि खुद हलवा पुरी खा रहा है और इस लज़्ज़त में बराबर का हिस्सा दार है|

मुझे उसकी यह आदत बेहद पसंद आई है कि जब उस के ज़हन में कोई बात बिठा दी जाए तो वो उससे सर मुँह इधर उधर नहीं होता| चुनांचा[२०] उसने जल्द ही मेरी इस अनोखी तजवीज़ [२१] पर अमल करना शुरू कर दिया है|

“बक” बोतल खुलने कि आवाज़ आती है|

एक पतला दुबला आदमी बोतल मुँह से लगाता है| वो अपनी जगा खड़ा मुस्कुरा कर मेरी तरफ़ देखता है और कहता है,” वाह ! वाह ! .क्या ठंडी ठार और मज़ेदार बोतल है!” फिर आस्तीन से मुँह पोंछ कर कहता है “मज़ा आ गया!” सीख़ कबाबों कि ख़ुशबू लपकती हुई आती है और उस के क़दम रोक लेती है|
वो मुँह खोले बग़ैर तिक्कों को दांतों से काटता चबाता है| फिर इन कि लज़्ज़त महसूस करते हुए कहता है,”ज़रा सख्त हैं| मगर गोश्त सख्त ही हो तो मज़ा देता है|”

मैं इत्मीनान का साँस लेता हूँ|

उसकी नज़रें बालूशाही के थाल पर हैं| वो दूकान से कुछ फासले पर खड़े खड़े बालूशाही खाना शुरू कर देता है| खाते खाते उसका मुँह थक जाता है| पेट फूल जाता है मगर बालूशाही ख़त्म होने का नाम नहीं लेती| मैं कहता हूँ, “और खाओ!”

“नहीं बस|” वो डकार लेते हुए जवाब देता है| पापड देखकर कहता है|

” मूह सलून करो गे?”

“हाँ…”

पापड उस के दांतों तले कड़कड़ाते हैं|

“कैसे हैं?”

“बहुत अच्छे हैं! बस ज़रा मसाला तेज़ है|”

“और क्या पसंद करोगे?”

“मैंने आज तक सेब नहीं चखा|”

मैं उसे फलों कि दुकान के सामने ले जाता हूँ, और सेबों कि तरफ़ इशारा कर के कहता हूँ,”यह सेब हैं, तुम जितने चाहो खा सकते हो|”

वो एक सैन निगाहों से उठाता है| दांतों से काटता है, और कहता है

“यह तो नाशपाती है|”

“यह नाशपाती नहीं सेब है, तुम इसे सेब कि तरह महसूसकर के खाओ|”

वो फिर दाँतो से काटता है और कहता है “यह अमरुद है|”

“यह अमरुद नहीं सेब है सेब|”

वो फिर कोशिश करता है, फिर कहता है

“यह आडू है”…..

मुझे ग़ुस्सा आ जाता है … “तुम उल्लू के पठ्ठे हो!”

वो मुझे उदास नज़रों से देखता है, और फिर रुआंसा हो कर कहता है

“मुझे क्या पता सेब का ज़ायेका कैसा होता है, मैंने कभी खाया ही नहीं|”

“अच्चा छोड़ो|”…

मैं कहता हूँ,”अब आगे चलते हैं”

हम बारी बारी एक दुसरे की उंगली पकड़े चलने लगते हैं. एक जगा बहुत से लोग जमा हैं.

“क्या बात है भाई?”….

वो पूछता है ”हादसा हो गया| आदमी ट्रक के नीचे आ कर कुचला गया”….

वो परेशान हो कर मेरी तरफ़ देखता है ….

फिर कहता है….

“ट्रक…. मेरे ऊपर से ट्रक गुज़र रहा है”….

“नहीं” …. मैं चिल्लाता हूँ|

लेकिन इससे पहले कि मैं कुछ और कहूँ वो धड़ाम से नीचे गिर जाता है, और देखते ही देखते ठंडा हो जाता है……|

 

 Glossary:

[१] निगेह्दाश्त: Taking caring. Care.
 
[२] मामूर: Assigned [on duty]
 
[३]  जानिब: To. Facet [Direction]
 
[४] मुसलसल: Continuously 
 
[५]   ख्वान्चा फ्रोशों Hawkers
 
 [६] ख़लत मलत: Moider. Mixed
 
[७] अलेहदा Separate
 
[८]  नदीदा Belly-pinched
 
[९]  आशिक़ ओ माशूक़ Lovers. Lover and Beloved.
 
[१०] मसख़रों Clowns
 
[११] महरूम : Deprived
 
[१२] नंबर-दार Chief of  village.
 
[१३] तख़्त पोश Throne Cover. A big table [in simple words]
 
[१४] मुतमईन Satisfied
 
[१५] गुज़श्ता By-gone. Previous
 
[१६] ख्वाहिश Desire
 
[१७] तवज्जो Attention
 
[१८] ज़हन नशीं Realize. To carry conviction.
 
[१९] मुख्तलिफ़ Different
 
[२०] चुनांचा Haynne. Therefore.
 
[२१]  तजवीज़ Suggestion

 

***

راستے بند ہیں

محمد منشا یاد

وہ میلہ دیکھتے آیا ہوا ہے اور اس کی جیب میں پھوٹی کوڑی نہیں۔

میں اس سے پوچھتا ہوں۔

‘جب تمہاری جیب میں پھوٹی کوڑی نہیں تھی تو تم میلہ دیکھتے کیوں آئے ہو؟’

وہ پہلے روتا ہے اور پھر ہنستا ہے اور کہتا ہے۔

‘میں میلے میں نہیں آیا۔۔۔ میلہ خود میرے چاروں طرف لگ گیا ہے اور میں اس میں گھِر گیا ہوں۔ میں نے باہر نکلنے کی کئی بار کوشش کی ہے مگر مجھے راستہ سجھائی دیا۔’

مجھے اس کی بات پر یقین نہ کرنے کی کوئی وجہ نظر نہیں آتی اس لیے پریشان ہو جاتا ہوں کیونکہ میں اس کی نگہداشت پر مامور ہوں۔ مجھے پتہ نہیں مجھے اس کی نگہداشت ہر کس نے مامور کیا ہے؟ میں بس اتنا جانتا ہوں کہ مجھے ہر وقت اس کے ساتھ رہنا ہے اور اسے بھٹکنے سے بچانا ہے۔

میلہ زوروں پر ہے۔

چاروں طرف انسان ہی انسان نظر آتے ہیں جتنے لوگ میلے سے جاتے ہیں اس سے کئی گنا زیادہ آجاتے ہیں۔ سڑکوں پر ہر طرف تانگے، بیل گاڑیاں، بسیں ، ٹرک، کاریں اور موٹر سائیکلیں ایک دوسرے سے آگے نکلنے کی ناکام کوشش کرتی ہیں۔ ہارن بجاتی، دھواں اُڑاتی نظر آتی ہیں۔ ہارن بجا بجا کر ڈرائیوروں کے اور مسلسل گھنٹیاں بجا بجا کر سائیکل سواروں کے ہاتھ تھک گئے ہیں۔ پیدل چلے والوں کے چہرے دھول سے اٹے ہوئے ہیں اور کپڑوں پر گرد جمی ہے۔ لیکن میلے کے شور نے ان کے تھکے ہوئے نڈھال جسموں میں نئی روح پھونک دی ہے۔ میلے کی فضا کو دھوئیں، گرد اور شور و غل کے بادلوں نے ڈھانپ رکھا ہے۔ بڑے بڑے لاﺅڈ سپیکروں پر انسانی آوازیں گرجتی اور چنگھاڑتی ہیں۔ جھولوں کی چیخیں، ڈھولوں کی گھمکاریں، مداریوں کی بانسریوں کی کوکیں اور خوانچہ فروشوں کی صدائیں ایک دوسرے میں غلط ملط ہورہی ہیں۔ ان سینکڑوں قسم کی آوازوں کے شور میں اسے سوڈا واٹر کی بوتل کھلنے کی ‘بَک’ جیسی آواز سب سے اچھی لگتی ہے۔ وہ اسے کسی سریلے نغمے کی طرح سنتا اور چاٹتا ہے۔ میں نے کئی بار چلا چلا کر اسے آگے بڑھنے کے لئے کہا ہے مگر وہ سوڈا واٹر کی بوتلوں کی دکان کے سامنے پتھر ہوگیا ہے۔ میرے لیے عجیب مشکل ہے۔ کاش میں اس سے علیحدہ ہوسکتا، اسے اس کی حال پر چھوڑ کر جا سکتا۔ میں اس کی کمینی حرکتوں سے آجز آگیا ہوں۔ عجیب ندیدہ آدمی ہے۔ صبح وہ کتنی ہی دیر تک اس بھٹی کے قریب کھڑا جھلستا رہا جس پر پوریاں تلی جا رہی تھیں اور یہ جانتے ہوئے بھی کہ اس کی جیب میں پھوٹی کوڑی نہیں، وہ بار بار جیب میں ہاتھ ڈالتا پھر خالی ہاتھ کو یوں گھورتا جیسے اس کی ہتھیلی پر گرم گرم پوری رکھی ہو۔ عجیب واہیات انسان ہے۔ کھانا کھاتے ہوئے آدمی کے سامنے اکڑوں بیٹھے کتے کی آنکھوں میں اتنا ندیدہ پن نہیں ہوتا، جتنا حلوہ پوری کھاتے اور فالودہ پیتے لوگوں کو دیکھ کر اس کی نگاہوں سے جھلکنے لگتا ہے۔

وہ میلہ دیکھنے آیا ہے۔

اور میلے میں دیکھنے کی سینکڑوں چیزیں ہیں۔ تھیٹر کے مسخرے، ناچتی گاتی عورتیں، سرکس کے جانوروں کے کرتب، موت کے کنویں میں چلتی موٹر سائیکل اور چلانے والے کی گود میں بیٹھی لیڈی، اوپر نیچے جاتے جھولے ، فلم کی ٹاکی پر دوگانے گاتے ہوئے عاشق و معشوق اور مداری کے توپ چلاتے طوطے لیکن اسے ان میں سے کسی چیز سے دلچسپی نہیں حالانکہ سرکس کے باہر فلمی ریکارڈوں کی دھنوں پر ناچتے مسخروں کو دیکھنے پر تو خرچ بھی کچھ نہیں آتا مگر اسے صرف کھانے پینے کی چیزوں سے دلچسپی ہے۔ اسے پھلوں، مٹھائیوں، فالودوں، آئس کریموں، سوڈا واٹر کی بوتلوں اور سیخوں میں پروئے ہوئے مرغوں کو دیکھنا، گھورنا اور ان کی خوشبو سونگھنا اچھا لگتا ہے اور حالانکہ دونوں وقت پیر صاحب کے ڈیرے پر سے بھنڈارے کی دال روٹی مل جاتی ہے لیکن اس کا پیٹ نہیں بھرتا۔ رات وہ مجھے دیر تک ان مٹھائیوں، پھلوں اور چیزوں کے نام گنواتا رہا جو اس نے کبھی نہیں چکھی تھیں۔ یہ فہرست اتنی طویل تھی کہ میں اُکتا گیا اور اسے مشورہ دیا کہ وہ صرف ان چیزوں کے نام بتائے جن کے ذائقے سے وہ آشنا ہے۔ لیکن وہ رضامند نہ ہوا۔ اس کا کہنا تھا کہ وہ لذیذ چیزوں کے ذکر سے حاصل ہونے والی لذت سے محروم ہونا نہیں چاہتا۔

میلے میں اس کی جان پہچان کے اور لوگ بھی تھے۔

الٰہی بخش نمبردار کا لڑکا عاشق ہے جو اپنے یار دوستوں کے ہمراہ میلے پر آیا ہے اور اس کے ڈیرے پر ہر وقت مجرا ہوتا رہتا ہے اور شراب کی بوتلیں خالی ہوتی رہتی ہیں۔ طوائفیں سروں پر رکھے اور دانتوں سے پکڑے ہوئے نوٹ چُن چُن کر تھک جاتی ہیں ۔ اس نے کئی بار ارادہ کیا کہ وہ عاشق کے ڈیرے ہر چلا جائے۔ لیکن میں نے اسے منع کر دیا ہے۔ میں نہیں چاہتا کہ وہ وہاں دن رات چلمیں بھرتا رہے۔ پھر سردار محمد تھانیدار ہے اسے اعتباری آدمیوں کی ضرورت بھی ہے لیکن میں نے اسے سردار محمد کے پاس جانے سے بھی منع کر دیا ہے۔ علیا نائی اپنے حال میں مست ہے۔ جو میلے میں خالی ہاتھ نہیں آیا اپنے ساتھ رچھانی لیتا آیا۔ اس کا جب جی چاہتا ہے حجامتیں بنانے لگتا ہے اور جب جی چاہتا ہے تھیٹر دیکھنے چلا جاتا ہے۔ تھیٹر دیکھتے ہوئے بھی وہ قریب بیٹھے ہوئے لوگوں کے ناخن تراشتا رہتا ہے۔ صرف مہرو سانسی ایک ایسا آدمی ہے جو اسے دیکھ کر خوش ہوتا ہے اور خوشی کے اظہار کے لیے جب بھی سامنے آتا ہے دانت نکالتا ہے یا پھر کالو ہے جو اسے دیکھتے ہی دُم ہلانے لگتا ہے حالانکہ اس نے زندگی بھر اسے سوکھی روٹی کا ٹکڑا تک نہیں ڈالا۔

اسے مہرو سانسی اچھا لگتا ہے شاید اس لیے کہ مہرو گندی چیزیں سہی ہر طرح کی کھانے پینے کی چیزوں کے ذائقوں سے آشنا ہے۔ پچھلی تو اس نے حد ہی کر دی تھی۔ رات کو جب اچانک آندھی آگئی تو کالو کے ساتھ پناہ لینے کے لئے ایک تخت پوش کے نیچے گھُس گیا تھا، تخت پوش کے نیچے قلاقند سے بھری کراہی رکھی تھی جسے اس نے اور کالو نے خالی کر دیا۔ اس دن مہرو کو باہر نکل کر دو بار گلے میں انگلی ڈال کر قے کرنا پڑی تھی۔ اگر کالو کی دم اس کے پاﺅں کے نیچے نہ آجاتی تو ایک آدھ بار اور قے کر کے وہ گلاب جامنوں کا بھی صفایا کر دیتا۔ اسے مہرو اور کالو پر رشک آتا تھا اگر میں اس کے ہمراہ نہ ہوتا یا اس سے بے پرواہ ہو کر سویا رہتا تو وہ یقیناً بھٹک جاتا۔ چلمیں بھرتا۔ دلالی کرتا یا پھر کسی تخت پوش کے نیچے گھس کر قلاقند یا گلاب جامنیں کھا رہا ہوتا۔ اس نے کئی بار ارادہ کیا کہ کسی حلوائی کی دکان یا کسی ہوٹل میں گھس کر جی بھر کے کھائے اور خود کو دکاندار یا پولیس کے حوالے کر دے۔ لیکن میں نے ہر لمحہ اسے ایسی حرکتوں سے بار رکھا ہے۔

میلے کا آج تیسرا روز ہے۔

اور میں نہایت مشکل میں ہوں۔

وہ بغاوت پر آمادہ ہے۔

مجھے اس کے تیور بگڑے ہوئے نظر آتے ہیں۔ سوڈا واٹر کی بوتل کھلنے کی ‘بَک’ جیسی آواز سن کر اس کی تشفی نہیں ہوتی۔

وہ حلوہ پوری، قلاوقند اور بالُو شاہی کے ذکر سے مطمئن نہیں ہوتا ۔

بھنے ہوئے گوشت اور روسٹ مرغ کی خوشبو سے اس کا جی نہیں بہلتا اور وہ پھلوں کے نام گنوا کر لذت حاصل کرنے پر قناعت نہیں کرنا چاہتا۔

میں نے اسے بہت سمجھایا ہے۔ لعن طعن اور ملامت کی ہے لیکن وہ مِصر ہے کہ وہ ہر قیمت پر ان سب چیزوں کو چکھ کر دیکھتا چاہتا ہے جن کے ذائقے سے وہ نا آشنا ہے۔ گزشتہ رات ہم دونوں دیر تک لڑتے جھگڑتے رہے ہیں۔ میں نے اسے صاف صاف بتا دیا ہے کہ اگر وہ باز نہ آیا تو مجھے زندہ نہ دیکھے گا لیکن اس کا کہنا ہے کہ اگر اس نے اپنی خواہش کا گلا گھونٹ دیا تو گھٹ کر مر جائے گا۔

میں عجیب الجھن میں ہوں۔ شاید وہ وقت آگیا ہے۔ جب ہمیں یہ فیصلہ کرنا ہوگا کہ ہم دونوں میں سے کسے زندہ رہنا چاہئے۔

میں زندہ رہتا چاہتا ہوں۔

لیکن میں اسے بھی زندہ، خوش اور مطمئن دیکھتا چاہتا ہوں۔ میں س کی توکی توجہ ہٹانے کی کوشش کرتا ہوں اور اسے مداری کے کرتب، جھولوں کے مناظر اور مسخروں کے ناچ دکھانا چاہتا ہوں لیکن وہ قیمہ کریلے، بھنے ہوئے گوشت اور روسٹ مرغی اور قلاقند کے ذائقوں کے لئے قتل و غارت پر اتر آتا ہے۔

وہ کہتا ہے ‘جب یہ سب چیزیں موجود ہیں تو میں ان کے ذائقوں سے محروم کیوں ہوں۔’

میری سمجھ میں نہیں آتا کہ میں کیا کروں۔ اسے کیسے سمجھاﺅں اور بھٹکنے سے کیسے بچاﺅں؟ میلے کا آخری اور چوتھا روز ہے۔

رات مجھے ایک نہایت اچھوتا خیال سوجھا ہے اور میں نے بڑی مشکل سے یہ بات اس کے ذہن نشین کرائی ہے کہ اصل میں سب انسان ایک ہی انسان کا پرتَو ہیں یا اصل میں انسان ایک ہی ہے جو مختلف شکلوں میں جگہ جگہ نظر آتا ہے۔ کہیں وہ قلاقند کھا رہا ہے۔ کہیں ناخن تراش رہا ہے۔ کہیں روسٹ مرغ اُڑتا ہے اور کہیں بھنڈارے کی دال روٹی ہر اکتفا کرتا ہے۔ اس لیے جو کچھ بھی دنیا میں ہو رہا ہے یا کھایا پیا جا رہا ہے اس کی لذت انسان کی مشترکہ لذت ہے۔ چنانچہ جب وہ کسی کو حلوہ پوری کھاتے ریکھتا ہے تو اسے محسوس کرنا چاہئے کہ خود حلوہ پوری کھا رہا ہے اور اس لذت میں برابر کا حصہ دار ہے۔

مجھے اس کی یہ عادت بے حد پسند آئی کہ جب اس کے ذہن میں کوئی بات بٹھا دی جائے تو وہ اس سے سومو ادھر اُدھر نہیں ہوتا۔ چنانچہ اس نے جلد ہی میری اس انوکھی تجویز پر عمل کرنا شروع کر دیا ہے۔

‘بَک’ بوتل کھلنے کی آواز آتی ہے۔

ایک دبلا پتلا آدمی بوتل منہ سے لگاتا ہے۔ وہ اپنی جگہ کھڑا مسکرا کر میری طرف دیکھتا ہے اور کہتا ہے۔

‘واہ، واہ، کیا ٹھنڈی ٹھار اور مزے دار بوتل ہے۔’ پھر آستین سے منہ پونجھ کر کہنا ہے۔ ‘مزا آ گیا۔’ سیخ کبابوں کی خوشبو لپکتی ہوئی آتی ہے اور اس کے قدم روک لیتی ہے۔

وہ منہ کھولے بغیر تِکوں کو دانتوں کا کاٹتا چباتا ہے۔ پھر ان کی لذت محسوس کرتے ہوئے کہتا ہے۔

‘ذرا سخت ہیں، مگر گوشت سخت ہی ہو تو مزا دیتا ہے۔’

میں اطمینان کا سانس لیتا ہوں۔

اس کی نظریں بالو شاہی کے تھال پر ہیں۔ وہ دکان کے کچھ فاصلے پر کھڑے کھڑے بالو شاہی کھانا شروع کر دیتا ہے۔ کھاتے کھاتے اس کا منہ تھک جاتا ہے۔ پیٹ پھول جاتا ہے مگر بالو شاہی ختم ہونے کا نام نہیں لیتی۔ میں کہتا ہوں ‘اور کھاﺅ’۔

‘نہیں بس’ وہ ڈکار لیتے ہوئے جواب دیتا ہے۔ پاپڑ دیکھ کر کہتا ہوں۔

‘منہ سلونا کروگے؟’

‘ہاں۔۔۔۔۔’

پاپڑ اس کے دانتوں تلے کڑکڑاتے ہیں۔

‘کیسے ہیں؟’

‘بہت اچھے ہیں بس ذرا مصالحہ تیز ہے’۔

‘اور کیا پسند کرو گے؟’

‘میں نے آج تک سیب نہیں چکھا’۔

میں اسے پھلوں کی دکان کے سامنے لے جاتا ہوں اور سیبوں کی طرف اشارہ کر کے کہتا ہوں

‘یہ سیب ہیں تم جتنے چاہے کھا سکتے ہو’۔

وہ ایک سیب نگاہوں سے اٹھاتا ہے۔ دانتوں سے کاٹتا ہے اور کہتا ہے۔

‘یہ تو ناشپاتی ہے’۔

‘یہ ناشپاتی نہیں سیب ہے تم اسے سیب کی طرح محسوس کر کے کھاﺅ’۔

وہ پھر دانتوں سے کاٹتا ہے اور کہتا ہے ‘یہ امرود ہے’۔

‘یہ امرود نہیں سیب ہے’۔

وہ پھر کوشش کرتا ہے اور پھر کہتا ہے۔

‘یہ آڑو ہے’۔۔۔

مجھے غصہ آجاتا ہے۔ ‘تم الّو کے پٹھے ہو’۔۔۔۔

وہ مجھے اداس نظرو سے دیکھتا ہے اور پھر روہانسا ہو کر کہتا ہے:

‘مجھے کیا پتہ سیب کا ذائقہ کیسا ہوتا ہے میں نے کبھی کھایا ہی نہیں’۔

‘اچھا چھوڑو’۔۔۔

میں کہتا ہوں۔

‘اب آگے چلتے ہیں’

ہم باری باری ایک دوسرے کی انگلی پکڑے چلنے لگتے ہیں۔ ایک جگہ بہت سے لوگ جمع ہیں۔

‘کیا بات ہے بھائی؟’۔۔۔

وہ پوچھتا ہے۔

‘حادثہ ہو گیا ہے۔ آدمی ٹرک کے نیچے آکر کچلا گیا’۔۔۔

وہ پریشان ہو کر میری طرف دیکھتا ہے۔

پھر کہتا ہے۔۔۔

‘ٹرک۔۔۔ میرے اوپر سے ٹرک گزر رہا ہے’۔۔۔۔

‘نہیں۔۔۔’ میں چلاتا ہوں۔

لیکن اس سے پہلے میں کچھ اور کہوں وہ دھڑام سے نیچے گر جاتا ہے اور دیکھتے ہی دیکھتے ٹھنڈا ہو جاتا ہے۔۔۔۔

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